Sunday, November 15, 2009

"राजस्थान पत्रिका" में ब्लॉग की चर्चा

"डाकिया डाक लाया" ब्लॉग की चर्चा सबसे पहले 8 अप्रैल, 2009 को दैनिक हिंदुस्तान अख़बार में ब्लॉग वार्ता के अंतर्गत की गई थी। रवीश कुमार जी ने इसे बेहद रोचक रूप में प्रस्तुत किया था. इसके बाद इसकी चर्चा 29 अप्रैल 2009 के दैनिक 'राष्ट्रीय सहारा' पत्र के परिशिष्ट 'आधी दुनिया' में 'बिन्दास ब्लाग' के तहत की गई. "प्रिंट मीडिया पर ब्लॉग चर्चा" द्वारा पता चला कि अब इस ब्लॉग की २२ अक्तूबर की पोस्ट "2009 ईसा पूर्व में लिखा गया दुनिया का पहला पत्र'' की चर्चा 11 नवम्बर 2009 को राजस्थान पत्रिका, जयपुर संस्करण के नियमित स्तंभ 'ब्लॉग चंक' में की गई है....ऐसे में यह जानकर अच्छा लगता है कि इस ब्लॉग को आप सभी का भरपूर प्यार व सहयोग मिल रहा है. आप सभी शुभेच्छुओं का आभार !!

Thursday, October 22, 2009

2009 ईसा पूर्व में लिखा गया दुनिया का पहला पत्र

हममें से हर किसी ने अपने जीवन में किसी न किसी रूप में पत्र लिखा होगा। पत्रों का अपना एक भरा-पूरा संसार है। दुनिया की तमाम मशहूर शख्सियतों ने पत्र लिखे हैं- फिर चाहे वह नेपोलियन हों, अब्राहम लिंकन, क्रामवेल, बिस्मार्क या बर्नाड शा हों। महात्मा गाँधी तो रोज पत्र लिखा करते थे. अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा को आज भी रोज ४०,०० से ज्यादा पत्र प्राप्त होते हैं.आज ये पत्र एक धरोहर बन चुके हैं। ऐसे में यह जानना अचरज भरा लगेगा कि दुनिया का सबसे पुराना पत्र बेबीलोन के खंडहरों से मिला था, जो कि मूलत: एक प्रेम-पत्र था. बेबीलोन की किसी युवती का प्रेमी अपनी भावनाओं को समेटकर उससे जब अपने दिल की बात कहने बेबीलोन तक पहुँचा तो वह युवती तब तक वहां से जा चुकी थी। वह प्रेमी युवक अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाया और उसने वहीं मिट्टी के फर्श पर खोदते हुए लिखा- ''मैं तुमसे मिलने आया था, तुम नहीं मिली।'' यह छोटा सा संदेश विरह की जिस भावना से लिखा गया था, उसमें कितनी तड़प शामिल थी। इसका अंदाजा सिर्फ वह युवती ही लगा सकती थी जिसके लिये इसे लिखा गया। भावनाओं से ओत-प्रोत यह पत्र 2009 ईसा पूर्व का है और आज हम वर्ष 2009 में जी रहे हैं. ...तो आइये पत्रों के इस सफर का स्वागत करते हैं और अपने किसी को एक खूबसूरत पत्र लिखते हैं !!

Monday, October 12, 2009

यादगार के तौर पर चिट्ठियाँ

21वीं सदी में संचार माध्यमों की बढ़ती उपयोगिता ने बहुत सारी चीजों को प्रभावित किया है। जाहिर है कि मोबाइल के आने के बाद से हिंदी साहित्य में जिस विधा का अस्तित्व लगभग समाप्त हो चला है वह पत्र है। हर नये साल की शुरूआत में जब भी साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं में लेखा-जोखा प्रकाशित होता है तो उसमें कहानी, कविता, उपन्यास विषयों में तो पुस्तकों की भरमार होती है लेकिन पत्र, संस्मरण, साक्षात्कार, आत्मकथा की पुस्तकों की संख्या इस कदर कम होती है कि उसे उंगलियों पर गिना जा सकता है। संचार माध्यमों के विशेषकर मोबाइल के आम आदमी के हाथों में पहुँचने से पहले की बात की जाए तो निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि अपने सुख और दुःख व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम हमारे समाज में चिट्ठियां रही हैं। एक समय में परिवार से दूर रह रहा व्यक्ति अपनी पत्नी और पुत्र-पुत्रियों से चिट्ठियों के माध्यम से संवाद कायम किया करता था।

आधुनिक भारत के निर्माता पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा अपनी बेटी इंदिरा गांधी को लिखी गई चिट्ठियों की चर्चा आज भी की जाती है। चिट्ठी आज भी संवाद भावनाओं को व्यक्त करने का सशक्त जरिया मानी जाती है। आज भी मेरे पास माँ की लिखी गई चिट्ठियां हैं जो सिर्फ परिवार तक सीमित न होकर गाँव जंवार और बाग बगीचों को भी खबर देने वाली रही हैं। इस बीच मोबाइल का आगमन क्या हुआ कि लोग बेहद कम कीमत पर दूर बैठे अपने परिजनों से बातचीत करने लगे लेकिन इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि धीरे-धीरे पूरा समाज चिट्ठियां लिखने और भेजने से कतराने लगा। एक समय आज से करीब 20 साल पहले पोस्टमैन की आवाज सुनने के लिए गाँव की स्त्रियां और पुरूष बाट जोहते थे। पोस्टमैन न सिर्फ चिट्ठियां लाता था बल्कि मनीआर्डर और नौकरी की खबर भी। यह सच भी है कि जब हम 30 सेकेंड के भीतर ही अपने प्रियजनों की सुमधुर आवाज सुन सकते हैं तो चिट्ठी लिखकर पोस्ट आफिस में डालने और उसका जवाब आने का इंतजार कौन करे? एक समय में कबूतर भी चिट्ठियां ले जाने का काम किया करते थे और कई फिल्मों में ऐसे दृश्य दिखाए भी गए हैं जिसमें कबूतर पत्र लिखने वाले की प्रेमिका को उसके जज्बातों से लबरेज चिट्ठी पहुँचा दिया करता था। आज से पहले किसी बड़े कथाकार की एक कहानी छपने पर सौ दो सौ पत्र आते थे जबकि आज वे एक पोस्टकार्ड के लिए तरसते हैं। जाहिर है कि यह ई-मेल, मोबाइल, एसएमएस के आगमन के कारण हुआ है। इसके बावजूद हमें मौका मिलने पर परिजनों को चिट्ठियां लिखना चाहिए क्योंकि ऐसी चिट्ठियां यादगार के तौर पर भी रखी जा सकती हैं। इस तरह हम एक मरती हुई विधा को बचा सकेंगे।

(साभार: इण्डिया न्यूज, 3-9 अक्टूबर, 09 में अशोक मिश्र)

Sunday, October 11, 2009

Gandhiji writes a postcard प्रतियोगिता का आयोजन

गांधी जी को पत्रों से बहुत प्यार था। वे अक्सर अपने साथ पोस्टकार्ड लेकर चलते थे और जहाँ भी रूकते थे, लोगों को पोस्टकार्ड लिखा करते थे। डाक विभाग राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी की इस खासियत के मद्देनजर राष्ट्रीय स्तर पर 'Gandhiji writes a postcard' प्रतियोगिता आयोजित कर रहा है। इसके अन्तर्गत बच्चे प्रतियोगिता पोस्टकार्ड पर एक पत्र लिखेंगे। इस हेतु वह अपने को गांधी जी मानकर पत्र लिखेंगे और यह पत्र किसी ज्वलंत तात्कालिक मुद्दे पर होना चाहिए।

