Saturday, March 21, 2009

जब चिट्ठी का मजमून ही बदल गया...

एक गांव में एक स्त्री थी। उसके पति आई टी आई मे कार्यरत थे । वह अपने पति को पत्र लिखना चाहती थी, पर अल्पशिक्षित होने के कारण उसे यह पता नहीं था कि पूर्णविराम कहाँ लगेगा । इसीलिये उसका जहाँ मन करता था वहीं पूर्णविराम लगा देती थी। आखिरकार उसने चिट्टी इस प्रकार लिखी की उसका मजमून ही बदल गया. आप भी गौर करें और आनंद लें-

मेरे प्यारे जीवनसाथी मेरा प्रणाम आपके चरणों में । आप ने अभी तक चिट्टी नहीं लिखी मेरी सहेली कॊ । नौकरी मिल गयी है हमारी गाय को । बछडा दिया है दादाजी ने । शराब की लत लगा ली है मैंने । तुमको बहुत खत लिखे पर तुम नहीं आये कुत्ते के बच्चे । भेड़िया खा गया दो महीने का राशन । छुट्टी पर आते समय ले आना एक खूबसूरत औरत । मेरी सहेली बन गई है । और इस समय टीवी पर गाना गा रही है हमारी बकरी । बेच दी गयी है तुम्हारी माँ । तुमको बहुत याद कर रही है एक पड़ोसन । हमें बहुत तंग करती है तुम्हारी बहन । सिर दर्द मे लेटी है तुम्हरी पत्नी।

Tuesday, March 10, 2009

डाकघरों से सोने के सिक्कों की बिक्री

डाकघरों में सोने की बिक्री। पहली दृष्टि में यह चौंकाने वाली बात लगती है पर है एकदम सही। भारतीय डाक विभाग द्वारा रिलायन्स मनी लि0 के सहयोग से देश के तमाम डाकघरों में 24 कैरेट के सोने के सिक्कों की बिक्री अक्टूबर २००८ से की जा रही है। आरंभ में यह योजना दिल्ली, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और गुजरात के १०० डाकघरों में आरंभ की गई और तत्पश्चात नवम्बर २००८ में इसे पंजाब, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और मध्य प्रदेश तक विस्तृत किया गया। ९ मार्च २००९ को यह आकर्षक योजना उत्तर प्रदेश और हरियाणा में विस्तृत की गई।

सोने के ये सिक्के 0.5, 1, 5, 8 ग्राम की टेम्पर प्रूफ पैकिंग में बिक्री हेतु उपलब्ध कराये जा रहे हैं। इनकी बिक्री बाजार द्वारा निर्धारित मूल्य से ही निर्धारित होगी। सील्ड कवर में पैक किये गये ये सिक्के वल्काम्बी (Valcambi) स्विटजरलैण्ड द्वारा निर्मित हैं एवं 24 कैरेट के साथ इनकी शुद्धता 99.99 प्रतिशत स्विस सर्टिफिकेशन द्वारा प्रमाणित है। इसके साथ ही डाक विभाग की विभिन्न योजनाओं में निवेश करने के साथ-साथ अब लोगों को डाकघरों में जाकर सोने में निवेश करने का मौका भी मिलेगा। फिलहाल डाकघर से सोने की इस खरीद पर ग्राहकों को 8 अप्रैल तक 5 प्रतिशत की छूट दी जा रही है।.......... है न आकर्षक योजना।
(http://pib.nic.in/release/release.asp?relid=46556)

Sunday, March 8, 2009

अमेरिकी राष्ट्रपति को रोज मिलते हैं 40,000 पत्र

कौन कहता है कि लोग अब पत्र नहीं लिखते। दुनिया की मशहूर हस्तियांँ इस बात की गवाह हैं कि लोगों में अभी भी पत्र लिखने का क्रेज कायम है। नवनिर्वाचित अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को प्रतिदिन करीब 40,000 पत्र मिलते हैं। हालांकि वह इनमें से केवल 10 का ही जवाब दे पाते हैं। यह आंकड़ा खुद राष्ट्रपति बराक ओबामा ने सार्वजनिक किया। उन्होंने व्हाइट हाउस में बुलाए गए हेल्थ सेमिनार के समापन समारोह में इस बात का खुलासा किया। राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा कि मुझे हर दिन 40,000 पत्र मिलते हैं। यद्यपि मैं सभी 40,000 पत्र तो नहीं पढ़ पाता लेकिन मेरा स्टाफ हर दिन 10 पत्रों को चुनता है जो कि मैं पढ़ता हूँ और इनमें से अधिकतर का जवाब देने की हरसंभव कोशिश करता हूँ। राष्ट्रपति बराक ओबामा का मानना है कि यह जनता से संपर्क में रहने का एक नायाब तरीका है।

Monday, March 2, 2009

1897 में गठित हुयी फिलेटलिक सोसाइटी ऑफ़ इंडिया

भारत में प्रथम स्टैम्प सोसाइटी, फिलेटलिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल थी। 1894 में स्थापित इस सोसाइटी के प्रथम अध्यक्ष जी0जे0 हिन्स, उपमहानिदेशक डाक विभाग थे। फिलेटलिक सोसाइटी आफ इंडिया का गठन 6 मार्च 1897 में हुआ था और फिलेटलिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल के तत्कालीन अध्यक्ष सी0 इस्टीवर्ट विल्सन ही इसके प्रथम अध्यक्ष बने। आरम्भ में इस सोसाइटी में 6 महिलाओं सहित कुल 60 सदस्य थे और सभी ब्रिटिश थे। 1897 में ही प्रथम भारतीय सी0के0 दत्त इस सोसाइटी के सदस्य बने। 1906 का वर्ष सोसाइटी हेतु महत्वपूर्ण रहा, जब प्रिन्स आफ वेल्स जार्ज पंचम ने कलकत्ता में स्वयं सदस्यों के डाक टिकटों का संग्रह व्यक्तिगत रूप से देखा। इस दौरान एक सदस्य ए0सी0 राइट ने जार्ज पंचम को ‘सिन्दे डाक' भी सौपा। सोसाइटी ने 1977 में अपना एक शताब्दी का सफर पूरा किया और इस दौरान डाक विभाग द्वारा इस पर दो डाक टिकटों का सेट भी जारी किया . इसके वर्तमान अध्यक्ष श्री दिलीप शाह हैं।

