Friday, October 21, 2011

डाकिया डाक लाया

सुख-दुख की धूप-छांव मानव समाज में आदि काल से ही अपने रंग-ढंग दिखाती रही है और आज भी मानव जीवन के साथ उसकी यह आंख मिचैली बदस्तूर जारी है। जब से आदमी ने संगठित समाज के रूप में अपनी विकास यात्रा का शुभारम्भ किया, ठीक तभी से उसके जीवन में समाचारों और संदेशों का महत्व बढ़ गया। यहां तक कि वनवास के समय अपहरण के उपरान्त अपनी प्राणप्रिया सीता जी के विरह में भगवान् श्रीराम भी व्याकुलता के चरम पर पहुंच कर वनप्रांतर के तृणमूल एवम् वृक्षों झाडि़यों को पकड़ पकड़ कर यह पूछने लगे कि 'हे वृक्षो लताओ, बताओ ! मेरी सीता कहां है और किस हाल में है ?' फिर भी सीता जी के विषय में कुछ भी ज्ञात न हो पाने के कारण उनकी विकलता और बढ़ने लगी । तब पवनपुत्र वीर हनुमान ने लंका की अशोक वाटिका से सीता माता का समाचार संदेश लाकर रामदूत अतुलित बलधामा होने का गौरव पाया ।

इधर मेघों के माध्यम से संदेश भिजवाने की अवधारणा कालिदास के यहां मेघदूत के रूप में ही नहीं मिलती बल्कि भारतीय सिनेमा में भी इसकी अनुगूंज सुनाई देती है -

जा रे कारे बदरा/बलम के द्वार ।
वो हैं ऐसे बुद्धू/के समझे ना प्यार ।।

आपको जरूर याद होगा वह फिल्मी गीत भी जिस में बिना पढ़ी लिखी नायिका दूर शहर चले गये अपने प्रेमी को खत लिखने के लिये डाकिया की बहुत मिन्नतें करती है, उसपर भरोसा करके अपने मन का सारा हाल उसी से लिखवाती है-

खत लिख दे सांवरियां के नाम बाबू ।
कोरे कागज पे लिख दे सलाम बाबू ।।
वो जान जाएंगें, वो मान जाएंगें -
कैसे होती है सुबह से शाम बाबू ।।

अपनी जिस प्रेम व्यथा को सारी दुनियां से छुपाती हैं, उसी में डाकिया बाबू को अपना हमराज़ बनाती हैं । यह अलग बात है कि समय के साथ वह प्रेम की जोगन अब इतनी अशिक्षित नहीं रही। अब तो बतियाने वाली डिबिया (सेलफोन) आठों याम उसकी कनपटी से सटी रहती हैं। भले ही आज ई-मेल का जमाना आ गया हो, भारतीय समाज में डाकिये का महत्व शुरू से रहा है। सभी घरों के एक ष्काॅमन मैम्बरष् के रूप में उसकी सामाजिक स्वीकृति बनी हुई है । तभी तो उर्दू के जाने माने शायर निदा फाजली ने उसके बारे में क्या खूब कहा है-

सीधा-सादा डाकिया जादू करे महान् ।
एक ही थैले में रखे आंसू और मुस्कान ।।

भारत में विज्ञापन के क्षेत्र में सम्भवतः पहला ब्राण्ड एम्बैसेडर होने का गौरव यदि किसी को प्राप्त है तो वह एकमात्र डाकिया ही है। डाकघर के लाल डिब्बे में जब आप कोई पत्र पोस्ट करते हैं कि यह पत्र, भले ही बैरंग क्यों न हो - अपने गन्तव्य तक यथाशीघ्र पहुंचेगा जरूर । फिर चाहे धूप हो या बारिश, गर्मी हो अथवा सर्दी भारतीय डाकिया ने इस विश्वास को सदा बनाये रखा है । इसी छवि को ध्यान में रखते हुए सन् 70 के दशक के अंत तक भारतीय खाद्य तेल के बाजार में एक छत्र राज करने वाले पोस्टमैन रिफाइंड आॅयल को उस उम्र के लोग भूले नहीं होंगे । तेल कम्पनी को अपनी बिक्री बढ़ाने के मकसद से अपने तेल की कनस्तरी पर छापने के लिये किसी पुलिसमैन के चित्र को नहीं अपितु पोस्टमैन को चुना। यह पोस्टमैन मार्का का ही कमाल था कि इस खाने के तेल ने हर भारतीय रसोई में कई दशकों तक धूम मचाए रखी ।

