Thursday, December 9, 2010

गौरैया और कबूतर के साथ उडेंगी चिट्ठियाँ

भारतीय डाक विभाग ने 9 जुलाई सन 2010 को गौरैया व कबूतर पर डाक टिकट जारी किए। गौरैया व कबूतर हमारी संस्कृति और परंपराओं का हिस्सा रहे हैं, लोकजीवन में इनसे जुड़ी कहानियां व गीत आप को लोक साहित्य में मिलेंगें। इधर कुछ वर्षों से पक्षी वैज्ञानिकों एंव सरंक्षणवादियों का ध्यान घट रही गौरैया की तरफ़ गया। नतीजतन इसके अध्ययन व सरंक्षण की बात शुरू हुई, जैसे की पूर्व में गिद्धों व सारस के लिए हुआ। डाक टिकटों में एक नर व मादा गौरैया को एक मिट्टी के घड़े पर बैठे हुए दर्शाया गया है, दूसरे सेट में कबूतरों का एक जोड़ा चित्रित है। एक डाक टिकट की कीमत पाँच रुपये हैं। जो पूरे भारत में आप के पत्र को पहुंचाने में सक्षंम हैं.डाक टिकटों को इकट्ठा करने वाले लोगों के संग्रह में कबूतर और गौरैया की तस्वीर वाले डाक टिकटों की बढ़ोत्तरी हो सकेगी।पक्षी प्रेमियों के लिए भी यह एक सुखद अनुभव होगा जब वह गौरैया या कबूतर वाले डाक टिकट लगे पत्रों को प्राप्त करेंगे या किसी को भेजेंगे।

हांलाकि ई-मेल व मोबाइल ने चिठ्ठियों के चलन को काफ़ी हद तक कम किया हैं, लेकिन हाथ से लिखे खत और उन पर चिपके हुए रंग-बिरंगी तस्वीरों वाले टिकट मानव मन-मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव छोड़ते हैं, साथ ही वह खत व टिकट लिफ़ाफ़े हमारे अतीत की यादों को सुरक्षित रखने में भी मदद करते हैं। क्योंकि जब भी आप इन धूल चढ़े लिफ़ाफ़ों से वह परत हटायेंगे तो बरबस ही वह पुराना वक्त और वह बाते ताजा होंगी जो इस खत में लिखी हुई हैं। खास बात है कि कागज के यह खत जो कहते हैं, उस बात का पालन करने के लिए हम अधिक तत्पर व संवेदनशील होते हैं। वह प्रभाव इलेक्ट्रानिक संपर्क के किसी माध्यम में मौजूद नही हैं।

इसलिए इस बार जब आप किसी को खत लिखे तो गौरैया व कबूतर वाले टिकट लगाना मत भूलिएगा, और यह भी जरूर लिखिएगा कि हमारें घरों व उनके आस-पास रहने वाले इन खूबसूरत परिन्दों के खाने-पीने का खयाल रखते है या नही।

साभार :दुधवा लाइव डेस्क
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