Saturday, February 21, 2009

डाक सेवाओं का बढ़ता सफर

भारतीय डाक एक विभाग के रूप में भले ही 1854 में स्थापित हुआ हो पर इसका सफर इससे भी पुराना है। भारत में व्यवस्थित डाक सेवा का प्रथम उद्धरण चन्द्रगुप्त मौर्य(321-297 ई0पूर्व) के काल का मिलता है। संदेशवाहक कबूतर भी मौर्य काल की ही देन है। डाक सेवाओं पर भारत में प्रथम लिखित विवरण जियाउद्दीन बरनी का मिलता है, जिसमें उल्लेख किया है कि 1226 ई0 में अलाउद्दीन खिलजी ने नियमित अश्व एवं धावकों को इस कार्य हेतु व्यवस्थित किया। इसी प्रकार मैसूर ने चिक्का देवराज वाड्यार के काल में 1672 ई0 में सबसे बढ़िया डाक व्यवस्था आरम्भ की, जिसे कि भारतीय डाक सेवा के इतिहास में प्रथम संस्थागत स्थापना माना जाता है। इस्ट इंडिया कम्पनी ने सर्व प्रथम 1688 में बम्बई और मद्रास के मध्य डाक लाइन स्थापित करने हेतु कदम उठाये। अंग्रेजों ने सर्वप्रथम 1727 में कलकत्ता के कोर्ट हाउस बिल्डिंग में डाकघर स्थापित किया। इसके ठीक 39 वर्ष बाद राबर्ट क्लाइव ने 24 मार्च 1766 को बंगाल में एक नियमित डाक व्यवस्था आरम्भ की और आदेश किया कि सभी पत्र सरकारी भवन से ही डिस्पैच होने चाहिए। इस हेतु एक पोस्टल राइटर (अब के पोस्टमास्टर) और एक सहायक की गवर्नमेन्ट हाउस में नियुक्ति की गई जो प्रत्येक रात को डाक प्राप्त करते, उनकी स्क्रूटनी करते और तत्पश्चात उसे डिस्पैच करते। 1774 में वारेन हेस्टिंग्स ने यह व्यवस्था की कि कम्पनी डाक के द्वारा लोगों के व्यक्तिगत पत्र भी फीस लेकर भेजे जा सकते हैं। इसके बाद डाक सेवाओं का विस्तार निरन्तर होता गया और 1854 में इसे एक विभाग रूप में स्थापित किया गया। 1947 में विभाजन के पश्चात भारत में 23344 डाकघर थे और कुल मेल ट्रैफिक 2204 मिलियन था। आजादी पश्चात डाक विभाग ने तमाम नये कदम उठाये। 21 नवम्बर 1947 को प्रथम डाक टिकट जारी किया और तत्पश्चात फिलैटली को एक शौक रूप में विकसित करने में अपना योगदान दिया। आवश्यकतानुसार डाक विभाग ने कई अन्य कार्य भी किये, जिसमें 1950 में टी0बी0 सील्स की डाकघरों द्वारा बिक्री शामिल थी। वर्ष 2004 में विभाग ने 150 वर्ष पूरे किये हैं और इसी वर्ष तमाम क्रान्तिकारी कदम उठाये। इनमें लाजिस्टिक पोस्ट, ई-पोस्ट, सीनियर सिटीजन सेविंग स्कीम, म्युचुअल फण्डों की डाकघरों से बिक्री, ओरियन्टल इंश्योरेन्स कम्पनी के उत्पादों की बिक्री शामिल है। 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में अगले वर्ष 26 जनवरी 2005 को प्रथम बार भारतीय डाक ने गणतंत्र दिवस परेड में अपनी झांकी प्रस्तुत की। इसी वर्ष राष्ट्रपति डाॅ0 ए0पी0जे0 अब्दुल कलाम ने देश भर से 150 डाकियों को राष्ट्रपति भवन में आमंत्रित किया। वक्त के साथ डाक सेवाओं का काफिला बढ़ता गया और यह दस्तूर अभी भी जारी है।

Tuesday, January 27, 2009

प्रोजेक्ट एरो बदलेगा डाक घरों का चेहरा


भारतीय डाकघर अपनी साधारण छवि के साथ 150 वर्षों से अधिक समय से राष्ट्र को सेवाएं प्रदान कर रहा है। सामुदायिक जीवन में संचार के एक प्रमुख केन्द्र के रूप में इस समय डाकघर को प्रौद्योगिकी के नवीनतम माध्यमों से कड़ी प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है, जिन्होंने ‘कनेक्टिविटी‘ को पुनर्परिभाषित किया है। विश्व के सबसे बड़े नेटवर्क, 1।55 लाख डाकघरों के साथ तमाम कड़ी प्रतिस्पद्र्धा के बावजूद सामाजिक प्रतिबद्धता को पूरा करने की दिशा में डाक विभाग निरन्तर प्रयासरत हैं। सामान्यतया देखा गया है कि इतने बड़े नेटवर्क के बावजूद डाकघरों की कोई ब्राण्डिंग नहीं है एवं न ही एकरूपता है। हर डाकघर की अपनी अलग संरचना है। इसी के मद्देनजर युवा संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी राज्यमंत्री श्री ज्योतिरादित्य सिन्धिया ने आई0टी0 के इस दौर में नई पहल करते हुए डाकघरों को ‘‘प्रोजेक्ट एरो‘‘ अवधारणा से एकरूप करने का बीड़ा उठाया है। इसके तहत चयनित डाकघरों की कार्यप्रणाली को सभी क्षेत्रों में सुधार एवं उच्चीकृत करके पारदर्शी, सुस्पष्ट एवं उल्लेखनीय प्रदर्शन के आधार पर और आधुनिक बनाया जा रहा है। डाक वितरण, डाकघरों के बीच धन प्रेषण, बचत बैंक सेवाओं और ग्राहकों की सुविधा पर जोर के साथ नवीनतम टेक्नोलाजी, मानव संसाधन के समुचित उपयोग एवं आधारभूत अवस्थापना में उन्नयन द्वारा विभाग अपनी ब्राण्डिंग पर भी ध्यान केन्द्रित कर रहा है। भारतीय डाक विभाग प्रोजेक्ट एरो के तहत प्रथम चरण में पूरे देश में 50 एवं द्वितीय चरण में 450 डाकघरों को नवीनीकृत कर चुका है। तृतीय चरण में 4500 डाकघरों को चिन्हित किया गया है।


