Sunday, July 5, 2009

डाक सेवाओं में महत्वपूर्ण कानपुर

व्यवस्थित तौर पर कानपुर में डाक सेवाओं का इतिहास काफी पुराना है। आरम्भ में कानपुर डाक मण्डल के अन्तर्गत कानपुर, फतेहपुर, उन्नाव, रायबरेली, इटावा, फतेहगढ़ और मैनपुरी जनपद शामिल थे। कालान्तर में फतेहगढ़, मैनपुरी और इटावा को कानपुर डाक मण्डल से पृथक कर 15 फरवरी 1935 को फतेहगढ़ डाक मण्डल की स्थापना की गई। बाद में प्रतापगढ़ डाक मण्डल की स्थापना उपरान्त रायबरेली को कानपुर डाक मण्डल से पृथक कर 1जनवरी 1955 को प्रतापगढ़ डाक मण्डल का भाग बना दिया गया। 4 जनवरी 1972 को कानपुर प्रधान डाकघर का अपग्रेडेशन हुआ और यह कानपुर मण्डल से स्वतन्त्र इकाई के रूप में संचालित होने लगा। पुनः 28 फरवरी 1973 को कानपुर देहात, उन्नाव और फतेहपुर को कानपुर डाक मण्डल से पृथक करते हुये एक अलग कानपुर (मुफस्सिल) डाक मण्डल बनाया गया। उस समय कानपुर देहात कानपुर जनपद का और उन्नाव लखनऊ जनपद के भाग थे, जो कि कालान्तर में पृथक जनपद के रूप में अवस्थित हुये। इसके बाद कानपुर डाक मण्डल में सिर्फ कानपुर नगर राजस्व जनपद का क्षेत्र बचा। बाद में 1 फरवरी 1981 को कानपुर (मुफस्सिल) से पृथक कर फतेहपुर डाक मण्डल की स्थापना की गई।

वर्तमान रूप में कानपुर नगर डाक मण्डल की स्थापना 28 फरवरी 1973 को हुई। कानपुर नगर मण्डल में कुल 174 डाकघर हैं, जिनमें 02 प्रधान डाकघर, 94 उप डाकघर, 02 अतिरिक्त विभागीय उपडाकघर और 76 शाखा डाकघर हैं। इसके अलावा 08 पंचायत संचार सेवा केन्द्र व एक फ्रेन्चाइजी आउटलेट भी चल रहे हैं। 31 वितरण डाकघर, 317 डाकियों और 640 लेटर बाक्सों के माध्यम से डाक सेवा नगर मण्डल में कार्य कर रही है। इसके अलावा तमाम ग्रामीण डाक सेवक भी वितरण कार्य में संलग्न हैं। कानपुर नगर मण्डल के कार्यक्षेत्र में अवस्थित नरोना एक्सचेंज डाकघर में लगे शिलापट के अनुसार इस डाकघर का शुभारम्भ 4 अप्रैल 1911 को मिस्टर सी0आर0क्लार्क (आई0सी0एस0), तत्कालीन पोस्टमास्टर जनरल उत्तर प्रदेश द्वारा किया गया था, जो कि कानपुर में अग्रणी डाक सेवाओं को दर्शाता है। कानपुर जी0पी0ओ0 के अलावा नगर के समस्त डाकघर प्रवर डाक अधीक्षक, कानपुर नगर मण्डल के प्रशासकीय नियन्त्रण के अधीन हैं। इस मण्डल के अधीनस्थ नवाबगंज और कैण्ट डाकघरों को अपग्रेडेशन द्वारा क्रमशः 1 अक्टूबर 1973 व 1 जनवरी 1979 को प्रधान डाकघरों में तब्दील कर दिया गया। वर्तमान में नवाबगंज प्रधान डाकघर के लेखा क्षेत्र में 38 और कैण्ट प्रधान डाकघर के लेखा क्षेत्र में 39 उपडाकघर कार्यरत हैं। कानपुर नगर मण्डल के अधीनस्थ शेष 19 उपडाकघर कानपुर जी0पी0ओ0 के लेखा क्षेत्र में आते हैं।