प्रतियोगिता दो श्रेणियों में होगी। प्रथम, कक्षा 3 से कक्षा 5 तक और द्वितीय, कक्षा 6 से कक्षा 8 तक। इस हेतु किसी भी प्रकार का प्रवेश शुल्क नहीं देना होगा। मात्र 10 रूपये का प्रतियोगिता पोस्टकार्ड डाकघर से खरीद कर, उस पर हाथ से निबंध लिखना होगा। निबंध हिन्दी/अंग्रेजी में लिखा जा सकता है। शब्द सीमा न्यूनतम 25 शब्दों की होगी। इसके साथ प्रेषक अपना नाम, उम्र, कक्षा, स्कूल, पता व निबंध लेखन की तिथि, प्रतियोगिता पोस्टकार्ड के पीछे पते वाले भाग के बगल में लिखेगा। निबंध लिखकर पोस्टकार्ड को चीफ पोस्टमास्टर जनरल के चिन्हित पोस्ट बाक्स (उत्तर प्रदेश हेतु-पोस्ट बाक्स सं0-101,लखनऊ जी0पी0ओ0) के पते पर भेजना होगा। इस हेतु अंतिम तिथि 30 अक्टूबर 2009 है। राष्ट्रीय स्तर पर एक जनवरी 2010 को रिजल्ट घोषित कर दिये जायेंगे।

सर्वश्रेष्ठ निबंध को पुरस्कृत भी किया जायेगा। परिमण्डलीय स्तर पर प्रथम श्रेणी (कक्षा 3-5) हेतु क्रमशः आईपाड, डिजिटल कैमरा व सी0डी0 के साथ इन्साइक्लोपीडिया सेट एवं द्वितीय श्रेणी (कक्षा 6-8) हेतु क्रमशः लैपटाप, आईपाड व डिजिटल कैमरा क्रमशः प्रथम, द्वितीय व तृतीय पुरस्कार के रूप में दिये जायेंगे। इसी प्रकार राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम श्रेणी (कक्षा 3-5) हेतु लैपटाप व सी0डी0, डिजिटल कैमरा एवं सिन्थसाइजर तथा द्वितीय श्रेणी (कक्षा 6-8) हेतु पर्सनल कम्प्यूटर, प्रिन्टर, यू0पी0एस0 व सी0डी0, हैण्डीकैम तथा म्यूजिक सिस्टम क्रमशः प्रथम, द्वितीय व तृतीय पुरस्कार के रूप में दिये जायेंगे।

Saturday, October 10, 2009

डाकिया बाबू बनवाएगा मूल्य सूचकांक

डाकिया बाबू अब राष्ट्रीय स्तर पर सटीक वास्तविक मूल्य सूचकांक तैयार करने में भी सहयोग करेगा। केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन ने इस कार्य के लिए डाक विभाग के देशव्यापी नेटवर्क का इस्तेमाल करने के लिए 25 फरवरी, 2009 को अनुबंध किया, जिसके तारतम्य में डाटा-एकत्रीकरण का कार्य डाकिया द्वारा किया जा रहा है। अनुबंध के अनुसार डाक विभाग देश भर के ग्रामीण क्षेत्रों से चयनित 1183 डाकघरों के माध्यम से उपभोक्ता वस्तुओं के मूल्यों का संकलन कर रहा है। इसके तहत ग्रामीण क्षेत्र में डाकियों के माध्यम से दो तरह के सर्वेक्षण कराये जा रहे हैं। प्रथम, जन वितरण प्रणाली के तहत प्रदान किये जाने वाले चावल, गेहूँ, गेहूँ का आटा, चीनी और केरोसीन के बी0पी0एल0 व अन्त्योदय ग्राहकांे को दिये जाने वाले मूल्यों का सर्वेक्षण। द्वितीयतः, निर्धारित गाँवों में लगने वाले बाजारों व दुकानों पर बिकने वाले सामानों के मूल्यों का सर्वेक्षण। इसमें लगभग 200 वस्तुएं शामिल हैं, मसलन अन्न एवं उसके उत्पाद, दालें, दूध एवं उसके उत्पाद, तेल एवं बसा, मीट एवं मछली, चावल, गेहूँ, मैदा, सूजी, मक्का, सब्जियों, फल, शकर एवं शहद, मसाले, चाय एवं काफी, तैयार भोजन, पान सुपाड़ी तम्बाकू, ईधन एवं प्रकाश, पहनने वाले वस्त्र एवं बिस्तर, जूते, शिक्षा इत्यादि, स्वास्थ्य क्षेत्र, मनोरंजन एवं खेलकूद, परिवहन एवं संचार, निज कार्य हेतु सामग्री, गृहस्थी के सामान इत्यादि। इसके तहत हर माह के आंकड़े लगभग 31 पेजों में भरकर एकत्र किये जाने डाकिया बाबू द्वारा एकत्र की गई इन जानकारियों को केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन की वेबसाइट पर डाकघरों द्वारा ही फीड कर दिया जा रहा है।

डाकिया बाबू द्वारा एकत्रित जरूरी उपभोक्ता वस्तुओं के दामों का विवरण हर माह डाक विभाग द्वारा केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन को उपलब्ध कराया जाता है। कहा जा रहा है कि संगठन अब इसी आधार पर वास्तविक मूल्य सूचकांक तैयार करेगा और यह सूचकांक ही सरकारी कार्य योजनाओं का आधार बनेगा। गौरतलब है कि इधर उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (कन्ज्यूमर प्राइज इण्डेक्स) में मूल्य वृद्धि शून्य होने के बावजूद बाजार में सामानों के दाम काफी बढ़े नजर आ रहे हैं। ऐसे में जानकारों का मानना है कि वर्तमान में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक मेट्रो व अन्य चुनिंदा शहरों के दामों के आधार पर तैयार किये जाते रहे हैं। अब ग्रामीण क्षेत्रों के खुदरा मूल्य को आधार बनाने के कारण मूल्य सूचकांक को वास्तविक बनाया जा सकेगा।

Friday, October 9, 2009

चिट्ठी में भी आ सकते हैं बम

अचानक नजर एक खबर पर आकर अटक गई। शीर्षक था- चिट्ठी में भी आ सकते हैं बम। लोग तो बाद में डरेंगे, पहले तो मुझे ही डरना था आखिर रोजमर्रा का मेरा काम ही चिट्ठियों को लाना और ले जाना है। खबर कुछ यूँ थी- ‘‘अपनों का कुशल मंगल बताने वाली चिट्ठी भी अमंगल का कारण बन सकती है। इन पर अब आतंकियों की नजर हैं। सितंबर (9/11) बीत चुका है लेकिन नवंबर (11/26) नजदीक है। ऐसे में पूरी दुनिया आतंकी हमलों को लेकर चैकस है। हाल में अमेरिका और यूरोप की बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने भारतीय प्रबंधन को खास निर्देश दिए हैं, जिसमें कहा गया है कि कोई भी कर्मचारी कार्यालय के पते पर व्यक्तिगत पत्र, पार्सल या कूरियर नहीं मंगवाएगा। सुरक्षा एजेंसियों के खुलासों के बाद कंपनियों को खतरा है कि चिट्ठियों के जरिए आतंकी विस्फोटक भेज सकते हैं। नोएडा में इंग्लैंड की एक कंपनी के मानव संसाधन विभाग ने अपने कर्मचारियों को आदेश दिया है कि व्यक्तिगत पत्र व्यवहार कार्यालय के पते पर नहीं करें। ऐसे पत्र, पार्सल और कूरियर के लिए अपने घर का पता इस्तेमाल करें। वस्तुतः बहुराष्ट्रीय कंपनियों में 90 फीसदी से ज्यादा कर्मचारी भारतीय हैं। विदेशी कर्मचारियों के लिए आने वाले पत्रों की जांच हवाई अड्डों पर हो जाती है। लेकिन स्थानीय पत्रों की जांच नहीं होती।‘‘

