Monday, June 22, 2009

गाँधी और नेहरू की ऐतिहासिक चिट्ठियाँ

चिट्ठियाँ-पत्रों का अपना इतिहास है। हर पत्र अपने अन्दर एक कहानी छुपाये हुए है। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान और उसके बाद प्रतिष्ठित राजनेताओं द्वारा लिखे गये पत्र सिर्फ शब्द मात्र नहीं बल्कि इतिहास की धरोहर है। वक्त बीतने के साथ यह धरोहर बहुमूल्य होती गईं और यही कारण है कि आज इनकी नीलामी करोड़ों रूपये में होती है।

लंदन की मशहूर नीलामी संस्था क्रिस्टी 14 जुलाई, 2009 को राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी एवं प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की चिट्ठियाँ, पोस्टकार्ड और कुछ कागजात नीलाम करने जा रही है। इनमें उर्दू में लिखे वो तीन पत्र भी शामिल हैं जिन्हें गाँधी जी ने इस्लाम के विद्वान और तब की मशहूर हस्ती मौलाना अब्दुल बारी को लिखे थे। इन पत्रों में हिंदू-मुस्लिम संबंध, लखनऊ में सांप्रदायिक तनाव और गाँधी व बारी के बीच दोस्ती की चर्चा है। इस नीलामी में महात्मा गाँधी के उर्दू में हस्ताक्षर वाले दो पोस्टकार्ड भी शामिल हंै। ये पोस्टकार्ड उर्दू के कवि हामिदउल्ला अफसर को भेजे गए थे। इसी क्रम में नेहरू जी के हस्ताक्षर वाले 29 पत्रों की एक श्रृंखला भी नीलाम की जाएगी। नेहरू जी के इन पत्रों में कश्मीर मुद्दा, साराभाई के राजनीतिक अभियानों, देश के विभाजन के बाद अपने घर से विस्थापित हुए मुसलमानों का पुनर्वास और दिल्ली में घरविहीन बच्चों के लिए शुरू की गई मानवीय परियोजना की चर्चा है। 3 अगस्त, 1953 को लिखे एक पत्र में नेहरू जी ने बताया है कि वह हर कीमत पर अपने निर्णय के अनुसार काम करेंगे। उन्होंने लिखा है- जो हो रहा है उसका कश्मीर में ही नहीं, पूरे भारत और पाकिस्तान में क्या परिणाम होने वाला है, इसके बारे में मैं शायद आपसे ज्यादा बेहतर ढंग से जानता हूँ। यह पत्र कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला को हटाए जाने से पहले लिखा गया है। निश्चिततः तत्कालीन इतिहास और परिवेश को सहेजे हुए ये पत्र न सिर्फ अमूल्य विरासत हैं बल्कि हमारी धरोहर भी हैं।
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