Friday, July 3, 2009

कानपुर में रेल डाक सेवा

रेलवे सेवा आरम्भ होने के बाद इलाहाबाद और कानपुर के बीच अखिल भारतीय स्तर पर प्रथम बार रेलवे सार्टिंग सेक्शन की स्थापना 1 मई 1864 को की गई, जो कि कालान्तर में रेलवे डाक सेवा में तब्दील हो गया। आरम्भ में कानपुर की रेलवे डाक सेवा इलाहाबाद से संचालित होती थी, पर 30 अगस्त 1972 को पोस्टमास्टर जनरल, उत्तर प्रदेश के एक आदेश द्वारा ‘ए’ मण्डल इलाहाबाद को विभक्त कर ‘के0पी0’ मण्डल कानपुर का गठन किया गया। वर्तमान में इस मण्डल द्वारा कुल 12 जनपदों, यथा- कानपुर नगर, कानपुर देहात, उन्नाव, फतेहपुर, फर्रूखाबाद, इटावा, मैनपुरी, औरैया, फिरोजाबाद, महामाया नगर, बुलन्दशहर, अलीगढ़ की डाक का आदान-प्रदान व पारेषण किया जाता है। वर्तमान में रेलवे डाक सेवा की अवधारणा को और व्यापक बनाते हुए इन्हे ‘मेल बिजनेस सेन्टर‘ में तब्दील किया जा रहा है, जहाँ इसका कार्य डाक-प्रोसेसिंग तक सीमित न होकर डाक के एकत्रीकरण, वितरण और विपणन तक विस्तृत हो जायेगा। ‘के0पी0’ मण्डल कानपुर को यह सौभाग्य प्राप्त है कि उत्तर प्रदेश के प्रथम ‘मेल बिजनेस सेन्टर’ का शुभारम्भ इसके अधीनस्थ अलीगढ़ आर0एम0एस0 में 27 दिसम्बर 2006 को हुआ।
(चित्र में- उत्तर प्रदेश के प्रथम ‘मेल बिजनेस सेन्टर’ के शुभारम्भ के दौरान डाक सेवा बोर्ड सदस्य आई. एम. जी. खान और तत्कालीन एस.एस.आर.एम. के.के.यादव )

डाक व्यवस्था में प्रथम कम्पनी स्थापित किया लाला ठंठीमल ने

सामरिक व औद्योगिक रूप से महत्वपूर्ण होने के कारण ब्रिटिश शासन काल से ही अंग्रेजों ने कानपुर में संचार साधनों की प्रमुखता पर जोर दिया। इनमें डाक सेवायें सर्वप्रमुख थीं। कानपुर में सर्वप्रथम डाकघर की स्थापना कैण्ट स्थित नहरिया पर 1840 में हुई। 6 मई 1840 को ब्रिटेन में विश्व के प्रथम डाक टिकट जारी होने के अगले वर्ष 1841 मंे इलाहाबाद और कानपुर के मध्य घोड़ा गाड़ी द्वारा डाक सेवा आरम्भ की गई। इलाहाबाद के एक धनी व्यापारी लाला ठंठीमल, जिनका व्यवसाय कानपुर तक विस्तृत था को इस घोड़ा गाड़ी डाक सेवा को आरम्भ करने का श्रेय दिया जाता है, जिन पर अंग्रेजों ने भी अपना भरोसा दिखाया। जी0टी रोड बनने के बाद उसके रास्ते भी पालकी और घोड़ा गाड़ी से डाक आती थी, जिसमें एक घोड़ा 7 किलोमीटर का सफर तय करता था। आधा तोला वजन का एक पैसा किराया तुरन्त भुगतान करना होता था। इलाहाबाद से बिठूर तक डाक का आवागमन गंगा नदी के रास्ते से होता था। सन् 1850 में लाला ठंठीमल ने कुछ अंग्रेजों के साथ मिलकर ‘इनलैण्ड ट्रांजिट कम्पनी’ की स्थापना की और कलकत्ता से कानपुर के मध्य घोड़ा गाड़ी डाक व्यवस्थित रूप से आरम्भ किया। अगले वर्षों में इसका विस्तार मेरठ, दिल्ली, आगरा, लखनऊ, बनारस इत्यादि प्रमुख शहरों में भी किया गया। कानपुर की अवस्थिति इन शहरों के मध्य में होने के कारण डाक सेवाओं के विस्तार के लिहाज से इसका महत्वपूर्ण स्थान था। इस प्रकार लाला ठंठीमल को भारत में डाक व्यवस्था में प्रथम कम्पनी स्थापित करने का श्रेय दिया जाता है। 1854 में डाक सेवाओं के एकीकृत विभाग में तब्दील होने पर इनलैण्ड ट्रांजिट कम्पनी’ का विलय भी इसमें कर दिया गया।