....... आपको वह दिन तो याद होंगे जब चिट्ठियों के माध्यम से एन्थ्रेक्स को फैलाये जाने की अफवाहें हर तरफ थीं। कानपुर में तो एक बार एक व्यक्ति ने लगभग सैकड़ा चिट्ठियाँ तमाम अधिकारियों-नेताओं को भेज दी और उनमें कुछ बारूदनुमा पदार्थ था। वास्तव में यह क्या था, यह तो नहीं पता चला पर चिट्ठी जरूर बदनाम हो गई। मेरी आप सबसे यही गुजारिश है कि चिट्ठियां लोगों की संवेदनाओं से जुड़ीं होतीं हैं और कृपा करके उन्हें विस्फोटक मत बनाइये।

Thursday, October 8, 2009

विश्व डाक दिवस की बधाईयाँ !!

डाक सेवाओं की एक पुरानी परम्परा है। दुनिया भर में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं होगा, जिसका कभी डाक सेवाओं से पाला न पड़ा हो। यह अचरज की बात है कि एक देश में पोस्ट किया हुआ पत्र दुनिया के दूसरे कोनों में आराम से पहुँच जाता है। डाक सेवाओं के संगठन रूप में उद्भव के साथ ही इस बात की जरूरत महसूस की गई कि दुनिया भर में एक ऐसा संगठन होना चाहिए, जो यह सुनिश्चित करे कि सभी देशों के मध्य पत्रों का आवागमन सहज रूप में हो सके और आवश्यकतानुसार इसके लिए नियम-कानून बनाये जा सकें।

इसी क्रम में 9 अक्टूबर 1874 को ‘‘जनरल पोस्टल यूनियन‘‘ के गठन हेतु बर्न, स्विटजरलैण्ड में 22 देशों ने एक संधि पर हस्ताक्षर किया था, इसी कारण 9 अक्टूबर को कालान्तर में ‘‘विश्व डाक दिवस‘‘ के रूप में मनाना आरम्भ किया गया। यह संधि 1 जुलाई 1875 को अस्तित्व में आयी, जिसके तहत विभिन्न देशों के मध्य डाक का आदान-प्रदान करने संबंधी रेगुलेसन्स शामिल थे। कालान्तर में 1 अप्रैल 1879 को जनरल पोस्टल यूनियन का नाम परिवर्तित कर यूनीवर्सल पोस्टल यूनियन कर दिया गया। यूनीवर्सल पोस्टल यूनियन का सदस्य बनने वाला भारत प्रथम एशियाई राष्ट्र था, जो कि 1 जुलाई 1876 को इसका सदस्य बना। जनसंख्या और अन्तर्राष्ट्रीय मेल ट्रैफिक के आधार पर उस समय सदस्य राष्ट्रों की 6 श्रेणियां थीं और भारत आरम्भ से ही प्रथम श्रेणी का सदस्य रहा। 1947 में यूनीवर्सल पोस्टल यूनियन, संयुक्त राष्ट्र संघ की एक विशिष्ट एजेंसी बन गई। यह भी एक रोचक तथ्य है कि विश्व डाक संघ के गठन से पूर्व दुनिया में एकमात्र अन्तर्राष्ट्रीय संगठन रेड क्रास सोसाइटी (1870) था।

यह भी एक अजीब इत्तिफाक है कि 1874 में ‘‘जनरल पोस्टल यूनियन‘‘ के गठन के ठीक अगले साल 1975 में भारतीय डाक पर प्रथम पुस्तक ‘‘द पोस्ट आफिस आफ इण्डिया‘‘ प्रकाशित हुई, जिसे कि बांकीपुर, पटना के एक रिटायर्ड पोस्टमास्टर आनंद गोपाल सेन ने लिखा था।

9 अक्टूबर को विश्व डाक दिवस है और इसी क्रम में पूरे सप्ताह राष्ट्रीय डाक सप्ताह (9-15 अक्टूबर) का आयोजन चलता है। इस दौरान जहाँ प्रतिदिन सेवाओं के व्यापक प्रचार-प्रसार एवं राजस्व अर्जन में वृद्धि पर जोर दिया जाता है वहीं डाक टिकटों की प्रदर्शनी, स्कूली विद्यार्थियों हेतु कार्यक्रम, कस्टमर मीट, स्कूली छात्र-छात्राओं द्वारा डाकघरों का विजिट, बचत बैंक खातों हेतु लकी ड्रा एवं उत्कृष्ट कार्य करने वाले स्टाफ तथा महत्वपूर्ण बचत अभिकर्ताओं व कारपोरेट कस्टमर्स के सम्मान जैसे तमाम कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं।
विश्व डाक दिवस की बधाईयाँ !!

Monday, September 28, 2009

विजयदशमी की बधाई !!

दशहरे की परम्परा भगवान राम द्वारा त्रेतायुग में रावण के वध से भले ही आरम्भ हुई हो, पर द्वापरयुग में महाभारत का प्रसिद्ध युद्ध भी इसी दिन आरम्भ हुआ था। विजयदशमी सिर्फ इस बात का प्रतीक नहीं है कि अन्याय पर न्याय अथवा बुराई पर अच्छाई की विजय हुई थी बल्कि यह बुराई में भी अच्छाई ढूँढ़ने का दिन होता है।....विजयदशमी की हार्दिक बधाई !!

Saturday, September 26, 2009

अब डाकघरों में भी कोर बैंकिंग और ए0टी0एम0

नेटवर्क की दृष्टि से डाकघर बचत बैंक देश का सबसे बड़ा रीटेल बैंक (लगभग 1.5 लाख शाखाओं, खातों और वार्षिक जमा-राशि का संचालन, 31 मार्च 2007 को कुल जमा राशि-3,515,477.2 मिलियन रूपये) है। यह अनुमान लगाया गया था कि वर्ष 2001 में डाकघर में बचत की कुल राशि भारत के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 7 प्रतिशत बनती है। (विश्व बैंक अध्ययन की अंतिम रिपोर्ट, अगस्त, 2002)। 172 मिलियन से अधिक खाताधारकों के ग्राहक आधार और 1,54,000 शाखाओं के नेटवर्क के साथ डाकघर बचत बैंक देश के सभी बैंकों की कुल संख्या के दोगुने के बराबर है। डाकघर से बचत खाता, आवर्ती जमा, सावधि जमा, मासिक आय स्कीम, लोक भविष्य निधि, किसान विकास पत्र, राष्ट्रीय बचत पत्र और वरिष्ठ नागरिक बचत स्कीम की खुदरा बिक्री की जाती है।

डाकघर ही एक मात्र ऐसी संस्था है जो देश के सुदूरतम कोनों को जोड़ती है और इस तरह ऐसे क्षेत्रों में रह रहे लोगों को वित्तीय सुविधा मिलनी सुनिश्चित हो जाती है। अब, यह भांति-भांति की बैंकिंग एवं बीमा सेवाओं जैसे सावधि जमा, म्युचुअल फंडों, पेंशन आदि प्रदान करने का वन-स्टाॅप स्थान है। नरेगा के तहत कुशल/अर्ध-कुशल/अकुशल मजदूरों के लिए रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने में भारत सरकार को सहयोग देते हुए डाकघर मजदूरी का भुगतान करने का माध्यम भी बन चुका है।

