Friday, April 24, 2009

डाक टिकटों पर विश्व चित्रकला की झांकी


प्रायः साहित्य के बारे में कहा जाता है कि वह समाज का दर्पण होता है। यदि ध्यान से देखा समझा जाये तो दूसरी कलाएं भी अपने-अपने समाज का दर्पण होती हैं बशर्ते इनके रचयिता सजग साहितयकार-कालाकार में वैसी पैनी दृष्टि हो। ठीक उसी प्रकार अनेकानेक-स्मारक-विशेष-नियत डाक टिकट भी निज समाज के दर्पण ही नहीं बल्कि ऐतिहासिक जीवंत दस्तावेज होते हैं। ऐसे ही ऐतिहासिक दस्तावेजों में वे अनेक डाक टिकट हैं जो अपने में विश्व के महान चित्राकरों की अनुपम चित्रकृतियों को संजाये हुए हैं। ये मात्र डाक टिकट ही नहीं हैं बल्कि अच्छी-खासी चित्रकला की सचित्र पुस्तकें हैं। विश्व के महान चित्रकारों की दुनिया के जीवंत दस्तावेज हैं और अनूठी विश्व चित्रकला के इतिहास के साफ-सुथरे दर्पण हंै।

जो डाक टिकट 8 मई, सन् 1840 ई. में इंग्लैण्ड में पहली बार विश्व पटल पर देखने को मिले थे, वे शुरू में कौतुहल के विषय थे। डाक खर्च अदा करने के बाद इनका संग्रह करना एक अभूतपूर्व शौक के रूप में जन्मा था। तब फिलेटली का मतलब ही था- डाक टिकटों का संग्रह करना। धीरे-धीरे यह शौक मनोरंजन के साथ-साथ ज्ञान का पिटारा बनता चला गया। आज की फिलेटली की उन्नत अवधारणा यह है कि इन डाक टिकटों का विधिवत अध्ययन हो, इनकी सार्थक समीक्षा हो एवं इनके विश्लेषण से प्राप्त निष्कर्षों का इनके समसामयिक विश्व के सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनैतिक परिदृश्य में प्रासंगिक व्याख्या हो। प्रस्तुत पुस्तक में इसी दृष्टिकोण से कुछ बहुमूल्य व दुर्लभ चित्रों वाले डाक टिकट शामिल है एवं तद्नुसार चित्रकला के कुछ मन्तवयों को भी उभारा गया है। निश्चिततः यह पुस्तक एक विलक्षण एवं संग्रहणीय दस्तावेज है।

पुस्तक-रंगीन डाक टिकटों पर विश्व चित्रकला की झांकी
लेखक-गोपीचंद श्रीनागर
पृष्ठ- 120, संस्करण-2005-2006, मूल्य- 150 रूपये
प्रकाशक-बुनियादी साहित्य प्रकाशन, राम कृष्ण पार्क, अमीनाबाद, लखनऊ
Post a Comment