Wednesday, July 1, 2009

डाकिया: बदलते हुए रूप

पिछले दिनों आफिस में बैठकर कुछ जरूरी फाइलें निपटा रहा था, तभी एक बुजुर्गवार व्यक्ति ने अन्दर आने की इजाजत मांगी। वे अपने क्षेत्र के डाकिये की शिकायत करने आये थे कि न तो उसे बड़े छोटे की समझ है एवं न ही वह समय से डाक पहुंचाता है। बात करते-करते वे अतीत के दिनों में पहुंच गये और बोले-साहब! हमारे जमाने के डाकिये बहुत समझदार हुआ करते थे। हमारा उनसे अपनापन का नाता था। इससे पहले कि हम अपना पत्र खोलें वे लिखावट देखकर बता दिया करते थे-अच्छा! राकेश बाबू (हमारे सुपुत्र) का पत्र आया है, सब ठीक तो है न। वे सज्जन बताने लगे कि जब हमारे पुत्र का नौकरी हेतु चयन हुआ तो डाकिया बाबू नियुक्ति पत्र लेकर आये और मुझे आवाज लगाई। मेरी अनुपस्थिति में मेरी श्रीमती जी बाहर्र आइं व पत्र को खोलकर देखा तो झूम उठीं। डाकिया बाबू ने पूछा- अरे भाभी, क्या बात है, कुछ हमें भी तो बताओ। श्रीमती जी ने जवाब दिया कि आपका भतीजा साहब बन गया है।

शाम को मैं लौटकर घर आया तो पत्नी ने मुझे भी खुशखबरी सुनाई और पल्लू से पैसे निकालते हुए कहा कि जाइये अभी डाकिया बाबू को एक किलो मोतीचूर लड्डू पहुंँचा आइये। मैंने तुरंत साइकिल उठायी और लड्डू खरीद कर डाकिया बाबू के घर पहुंँचा। उस समय वे रात्रि के खाने की तैयारी कर रहे थे। मुझे देखते ही उन्होंने गले लगकर बेटे के चयन की बधाई दी और जवाब में मैंने लड्डू का पैकेट उनके हाथों में रख दिया। डाकिया बाबू बोले- ‘‘अरे ये क्या कर रहे हैं आप? चिट्ठियाँं बांँटना तो मेरा काम है। किसी को सुख बांटता हूँ तो किसी को दुःख।‘‘ मैंने कहा नहीं साहब, आप तो हमारे घर हमारा सौभाग्य लेकर आये थे, अतः आपको ये मिठाई स्वीकारनी ही पड़ेगी।

ये बताते-बताते उन बुजुर्ग की आंखों से आँसू झलक पड़े। और बोले, साहब! जब मेरे बेटे की शादी हुई तो डाकिया बाबू रोज सुबह मेरे घर पर आते और पूछ जाते कि कोई सामान तो बाजार से नहीं मंगवाना है। इसके बाद वे अपने वर्तमान डाकिया के बारे में बताने लगे, साहब! उसे तो बात करने की भी तमीज नही। डाक सीढ़ियों पर ही फेंककर चला जाता है। पिछले दिनों मेरे नाम एक रजिस्ट्री पत्र आया। घर में मात्र मेरी बहू थी। उसने कहा बाबू जी तो घर पर नहीं हैं, लाइये मुझे ही दे दीजिए। जवाब में उसने तुनक कर कहा जब वह आ जाएं तो बोलना कि डाकखाने से आकर पत्र ले जाएं।