अब डाक विभाग वर्तमान 11वीं पंचवर्षीय योजना के तहत कोर बैंकिंग साल्यूशन के तहत एनीव्हेयर, एनीटाइम, एनीब्रान्च बैंकिंग लागू करने जा रहा है। प्रथम फेज के तहत 2009-10 में 500 प्रधान डाकघरों को चुना गया है, जिन्हें 100, 100 और 300 के उपग्रुपों में विभाजित किया गया है। इसके तहत सभी खातों की डाटा फीडिंग, सिगनेचर स्कैनिंग, कम्प्यूटराइज्ड उपडाकघरों का प्रधान डाकघरों में इलेक्ट्रानिकली डाटा ट्रान्सफर, बचत बैंक नियंत्रण संगठन को प्रतिदिन रिटर्न का प्रेषण, सभी बचत सेवाओं का कम्प्यूटराइज्ड कन्सोलीडेटेड जर्नल, अनपोस्टेड आइटम, माइनस बैंलेन्स व आब्जेक्शन का निस्तारण, प्रतिदिन वाउचर चेकिंग, लेजर एग्रीमेण्ट व तदोपरान्त ब्याज का तत्काल जारी होना शामिल है। इसके तहत स्टाफ को प्रशिक्षित भी किया जायेगा।

डाकघरों में कोर बैंकिंग साल्यूशन लागू होने पर वर्तमान संचय पोस्ट साफ्टवेयर रिप्लेस हो जायेगा। इसके माध्यम से तमाम नई सेवायें मसलन नेशनल इलेक्ट्रानिक फण्ड ट्रान्सफर, इलेक्ट्रानिक क्लीयरेन्स सिस्टम, रियल टाइम ग्राॅस सेटेलमेन्ट इत्यादि लागू की जा सकेगी और एटीएम, इण्टरनेट बैंकिंग व मोबाइल बैंकिंग डाकघरों में भी आरम्भ किया जा सकेगा।

तो अब इन्तजार कीजिए कि आप डाकघरों में एटीएम, इण्टरनेट बैंकिंग व मोबाइल बैंकिंग का आनंद ले सकें। पर हाँ, अपने डाकिया बाबू को नहीं भूलिएगा। भूल गये तो ये सब बातें कौन बताएगा।

Monday, September 14, 2009

14 सितम्बर : संचयिका दिवस

14 सितंबर को संचयिका दिवस मनाया जाता है। संचयिका यानी स्कूली बच्चों की बचत बैंक योजना, जिसमें वे अपनी छोटी-छोटी बचतें करना सीखते हैं. कहते भी हैं-बूंद-बूंद से भरता सागर. बचत आदत नहीं संस्कार है, जो आजीवन काम आती है. पहले संचयिका योजना राष्ट्रीय बचत संगठन (कालांतर में राष्ट्रीय बचत संस्थान) के अधीन संचालित होती थी,वर्ष 2002 के आखिर में केंद्र सरकार ने इसे राज्य सरकारों को सौंप दिया। ..तो आइये हम भी इस दिन अपने बच्चों को बचत का क..ख..ग...सिखाएं व उनमें बचत की आदत विकसित करें. स्कूलों के माध्यम से खुले संचायिका खाते वाकई एक सुखद भविष्य की ओर इशारा करते हैं, बस इन्हें समझने की देरी है.

Saturday, September 12, 2009

जेब खर्च का जरिया बने प्रेम-पत्र

आपने वह कहानी तो सुनी होगी कि एक प्रेमिका प्रतिदिन अपने प्रेमी को डाकिया बाबू द्वारा प्रेम पत्र लिखवाती थी और अन्ततः एक दिन उसे उस डाकिया बाबू से ही प्रेम हो गया। पिछले दिनों अख़बार में एक वाकया देखा तो इस प्रसंग की याद आ गई. यह वाकया भी कुछ इसी तरह का है पर यहाँ डाकिया बाबू की भूमिका में कोई और है।

यह वाकया है चीन के एक कालेज स्टूडेंट वाग ली का। इन महाशय ने अपना जेब खर्च निकालने का अद्भुत तरीका निकाला है कि ये अपने साथ पढ़ने वाले स्टूडेंट्स के लिए प्रेम पत्र लिखते हैं। आखिर इनकी राइटिंग खूबसूरत जो है और लच्छेदार भाषा व प्रवाह पर मजबूत पकड़ भी। वैलेन्टाइन डे पर तो इनकी चांदी रहती है क्योंकि इनके पास एडवांस बुकिंग रहती है। फिलहाल इस वाकये में दिलचस्प तथ्य यह है कि सबके लिए प्रेम पत्र लिखने वाले वाग ली कोई गर्लफ्रेंड नहीं है। पर इन महाशय के साथ भी डाकिया बाबू जैसा कुछ हो जाय इसकी गारन्टी देना सम्भव नहीं। प्रेम-पत्र लिखते-लिखते ये जनाब कभी लोगों के पत्र बांटने भी लगे तो कोई अजूबा नहीं होगा।

Friday, August 28, 2009

पानी में पोस्ट आफिस

पानी में पोस्ट आफिस। है ना अजूबा। पर यह अजूबा नहीं बिल्कुल सच है। पानी के अन्दर यह पोस्ट आफिस, साउथ पेसिफिक आइलैंड में स्थिति एक छोटे से देश वनुवातु में मौजूद है। सबसे रोचक बात यह है कि यह दुनिया का पहला पोस्ट आफिस है, जो पानी के अंदर स्थित है। फाइबर ग्लास से बने इस पोस्ट आफिस में कुल चार कर्मचारी हैं, जिनकी ड्यूटी शिट में होती है। पानी में काम करने के लिए ये कर्मचारी विशेष रूप से प्रशिक्षित किये जाते हैं। तैराकी और स्कूबा डाइविंग में वे माहिर होते हैं। पोस्ट आफिस के कार्यों से परे इसका दुनिया भर के पर्यटकों में अच्छा-खासा क्रेज है। इस पोस्ट आफिस से पर्यटक वाटरप्रूफ काड्र्स की खरीददारी करते हैं और पानी के अंदर ही रहकर संदेश लिखकर अपने परिजनों को इसी पोस्ट आफिस से प्रेषित भी करते हैं। तो आपको भी कभी मौका मिले तो इस पोस्ट आफिस से अपनों को कार्ड और संदेश भेजने का मौका न छोड़ियेगा।

Tuesday, August 25, 2009

अब स्पीड पोस्ट हेतु वाटरप्रूफ व डिजाइनर लिफाफे

डाक विभाग ने अपनी प्रीमियम सेवा स्पीड पोस्ट की विशिष्टता के मद्देनजर डिजाइनर वाटरप्रूफ लिफाफे जारी किये हैं। सफेद और हल्का भूरा कलर में उपलब्ध ये लिफाफे वजन में हल्के, वाटरप्रूफ होने के साथ-साथ पारवाहन के दौरान भी नही फटेंगे। इन लिफाफों का आकार सामान्य लिफाफों से बड़ा है तथा ये 16.2 X 22.9 सेमी0 साइज में उपलब्ध हैं। ये लिफाफे 5 रूपये की कीमत पर उपलब्ध कराये जायेंगे और पोस्टेज चार्ज अतिरिक्त होंगे। गौरतलब है कि इससे पूर्व डाक विभाग ने राखी भेजने हेतु भी वाटरप्रूफ एवं डिजाइनर लिफाफे जारी किये हैं। लिफाफे पर स्पीड पोस्ट का लोगो अंकित है तथा स्पीड पोस्ट सेवा के बारे में जानकारियाँ भी अंकित हैं। इस लिफाफे पर प्रेषक का नाम लिखने की सुविधा पीछे दी हुई है। एक तरफ ये डिजाइनर लिफाफे स्पीड पोस्ट की ब्राण्डिंग करेंगे वहीं लोगों द्वारा भेजी जाने वाली स्पीड पोस्ट बेहतर और सुरक्षित ढंग से अपने गंतव्य पर पहुँच सकेगी।

Saturday, August 15, 2009

स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनायें !!