भारत के सभी विद्यालयों में लगभग बारहवीं कक्षा तक सभी भाषाओं में डाकिया पर केवल निबंध ही नहीं लिखे जाते बल्कि अनेक विद्यालय अपने सभी छात्रों को बसों में भरकर शहर के डाकघर की सैर कराने भी ले जाते हैं जहां पर बच्चों के इस कौतूहल को शांत करने की कोशिश की जाती है कि एक पत्र पेटिका में पोस्ट करने से लेकर पोस्टमैन की मार्फत दिये गये पते पर पहुंचने से पहले किन-किन प्रक्रियाओं से गुजरता है ।

भारतीय डाक विभाग और रेलवे का एक दूसरे के अस्तित्व में आने के साथ ही अटूट सम्बन्ध रहा है । यह भी अपने आप में कितना अद्भुत संयोग है कि भारतीय रेल की किसी भी रेलगाड़ी का नाम फलां रेल अथवा अमुक रेलगाड़ी बिल्कुल भी नहीं है जबकि असंख्य रेलगाडि़यों के नाम के साथ 'मेल' शब्द का मेलजोल अवश्य है जैसे कि 'पंजाब मेल', 'फ्रंटियर मेल' आदि । निश्चित रूप से रेल विभाग ने भी डाक की महिमा का ध्यान रखते हुए अपने यात्रियों को यह संदेश देना जरूरी समझा कि फलां मेल गाड़ी में डाक का डिब्बा है ।

डाक विभाग का राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में भी बहुत महत्वपूर्ण योगदान है । सेना डाक सेवा नाम से इसका एक बहुत विशाल एवम् अलग प्रकोष्ठ है । यह भी पूर्णतः प्रशिक्षित एवम् शस्त्र सुसज्जित स्वयं में एक पूरी फौज ही है जो पूरे देश में सुदूर जंगलों, बीहड़ बियाबानों तथा दुर्गम पहाड़ी चोटियों पर युद्ध अथवा शांतिकाल में कभी भी और कहीं भी चाहे चार सैनिकों की चैंकी ही क्यों न हो, घर से या कहीं से भी उन सैनिकों के नाम आया एक अदद पोस्टकार्ड भी सेना डाक सेवा का नौजवान उन्हें वहीं उनके निर्धारित ठिकाने पर पहुंचायेगा जरूर। बर्फानी बंकरों में तैनात हमारे वीर सिपाहियों के लिये घर से प्राप्त होने वाले पत्र कितना बड़ा सहारा होते हैं इसका अनुमान किसी वार सैनिक बेटे को लिखे उसकी माँ के इस पत्र सन्देश के द्वारा आसानी से लगाया जा सकता है जिसे अलवर के एक कवि ने अपनी ओजस्वी कविता में यूं ढाला है-

छुटकी ने राखी रख दी है इसमें बड़े गरूर से ।
और बहू ने तिलक किया है इसका निज सिंदूर से ।।
मेरी बूढ़ी छाती में भी दूध उतर आया बेटा,
और गोंद की जगह उसी से चिट्ठी को चिपकाया बेटा ।।

