Friday, July 22, 2016

चिट्ठी और मोबाइल

उसने चिट्ठी लिखी, लिफाफे में भरी और टेबुल पर रखकर पोस्ट ऑफिस जाने की तैयारी करने लगा। चिट्ठी के बगल में ही मोबाइल आराम फरमा रहा था। उसे देखते ही उसके होठों पर एक कुटिल मुस्कान तैर गई – “हेलो, अभी तक जिंदा हो?” उसने तंज़ कसा। 

कयामत तक जिंदा रहूँगी ! 

यह भी कोई जीना ! कछुए की तरह !

आखिर में कछुए की ही जीत हुई थी !

हाऊ बोरिंग स्टोरी ! आउट डेटेड ! मुझे देखो, फोरजी स्पीड ! ग्लोरियस लाइफ ! 

दूसरे के दम पर !

सो व्हाट? इसी दम पर तुम्हारे साथियों को कब्रिस्तान पहुँचा चुका हूँ। अब तेरी बारी है। 

मुझे नेस्तनाबूत करने का ख्वाब मत देखो। जब तक तुम में ऊर्जा है, खूब बोलियाँ निकलेंगी। दुनिया तेरी मुट्ठियों में रहेगी, उसके बाद टांय-टांय फिस्स ! 

फास्ट कम्युनिकेशन के जमाने में जो प्रोग्रेस चाहता है वह ऊर्जा से प्यार करता है। तरक्की और ऊर्जा में गहरा रिश्ता है। 

कोई भी रिश्ता दिल के रिश्ते से बड़ा नहीं होता। 

व्हाट दिल विल ? जेट युग में इसे कौन पूछता है।

तुम क्या जानो दिल की अहमियत! दिल की बदौलत दुनिया बदसूरत होने से बची हुई है। तुम तो बगैर रूह वाला जिस्म हो। फिर भी जमाना इस जिस्म का दीवाना है। 

इस दीवानगी में जज़्बात की कोई जगह नहीं। संवेदना का कोई मोल नहीं। टोटली-मेकानायिज्ड रीलेशन !

और तुम्हारा रिलेशन?

मुझे नाज है सदियों पुराने रिश्ते पर। मेरे हर हर्फ में रूह बसती है। हर लफ्ज मे संजींदगी। पूरे वजूद में अपनेपन के एहसास की खुशबू। दिल की गहराई तक उतरने वाला अल्फ़ाज ! 

..... इसी बीच मोबाइल के जिस्म से अजीब तरह की टुई-टुई आवाज आने लगी। इससे बेखबर चिट्ठी अपने प्रवाह में बहती रही। मेरे स्पर्श से ही जिस्म के रेशे-रेशे में जल-तरंग बजने लगता है। जिसकी स्वर-लहरियाँ घर-आँगन को मौसिकी से भर देती हैं। चिट्ठी लिखने वाला और पढ़ने वाला पूरी शिद्दत से गुफ्तगू करने लगते हैं। दोनों आंतरिकता की महक से सराबोर हो जाते हैं। दूरियाँ आँसू बहाने लगती हैं। नजदीकियाँ मुस्कराने लगती हैं। 

पुनः मोबाइल के जिस्म से पहली वाली आवाज आने लगी? क्यों भाई, तुम्हारी जुबान को क्या हो गया? लगता है कि जवाब देते नहीं बन पा रहा है, इसलिए तुम्हारी जुबान लड़खड़ा रही है। मुझे मालूम है, सच्चाई का सामना करने की कूबत  तुझमें नहीं हैं। 

मोबाइल लाजवाब हो गया। 

उसकी खामोशी चिट्ठी को अखरने लगी। प्रत्युत्तर न पाकर उसने थोड़ा उचक कर झाँका, अरे यह तो बेजान हो गया! 

-मार्टिन जॉन, अपर बेनियासोल, पो. आद्रा, जिला-पुरुलिया, पश्चिम बंगाल-723121 
                                       (साभार: अक्षर पर्व, जुलाई-2016)

Post a Comment