आइये हम सभी आजादी के इस जश्न में शामिल हों और भारत को एक समृद्ध राष्ट्र बनायें.
स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनायें !! जय हिंद !! जय भारत !!

Tuesday, August 11, 2009

डाकघर द्वारा जारी होते हैं पहचान पत्र

पिछले दिनों प्रतिष्ठित औद्योगिक घराने, सिंहानिया परिवार के एक सदस्य डाकघर आए और उन्होने डाकघर पहचान पत्र बनाने के लिए अनुरोध किया। सुनकर आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता का अहसास हुआ कि यह योजना लोगों के बीच आज भी लोकप्रिय और प्रासंगिक है। यह योजना काफी पुराने समय में, जब पत्राचार पद्धति पर डाकघर का एकाधिकार था एवं देश की अधिकतर जनसंख्या सूचना प्रेषण एवं धन प्रेषण के लिए डाकघर पर आश्रित थी उस समय कम्पनियों एवं जनता के अन्य लोग जो सरकारी, अर्धसरकारी एवं निजी कार्यों के लिए बाहर जाते थे, उनको डाकपाल के द्वारा मंगाई जाने वाली डाक सामग्री प्राप्त करने में असुविधा से बचाने के लिए डाकघर पहचान पत्र जारी करने की योजना शुरू की गई थी। आज पहचान के तमाम अन्य साधन जैसे ड्राइविंग लाइसेन्स, पैन कार्ड, इलेक्शन कमीशन का कार्ड एवं अन्य प्रकार के पहचान पत्रों के समकक्ष ही डाकघर के पहचान पत्र ने भी अपनी पहचान, लोकप्रियता एवं प्रासंगिकता बना रखी है।

यह पहचान पत्र किसी भी शहर में वहाँ के प्रधान डाकघर से जारी किया जाता है। प्रधान डाकघर से निःशुल्क फार्म प्राप्त कर, इसे भरकर अपना एक पासपोर्ट साइज का फोटो चिपकाकर एवं एक फोटो साथ में लगाकर 10 रूपये का डाक टिकट लगाकर डाकघर में जमा किया जाता है। डाकघर के सक्षम अधिकारी के द्वारा पता एवं व्यक्ति की जांच की जाती है एवं इसके उपरान्त पहचान पत्र जारी कर दिया जाता है। इस पहचान पत्र में जन्मतिथि, ऊंचाई एवं पहचान चिन्ह भी अंकित होता है। इस कार्ड की वैधता तीन वर्ष की है। यह पहचान पत्र नगण्य शुल्क एवं सरल प्रक्रिया में जारी हो जाता है जो जन-साधारण के लिए बहुद्देशीय एवं सुगम्य है।

Monday, August 10, 2009

जन्मदिन मुबारक हो !!


*** डाकिया बाबू की तरफ़ से "डाकिया डाक लाया" ब्लॉग के सूत्रधार कृष्ण कुमार यादव जी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें ***

भारतीय डाक सेवा के अधिकारी बन
अपने कृतित्व-मान को और बढ़ाया
प्रशासन और साहित्य का हुआ समन्वय
इस बेजोड़ संतुलन ने सबको चौंकाया

बाइस जुलाई दो हजार तीन को
सूरत में पहले-पहल नियुक्ति पाये
वरिष्ठ डाक अधीक्षक पद प्राप्त कर
डाक विभाग का गौरव खूब बढ़ाये

स्ूारत, लखनऊ और कानपुर में
पद की गौरव-गरिमा खूब बढ़ाई
लिख डेढ़ सौ वर्षों का डाक इतिहास
दूर-दूर तक नाम औष् ख्याति पाई

आये जब से डाक विभाग में आप
लग गया फिलेटली का नया शौक
करते संग्रह डाक-टिकटों का खूब
रुचियांँ हैं इनकी और भी अनेक

जिज्ञासु प्रवृत्ति के रहे सदैव से
तार्किक विश्लेषण खूब करते हैं
चिंतन-मनन की अनुपम दुनिया में
जी भर यह आनन्द से रमते हैं

सूरत और कानपुर मण्डलों में आपने
सुन्दर डाक टिकट प्रदर्शनी करवायी
खूबसूरत स्मारिका किया सम्पादित
ज्ञानवर्धन कर युवा पीढ़ी भी हर्षायी

डाक विभाग में खूब बने लोकप्रिय
अराजकता कभी नहीं सह पाते हैं
किसी काम में यदि कुछ हुई गड़बड़ी
तो फिर अपनी त्योरियां चढ़ाते हैं

सुहृदय, मिलनसार और साहित्य प्रेमी
सबसे अन्तर्मन से वह जुड़ जाते हैं
एक बार जब बने निकटता आपसे
सब जन उनके सादर गुण गाते हैं !!
(साभार: बढ़ते चरण शिखर की ओर)

Friday, August 7, 2009

डाकिया









छोड़ दिया है उसने
लोगों के जज्बातों को सुनना

लम्बी-लम्बी सीढियाँ चढ़ने के बाद
पत्र लेकर
झट से बंद कर
दिए गए
दरवाजों की आवाज
चोट करती है उसके दिल पर

चाहता तो है वह भी
कोई खुशी के दो पल उससे बाँटे
किसी का सुख-दुःख वो बाँटे
पर उन्हें अपने से ही फुर्सत कहाँ?

समझ रखा है उन्होंने, उसे
डाक ढोने वाला हरकारा
नहीं चाहते वे उसे बताना
चिट्ठियों में छुपे गम
और खुशियों के राज

फिर वो परवाह क्यों करे?
वह भी उन्हें कागज समझ
बिखेर आता है सीढ़ियों पर

इन कागजी जज्बातों में से
अब लोग उतरकर चुनते हैं
अपनी-अपनी खुशियों
और गम के हिस्से
और कैद हो जाते हैं अपने में।

कृष्ण कुमार यादव

Saturday, August 1, 2009

डाकिया बाबू राखी लाया

राखी का त्यौहार भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख त्यौहार है जो प्रत्येक वर्ष श्रावण मास में मनाया जाता है। आज इस आधुनिकता एवम विज्ञान के दौर में संसार मे सब कुछ हाईटेक हो गया है। वहीं हमारे त्यौहार भी हाईटेक हो गए है। इन्टरनेट व एस0एम0एस0 के माध्यम से आप किसी को कहीं भी राखी की बधाई दे सकते है। किन्तु जो प्यार, स्नेह, आत्मीयता एवं अपनेपन का भाव बहन द्वारा भाई की कलाई पर राखी बाँधने पर है वो इस हाईटेक राखी में नही है। इस सम्बन्ध में हिन्दी फिल्म का एक मशहूर गाना याद आता है-‘‘बहना ने भाई की कलाई पर प्यार बाँधा है, कच्चे धागे से सारा संसार बाँधा है।‘‘ इन पंक्तियों में छुपा भाव इस पर्व की सार्थकता में चार चाँद लगा देता है। डाकिया बाबू इन भावनाओं को हर साल आपके दरवाजे तक पहुँचाता है, सो इस साल भी तैयार है।