एरो के मूलतः दो भाग हैं- कार्यों का सम्यक रूप में सम्पादन एवं डाकघरों के लुक एवं फील को आधुनिक बनाना। प्रथम के अन्तर्गत डाक वितरण, पे्रषण, बचत बैंक एवं आफिस सर्विस में सुधार पर जोर है तो लुक एवं फील के अन्तर्गत डाकघरों की ब्राण्ंिडग, आई0टी0 पर जोर, मानव संसाधन का सम्यक विकास एवं आधारभूत संसाधनों में सुधार अपेक्षित है।


प्रोजेक्ट एरो के माध्यम से डाक विभाग पुनः अपनी मूल सेवा डाक वितरण पर विशेष रूप से जोर दे रहा है। डाक वितरण के तहत प्राप्ति के दिन ही सभी प्रकार की डाक चाहे वह साधारण, पंजीकृत, स्पीड पोस्ट या मनीआर्डर हो का उसी दिन शतप्रतिशत वितरण व डिस्पैच, लेटर बाक्सों की समुचित निकासी और डाक को उसी दिन की डाक में शामिल करना, डाक बीटों के पुनर्निर्धारण द्वारा वितरण को और प्रभावी बनाना एवं डाक वितरण की प्रतिदिन मानीटरिंग द्वारा इसे और भी प्रभावी बनाया जा रहा है। यही नहीं आवश्यकतानुसार वितरण का समय और भी पहले किया जा रहा है एवं टेªन व बसों पर डाक के पारागमन हेतु निर्भरता की बजाय मेल मोटर द्वारा इसे त्वरित बनाया जा रहा है।

बचत बैंक सेवाओ को पूर्णतया कम्प्यूटराइज्ड कर उनकी शतप्रतिशत डाटा फीडिंग और सिगनेचर स्कैनिंग भी कराई जा रही है, ताकि मैनुअली ढंग से कार्य संपादित करने पर होने वाली देरी से बचा जा सके। खातों के स्थानान्तरण में लगने वाले समय और ब्याज की त्वरित गणना पर भी जोर है। लोगों की सुविधा हेतु अब कम्प्यूटराइज्ड पास बुकंे जारी की जायेंगी। मृतक दावों का त्वरित निस्तारण भी प्रोजेक्ट एरो के तहत प्राथमिकता पर है। बचत बैंक संबंधी कार्यो हेतु लोगों को भटकना न पड़े, इसके लिए सिटीजन चार्टर का क्रियान्वयन, वेब आधारित ग्राहक शिकायत निस्तारण प्रणाली, सभी बचत बैंक फार्मों के भरे हुए प्रारूपों का पब्लिक हाल में डिस्प्ले किया गया है।

प्रोजेक्ट एरो द्वारा डाकघरों का कायाकल्प होने के साथ ही दूर-दराज ग्रामीण अंचलों में इसके लेखान्तर्गत स्थित डाकघरों की कार्यप्रणाली में भी काफी पारदर्शिता आयेगी। जनोपयोगी सूचना को पब्लिक हाल में उपलब्ध कराना, समुचित पेयजल, टायलेट व बैठने की व्यवस्था इत्यादि सहित तमाम महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर इस प्रोजेक्ट में क्रियान्वयन किया है। इसके अलावा कारपोरेट लुक के तहत काउण्टर स्टाफ हेतु यूनीफार्म का निर्धारण एवं काउण्टर्स की ब्रांडिंग भी की गयी है। डाक विभाग की विभिन्न सेवाओं एवं उनकी दरों के लिए लोगों को असुविधा का सामना न करना पड़े, इसके लिए पब्लिक हाल में टच-स्क्रीन की सुविधा उपलब्ध करायी गयी है। टच स्क्रीन सुविधा द्वारा जहाॅ सभी डाक सेवाए एवं उनकी दरें निर्दिष्ट की गयी हैं, वहीं इसमें क्विज की रोचक सुविधा भी मुहैया करायी गयी है। इस टच स्क्रीन में नेट सर्फिंग का भी प्रावधान है।

Monday, January 26, 2009

डाक टिकटों के आईने में स्वतंत्रता संग्राम

*गणतंत्र दिवस की शुभकामनाओं सहित*
(वर्ष २००४ में भारतीय डाक के १५० वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में अगले वर्ष २६ जनवरी २००५ को प्रथम बार भारतीय डाक विभाग ने गणतंत्र दिवस परेड में अपनी झांकी प्रस्तुत की थी.यह एक स्मरणीय तथ्य है )

Wednesday, January 21, 2009

स्विस डाकघरों में लकड़ी के डाक टिकट

विभिन्न देश डाक टिकटों के प्रति लोगों को आकर्षित करने हेतु नित् नये प्रयोग करते रहते हैं। इसी क्रम में 5 अगस्त 2004 को स्विटजरलैण्ड ने चीड़ के पेड़ की लकड़ी का डाक टिकट जारी किया। चीड़ की लकड़ी से बना चैकोर आकार का यह डाक टिकट पांच स्विस फ्रेंक यानी चार अमेरिकी डालर की कीमत में जारी हुआ है। काष्ठ उद्योग को बढ़ावा देने के लिए जारी किये गये इस डाक टिकट की मोटाई एक के्रडिट कार्ड की मोटाई के बराबर है। स्विटजरलैण्ड के लेखा चित्रकार थामस राथगेब ने इस डाक टिकट को डिजाइन किया है, जो 120 साल पुराने चीड़ के पेड़ की लकड़ी से बनाया गया। डाक टिकट के विविध चित्र उसी तरह से अनूठे हैं जिस तरह हर पेड़ अपने में निराला होता है। गौरतलब है कि स्विटजरलैण्ड इससे पहले फीते और चाकलेट की गंध वाले डाक टिकट जारी कर चुका है। 2001 में स्विस डाकघर ने एक चैकोर डाक टिकट जारी किया जिसमें चाकलेट की सुगंध समेटा एक छोटा सा कैप्सूल लगा था। एक साल पहले इसने स्विटजरलैण्ड के फीता बनाने वाले उद्योग को समर्पित एक और अनूठा डाक टिकट जारी किया था।

Monday, January 19, 2009

एक डाक टिकट 22 कैरेट सोने का

डाक टिकट जगत में नित नये अनूठे प्रयोग करने वाले देशों में भूटान का नाम सबसे ऊपर है। पिछले पचास वर्षों में इस छोटे से देश ने विदेशी मुद्रा कमाने के लिए अनूठे डाक टिकट निकाले हैं। उनमें त्रिआयामी, उभरे हुए रिलीफ टिकट, इस्पात की पतली पन्नियाँ, रेशम, प्लास्टिक और सोने की चमकदार पन्नियों वाले डाक टिकट शामिल हैं। साथ ही, सुगंधित और बोलने वाले (छोटे रिकार्ड के रूप में) डाक टिकट निकालकर भी भूटान ने सबको चौंकाया है।

