Sunday, April 12, 2009

आन्दोलनों का गवाह है लखनऊ जीपीओ पार्क

अक्सर प्रदर्शनकारियों से आबाद रहने वाले लखनऊ जीपीओ पार्क की आजादी से पहले भी यही भूमिका थी। वर्तमान पीढ़ी के शायद बहुत कम लोग आजादी की लड़ाई में जीपीओ पार्क योगदान के बारे में जानते होंगे। आज जहाँं जीपीओ पार्क है आजादी से पहले वहाँ ‘रिंक थियेटर‘ हुआ करता था। लखनऊ में चलने वाले काकोरी षडयंत्र केस का मुकदमा पहले रौशनउद्दौला लाइब्रेरी में शुरू हुआ मगर तुरन्त ही बाद इसकी सुनवाई ‘रिंक थियेटर‘ में होने लगी। यहाँ सन 1925 में दस माह तक यह केस चला। सेशन जज हेमलटन इस केस की सुनवाई करते थे और सरकारी वकील जगत नरायण मुल्ला व आनन्द नरायण मुल्ला बहस करते थे। यहीं रामकृष्ण खत्री व शचीन्द्रनाथ सान्याल की पैरवी के लिए चन्द्रभानु गुप्त, मोहनलाल सक्सेना व कृपाशंकर हजेला कलकत्ता के बैरिस्टर बी0के0 चैधरी के साथ यहाँ आया करते थे। क्रान्तिकारियों को जेल से लाते समय कान्यकुब्ज कालेज से कैसरबाग चैराहे तक छात्रों की भीड़ उमड़ पड़ती थी। जिस दिन ‘रिंक थियेटर‘ में शचीन्द्रनाथ सान्याल को काले पानी व रामकृष्ण खत्री को दस साल के कठोर कारावास की सजा सुनायी गयी थी, उसी दिन ‘रिंक थियेटर‘ को तोड़कर यहाँ पर जीपीओ पार्क की नींव रखी गई। इसलिए लखनऊ जीपीओ पार्क और आन्दोलन का जन्मजात रिश्ता है।
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