बहनों द्वारा राखियों को सुरक्षित एवं सुगमता से भेजने के लिए डाक विभाग ने पाँच तरह के लिफाफे जारी किये गये हैं। ये लिफाफे पूर्णतया वाटर प्रूफ, मजबूत, पारगमन के दौरान न फटने, रंगबिरंगे एवं राखी की विभिन्न डिजाइनों से भरपूर है। इसके चलते जहाँ राखी प्राप्त करने वाले को प्रसन्नता होगी, वहीं इनकी छंटाई में भी आसानी होगी। यही नहीं राखी डाक को सामान्य डाक से अलग रखा जा रहा है। लोगों की सुविधा के लिए डाकघरों में अलग से डलिया लगाई गयी हैं, जिन पर स्थान का नाम लिखा है। पोस्ट की गई राखियों को उसी दिन विशेष बैग द्वारा सीधे गंतव्य स्थानों को प्रेषित कर दिया जा रहा है, ताकि उनके वितरण में किसी भी प्रकार की देरी न हो। ऐसे सभी भाई जो अपने घर से दूर है तथा देश की सीमा के सजग प्रहरी हमारे जवान जो बहुत ही दुर्गम परिस्थियो मे भी देश की सुरक्षा मे लगे है उन सभी की कलाई पर बँधने वाली राखी को सुरक्षित भेजे जाने के लिए भी डाक विभाग ने विशेष प्रबन्ध किये हैं। तो आप भी रक्षाबन्धन का इन्तजार कीजिए और इन्तजार कीजिए डाकिया बाबू जो आपकी राखी को आप तक पहुँचाना सुनिश्चित करेंगे और भाई-बहन के इस प्यार भरे दिवस के गवाह बनेंगे।

Friday, July 31, 2009

डाककर्मी के पुत्र थे प्रेमचंद

1920 का दौर... गाँधी जी के रूप में इस देश ने एक ऐसा नेतृत्व पा लिया था, जो सत्य के आग्रह पर जोर देकर स्वतन्त्रता हासिल करना चाहता था। ऐसे ही समय में गोरखपुर में एक अंग्रेज स्कूल इंस्पेक्टर जब जीप से गुजर रहा था तो अकस्मात एक घर के सामने आराम कुर्सी पर लेटे, अखबार पढ़ रहे एक अध्यापक को देखकर जीप रूकवा ली और बडे़ रौब से अपने अर्दली से उस अध्यापक को बुलाने को कहा । पास आने पर उसी रौब से उसने पूछा-‘‘तुम बडे़ मगरूर हो। तुम्हारा अफसर तुम्हारे दरवाजे के सामने से निकल जाता है और तुम उसे सलाम भी नहीं करते।’’ उस अध्यापक ने जवाब दिया-‘‘मैं जब स्कूल में रहता हूँ तब मैं नौकर हूँ, बाद में अपने घर का बादशाह हूँ।’’

अपने घर का बादशाह यह शख्सियत कोई और नहीं, वरन् उपन्यास सम्राट प्रेमचंद थे, जो उस समय गोरखपुर में गवर्नमेन्ट नार्मल स्कूल में सहायक अध्यापक के पद पर कार्यरत थे। 31 जुलाई 1880 को बनारस के पास लमही में जन्मे प्रेमचन्द का असली नाम धनपत राय था। आपकी माता का नाम आनन्दी देवी तथा पिता का नाम अजायब राय था। प्रेमचंद जी के पिता अजायब राय डाक-कर्मचारी थे सो प्रेमचंद जी अपने ही परिवार के हुए.आज उनकी जयंती पर शत-शत नमन. डाक-परिवार अपने ऐसे सपूतों पर गर्व करता है व उनका पुनीत स्मरण करता है.
(प्रेमचंद जी पर कृष्ण कुमार यादव का विस्तृत आलेख साहित्याशिल्पी पर पढ़ सकते हैं)

Tuesday, July 21, 2009

चिट्ठी












बहुत दिनों बाद
घर से चिट्ठी आई है,
खुशी के साथ
आंख भी भर आई है।
पूछा है-
कब आओगे गांव,
पैसों की जरूरत है
पत्नी के
भारी हो गए हैं पांव।
मां को घुटनों
और पिता को आंखों
की बीमारी है,
सूखे से फसल
दगा दे गई
दाल रोटी की भी
दुश्वारी है।
दवा इलाज हो तो
कम हो जाता मर्ज
पर कैसे?
रूपयों के लाले हैं
महाजन भी नहीं
दे रहा है कर्ज।
फिर लिखा है-
आ न सको तो
कोई बात नहीं
अपना सब कुछ
सह लेंगे
पर बहू की बात
कुछ और है,
पेट में पहला बच्चा है
आखिर उसका भी तो
अपना खर्चा है।
तुम भी कपड़े लत्ते की
कमी न होने देना
परेशानी हम समझते हैं,
पर जैसे-तैसे-कैसे भी
कुछ रूपयों का मनीआर्डर
जल्दी भिजवा देना।

मोहन राजपूत,दैनिक जागरण, रूद्रपुर,
ऊधमसिंह नगर (उत्तराखंड)


(दैनिक जागरण में 20 जुलाई 2009 को प्रकाशित मोहन राजपूत की यह कविता बड़ी प्रभावी एवं रोचक लगी। इसे साभार यहां प्रस्तुत किया जा रहा है।)

Saturday, July 18, 2009

डाकघर सद्भाव तथा शुभकामनाओं का प्रतीक- टैगोर

(डाकघर पर 13 अक्टूबर 2008 को 5 रूपये का स्मारक डाक टिकट जारी किया गया। प्रतिभूति मुद्रणालय हैदराबाद में वेट-आफसेट प्रक्रिया द्वारा आठ लाख की संख्या में मुद्रित इस डाक टिकट के साथ जारी विवरणिका में अंकित शब्दों को यहां साभार हूबहू स्थान दिया जा रहा है)

आज हम टेलीफोन, मोबाइल फोन, ई-मेल जैसे इलेक्ट्रानिक उपकरणों के इतने अभ्यस्त हो गये हैं कि हमने इन्हें सदा के लिए अपना मान लिया है। इन आविष्कारिक चमत्कारों के लिए हजारो समर्पित कारीगरों ने उत्साहपूर्वक कार्य किया है जिसके परिणामस्वरूप ये उपकरण अवसंरचनाएं और संस्थान आज मौजूद हैं। आज ये संस्थान हमारे हैं जिन्हें हमें सहेज कर रखना है और आगे ले जाना है। डाकघर भी एक ऐसा संस्थान है जोकि अन्य सरकारी विभागों की तुलना में, हमारी संवेदनाओं से जुड़ा हुआ है। यह संदेशों का आदान-प्रदान करता है, लोगों को जोड़ने में मदद करता है तथा पत्र के माध्यम से लोगों के मध्य संप्रेषण करता है।

जब तक हम इसके बारे में सोचते हैं तो पत्र के नाम से ही रोमांच उत्पन्न हो जाता है। कितनी बेसब्री से पत्र की प्रतीक्षा की जाती है। हममे से कितनों ने रविन्द्र नाथ टैगोर के नाटक ‘‘डाकघर‘‘ के छोटे से लड़के की तरह महसूस किया होगा जो गांव में नये खुले डाकघर के माध्यम से राजा से मिलने वाले पत्र की उत्सुकता से प्रतीक्षा करता है।

डाकघर को दुनिया में संचार का माध्यम माना गया है। डाकिया प्राकृतिक आपदाओं, जंगली जानवरों, भूभागी कठिनाइयों तथा डाकुओं आदि की बाधाओं को पार करते हुए अपने कर्तव्य का पालन करता है। ‘‘डाकघर‘‘ नाटक चैकीदार द्वारा छोटे लड़के को इस तथ्य को कितनी अच्छी तरह बताया गया हैः-