मैं उस बुजुर्ग व्यक्ति की बात ध्यान से सुन रहा था और मेरे दिमाग में भी डाकिया के कई रूप कौंध रहे थे। कभी मुझे एक प्रतिष्ठित साहित्यकार की कहानी का वह अंश याद आता, जिसमें डाकिये ने एक व्यक्ति को उसके रिश्तेदार की मौत की सूचना वाला पत्र इसलिए मात्र नहीं दिया, क्योंकि इस दुःखद समाचार से उस व्यक्ति की बेटी की शादी टल सकती थी, जो कि बड़ी मुश्किलों के बाद तय हुई थी। तो कभी विदेश से लौटकर आये एक व्यक्ति की बात कानों में गूँजती कि- कम से कम भारत में अपने यहाँ डाकिया हरेक दरवाजे पर जाता तो है। तो कभी अपने गांँव का वह डाकिया आता, जिसकी शक्ल सिर्फ वही लोग पहचानते थे जो कभी बाजार गये हों। क्योंकि वह डाकिया पत्र-वितरण हेतु कभी गाँव में आता ही नहीं था। हर बाजार के दिन वह खाट लगाकर एक निश्चित दुकान के सामने बैठ जाता और सभी पत्रों को खाट पर सजा देता। गाँव वाले हाथ बांधे खड़े इन्तजार करते कि कब उनका नाम पुकारा जायेगा। जो लोग बाजार नहीं आते, उनके पत्र पड़ोसियों को सौंप दिये जाते। तो कभी एक महिला डाकिया का चेहरा सामने आता जिसने कई दिन की डाक इकट्ठा हो जाने पर उसे रद्दी वाले को बेच दी। या फिर इलाहाबाद में पुलिस महानिरीक्षक रहे एक आई.पी.एस. अधिकारी की पत्नी को जब डाकिये ने उनके बेटे की नियुक्ति का पत्र दिखाया तो वह इतनी भावविह्नल हो गईं कि उन्होंने नियुक्ति पत्र लेने हेतु अपना आंचल ही फैला दिया, मानो मुट्ठी में वो खुशखबरी नहीं संभल सकती थी।

मैं इस तथ्य का प्रतिपादन नहीं करना चाहता कि हर डाकिया बुरा ही होता है या अच्छा ही होता है। पर यह सच है कि ‘‘डाकिया‘‘ भारतीय सामाजिक जीवन की एक आधारभूत कड़ी है। डाकिया द्वारा डाक लाना, पत्रों का बेसब्री से इंतजार, डाकिया से ही पत्र पढ़वाकर उसका जवाब लिखवाना इत्यादि तमाम महत्वपूर्ण पहलू हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आप डाकिये के रहन-सहन, वेश-भूषा एवं वेतन पर मत जाइये, क्योंकि उसके परिचित सभी तबके के लोग हैं। कभी-कभी जो काम बड़े अधिकारी भी नहीं करा पाते वह डाकिया चंद मिनटों में करा देता है। कारण डाक विभाग का वह सबसे मुखर चेहरा है। जहाँ कई अन्य देशों ने होम-टू-होम डिलीवरी को खत्म करने की तरफ कदम बढ़ाये हैं, या इसे सुविधा-शुल्क से जोड़ दिया है, वहीं भारतीय डाकिया आज भी देश के हर होने में स्थित गाँव में निःशुल्क अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है।

जैसे-जैसे व्यक्तिगत एवं सामाजिक रिश्तों में आत्मीयता व भावनात्मकता कम होती गयी, वैसे-वैसे ही डाकिया का दृष्टिकोण भी भावनात्मक की बजाय व्यवसायिक होता गया। कल तक लोग थके-हारे धूप, सर्दी व बरसात में चले आ रहे डाकिये को कम से कम एक गिलास पानी तो पूछते थे, पर आज की पीढ़ी डाकिये को एक हरकारा मात्र समझकर पत्र लेने के तत्काल बाद दरवाजा धड़ाम से बन्द कर कर लेती है, फिर भावनात्मकता व आत्मीयता कहाँ? कहां गया वह अपनापन जब डाकिया चीजों को ढोने वाला हरकारा मात्र न मानकर एक ही थैले में सुख और दुःख दोनों को बांटने वाला दूत समझा जाता था?