भूटान ने वर्ष 1996 में 140 न्यू मूल्य वर्ग का ऐसा विशेष डाक टिकट जारी किया था जिसके मुद्रण में 22 कैरेट सोने के घोल का उपयोग किया गया था। विश्व के पहले डाक टिकट ‘पेनी ब्लैक‘ के सम्मान में जारी किये गये इस टिकट पर ‘22 कैरेट गोल्ड स्टेम्प 1996‘ लिखा है। इस टिकट की स्वर्णिम चमक को देखकर इसकी विश्वनीयता के बारे में कोई संदेह नहीं रह जाता। यह सूबसूरत डाक टिकट अब दुर्लभ डाक टिकटों की श्रेणी में माना जाता है क्योंकि अब यह आसानी से उपलब्ध नहीं है।

Sunday, January 18, 2009

महाराज प्रयाग नारायण मंदिर, शिवाला पर डाक विभाग द्वारा विशेष आवरण


भारतीय डाक विभाग ने कानपुर के प्रसिद्ध महाराज प्रयाग नारायण मंदिर, शिवाला पर दिनांक 17 जनवरी, 2009 को एक विशेष आवरण (लिफाफा) एवं इसका विशेष विरूपण जारी किया। कानपुर जी0पी0ओ0 द्वारा जारी किये गये इस विशेष आवरण का विमोचन श्री श्रीप्रकाश जायसवाल, गृहराज्य मंत्री, भारत सरकार द्वारा श्री रवीन्द्र पाटनी, मेयर कानपुर, श्री उदय कृष्ण, पोस्टमास्टर जनरल कानपुर परिक्षेत्र और श्री कृष्ण कुमार यादव, चीफ पोस्टमास्टर, कानपुर जीपीओ के विशिष्ट आतिथ्य में सम्पन्न हुआ। 

महाराज प्रयाग नारायण मंदिर के 148 साल पूरे होने पर जारी (1861-2009) इस विशेष आवरण पर जहाँ मंदिर के गोपुरम का रेखाचित्र बना है, वहीं दुर्गा पूजा पर जारी डाक टिकट लगाकर इसका विरूपण किया गया है। विरूपण में भी मंदिर का चित्र बना हुआ है। गौरतलब है कि दक्षिण के त्रिचरापल्ली के श्री रंगम मंदिर के बाद तथा उत्तरी भारत में वृन्दावन के बाद महाराज प्रयाग नारायण मंदिर, दूसरा मंदिर है, जिसकी ख्याति देश के अलावा विदेशों तक में हैं। नागरी शैली में स्थापित इस मंदिर का ऊँचा गोपुरम व भव्य उज्जवल कलश दूर से ही अपनी अलग छटा बिखेरता है। बहुत कम लोगों को ज्ञात है कि मंदिरों की स्थापत्य के दृष्टिकोण से पॉँच भिन्न-भिन्न शैलियाँं हैं, जो दक्षिण के पॉँच प्रमुख राजवंशों की परिचायक हैं। ये पाँच मुख्य शैलियाँ कालक्रम में इस प्रकार हैं- पल्लव (600-1100 ई0 के लगभग), चोल (1100-1150 ई0 के लगभग), पांड्य (1100-1350 ई0 के लगभग), विजयनगर (1350-1565 ई0 के लगभग) एवं नायक (1600 ई0 के पश्चात)। इसमें प्रयाग नारायण शिवाला मंदिर विजयनगर शैली का है। इस शैली की मुख्य विशेषता है कि इसके प्रांगण में बाजार होता है, जो यहाँ पर भी है।
इस अवसर पर विशेष आवरण का विमोचन करते हुए केंद्रीय गृह राज्यमंत्री श्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने कहा कि इससे राष्ट्रीय स्तर पर न सिर्फ कानपुर को विशिष्ट पहचान मिली है बल्कि कानपुर के धार्मिक एवं पर्यटन स्थलों में महाराज प्रयाग नारायण मंदिर का नाम भी शुमार हो गया है। जिस कानपुर की पहचान या तो औद्योगिक नगर के रूप में रही है, या ब्रह्मावर्त के चलते, वहाँ उत्तर व दक्षिण का सेतुबन्ध कहे जाने वाले शिवाला के श्री रंगनाथ जी मंदिर पर विशेष आवरण जारी कर डाक विभाग ने कानपुर की सांस्कृतिक चेतना में प्राण फूँकने का कार्य किया है। महापौर श्री रवीन्द्र पाटनी ने इसे कानपुर के इतिहास में एक मील का पत्थर बताते हुए आशा की कि आने वाले दिनों में कानपुर के अन्य प्रसिद्ध स्थानों को भी यह गौरव प्राप्त होगा।


       (गृह राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल और भारतीय डाक सेवा के अधिकारी कृष्ण कुमार यादव)
कार्यक्रम के आरम्भ में सभी का स्वागत करते हुए भारतीय डाक सेवा के अधिकारी एवं कानपुर जीपीओ के चीफ पोस्टमास्टर श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि कानपुर सदैव से ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक धरोहरों एवं विभूतियों के मामले में अग्रणी रहा है। यही कारण है कि डाक विभाग ने अब तक कानपुर से जुड़े जहाँ 13 डाक टिकट जारी किये हैं, वहीं स्थानीय तौर पर अब तक 6 विशेष आवरण भी जारी किये गये हैं। श्री यादव ने बताया कि महाराज प्रयाग नारायण मंदिर, शिवाला अतीत के उस काल खण्ड का भी साक्षी है जब इसके प्रांगण में रहकर ही पं0 मोती लाल नेहरू ने कानपुर में अपनी वकालत शुरू की थी। इसी मंदिर के प्रांगण में झण्डा गीत के अमर रचयिता पद्मश्री श्याम लाल गुप्त ‘पार्षद‘ नित्य नंगे पैर रामायण का श्रवण करने आते थे। यहीं सन् 1884-85 में पं0 प्रताप नारायण मिश्र ने लावनी की अलख जगाई व नगर में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों दंगल, शास्त्रार्थ आदि में अग्रणी रहे, जिसकी चर्चा पं0 मिश्र ने ‘ब्राह्मण‘ पत्रिका में भी की है। सन् 1965 से शिवाला प्रांगण में सन्त मनीषियों व विद्वानों के व्याख्यान का जो सूत्रपात हुआ था वह अनवरत् रूप से आज भी जारी है। पं0 राम किंकर उपाध्याय ने शिवाला में रामकथा रस की अविरल गंगा बहाई, जो आज भी जारी है। मंदिर के प्रांगण में प्रतिवर्ष सांस्कृतिक-साहित्यिक गतिविधियों के पर्याय ‘मानस संगम‘ संस्था का वार्षिकोत्सव लगता है, जिसमें देश-विदेश के विद्वानों का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।