‘‘हा...हा....डाकिया, यकीनन बरसात हो या लू, अमीर हो या गरीब, सबको घर-घर जाकर चिट्ठी बांटना उसका काम है यह बहुत बड़ी बात है।‘‘

आज डाकघर न केवल पत्र वितरित करता है बल्कि अपने व्यापक नेटवर्क के माध्यम से विभिन्न प्रकार की सेवाएं भी प्रदान करता है। वित्तीय लेनदेनों का संवहन करने की क्षमता रखता है तथा स्थानीय इलाके की जानकारी होने के कारण यह जनता को विभिन्न सेवायें उपलब्ध करवाने के लिए दक्ष एवं लागत प्रभावी भी सुलभ कराता है। भारतीय डाक आज पारम्परिकता और आधुनिकता दोनों की झलक प्रस्तुत करता है। डाकघर निरंतरता एवं परिवर्तन की पहचान बन गया है।

गुरुदेव रविन्द्र नाथ टैगोर ने अपने नाटक ‘‘डाकघर‘‘ के माध्यम से डाकघर को सद्भाव, शुभकामनाओं का प्रतीक तथा राजा का प्रजा के प्रति वात्सल्य दिखाया है।

Thursday, July 16, 2009

डार्विन के अप्रकाशित पत्रों का होगा प्रकाशन

आपने कभी सोचा है कि पत्रों द्वारा किसी के व्यवहार को जांचा जा सकता है। जी हां, यह फार्मूला महान वैज्ञानिक डार्विन पर अपनाया जा रहा है। डार्विन का विचार था कि महिलाएं घरेलू काम और बच्चों की देखभाल के लिए उपयुक्त होती हैं पर जिन महिलाओं ने उन्हें खत लिखा, उनमें वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने में डार्विन ने काफी सार्थक भूमिका निभाई थी। महिलाओं और यौन व्यवहार पर चाल्र्स डार्विन के ऐसे ही विचारों के अध्ययन के लिए कैंब्रिज विश्वविद्यालय ने एक परियोजना ‘डार्विन और जेंडर‘ की शुरूआत की है। डार्विन के जीवन के अनछुए पहलुओं के अलावा स्त्री-पुरूष संबंधों की वैज्ञानिक और सामाजिक नजरिए से पड़ताल की जाएगी। ‘डार्विन और जेंडर‘ परियोजना में पहली बार इस महान प्रकृति विज्ञानी के अनछुए और अब तक प्रकाशित नहीं किए गए पत्रों और लेखों को लोगों के सामने लाया जाएगा। तीन साल की इस परियोजना को कैंब्रिज विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी के ‘‘डार्विन पत्राचार प्रोजेक्ट‘‘ के अंतर्गत चलाया जाएगा। इस परियोजना के बाद अपनी बड़ी बेटी हेनरीएटा से डार्विन के संबंध सामने आएंगे। डार्विन ने जब ‘ओरिजिन आॅफ द स्पीसीज‘ लिखी, उस वक्त हेनरीएटा बहुत छोटी थी पर बाद में उसका अपने पिता की लेखनी पर बहुत प्रभाव था। डार्विन का अपनी जिंदगी में कई महिलाओं से खतों के जरिए रिश्ता था। इनकी संख्या 148 तक बताई जाती है।

Wednesday, July 15, 2009

चिट्ठी का फ्यूचर

भाई लोगों का ऐसा कहना, मेरे अक्ल की स्क्रीन पर कतई डिस्प्ले नहीं होता कि मुए मोबाइल के आने से चिट्ठियां लिखने का चलन चैपट हो गया। डाकिए खाली हाथ चलने लगे और तो और एसएमएस ने संक्षिप्त संदेशों की ऐसी हैबिट डाल रखी है कि अब कोई दिल खोल के अपनी बातें नहीं लिखता। याद कीजिए पहले के जमाने में भी जब लेटर लिखे जाते थे, तब भी तो यह वाला जुमला आखिर में टांक ही दिया जाता था- थोड़े लिखे को ज्यादा समझना। यह सूत्र वाक्य ही एसएमएस का बीजमंत्र है। कुछ भी नया नहीं हुआ बस, लेटर लिखने की स्टाइल चेंज हो गई है।

हम सबको एसएमएस नामक डिवाइस का थैंकफुल होना चाहिए, इस एसएमएस विधि के आ जाने से स्टेशनरी और टाइम दोनों की बचत हो रही है। जो जितना ज्यादा पढ़ा-लिखा है, अंगूठे से उतना ही अधिक लिखने में पारंगत है। वह संपूर्ण मोबाइल टेक्नोलाजी अपने ठेंगे पर रखके चलता है।

हाल-फिलहाल, मैं इस बात से भी इत्तेफाक नहीं रखता कि संचार क्रांति के चलते पत्र-लेखन जैसा आदिकालीन कर्म विलुप्त होने की कगार पर है। गाँवों में आज भी चिट्ठी-पत्री का चलन आम है। जिसके यहाँ कंप्यूटर नहीं है, वह साइबर और इंटरनेट कैफे में सर्फिंग-चैटिंग करने जाता है। एक छोटे से दड़बे, जिसे केबिन कहा जाता है में बैठकर अगले की लाइफ के असंख्य घंटे किस रास्ते से निकल गए, यह स्वयं उस ध्यानस्थ जीवात्मा को भी पता नहीं चल पाता। डेस्कटाप, पामटाप और लैपटाप के इस काल में युवक-युवतियों की गोदें तो जैसे सदा-सवैदा भरी ही मिलती हैं। पता नहीं किससे-किससे और किसको-किसको मेल कर रहे हैं। भाई मेरे, पत्र प्रेषण ही तो है। जितना चाहो और जो चाहो, लिखो फिर पासवर्ड के लिफाफे में बंद करके रवाना कर दो। पाने वाला ही बांचेगा। लेटर राइटिंग के भविष्य को लेकर एक और तरह से भी निश्चिंत हुआ जा सकता है। इंटरनेट प्रयोगकर्ताओं में इधर एक नई आदत तरक्की पर है। वे जो पहले चिट्ठियों के जवाब देने तक से कतराते थे, वे इन दिनों दनादन चिट्ठे लिख रहे हैं। बड़ी ही संक्रामक बीमारी है यह ब्लागेंटाइटिस भी। इस रोग की एक खासियत यह भी है कि यह हते पंद्रह दिनों में ही क्रानिक हो लेता है। तब इसकी चपेट में आने वाले पोथा लिखने लग जाते हैं। मेरी बात का सहज ऐतबार न हो तो आप ऐसे तमाम अनामदासी पोथाकारों की साइट्स पर जाइए।

अब तो हालत यह है कि अखबारों तक ने अपने पाठकों के पन्नों वाली स्पेस को इन ब्लागर्स के नाम आवंटित कर दिया है। दिनोदिन ब्लागियों की फिगर में इजाफा हो रहा है। बिना डाक टिकट, लेटरबाक्स के ही चिट्ठे लिखे जा रहे हैं। जवाब आ रहे हैं। जिनके पास एक अदद कंप्यूटर और नेट की सुविधा उपलब्ध है, वे इस चिट्ठाकारिता में अपना योगदान करने को स्वतंत्र हैं। कर भी रहे हैं। अब अंकल एसएमएस के बिग ब्रदर बाबू ब्लागानंद प्रकट हो चुके हैं। उनकी कृपा से बबुआ लव लेटरलाल, चाचा चिट्ठाचंद और पापा पोथाप्रसाद समेत फैमिली के टोटल मेंबर्स की लाइफ सुरक्षित है। सो चिट्ठी बिटिया की भी।
सूर्य कुमार पांडेय,
साभार- आई नेक्स्ट, 13 जुलाई, 2009

