Saturday, January 23, 2010

डाकिया डाक लाया

जब यह ब्लोग शुरू किया था तो मन में कही यह था कि उस समय और स्थान से जुडे लोग भी अपनी यादो को शेयर करें, जो हमारी जिन्दगी का एक अटूट हिस्सा हुआ करते थे तब. उनमे से एक हैं हम लोगों के पंडितजी यानी हमारी कॉलोनी के पोस्टमैन .पंडितजी हमारे घरों में केवल चिट्ठी फ़ेंक कर नही चले जाते थे बल्कि पते की लिखावट से अक्सर जान जाते थे कि चिट्ठी कहॉ से आयी है .अब सोचो तो कितनी आश्चर्यजनक बात लगती है कि कॉलोनी में कितने सारे घर थे और हर घर में कितनी जगहों से चिट्ठी आती थी .कैसे याद रखते होंगे पंडितजी इतनी सारी हन्द्व्रितिंग .पर कहते हैं ना कि the more involved you areे with your work ,the more efficient you will be .हमारे पंडितजी तो काम के साथ साथ लोगों से भी involved रहते थे तो फिर भला कैसे ना होते वे extra efficient।

पंडितजी की आवाज़ आयी नही कि आगे आने वाले घरों में उनका इंतज़ार शुरू हो जाता था .आवाज़ आयी नौ नंबर (हाँ यही नंबर हुआ करता था कॉलोनी में हमारे घर का ).उस दिन चिट्ठी नौ नंबर की थी इस लिए साइकिल हमारे घर के सामने रुकी लेकिन अगर पड़ोस वाली चाचीजी बाहर काम करती दिख गयीं तो एक सवाल उधर की ओर उछला 'और बडके भैया के यहाँ सब ठीक है ना '.कल पंडितजी आसाम में posted सपन दादा का पत्र दे कर गए थे चाचीजी को ।

दूसरे शहरों के ही संदेश केवल नही पहुँचाते थे पंडितजी हम लोगों तक .'पंडितजी आप पुराने सेंटर की ओर हो आये हैं क्या '। 'नाही अबे जैबे बिटिया .काहे कौनो काम रहए का .''हाँ पंडितजी ,वो १२१ ब्लॉक में टंडन जी की बिटिया नीरु को यह किताब दे दीजियेगा .'इसी तरह की सेवायें कॉलोनी की सभी लड़कियाँ पंडितजी से ले लिया करती थी .और ये सेवायें थी भी exclusive for girls .लड़कियों को पैदल कम चलना पडे ,उनका बाहर निकलना बच जाये ,पंडितजी के ये कुछ अपने कारण हो सकते हैं .पर यह सच है कि इस वजह से हम लड़कियाँ खुद को कुछ खास महसूस करते थे .पता नहीं आज के बच्चे इस बात को समझ पायेंगे या नहीं पर उस समय बहुत से घरों की लड़कियों को पंडितजी का यह काम एक अलग तरह की ख़ुशी देता था .कोई तो था जो कोई काम केवल उनके लिए करता था .कहीँ तो उन्हें अपने भाइयों से ज्यादा तवज्जो मिलाती थी .वो भी बुजुर्ग पंडितजी द्वारा ,जिनकी इज़्ज़त हर घर में होती थी .यूं शायद यह बहुत छोटी बात लगे पर जब अपना वजूद हर घडी दांव पर लगा अनुभव हो तो ये छोटे दिखने वाले काम और बाते ही तो आसमान की ओर खुलती खिडकी से नज़र आते हैं ।

इतना ही नही ,कॉलोनी के किसी भी घर के किसी भी दुखद समाचार की खबर वे बिना किसी के कहे कॉलोनी में उसके आत्मीय स्वजनों तक पहुचा देते थे ,फिर भला उसके लिए उन्हें कितना भी लम्बा चक्कर क्यों ना लगाना पडे या फिर से उसी ओर जाना पडे जहाँ से वे आ रहे होते थे । यह उनकी सरकारी ड्यूटी का हिस्सा तो था नही पर इसे भी वे उतनी ही गंभीरता ओर जिम्मेदारी से निभाते थे .मौसम के तेवर कितने भी बिगाड हुए क्यों ना हो पंडितजी बिना किसी रुकावट के अपना काम करते थे और वह भी अपनी चिर परिचित मुस्कराहट के साथ .ना उनके चेहरे पर कभी परेशानी झलकती थी ना उनकी आवाज़ में शिथिलता .जेठ का प्रचंड ताप हो ,मूसलाधार बारिश या फिर कडाके की सरदी पंडितजी की उपस्थिति हमारी दिनचर्या का अंग थी जैसे .घर गृहस्थी वाले आदमी थे ,रोज़ पास के गाँव से साइकिल चलाते हुए आते थे .परेशानियाँ ,झंझटें ,तो उनकी ज़िंदगी में भी आती ही रही होगीं पर उसका प्रभाव वे अपने काम और जिम्मेदारी पर नही पडने देते थे .और जिम्मेदारियां भी कैसी ,जिसमें से बहुत सारी तो उन्होने खुद ओढ़ रखी थी .हमारी कॉलोनी में पंडितजी की पोस्टिंग काफी लंबे समय तक रही थी .हमारी किशोरावस्था से हमारी शादी तक । इतने लंबे समय में मेरी याद में वे केवल एक बार छुट्टी गए थे .अपनी बिटिया की शादी के समय ।