            (विशेष आवरण का विमोचन करते हुए केंद्रीय गृह राज्यमंत्री श्री श्रीप्रकाश जायसवाल)
पोस्टमास्टर जनरल श्री उदय कृष्ण ने कहा कि सांस्कृतिक धरोहरों को सवंर्धित करने का कार्य आरम्भ से ही डाक विभाग करता रहा है और इसी कड़ी में महाराज प्रयाग नारायण मंदिर पर जारी इस विशेष आवरण को भी देखा जाना चाहिए। कार्यक्रम के अन्त में धन्यवाद ज्ञापन महाराज प्रयाग नारायण मंदिर के संरक्षक श्री बद्री नारायण तिवारी द्वारा एवं संचालन श्री प्रदीप दीक्षित द्वारा किया गया। मंचासीन अतिथियों को श्री मुकुल नारायण तिवारी एवं अभिनव नारायण तिवारी द्वारा स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में डाक विभाग के अधिकारियों के अलावा शहर के तमाम साहित्यकार, समाजसेवी, जन प्रतिनिधिगण एवं पत्रकार उपस्थित थे।


अभिनव नारायण तिवारी, 
प्रबन्धक- महाराजा प्रयाग नारायण मन्दिर,
 शिवाला, कानपुर-208001

Wednesday, January 14, 2009

डाक विभाग की मशहूर हस्तियाँ

दुनिया की तमाम नामी-गिरामी हस्तियों का किसी न किसी रूप में डाक विभाग से जुड़ाव रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति रहे अब्राहम लिंकन पोस्टमैन तो भारत में पदस्थ वायसराय लार्ड रीडिंग डाक वाहक रहे। विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक व नोबेल पुरस्कार विजेता सी0वी0 रमन भारतीय डाक विभाग में अधिकारी रहे वहीं प्रसिद्ध साहित्यकार व ‘नील दर्पण‘ पुस्तक के लेखक दीनबन्धु मित्र पोस्टमास्टर थे। 

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित लोकप्रिय तमिल उपन्यासकार पी0वी0अखिलंदम, राजनगर उपन्यास के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित अमियभूषण मजूमदार, फिल्म निर्माता व लेखक पद्मश्री राजेन्द्र सिंह बेदी, मशहूर फिल्म अभिनेता देवानन्द डाक कर्मचारी रहे हैं। उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द जी के पिता अजायबलाल डाक विभाग में ही क्लर्क रहे। 

ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता मशहूर लेखिका महाश्वेता देवी ने आरम्भ में डाक-तार विभाग में काम किया था तो प्रसिद्ध बाल साहित्यकार डा0 राष्ट्रबन्धु भी पोस्टमैन रहे। सुविख्यात उर्दू समीक्षक पद्मश्री शम्सुररहमान फारूकी, शायर कृष्ण बिहारी नूर, महाराष्ट्र के प्रसिद्ध किसान नेता शरद जोशी सहित तमाम विभूतियाँ डाक विभाग से जुड़ी रहीं। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री सुश्री मायावती भी डाक-तार विभाग के कर्मचारी की ही पुत्री हैं।

 समकालीन साहित्य के तमाम नाम- कवि तेजराम शर्मा, साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव, कहानीकार दीपक कुमार बुदकी, कथाकार ए. एन. नन्द, शायर अब्दाली, गीतकार राम प्रकाश 'शतदल', गज़लकार केशव शरण, बाल साहित्यकार डा0 राष्ट्रबंधु, लघु कथाकार बलराम अग्रवाल, कालीचरण प्रेमी, अनुराग 'लाक्षाकर', मंचीय कवि जवाहर लाल 'जलज', शारदानंद दुबे इत्यादि भारतीय डाक विभाग की समृद्ध परंपरा के ही अंग हैं. स्पष्ट है कि डाक विभाग सदैव से एक समृद्ध विभाग रहा है और तमाम मशहूर शख्सियतें इस विशाल विभाग की गोद में अपनी काया का विस्तार पाने में सफल रहीं।

Saturday, January 3, 2009

टाइटेनिक यात्रियों के पत्र होंगे नीलाम

टाइटैनिक जहाज को डूबे एक लम्बा अरसा बीत गया, पर अभी भी उसकी यादें लोगों के जेहन में हैं। सबसे नई खबर यह है कि दुर्घटनाग्रस्त जहाज टाइटेनिक के यात्रियों के दो पत्रों को 16 जनवरी को न्यूयार्क में नीलाम किया जाएगा। इसमें एक पत्र उस काले दिन की घटना के अंतिम क्षणों का हृदय विदारक विवरण देता है, जब टाइटेनिक डूब रहा था। यह पत्र एडोल्फ साल्फेल्ड ने जल्दबाजी में अपनी पत्नी को लिखा था, जब 1912 में टाइटेनिक पहली समुद्री यात्रा के लिए साउथेंपटन से रवाना हुआ था और उत्तरी अटलांटिक में किसी हिमखंड से टकराकर डूब गया था जिसमें 1,500 यात्री मारे गए थे। नीलाम होने वाला दूसरा पत्र जाॅर्ज ग्राहम ने लिखा था, जो डिपार्टमेंट स्टोर का सेल्समैन था। स्पिंक स्मिथ नीलामघर के विशेषज्ञ राॅबर्ट लितजेनबर्गर ने अनुसार, इस पत्र में आर0एम0एस0 टाइटेनिक की मुहर लगी है और यह दुर्घटना से जुड़ी बहुमूल्य व दुर्लभ वस्तुओं में से एक है। इन पत्रों की नीलामी में प्रत्येक की बिक्री से 10 हजार से 20 हजार डाॅलर की आय होने की संभावना है। इन वस्तुओं को न्यूयार्क में और स्पिंक स्मिथ की वेबसाइट पर आॅनलाइन बिक्री के लिए भी उपलब्ध कराया जाएगा। सो तैयार हो जाइये, आप भी इस नीलामी में भाग ले सकते हैं !!