Monday, July 13, 2009

अब डाकिया बाबू लायेंगे काशी विश्वनाथ व उज्जैन के महाकालेश्वर का प्रसाद

सावन के मौसम में भगवान शिव की पूजा होती है। बनारस को भगवान शिव की नगरी कहा जाता है और काशी विश्वनाथ मंदिर यहाँ का प्रमुख धार्मिक स्थल है। डाक विभाग और काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट के बीच वर्ष 2006 में हुए एक एग्रीमेण्ट के तहत काशी विश्वनाथ मंदिर का प्रसाद डाक द्वारा भी लोगों को उपलब्ध कराया जा रहा है। इसके तहत साठ रूपये का मनीआर्डर प्रवर डाक अधीक्षक, बनारस (पूर्वी) के नाम भेजना होता है और बदले में वहाँ से काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट के सौजन्य से मंदिर की भभूति, रूद्राक्ष, भगवान शिव की लेमिनेटेड फोटो और शिव चालीसा प्रेषक के पास प्रसाद रूप में भेज दिया जाता है।

काशी विश्वनाथ मंदिर के अलावा उज्जैन के प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर का प्रसाद भी डाक द्वारा मंगाया जा सकता है। इसके लिए प्रशासक, श्री महाकालेश्वर मंदिर प्रबन्धन कमेटी, उज्जैन को 151 रूपये का मनीआर्डर करना पड़ेगा और इसके बदले में वहाँ से स्पीड पोस्ट द्वारा प्रसाद भेज दिया जाता है। इस प्रसाद में 200 ग्राम ड्राई फ्रूट, 200 ग्राम लड्डू, भभूति और भगवान श्री महाकालेश्वर जी का चित्र शामिल है।

इस प्रसाद को प्रेषक के पास एक वाटर प्रूफ लिफाफे में स्पीड पोस्ट द्वारा भेजा जाता है, ताकि पारगमन में यह सुरक्षित और शुद्ध बना रहे। तो अब आप भी घर बैठे भोले जी का प्रसाद ग्रहण कीजिये और मन ही मन में उनका पुनीत स्मरण कर आशीर्वाद लीजिए !!

Wednesday, July 8, 2009

डाक टिकटों पर कानपुर

कानपुर आरम्भ से ही राजनैतिक-सामाजिक-साहित्यिक-औद्योगिक गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र रहा है और यही कारण है कि कानपुर से जुड़े- गणेश शंकर विद्यार्थी (25 मार्च 1962, 15 पैसे), दीन दयाल उपाध्याय (5 मई 1978, 25 पैसे), तात्या टोपे (10 मई 1984, 50 पैसे)े, नाना साहब (10 मई 1984, 50 पैसे), चन्द्रशेखर आजाद (27 फरवरी 1988, 60 पैसे), बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ (8 दिसम्बर 1989, 60 पैसे), श्याम लाल गुप्त ‘पार्षद’ (4 मार्च 1997, 1 रूपये), नरेन्द्र मोहन (14 अक्टूबर 2003, 5 रूपया), पदमपत सिंहानिया (3 फरवरी 2005, 5 रूपया) जैसी विभूतियों पर अभी तक डाक टिकट जारी हो चुके हैं। 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की 150वीं जयन्ती पर कानपुर व लखनऊ में हुए घमासान युद्वों को दर्शाते हुए 9 अगस्त 2007 को 5 रूपये व 15 रूपये मूल्यवर्ग के डाक टिकट व मिनीएचर शीट जारी किये गये। इसके अलावा बिठूर से जुड़े होने के कारण रानी लक्ष्मीबाई (15 अगस्त 1957, 15 पैसे) व महर्षि बाल्मीकि (14अक्टूबर 1970, 20 पैसे) पर जारी डाक टिकटों को भी इसी क्रम में रखा जाता है। यही नहीं फूलबाग स्थित राजकीय संग्राहलय में भी डाक टिकटों के संकलन का एक अलग सेक्शन है। डाक टिकटों के मामले में एक रोचक तथ्य कानपुर से जुड़ा हुआ है। वर्ष 1957 में बाल दिवस पर पहली बार तीन स्मारक डाक टिकट जारी किये गये, जो पोषण (8 पैसे, केला खाता बालक), शिक्षा (15 पैसे, स्लेट पर लिखती लड़की) व मनोरंजन (90 पैसे, मिट्टी का बना बांकुरा घोड़ा) पर आधारित थे। दस हजार फोटोग्रास में से चयनित शेखर बार्कर व रीता मल्होत्रा को क्रमशः पोषण व शिक्षा पर जारी डाक टिकटों पर अंकित किया गया। स्लेट पर लिखती लड़की रीता मल्होत्रा कानपुर की थी। ठीक पचास वर्ष बाद वर्ष 2007 में बाल दिवस पर डाक टिकट जारी होने के दौरान शेखर बार्कर व रीता मल्होत्रा को भी आमंत्रित किया गया, पर रीता मल्होत्रा को शायद खोजा न जा सका। इस प्रकार कानपुर की विभूतियों पर जारी डाक टिकटों के क्रम में रीता मल्होत्रा का नाम भी शामिल किया जा सकता है।

डाक टिकट संग्रह को बढ़ावा देने हेतु कानपुर जी0पी0ओ0 में जुलाई 1973 में फिलेटलिक ब्यूरो की स्थापना की गयी जिसमें तमाम डाक टिकटों और उनसे जुड़ी सामग्रियों का अवलोकन किया जा सकता है। कानपुर में 30 अक्टूबर-1 नवम्बर 1982, 17-18 फरवरी 2001, 22-23 मार्च 2003, 24-25 नवम्बर 2004 और 22-23 दिसम्बर 2006 को डाक टिकटों के प्रति लोगों को आकर्षित करने हेतु और इससे जुड़े विभिन्न पहलुओं से रूबरू कराने हेतु डाक टिकट प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। इन प्रदर्शनियों में 30 अक्टूबर-1 नवम्बर 1982 को ‘फिलकाॅन-82‘ के दौरान क्रमशः प्रथम भारतीय पोस्टमास्टर जनरल राय बहादुर सालिगराम, रानी लक्ष्मीबाई व श्री राधाकृष्ण मन्दिर (जे0के0मन्दिर) पर, तत्पश्चात 24 नवम्बर 2004 को ’कानफिलेक्स-2004‘ के दौरान कानपुर जी0पी0ओ0 भवन पर और 22 व 23 दिसम्बर 2006 को ‘कानपेक्स-2006‘ के दौरान क्रमशः ’कानपुर की स्थापत्य कला’ (कानपुर जी0पी0ओ0, लालइमली, फूलबाग, कानपुर सेण्ट्रल रेलवे स्टेशन, चन्द्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के भवनों के चित्र अंकित) एवं ’बिठूर की धरोहरें’ (नानाराव पेशवा का किला, स्वर्ग नसेनी, ब्रहमावर्त घाट, लवकुश जन्मस्थली के चित्र अंकित) पर विशेष आवरण जारी किये गये। इसी प्रकार 17 जनवरी 2009 को महाराज प्रयाग नारायण मंदिर, शिवाला पर विशेष आवरण जारी किया गया। इन जारी आवरणों द्वारा कानपुर की समृद्ध ऐतिहासिक विरासतों को दर्शाने का प्रयास किया गया है।