वे बुजुर्ग व्यक्ति मेरे पास लम्बे समय तक बैठकर अपनी व्यथा सुनाते रहे और मैंने उनकी शिकायत के निवारण का भरोसा भी दिलाया, पर तब तक मेरा मनोमस्तिष्क ऊपर व्यक्त की गई भावनाओं में विचरण कर चुका था।

Friday, June 26, 2009

उ0 प्र0 परिमंडल डाक कैरम प्रतियोगिता संपन्न

उ0 प्र0 परिमंडल डाक कैरम प्रतियोगिता का आयोजन कानपुर जी0पी0ओ0 भवन में 24-25 जून 2009 को संपन्न हुआ। इस प्रतियोगिता में उ0 प्र0 के विभिन्न जनपदों के कुल 26 खिलाड़ियों ने भाग लिया। प्रतियोगिता का उद्घाटन कानपुर रीजन के पोस्टमास्टर जनरल श्री सीताराम मीना एवं समापन श्री कृष्ण कुमार यादव, चीफ पोस्टमास्टर कानपुर ने किया। इस अवसर पर विजेताओं को मुख्य अतिथि के रूप में चीफ पोस्टमास्टर श्री कृष्ण कुमार यादव ने पुरस्कृत किया। इसमें प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय पुरस्कार हेतु श्री मोहम्मद ओवेश (नोयडा मुख्य डाकघर), श्री के0एस0 नेगी, श्री वी0जे0 केवट (निदेशक डाक लेखा, लखनऊ) व सांत्वना पुरस्कार श्री शेखर कुमार (निदेशक डाक लेखा, लखनऊ) एवं श्री इमरान खान (नोयडा मुख्य डाकघर) को प्रदान किया गया। 
उ0प्र0 डाक कैरम प्रतियोगिता के विजेता अक्टूबर में भोपाल में आयोजित होने वाली अखिल भारतीय डाक कैरम प्रतियोगिता में भाग लेंगे। गौरतलब है कि पिछले वर्ष अखिल भारतीय डाक कैरम प्रतियोगिता मैसूर में आयोजित हुई थी, जिसमें उत्तर प्रदेश के मो0 ओवेस एवं इमरान खान को डबल्स में गोल्ड मेडल मिला था। इन दोनों खिलाड़ियों ने भी इस प्रतियोगिता में भाग लिया। श्री कृष्ण कुमार यादव ने अपने संबोधन में खिलाड़ियों की हौसला आफजाई करते हुए कहा कि इस तरह के खेलकूद एवं वेलफेयर संबंधी गतिविधियों को डाक विभाग सदैव से प्रोत्साहन देता रहा है जिससे कर्मचारियों के मनोबल में वृद्धि होती है।

Monday, June 22, 2009

गाँधी और नेहरू की ऐतिहासिक चिट्ठियाँ

चिट्ठियाँ-पत्रों का अपना इतिहास है। हर पत्र अपने अन्दर एक कहानी छुपाये हुए है। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान और उसके बाद प्रतिष्ठित राजनेताओं द्वारा लिखे गये पत्र सिर्फ शब्द मात्र नहीं बल्कि इतिहास की धरोहर है। वक्त बीतने के साथ यह धरोहर बहुमूल्य होती गईं और यही कारण है कि आज इनकी नीलामी करोड़ों रूपये में होती है।

