Saturday, October 2, 2010

डाक-टिकटों पर भी छाये गाँधी जी

विश्व पटल पर महात्मा गाँधी सिर्फ एक नाम नहीं अपितु शान्ति और अहिंसा का प्रतीक है। महात्मा गाँधी के पूर्व भी शान्ति और अहिंसा की अवधारणा फलित थी, परन्तु उन्होंने जिस प्रकार सत्याग्रह एवं शान्ति व अहिंसा के रास्तों पर चलते हुये अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया, उसका कोई दूसरा उदाहरण विश्व इतिहास में देखने को नहीं मिलता। तभी तो प्रख्यात वैज्ञानिक आइंस्टीन ने कहा था कि -‘‘हजार साल बाद आने वाली नस्लें इस बात पर मुश्किल से विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस से बना ऐसा कोई इन्सान धरती पर कभी आया था।’’ संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी वर्ष 2007 से गाँधी जयन्ती को ‘विश्व अहिंसा दिवस’ के रूप में मनाये जाने की घोषणा की तो अमेरिकी कांग्रेस में बापू को दुनिया भर में स्वतंत्रता और न्याय का प्रतीक बताते हुए प्रतिनिधि सभा में उनकी 140वीं जयंती मनाने संबंधी प्रस्ताव पेश किया गया। दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र अमेरिका के मुखिया ओबामा तो गाँधी जी के कायल हैं। उनकी माने तो अगर भारत में अहिंसात्मक आंदोलन नहीं होता तो अमेरिका में नागरिक अधिकारों के लिए वैसा ही अहिंसात्मक आंदोलन देखने को नहीं मिलता। निश्चिततः दुनिया का यह दृष्टिकोण आज के दौर में शान्ति व अहिंसा के पुजारी महात्मा गाँधी के विचारों की प्रासंगिकता को सिद्ध करता है।

महात्मा गाँधी दुनिया के सर्वाधिक लोकप्रिय राजनेताओं/व्यक्तित्व में से हैं. . यही कारण है कि प्राय: अधिकतर देशों ने उनके सम्मान में डाक-टिकट जारी किये हैं. सामान्यतः डाक टिकट एक छोटा सा कागज का टुकड़ा दिखता है, पर इसका महत्व और कीमत दोनों ही इससे काफी ज्यादा है. डाक टिकट वास्तव में एक नन्हा राजदूत है, जो विभिन्न देशों का भ्रमण करता है एवम् उन्हें अपनी सभ्यता, संस्कृति और विरासत से अवगत कराता है। यह किसी भी राष्ट्र के लोगों, उनकी आस्था व दर्शन, ऐतिहासिकता, संस्कृति, विरासत एवं उनकी आकांक्षाओं व आशाओं का प्रतीक है। ऐसे में डाक-टिकटों पर स्थान पाना गौरव की बात हैभारत में सर्वाधिक बार डाक-टिकटों पर स्थान पाने वालों में गाँधी जी प्रथम हैं. यहाँ तक कि आजाद भारत में वे प्रथम व्यक्तित्व थे, जिन पर डाक टिकट जारी हुआ. हाल ही में संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी गांधीजी की स्मृति में डाक-टिकट जारी किया है.

डाक-टिकटों के परिप्रेक्ष्य में याद आया कि स्वतन्त्रता के बाद सन् 1948 में महात्मा गाँधी पर डेढ़ आना, साढे़ तीन आना, बारह आना और दस रू0 के मूल्यों में जारी डाक टिकटों पर तत्कालीन गर्वनर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने गवर्नमेण्ट हाउस में सरकारी काम में प्रयुक्त करने हेतु ‘‘सर्विस’’ शब्द छपवा दिया। इन आलोचनाओं के बाद कि किसी की स्मृति में जारी डाक टिकटों के ऊपर ‘‘सर्विस’’ नहीं छापा जाता, उन टिकटों को तुरन्त नष्ट कर दिया गया। पर इन दो-तीन दिनों में जारी सर्विस छपे चार डाक टिकटों के सेट का मूल्य दुर्लभता के चलते आज तीन लाख रूपये से अधिक है। वाकई आज गाँधी जी के साथ-साथ उनसे जुडी हर चीजें मूल्यवान हैं, यही कारण है दुनिया भर में उनके प्रशंसक उनसे जुडी चीजों को नीलामी तक में खरीदने के लिए उत्सुक रहते हैं. गाँधी-जयंती पर राष्ट्रपिता का पुनीत स्मरण !!

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