Wednesday, April 21, 2010

युग-युग जियो डाकिया भैया

युग-युग जियो डाकिया भैया, सांझ सबेरे इहै मनाइत है.....
हम गंवई के रहवैया
पाग लपेटे, छतरी ताने, कांधे पर चमरौधा झोला,
लिए हाथ मा कलम दवाती, मेघदूत पर मानस चोला
सावन हरे न सूखे कातिक, एकै धुन से सदा चलैया......

शादी, गमी, मनौती, मेला, बारहमासी रेला पेला
पूत कमासुत की गठरी के बल पर, फैला जाल अकेला
गांव सहर के बीच तुहीं एक डोर, तुंही मरजाद रखवैया
थानेदार, तिलंगा, चैकीदार, सिपाही तहसीलन के
क्रुकअमीन गिरदावर आवत, लोटत नागिन छातिन पै
तुहैं देख कै फूलत छाती, नयन जुड़ात डाकिया भैया
युग-युग जियो डाकिया भैया.......

अनिल मोहन
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