लंदन की मशहूर नीलामी संस्था क्रिस्टी 14 जुलाई, 2009 को राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी एवं प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की चिट्ठियाँ, पोस्टकार्ड और कुछ कागजात नीलाम करने जा रही है। इनमें उर्दू में लिखे वो तीन पत्र भी शामिल हैं जिन्हें गाँधी जी ने इस्लाम के विद्वान और तब की मशहूर हस्ती मौलाना अब्दुल बारी को लिखे थे। इन पत्रों में हिंदू-मुस्लिम संबंध, लखनऊ में सांप्रदायिक तनाव और गाँधी व बारी के बीच दोस्ती की चर्चा है। इस नीलामी में महात्मा गाँधी के उर्दू में हस्ताक्षर वाले दो पोस्टकार्ड भी शामिल हंै। ये पोस्टकार्ड उर्दू के कवि हामिदउल्ला अफसर को भेजे गए थे। इसी क्रम में नेहरू जी के हस्ताक्षर वाले 29 पत्रों की एक श्रृंखला भी नीलाम की जाएगी। नेहरू जी के इन पत्रों में कश्मीर मुद्दा, साराभाई के राजनीतिक अभियानों, देश के विभाजन के बाद अपने घर से विस्थापित हुए मुसलमानों का पुनर्वास और दिल्ली में घरविहीन बच्चों के लिए शुरू की गई मानवीय परियोजना की चर्चा है। 3 अगस्त, 1953 को लिखे एक पत्र में नेहरू जी ने बताया है कि वह हर कीमत पर अपने निर्णय के अनुसार काम करेंगे। उन्होंने लिखा है- जो हो रहा है उसका कश्मीर में ही नहीं, पूरे भारत और पाकिस्तान में क्या परिणाम होने वाला है, इसके बारे में मैं शायद आपसे ज्यादा बेहतर ढंग से जानता हूँ। यह पत्र कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला को हटाए जाने से पहले लिखा गया है। निश्चिततः तत्कालीन इतिहास और परिवेश को सहेजे हुए ये पत्र न सिर्फ अमूल्य विरासत हैं बल्कि हमारी धरोहर भी हैं।

Tuesday, June 16, 2009

डाक टिकट संग्रहः एक लाभप्रद शौक

डाक टिकट संग्रह केवल एक शौक ही नहीं बल्कि एक ज्ञानवर्द्धक व लाभप्रद मनोरंजन भी है। सामान्यतः डाक टिकट एक छोटा सा कागज का टुकड़ा दिखता है, पर इसका महत्व और कीमत दोनों ही इससे काफी ज्यादा है। डाक टिकट किसी भी राष्ट्र की सभ्यता, संस्कृति एवं विरासत के प्रतिबिम्ब हैं जिसके माध्यम से वहाँ के इतिहास, कला, विज्ञान, व्यक्तित्व, वनस्पति, जीव-जन्तु, राजनयिक सम्बन्ध एवं जनजीवन से जुडे़ विभिन्न पहलुओं की जानकारी मिलती है। मन को मोह लेने वाली जीवन शक्ति से भरपूर डाक टिकटों का संकलन लोगों के सांस्कृतिक लगाव, विविधता एवं सुरूचिपूर्ण चयन का भी परिचायक है। रंग-बिरंगे डाक टिकटों का संग्रह करने वाले लोग जहाँ इस शौक के माध्यम से परस्पर मित्रता में बँधकर सम्बन्धों को नया आयाम देते हैं वहीं इसके व्यवहारिक पहलुओं का भी बखूबी इस्तेमाल करते हैं। मसलन रंग-बिरंगे टिकटों से जहाँ खूबसूरत ग्रीटिंग कार्ड बनाये जा सकते हैं वहीं इनकी खूबसूरती को फ्रेम में भी कैद किया जा सकता है। बचपन से ही बच्चों को फिलेटली के प्रति उत्साहित कर उनको अपनी संस्कृति, विरासत एवम् जनजीवन से जुड़े अन्य पहलुओं के बारे में मनोरंजक रूप से बताया जा सकता है।