Thursday, January 1, 2009

Wednesday, December 24, 2008

माँ का पत्र



घर का दरवाजा खोलता हूँ 
नीचे एक पत्र पड़ा है 
शायद डाकिया अंदर डाल गया है 
उत्सुकता से खोलता हूँ 
माँ का पत्र है 
एक-एक शब्द दिल में उतरते जाते हैं 
बार-बार पढ़ता हूँ
 फिर भी जी नहीं भरता 
पत्र को सिरहाने रख सो जाता हूँ 
रात को सपने में देखता हूँ 
माँ मेरे सिरहाने बैठी बालों में उंगलियाँ फिरा रही है। 

- कृष्ण कुमार यादव-

Tuesday, December 23, 2008

सूरतपेक्स-२००३ की यादें

डाक टिकट संग्रह को लोगों विशेषकर युवाओं में अभिरूचि रूप में विकसित करने हेतु सूरत में प्रवर डाक अधीक्षक के रूप में भारतीय डाक सेवा के अधिकारी कृष्ण कुमार यादव ने 24 वर्षों के लम्बे अन्तराल पश्चात 22-23 दिसम्बर 2003 को जनपद स्तरीय डाक टिकट प्रदर्शनी ‘सूरतपेक्स- 2003’ का आयोजन किया, जिसे काफी सराहा गया। इस प्रदर्शनी की रोचकता का अन्दाज इसी से लगाया जा सकता है कि इसमें जहाँ 1854 में जारी भारत का प्रथम डाक टिकट प्रदर्शित किया गया, वहीं स्विटजरलैण्ड द्वारा जारी चाकलेट की खुशबू वाला डाक टिकट भी प्रदर्शित था। इस प्रदर्शनी में ‘सूरत रक्तदान केन्द्र व अनुसंधान केन्द्र‘ एवं ‘नेचर क्लब सूरत‘ पर विशेष आवरण जारी किये गये और सरदार वल्लभभाई पटेल पर एक बुकलेट जारी की गई, जिसमें उन पर जारी चारों डाक टिकटों को स्थान दिया गया। इन विशेष आवरणों व बुकलेट को http://www.geocities.com/indianphilately/pg200323?20082 पर देखा जा सकता है। सरदार वल्लभभाई पटेल पर जारी बुकलेट को ‘‘फिला इण्डिया गाइड बुक 2005‘‘ में भी अंकित किया गया है एवं इसे पृष्ठ संख्या 229 पर प्रदर्शित किया गया है। प्रदर्शनी की यादों को सहेजने हेतु इस अवसर पर एक स्मारिका भी जारी की गई, जिसमें तमाम ज्ञानवर्द्धक व रोचक लेखों के अलावा भारतीय डाक, प्रसिद्ध भारतीय नारियाँ, भारतीय फिल्म और ब्यूटी आफ इण्डिया पर जारी डाक टिकटों को समाहित कर इसे संग्रहणीय बना दिया गया। आज इस प्रदर्शनी को बीते पूरे पॉँच वर्ष हो गए, पर अपने प्रथम कार्यकाल की प्रथम प्रदर्शनी भला किसे bhulati है। सो अतीत के आईने से आप भी इस प्रदर्शनी की खूबसूरत तस्वीरों का आनंद इस लिंक पर जाकर उठाइए -http://www.geocities.com/indianphilately/pg200323?20082

Tuesday, December 9, 2008

डाक टिकट संग्रहकर्ताओं हेतु "फिला पोस्ट" का प्रकाशन

डाक टिकट संग्रहकर्ताओं के लिए खुशखबरी। भारतीय डाक विभाग और फिलेटलिक काँग्रेस आफ इण्डिया द्वारा संयुक्त रूप से एक त्रैमासिक पत्रिका ‘‘फिला पोस्ट‘‘ का प्रकाशन आरम्भ किया गया है। इसका प्रथम अंक अक्टूबर-दिसम्बर 2008 कुल 28 पृष्ठों में प्रकाशित है। फिलहाल इस त्रैमासिक पर कहीं भी कोई मूल्य अंकित नहीं है। डाक सचिव सुश्री राधिका दोराईस्वामी एवं फिलेटलिक काग्रेस आफ इंडिया के अध्यक्ष श्री दिलीप शाह ने अपने संदेश में पत्रिका को शुभकामनाएं देने के साथ-साथ इसके उद्देश्यों पर भी प्रकाश डाला है। फिलेटली पर विभिन्न लेखों के साथ-साथ इस पत्रिका में भारत में विभिन्न फिलेटलिक सोसाइटीज के इतिहास पर भी प्रकाश डाला गया है। वर्ष 2008 में जारी स्मारक डाक टिकटों, मिनियेचर सीट एवं प्रथम दिवस आवरण से सुसज्जित इस पत्रिका में 2008 एवं 2009 में जारी किये जाने वाले डाक टिकटों की सूची भी प्रकाशित है। 1973 से लेकर वर्ष 2007 तक जारी सभी मिनियेचर शीट का विवरण भी पत्रिका में प्रकाशित है। मधुबाला एवं इण्डो-चाइना ज्वाइंट इश्यू स्टैम्प से संबंधित चित्र पत्रिका को और खूबसूरत बनाते हैं। ग्लेज्ड पेपर पर प्रकाशित पत्रिका पहली ही नजर में आकर्षित करती है। निश्चिततः भारतीय डाक विभाग और फिलेटलिक काँग्रेस आफ इण्डिया द्वारा संयुक्त रूप से की गई इस पहल को सराहा जाना चाहिए और आशा की जानी चाहिए कि फिलेटली के क्षेत्र में यह पत्रिका मील का पत्थर साबित होगी।

Monday, December 1, 2008

डाक वितरण की स्थिति ई-मेल द्वारा अथवा वेबसाइट पर

डाक विभाग ने बल्क कस्टमर्स हेतु इलेक्ट्रानिक इन्टीमेशन आफ डिलीवरी सुविधा आरम्भ की है, जिसके तहत मात्र 50 पैसे अतिरिक्त देकर कोई भी बल्क कस्टमर अपनी डाक वितरण की स्थिति ई-मेल द्वारा अथवा वेबसाइट पर प्राप्त कर सकता है। इस सुविधा के साथ सामान्य डाक को भी स्पीड पोस्ट की भाँति ट्रैक-ट्रेस किया जा सकेगा। अभी तक यह सुविधा मात्र स्पीड पोस्ट और एक्सप्रेस पार्सल पोस्ट पर ही लागू है। इस सुविधा का उपयोग भारी संख्या में डाक भेजने वाले बैंकिंग, टेलीकाम, बीमा, वित्तीय क्षेत्र, समाचार पत्र समूहों इत्यादि के साथ-साथ आमंत्रण पत्र व ग्रीटिंग कार्ड भेजने वाले भी कर सकते है। इस हेतु पत्रों की न्यूनतम संख्या एक बार में निम्नवत् होनी चाहिएः-