सेना में एक बात बहुत प्रचलित है कि कोई भी सैनिक एक समय राशन न मिले तो परेशान नहीं होता किन्तु घर से आए पत्र के लिये वह बहुत विचलित होता है । उसकी इसी बेचैनी को शांत करती है आर्मी पोस्टल सर्विस । घर से आयी चिट्ठी किसी फौजी के लिये पूरा घर होती है । चिट्ठी में उसे उसके घर की पूरी झलक मिलती है जिसे पढ़कर प्रेमपूर्वक तह करके वह जेब में रख लेता है और अगले ही पल दुश्मन पर टूट पड़ता है ।

सन् 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के समय भी डाक विभाग का काम अत्यन्त सराहनीय रहा है । अंग्रेजों ने इस स्वाधीनता आन्दोलन को ग़दर की संज्ञा दी । इस जंग-ए-आजादी में शिरकत करने के जुर्म में अंतिम मुगल सम्राट बहादुरशाह ज़फर पर चले मुकदमें की कार्यवाई बुधवार 27 जनवरी 1858 से शुरू होकर मंगलवार 9 मार्च 1858 तक कुल 21 दिन चली थी । इसमें छठे दिन की कार्यवाही मंगलवार 2 फरवरी सन् 1858 के रोज़ बहादुरशाह ज़फर के (शाही) हकीम एहसन उल्ला खाँ अदालत में बुलाये गये तथा डिप्टी जज एडवोकेट ने उनका ब्यान लिया । उन्हें क्रमशः 6 कागजों की तस्दीक करने को कहा गया । गवाह ने समुचित उत्तर दिया । कागज नम्बर 5 की बाबत अलग से जोर देकर पूछे जाने पर गवाह ने ब्यान किया, 'जी नहीं वह किसके हाथ का लिखा है, मैं नहीं पहचान सकता।' आगे पूछे जाने पर हकीम साहब ने अपनी गवाही में कहा, 'जी हाँ, मुझे मुहम्मद बख्त खाँके दफ्तर के किसी मुहर्रिर की लिखावट मालूम होती है।' कागज जिस पर 'अ' का चिन्ह था असली लिफाफा सहित जिस पर दिल्ली के डाकखाने की मुहर है, लाया गया । इससे सिद्ध होता है कि वह 25 मार्च सन् 1857 को दिल्ली के डाकखाने में डाला गया और 27 मार्च सन् 1857 की मुहर प्रकट करती है कि यह उस दिन आगरे पहुँचा । (बहादुर शाह का मुकदमा, लेखकः ख्वाजा हसन निज़ामी, पृ0 27) डाक विभाग ने अपने बाल्यकाल में जबकि उन दिनों आज जैसे यातायात के साधनों का विकट अभाव था तब भी दिल्ली से पोस्ट किये गये पत्र को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बेहद उथल पुथल भरे समय में ठीक तीसरे दिन आगरा में वितरित कर दिया। यह डाक विभाग की शैशवास्था की कार्य-कुशलता का प्रामाणिक उदाहरण है जो कि इतिहास का अटूट अंग बन चुका है । चिट्ठी पर दर्ज पोस्टमैन के 'रिमार्क' को आज भी अदालतों में पूरी मान्यता दी जाती है ।

भारतीय मुद्रा बाजार में चवन्नी भले ही दिवंगत हो गयी हो किन्तु उसके सममूल्य 25 पैसे के डाक टिकट को डाक तिलक की भांति अपने भाल पर धारण करके कोई भी समाचार पत्र कश्मीर से कन्या कुमारी तक आज भी पहुंच रहा है. सामान्य-ज्ञान के रूप में एक बेहद रोचक जानकारी यह भी है कि भारत के सम्मानित जमाकर्ताओं की बदौलत डाकघर बचत बैंक अखिल विश्व में सर्वाधिक खाते होने के कारण दुनिया का सबसे बड़ा बैंक है । डाक विभाग की कल्याणकारी सेवाओं में ब्रेल लिपि में लिखे अंध साहित्य (ब्लाइंड लिटरेचर पैकेट्स) को पूरे देश में यहां से वहां पूर्णतः निःशुल्क पहंुचाया जाता है । किसी भी राष्ट्रीय आपदा के समय प्रधानमन्त्री राहत-कोष में दिये जाने वाले अंशदान के मनिआॅर्डरों का प्रेषण भी समय समय पर शुल्क मुक्त कर दिया जाता है किन्तु इसके लिए प्रत्येक बार नये आदेशों के अंतर्गत ही ये मनिआॅर्डर कमीशन मुक्त होते हैं ।