हमारी बड़ी बहन जब शादी के बाद त्रिवेंद्रम चली गयीं थी तो पूरे घर को उनकी चिट्ठी का इन्तजार रहता था .हमारी अम्मा की बेचैनी और उत्कंठा का पंडितजी को पूरा पूरा अंदाजा रहता था .जिस बार जिज्जी की चिट्ठी ज़रा देर से आती थी ,वे अपना नियमित रास्ता छोड़ कर पहले चिट्ठी हमारे यहाँ पहुचाने आते थे भले ही उसके लिए उन्हें उल्टा चक्कर क्यों ना लगाना पडे .अम्मा के मन को दो घंटे पहले निश्चिन्तता पहुचाना ज्यादा मायने रखता था .बात केवल ससुराल गयी बिटिया की अम्मा के मन पडने की ही नही थी .पंडितजी को सबके मन में होने वाली उठा पटक का अंदाज़ा रहता था .किस बहु को मायके में होने वाली शादी के कार्ड का इन्तजार है ,किस लडके के लिए नौकरी का appointment लैटर जीवन मरण का प्रशन बना हुआ है ,किस बहु का moneyorder या चिट्ठी उसकी सास के हाथ में देने में कोई हर्ज़ नही है और किसके लिए मौका तलाशना है .पंडितजी की पकड़ हर नब्ज़ पर बिल्कुल सही थी ।

कॉलोनी में बडे हुए हर बच्चे की ज़िंदगी के हर महत्वपूर्ण पड़ाव में पंडितजी की साझेदारी थी .वे केवल आने वाली चिट्ठी ही नही पहुचाते थे वरन इन्तजार की जा रही चिट्ठी के ना आने की भी खबर दे जाते थे .'आजव नही आयी बिटिया/भैया 'कहते समय पंडितजी की आवाज़ में इतनी लाचारी होती थी कि चिट्ठी का इन्तजार करने वाला अपनी बेचैनी छुपाने लगता था .ऐसा लगता था कि वे चिट्ठी ला कर हाथ में नही रख पा रहे हैं तो जैसे चूक उनसे ही हो रही है ।

अपनी ड्यूटी के प्रती इतना गम्भीर होने का यह मतलब बिल्कुल नही था कि पंडितजी को हँसना चिढ़ाना नही आता था .और भी रस थे उनमे.पंडितजी पर यह पोस्ट हमारे romance में उनकी अहम भूमिका के जिक्र के बिना तो पूरा हो ही नही सकता .वो पंडितजी और हमारे कॉलोनी में आखिरी दिन थे .उनकी सेवानिवृति का समय पास आ रहा था और हमारे अम्मा बाबु की देहरी छोड़ने का .सुन्दर उन दिनों दिल्ली में थे .ई connectivity और ई मेल ,chat के जमाने वाले लोग समझ ही नही सकते कि चिट्ठी लिखने और उसके इन्तजार का मज़ा क्या होता है .क्या होती है धड़क्नो की रफ्तार हाथ में पकडे लिफाफे के खुलने से पहले .पर हमारे पंडित जी को सब पता था .हमने तो उस जमाने में भी दिल्ली और कानपूर की दूरी को बालिश्त भर का कर दिया था .और उसमे पंडितजी ने हमारा पूरा साथ दिया था .कभी कभी सबेरे नौ बजे ही गेट पर आवाज़ आती ,बिटिया लेव ,दिल्ली वाली चिट्ठी रहे ,तो हम कहे सबेरे पहुँचा देयी .तुम्हारे बैंक जाये से पहिले .और फिर साइकिल में चढ़ते चढ़ते अम्मा की ओर देख कर हस्नते हुए कहते ,'और का अब दिन भर चैन तो पड़ जई ।' यही नही एक दिन में आने वाली दो दो चिट्ठियों को भी वे सुबह शाम दोनो समय उतनी ही मुस्तैदी से पहुँचा जाते थे .पर हमे यह बताना भी नही भूलते थे कि यह वे मेरी मनोदशा के मद्देनज़र कर रहे है

तो ऐसे थे हमारे पंडितजी .हमारे दुःख सुख ,उतार चदाव में हमारे साथ .हमे तो ऐसा लगता है कि भगवान ने उन्हें डाकिया बनाने के हिसाब से ही बनाया था .he was cut for that job .

साभार : akshara
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