Monday, April 20, 2009

खुशबू भरा खत भेजा है तुम्हें

यूँ मेरे खत का जवाब आया, लिफाफे में एक गुलाब आया...... खुशबू भरे खत भेजने और पाने की चाह किसे नहीं होती, उस पर से यदि गुलाब, चंदन और जूही की खुशबू हो तो मदहोश करने के लिए काफी है। खुशबू भरे खतों पर कवियों और शायरों ने बहुत कुछ लिखा है पर भारतीय डाक विभाग ने चंदन, गुलाब और जूही की खुशबू वाले डाक टिकट जारी कर मानो लोगों की कल्पनाओं को ही मूर्त रूप दे दिया। अब लोगों को अपने चाहने वालों के लिए लिफाफे में गुलाब या कोई अन्य फूल रखकर भेजने की जरूरत नहीं बल्कि लिफाफे पर लगा डाक टिकट दूर से ही अपनी खुशबू से बता देगा कि अब इन्तजार की घडियाँ खत्म हो चुकी हैं।

भारतीय इतिहास में पहली बार 13 दिसम्बर 2006 को डाक विभाग ने खुशबूदार डाक टिकट जारी किये। चंदन की खुशबू वाले इस डाक टिकट को तैयार करने के लिए इसमें इंग्लैण्ड से आयातित चंदन की खुशबू वाली एक इंक की परत चढ़ाई गई, जिसकी खुशबू लगभग एक साल तक बरकरार रहेगी। इस डाक टिकट में चंदन की लकड़ी के साथ हाथी की आकृति बनाई गई है। इस आकृति का चयन कर्नाटक राज्य कला एवं शिल्प इम्पोरियम, नई दिल्ली के संग्रह में से किया गया है। इण्डियन सिक्यूरिटी प्रेस, नासिक में फोटाग्रेव्योर तकनीक से 29 मिलीमीटर चैडे व 39 मिलीमीटर लम्बी संरचना में मुद्रित 15 रूपये वाले इस प्रकार के कुल 30 लाख डाक टिकट डाक विभाग द्वारा जारी किए गए। चंदन की खुशबू वाला डाक टिकट जारी करने का प्रमुख कारण यह है कि अपनी सुगंध और औषधीय गुणों एवं धार्मिक अनुष्ठानों व सामाजिक रीति-रिवाजों के कारण चंदन प्राचीन काल से ही भारतीय धरोहर का अभिन्न अंग रहा है और वर्तमान में इस राष्ट्रीय निधि के महत्व को जानने व इसको सरंक्षण प्रदान करने की आवश्यकता है। चंदन के संबंध में रोचक तथ्य यह है कि 1792 में मैसूर के राजा ने इसे शाही वृक्ष का दर्जा दे दिया था और आज भी भारत में कोई व्यक्ति चंदन के वृक्ष का मालिक नहीं बन सकता। एक अन्य रोचक बात यह है कि चंदन के पेड़ को काटा नहीं जाता बल्कि बरसात के मौसम में जब इसकी जडं़े बेशकीमती तेल से भरपूर होती हैं, तब इसे जड़ से उखाड़ा जाता है। कहा जाता है कि एक टन अंतःकाष्ठ से 60 किलो तक तेल प्राप्त हो सकता है। उष्मा और मिठास से भरी चंदन के तेल की हल्की तीक्ष्ण सुगंध, वातावरण में लम्बे समय तक समाए रहने की अपनी विशिष्टता के साथ-साथ इतनी मद्धिम होती है कि अन्य सुगंधों से मिलकर इत्रों का अनन्त संसार सृजित करती है।