डाक विभाग अपने सामाजिक दायित्वों के प्रति भी सदैव सजग एवम् समर्पित रहा है । 'अहर्निशं सेवामहे' तथा 'Service before self' की अवधारणा पर आधारित डाक विभाग द्वारा देश-विदेश की ख्याति प्राप्त महान् विभूतियों, ऐतिहासिक स्थलों, स्मारकों, शीर्षस्थ शिक्षा संस्थानांे, प्रमुख घटनाओं, अनेक सामाजिक चेतना से जुड़े प्रसंगों एवम् चर्चित आयोजनों पर समय-समय पर बहुरंगी डाक-टिकट जारी किये जाते हैं । डाक टिकटों का यह रंग-बिरंगा संसार डाक-टिकट संग्रहकर्ताओं के साथ साथ हर किसी का मन मोह लेता है ।

किसी जमाने में केवल डाक कर्मचारियों तक सीमित डाक जीवन बीमा सेवा न सिर्फ अन्य सभी केन्द्र अथवा राज्य सरकार एवम् सार्वजनिक प्रतिष्ठानों के कर्मचारियों तक पहुंचाई गई बल्कि इसके साथ-साथ ग्रामीण डाक जीवन बीमा पाॅलिसियां भी बहुत लोकप्रिय सिद्ध हो रही हैं । इसके अलावा स्पीड पोस्ट के बाद पंजीकृत डाक को भी नेट पर लाया जा रहा है ताकि उसकी पहुंच पर डाक विभाग के ग्राहकवृन्द घर बैठे नजर रख सकें । इसके अतिरिक्त अन्य अनेक सेवाओं की भी समयबद्धता तय की गई है और भरसक प्रयास किये जा रहे हैं कि निर्धारित मानदण्डों के अनुसार सेवाओं में व्यापक सुधार सुनिश्चित किया जा सके । इसके लिए विभाग को अपने नित्य सिकुड़ते मानव संसाधन एवम् अन्य उपलब्ध अत्यल्प स्त्रोतों में वर्तमान आवश्यकताओं के अनुरूप भारी इजाफा करना होगा तभी जाकर मानव एवम् तकनीकी तथा मशीनी क्षमता का विभाग तथा राष्ट्रहित में व्यापक उपयोग सम्भव है ।

सामाजिक जीवन में आये उतार चढ़ाव के हिसाब से कर्तव्यों में कोताही की छुटपुट खबरें डाक-विभाग के सन्दर्भ में भी भले ही कभी कभार सुनी जाती हों तो भी डाक विभाग ने अपने ढांचे व कार्यशैली में आमूल परिवर्तन करने की ठानी है जिसमें आधुनिक सूचना तकनीक का भरपूर उपयोग किया गया है ताकि डाक-विभाग अपने स्वर्णिम अतीत एवम् गौरवशाली इतिहास के बरक्स उसकी पुरानी साख और विश्वसनीयता की अक्षुण्ण रखा जा सके।

- नीतिपाल अत्रि 'सुदर्शन'
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जन्म : 1 जनवरी 1962, गांव आसन, रोहतक (हरि0)/ शिक्षा: कला एवम् शिक्षा स्नातक ।
प्रकाशन: देश की अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित । आकाशवाणी से अनेक प्रसारण ।
सम्मान: मंडल स्तरीय राजभाषा पुरस्कार ।
संप्रति: भारतीय डाक विभाग में कार्यरत (डाक अधीक्षक कार्यालय, फरीदाबाद, हरियाणा में डाक सहायक).
संपर्क: 3763 जवाहर काॅलोनी, फरीदाबाद-121005
मो0: 09711386169








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