Friday, July 16, 2010

चिट्ठी न कोई संदेश.....


पूरी छुट्टियां निकल गईं, और उस अलमारी की सफाई नहीं कर पाई, जो साल भर से मेरा मुंह जोह रही थी, आज बिना किसी प्लान के उसे साफ़ करने बैठ गई. एक बड़ा सा लिफाफा दिखाई दिया, पिछले कई सालों से इस लिफ़ाफ़े को बिना देखे ही पोंछ-पांछ के रख देती थी, आज खोल लिया, तमाम अंतर्देशीय, पोस्ट कार्ड, और लिफ़ाफ़े सामने बिखर गए और इन सारी चिट्ठियों के पीछे हमारे पोस्टमैन चाचा का चेहरा उभर कर दिखाई देने लगा.लगा कितने दिन हो गए किसी की चिट्ठी आये हुए.कितनी बार रोका है खुद को पुराने किस्से लिखने से, लेकिन क्या करुँ, पिछले बीस सालों में समय कुछ ऐसे बदला हैं, कुछ आदतें इस क़दर ख़त्म हुईं हैं, कि लिखने कुछ और बैठती हूँ, लिख कुछ और ही जाता है.आज भी नए टीवी शो " बिग-मनी" पर लिखने का मन बनाया था, लेकिन बीच में ये चिट्ठियाँ आ गईं.मन फिर वही नौगाँव की गलियों में भटकने लगा.

वो समय पोस्ट-ऑफिस के स्वर्ण युग की तरह था. चिट्ठी, तार, टेलीफोन, पार्सल, रजिस्ट्री, मनी ऑर्डर..सारे काम पोस्ट ऑफिस से, पोस्ट मैन कितने महत्वपूर्ण होते थे त. घरों में फोन लगवाने का चलन नहीं था. टेलीफोन तब केवल ऑफिसों में, बड़े सरकारी अधिकारियों के घरों में होते थे. सार्वजनिक रूप से टेलीफोन की सुविधा केवल पोस्ट ऑफिस में ही मिलती थी. लोग भी जब बहुत ज़रूरी हो, तभी फोन लगाने जाते थे. बाहर कहीं फोन लगाना है, तो ट्रंक-कॉल बुक होती थी. लाइन मिलने पर खूब चिल्ला-चिल्ला के बात करनी पड़ती थी. शायद इसीलिये पुराने लोग आज भी मोबाइल पर ज़ोर-ज़ोर से बात करते मिल जायेंगे...:)

तो पोस्ट ऑफिस का अपना अलग ही रुतबा था. और पोस्ट-मास्टर से ज्यादा पोस्ट मैन का. हम घर में पोस्ट मैन का इंतज़ार इस तरह करते थे, जैसे किसी ख़ास मेहमान का. सुबह ग्यारह बजे और दोपहर में एक बजे डाक आती थी. हम सब भाई-बहन इस कोशिश में रहते कि पत्र उसी के हाथ में आये, भले ही वो हमारे काम का हो या न हो. हमारे कान बाहर ही लगे रहते. उधर पोस्ट मैन की आवाज़ आई, इधर हम गिरते-पड़ते भागते... चिट्ठी पा जाने वाला विजेता की मुद्रा में मुस्कुराता, पत्र खोलता, हमारी आँखें उस पर लगी रहतीं- " किसका है?" जिसे पत्र मिलता, उसे ही पत्र पढ़ के सुनने का हक़ होता. घर के सारे पढ़े-लिखे लोग, पत्र सुनने बैठ जाते।

सुनने के बाद, यदि किसी ख़ास का पत्र है, तो बारी-बारी से सब पढ़ते. राय-मशविरा होता. और फिर उसे हमारे पापा अपनी फ़ाइल में सहेज लेते. पत्रों के जवाब देना उनकी दिनचर्या में शामिल था.
हमारे पोस्ट मैन, जिन्हें हम चाचा कहते थे, बड़ी दूर से "अवस्थी जीईईईई ...." की हांक लगाते थे, जिस पर हम दौड़े चले आते थे।

कुछ और बाद में जब मैं छपने लगी तो मेरी फैन-मेल आने लगी, अब पोस्ट मैन चाचा मेरे लिए और भी ख़ास हो गए थे. रचनाएं वापस न आ रहीं हों, इस डर से मेरी कोशिश होती थी कि पोस्ट मैन के आने के वक्त मैं ही बाहर रहूँ :)
धीरे-धीरे टेलीफोन का चलन बढ़ा, तो चिट्ठियों में कुछ कमी आई. लेकिन अब, जब से मोबाइल का चलन बढ़ा है, नेट का चलन आम हो गया है, पत्र आने ही बंद हो गए. कभी कोई सरकारी डाक आ जाती है बस. लोग पत्र लिखना ही भूल गए. अब तो ये भी नहीं मालूम कि लिफाफे या पोस्ट कार्ड की कीमत आज कितनी है?
इन त्वरित सेवाओं ने निश्चित रूप से दूरियां काम की हैं, लेकिन इनसे उस काल-विशेष को सहेजा नहीं जा सकता. यादों में शामिल नहीं किया जा सकता, किसी बात का अब साक्ष्य ही नहीं.. सब मौखिक रह गया...लिखित कुछ भी नहीं..
कभी-कभी सुविधाएं भी कितनी अखरने लगतीं हैं.. !!

(साभार : वन्दना अवस्थी दुबे के 'अपनी बात' ब्लॉग से )
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