आमंत्रण पत्र/ग्रीटिंग कार्ड - २००
पंजीकृत पत्र/पार्सल/वीपीपी - २००
बुक पोस्ट/पत्र/पोस्टकार्ड/अन्तर्देशीय पत्र - 5,०००
बिल मेल सर्विस/डायरेक्ट पोस्ट - 5,०००
समाचार पत्र - 5,०००
नेशनल बिल मेल सर्विस - 10,०००

‘‘इलेक्ट्रानिक इन्टीमेशन आफ डिलीवरी‘‘ सुविधा का लाभ चाहने वालों को डाकघर में पंजीकरण कराना होगा। तदोपरान्त ग्राहकों को 13 अंक के बार कोड संख्या आवंटित किये जायेंगे, जिनकी प्रिन्टिंग वे खुद करायेंगे और तदोपरान्त इस सुविधा के तहत पोस्ट की जाने वाली डाक पर इसे चिपका कर पिनकोड वाइज बुकिंग की जायेगी। इस बारकोड स्टिकर के आधार पर ही ग्राहकों को उनके डाक वितरण की जानकारी मुहैया करायी जायेगी। इस 13 अंक के बार कोड में प्रथम दो अंक सर्किल/रीजन, अगले चार अंक डिवीजन, अगले तीन अंक सम्बन्धित डाकघर और अंतिम चार अंक ग्राहको को चिन्हित करेंगे।

Friday, November 21, 2008

देश के प्रथम सांसद दंपति पर डाक टिकट

भारतीय डाक विभाग ने देश के प्रथम सांसद दंपति जोकिम और वाॅयलट अल्वा के सम्मान में २० नवम्बर 2008 को पॉँच रुपये का एक स्मारक डाक टिकट जारी किया। गौरतलब है कि जोकिम का जन्म मद्रास में 21 जनवरी 1907 को हुआ था जबकि वाॅयलट 24 अप्रैल 1908 को अहमदाबाद में जन्मी थीं। दोनों की 1937 में शादी हुई। वर्ष 1952 में वायलेट राज्य सभा और जोकिम तत्कालीन बांबे राज्य से लोक सभा के लिए चुने गए थे।

फ्री-पोस्ट

डाक विभाग ने थोक डाक प्राप्तकर्ताओं द्वारा अपने ग्राहकों से बिना जवाबी कूपन, लेबल अथवा लिफाफा के जवाब/आर्डर प्राप्त करने हेतु ’’फ्री-पोस्ट’’ योजना आरम्भ की है। इसके अंतर्गत थोक जवाब/आर्डर प्राप्त करने वाले उपभोक्ता, प्रेषकों द्वारा बिना डाक शुल्क के भुगतान के ही, जवाब/आर्डर प्राप्त कर सकते हैं। इस डाक शुल्क का समायोजन थोक जवाब/आर्डर प्राप्त करने वाले उपभोक्ता द्वारा जमा रू 10,000/- की अग्रिम धनराशि में से रू0 5/- डाक शुल्क तथा रू0 1/- हैन्डलिंग के रूप में प्रत्येक प्राप्त फ्री डाक के लिए डाकघर द्वारा समायोजित किया जायेगा। फ्री-पोस्ट अन्तर्गत उपयोगकर्ता को एक विशेष कोड आवंटित किया जायेगा, जिसमें प्रथम तीन अंक पिनकोड के होंगे और शेष तीन अंक उस उपभोक्ता का विशिष्ट कोड होगा। इस स्थिति में यदि कोई ग्राहक मात्र उस कोड को ही पत्र पर अंकित कर दे और पता न लिखे, तो भी वह पत्र सम्बन्धित थोक डाक प्राप्तकर्ता तक पहँुच जायेगा।

इस सुविधा का लाभ लेने के लिए सम्बन्धित थोक डाक प्राप्तकर्ताओं को एक निर्धारित प्रपत्र पर आवेदन करना होगा और इसके साथ रू0 1,000/- डाकघर में अवर्गीकृत मद में जमा करना होगा। एक वित्तीय वर्ष के लिए मान्य इस रजिस्ट्रेशन के नवीनीकरण हेतु रू0 200/- का शुल्क प्रत्येक वर्ष मार्च में देना होगा। रजिस्ट्रेशन के समय इच्छुक ग्राहकों को इस सुविधा का उपभोग करने हेतु रू0 10,000/- की अर्नेस्टमनी सिक्योरिटी जमा/बैंक गांरटी के रूप में जमा करना होगा।

Saturday, November 15, 2008

शीर्ष डाक प्रशिक्षण संस्थान : पोस्टल स्टाफ कॉलेज

गाजियाबाद में स्थित पोस्टल स्टाफ कॉलेज, भारत में डाक अधिकारियों की सर्वोच्च प्रशिक्षण संस्था है। इसकी स्थापना डाक विभाग के प्रबंधन संवर्ग की प्रवेश-स्तरीय और सेवाकालीन दोनों प्रकार की प्रशिक्षण संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए 27 सितंबर, 1977 को की गई थी। अप्रैल 1990 में पोस्टल स्टाफ कॉलेज संचार भवन, नई दिल्ली से गाजियाबाद में स्थानांतरित होने के बाद एक महत्वपूर्ण संस्थान के रूप में विकसित हुआ। 