चंदन की खुशबू वाले डाक टिकट के बाद 7 फरवरी 2007 को वसन्त पर्व की मादकता के बीच वैलेन्टाईन डे से कुछ दिन पहले ही डाक विभाग ने गुलाब की खुशबू वाले चार डाक टिकट जारी किये। सुगन्ध एवं सौन्दर्य के मिश्रण से ‘महक गुलाबों की’ विषय पर जारी इन चार डाक टिकटों पर क्रमशः चार भारतीय किस्मों - भीम, दिल्ली प्रिन्सेज, जवाहर और नीलम गुलाबों के चित्र अंकित हैं। इन चारों गुलाबों के रंग प्रकृति में क्रमशः अर्ध लाल, गुलाबी, मोतिया सफेद और चाँदी की छटा वाला गुलाबी रूप में पाये जाते हैं। जहाँ भीम और नीलम गुलाब अंकित डाक टिकटों की कीमत 5-5 रुपये है वहीं दिल्ली प्रिन्सेज और जवाहर गुलाब अंकित डाक टिकटों की कीमत 15-15 रुपये है। इण्डियन सिक्योरिटी प्रेस, नासिक में फोटोग्रेव्योर तकनीक से मुद्रित इन चारों डाक टिकटों की 8-8 लाख संख्या में छपाई हुई। गौरतलब है कि गुलाब ‘रोजा’ जाति का खिलने वाला पौधा है, जिसकी उत्पत्ति अनुमानतः 3 करोड़ वर्ष से भी अधिक पुरानी है तथा इस फूल का दुनिया भर के अनेकानेक किस्सों, गाथाओं ओैर कविताओं व गीत-संगीत में जिक्र मिलता है। हाल ही में जर्मनी में किये गये एक शोध के अनुसार गुलाब की खुशबू व्यक्ति को तरोताजा रखने के साथ-साथ उसकी याददाश्त भी बढ़ाती है। शोधकर्ताओं का दावा है कि पेचीदा काम सीखते समय और सोते समय यदि गुलाब की खुशबू सूँघी जाये तो याददाश्त तेज होती है। गुलाब की महक सूँघने के बाद सोने पर व्यक्ति को पुरानी यादें आती हैं और जगने पर वह उन्हें बेहतर तरीके से याद रखता है। शायद, यही कारण है कि जेरट्ूड स्टेन ने कहा था कि-”गुलाब का कोई जवाब नहीें, गुलाब वाकई गुलाब ही है।“ प्राचीन समय से ही गुलाब स्नेह एवं सांैदर्य के प्रतीक रहे हैं।
विक्टोरियाई फूलों की भाषा के अनुसार विभिन्न रंगों के गुलाबों के संाकेतिक अर्थ होते हैं-मसलन, लाल गुलाब प्यार का प्रतीक है, गुलाबी गुलाब भद्रता, सफेद गुलाब मासूमियत, पवित्रता व मित्रता का तो पीला गुलाब टूटते प्यार या रुहानी इश्क का प्रतीक है।

चन्दन और गुलाब के बाद जूही की खुशबू वाले दो डाक टिकट 26 अप्रैल 2008 को डाक विभाग द्वारा जारी किये गये हैं। जूही भारतीय उपमहाद्वीप की जनचेतना का अभिन्न अंग है और अनेक भाषाओं के भारतीय काव्य और साहित्य में इसका उल्लेख मिलता है। जूही की सुगन्ध से सुवासित और इण्डियन सिक्योरिटी प्रेस, नासिक में फोटोग्रेव्योर तकनीक से मुद्रित 5 रूपये और 15 रूपये मूल्य के क्रमशः कुल 10 लाख और 30 लाख डाक टिकट जारी किए गए है। गौरतलब है कि जूही पुष्प को भारत में महिलाएं वेणि़यों में सजाती हैं तो चीन और दक्षिण पूर्व एशिया में इसका उपयोग चाय और चावल को जायकेदार बनाने के लिए भी किया जाता है। यही नहीं माना जाता है कि जूही वाली चाय का रोजाना सेवन करने से कुछ प्रकार के कैंसर से बचाव सम्भव है। उत्तर भारत में जूही, मोगरा व मालती एवं दक्षिण में मल्लिगई व मल्लेपूवू नाम से प्रसिद्ध रात में खिलने वाले ये फूल फिजा में मीठी सुगन्ध घोल देते हैं।

भारतीय डाक विभाग द्वारा समय-समय पर जारी नियमित डाक टिकटों के विपरीत ये खुशबूदार डाक टिकट, स्मारक डाक टिकटों की श्रेणी के तहत जारी किये गये हैं। यही कारण है कि इन डाक टिकटों का पुनर्मुद्रण नहीं हो सकता और डाक टिकट संग्राहकों हेतु यह एक अमूल्य और रोचक निधि बन गया है। सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि वर्ष 1840 में ब्रिटेन में विश्व का प्रथम डाक टिकट जारी होने के बाद मात्र चार देशों ने ही खुशबूदार डाक टिकट जारी किए। इनमें स्विटजरलैण्ड, थाईलैण्ड व न्यूजीलैण्ड ने क्रमशः चाॅकलेट, गुलाब व जैस्मीन की खुशबू वाले डाक टिकट जारी किए हैं, तो भूटान ने भी खुशबूदार डाक टिकट जारी किए हैं। अब भारत इस श्रेणी में पाँचवां देश बन गया है, जिसने चंदन की खूशबू वाला विश्व का प्रथम डाक टिकट एवं गुलाब व जूही की खूशबू वाले विश्व के द्वितीय डाक टिकट जारी किये हैं।


( कृष्ण कुमार यादव का ‘‘चन्दन की खुशबू वाला डाक टिकट‘‘ शीर्षक से यह आलेख प्रतिष्ठित पत्रिका ‘‘नवनीत‘‘ के फरवरी 2007 अंक में प्रकाशित हुआ था। बाद में इस लेख में समयानुसार संशोधन हुए और तद्नुरूप यह यहाँ प्रस्तुत है)
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