एक ओर आईसीटी आधारित इंटरएक्टिव प्रशिक्षण एवं शिक्षण परिवेश के लिए आवश्यक सभी नवीनतम सुविधाएं यहाँ मौजूद हैं तो वहीं परिसर की शांति और सुन्दरता प्रशिक्षण-कक्षों के गंभीर प्रशिक्षण कार्यकलापों के बिल्कुल अनुकूल है। पहली नजर में ही सोलह एकड़ में विस्तृत परिसर में चारों ओर विद्यमान हरियाली तथा विविध प्रकार की वनस्पतियांँ व मुक्त विचरण करते पक्षी ध्यान आकृष्ट करते हैं। हेतु यहाँ पर पूर्णतया सुसज्जित तीन व्याख्यान-कक्ष हैं, जिनमें पैंसठ प्रशिक्षणार्थी बैठ सकते हैं। इसके अलावा अलावा पैंतीस प्रतिभागियों के प्रशिक्षण के लिए पर्याप्त जगह वाले तीन सिंडिकेट कमरे भी हैं। लैन के अंतर्गत इंटरनेट कनेक्टिविटी सहित दो कम्प्यूटर लैब हैं जिनमें पैंतीस प्रशिक्षणार्थियों को प्रशिक्षण दिया जा सकता है। पुस्तकालय में हिन्दी तथा अंग्रेजी, दोनों भाषाओं में विभिन्न विषयों एवं शीर्षकों की उत्कृष्ट पुस्तकें तथा पत्रिकाओं का वृहद् संग्रह ज्ञानार्जन और अभिरूचियों के विकास हेतु लाभप्रद है। 

यहां पर बैडमिंटन, टेनिस, बिलियड्र्स, बास्केटबाॅल, टेबल टेनिस, शतरंज इत्यादि जैसी खेल सुविधाओं का जहाँ लोग आनन्द उठाते हैं, वहीं परिसर के भीतर बनाया गया एक किलोमीटर लम्बा भ्रमण-पथ लोगों को चुस्त-दुरूस्त रखता है। 

इस संस्थान में निदेशक, अतिरिक्त निदेशक, 3 संयुक्त निदेशक, 2 सहायक निदेशक सहित तमाम अधिकारी-कर्मचारी पदस्थ हैं। फील्ड-स्तर पर निदेशक-चीफ पोस्टमास्टर जनरल, अतिरिक्त निदेशक-पोस्टमास्टर जनरल एवं संयुक्त निदेशक-निदेशक स्तर का अधिकारी होता है। 

पहले यहाँ पर सिर्फ़ एक भवन खंड था जिसमें हॉस्टल, प्रशासनिक कार्यालय और क्लास-रूम भी अवस्थित थे, पर 2001 के बाद नए बहुमंजिली हास्टल भवन से काफी सुविधा हो गयी है. हर वर्ष भारतीय डाक सेवा के नव चयनित अधिकारियों के अलावा यहाँ पर ग्रुप-ए और ग्रुप-बी अधिकारियों हेतु प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं. यहाँ पर विदेशों से भी डाक अधिकारी प्रशिक्षण कार्यक्रमों के लिए आते रहते हैं.

Wednesday, November 12, 2008

अब 'पिन कोड' की जगह 'पिन प्लस'

भूमण्डलीकरण एवं उदारीकरण के दौर में जैसे-जैसे बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विस्तार होता गया और संचार-प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में नई तकनीकों का आविष्कार होता गया, डाक विभाग भी इससे अछूता नहीं रहा। स्वतन्त्रता की 25वीं वर्षगाँठ पर 15 अगस्त 1972 को भारतीय डाक विभाग ने डाक सेवाओं को तीब्र बनाने हेतु छः अंको की पिन कोड व्यवस्था लागू की थी। इनमें से प्रथम 3 अंक सार्टिंग यूनिट और अंतिम 3 अंक वितरण डाकघर को चिन्हित करते हैं। व्यक्तिगत/घरेलू पत्रों के वितरण में पिनकोड व्यवस्था से काफी सहूलियत पैदा हुई। पर जैसे-जैसे चिटिठ्यों की बजाय मेल सेक्टर बिजनेस टू बिजनेस (B2B) और बिजनेस टू कस्टमर्स (B2C) की ओर प्रवृत होता गया, नई सेवाओं की आवश्यकता पड़ी। इसी क्रम में एक कदम आगे बढ़ाते हुए भारतीय डाक विभाग ने पिनकोड सेवा को व्यापक बनाते हुए ‘पिनप्लस‘ सेवा आरम्भ की है। 11 अंकीय पिनप्लस सेवा में प्रथम 6 अंक पिनकोड के होंगे और तत्पश्चात 5 प्लस अंक होंगे। इस 5 प्लस अंक में से प्रथम 2 अंक पोस्टमैन की बीट दर्शाते हैं और अंतिम 3 अंक वितरण विन्दु को दर्शाते हैं। पोस्टबाक्स व पोस्टबैग सेवा को भी पिनप्लस से जोड़ा गया है। इसमें 5 प्लस अंक में प्रथम 2 अंक 00 होंगे और अंतिम 3 अंक पोस्टबाक्स व पोस्टबैग संख्या को दर्शाते हैं। किसी भी प्रकार के संशय को दूर करने हेतु पिनकोड के बाद एक विभाजक रेखा खींची जायेगी, तत्पश्चात 5 अंक का प्लस कोड लिखा जायेगा। पिनप्लस सेवा आरम्भ होने के बाद जहाँ डाक वितरण में काफी आसानी हो जायेगी, वहीं इसके माध्यम से ज्यादा मात्रा में डाक प्राप्त करने वाले व्यक्ति/संस्थायें, विभिन्न सरकारी/कोरपोरेट संस्थानों का अपना एक अलग पिनप्लस कोड हो सकेगा। सीधे अर्थों में समझें तो जहाँ पिनकोड वितरण डाकघर तक की स्थिति दर्शाता है, वहीं पिनप्लस सेवा में न सिर्फ पोस्टमैन बीट बल्कि डाक प्राप्त करने वाले व्यक्ति/संस्थान को भी चिन्हित किया जायेगा। आदर्श स्थिति तो तब उत्पन्न होगी जब डाक भेजने हेतु नाम व पता लिखने की जरूरत नहीं पड़े, मात्र पिनप्लस कोड के आधार पर डाक पहुँच जाये। एक उदाहरण के माध्यम से इसे समझना आसान होगा। लखनऊ जी0पी0ओ0 के वितरण क्षेत्र में अवस्थित राज्यपाल कार्यालय को ले। लखनऊ जी0पी0ओ0 का पिनकोड 226001 है। यदि बीट नं0 45 का पोस्टमैन राज्यपाल की डाक बाटता है और राज्यपाल कार्यालय वितरण विन्दु को 222 कोड आवंटित किया जाता है तो पिनप्लस कोड होगा- 226001- 45222। यदि भारत के किसी कोने में बैठा व्यक्ति उत्तर प्रदेश के राज्यपाल को पत्र लिखता है और उसपर नाम व पता लिखने की वजाय मात्र पिनप्लस कोड- 226001-45222 अंकित कर दे तो उक्त डाक सुगमता के साथ राज्यपाल कार्यालय को वितरित हो जायेगी।