डाक-टिकटों के संकलन का सबसे आसान तरीका ‘फिलेटलिक जमा खाता योजना’ है। जिसके तहत न्यूनतम रूपये 200/- जमा करके खाता खोला जा सकता है और भारतीय डाक विभाग देय मूल्य के बराबर रंगीन डाक टिकट, प्रथम दिवस आवरण और विवरणिका खाताधारक के पते पर हर माह बिना किसी अतिरिक्त मूल्य के पहुँचाता है। अपने किसी खास रिश्तेदार या मित्र को सरप्राइज गिट देने के लिए भी फिलेटलिक जमा खाता एक अनूठी चीज है और घर बैठे-बैठे खूबसूरत डाक-टिकट पाने वाला वह रिश्तेदार/दोस्त भी अचरज में पड़ जायेगा कि उस पर इतनी खूबसूरत मेहरबानी करने वाला शख्स कौन हो सकता है? इसके अलावा डाक विभाग वर्ष भर में जारी सभी टिकटों अथवा किसी थीम विशेष के डाक-टिकटों को समेटकर एक विशेष ‘स्टैम्प कलेक्टर्स पैक’ जारी करता है जो आज की विविधतापूर्ण दुनिया में एक अनूठा उपहार भी हो सकता है। और तो और, डाक-विभाग द्वारा सन् 1999 से प्रति वर्ष आयोजित ‘डाक टिकट डिजाइन प्रतियोगिता’ के विजेता की डिजाइन को अगले बाल-दिवस पर डाक-टिकट के रूप में जारी किया जाता है। इसी प्रकार 1998 से भारतीय डाक द्वारा आयोजित ‘डाक टिकट लोकप्रियता मतदान’ में प्रति वर्ष भाग लेकर सर्वोत्तम डाक-टिकटों का चुनाव किया जा सकता है।

फिलेटली को यूँ ही शौकों का राजा नहीं कहा जाता, वस्तुतः यह चीज ही ऐसी है। एक तरफ फिलेटली के माध्यम से अपनी सभ्यता और संस्कृति के गुजरे वक्त को आईने में देखा जा सकता है, वहीं इस नन्हें राजदूत का हाथ पकड़ कर नित नई-नई बातें भी सीखने को मिलती हैं। निश्चिततः आज के व्यस्ततम जीवन एवम् प्रतिस्पर्धात्मक युग में फिलेटली से बढ़कर कोई भी रोचक और ज्ञानवर्द्धक शौक नहीं हो सकता। व्यक्तित्व परिमार्जन के साथ-साथ यह ज्ञान के भण्डार में भी वृद्धि करता है। संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति फ्रेंकलिन डी0 रूजवेल्ट ने डाक-टिकट संग्रह के सम्बन्ध में कहा था- “The best thing about stamp collecting is that the enthusiasm which it arouses in youth increases as the years pass. It dispels boredom, enlarges our vision, broadens our knowledge and in innumerable ways enriches our life. I recommend stamp collecting because I really believe that it makes one a better citizen.”

Sunday, June 14, 2009

डाक टिकट संग्रह हेतु जरूरी बातें

आज विश्व के तमाम देशों द्वारा विभिन्न विषय वस्तुओं पर डाक टिकट जारी किये जा रहे हैं। सभी डाक टिकटों का संकलन न तो सम्भव है व न ही व्यावहारिक ही। डाक टिकट संग्रह हेतु जरूरी है कि किसी खास विषयवस्तु में या खास देश या क्षेत्र के डाक टिकट संग्रह करने में अपनी रूचि के अनुसार संग्रह किया जाय। डाक टिकट संग्रह का सबसे आसान तरीका प्राप्त पत्रों पर लगे डाक टिकट हैं, जिनकी अपने मित्रों से अदला-बदली भी की जा सकती है। आवरण पर से डाक टिकट को उखाड़ने या छीलने की कोशिश न करें, वरन् लिफाफे से टिकट वाला हिस्सा थोड़ा हाशिया देकर काट लें। डाक टिकटों को सहेज कर रखने हेतु बाजार में एलबम भी मिलते हैं। डाक टिकटों को एलबम में लगाने हेतु कब्जा व चिमटी का प्रयोग करना चाहिए। डाक टिकट के आरोपण में गोंद का प्रयोग न करें क्योंकि गोंद हमेशा के लिये आपके डाक टिकटों को क्षतिग्रस्त कर देगा। कब्जे (कार्नस) छोटे पतले कागज के बने होते हैं जिनके एक ओर गोंद लगा होता है। डाक टिकट को पकड़ने के लिए चिमटी का इस्तेमाल करें, अंगुलियों से डाक टिकट मैला हो जाने की संभावना रहती है।

डाक-टिकटों का आरोपण करने से पहले अपने संग्रह को छाँट लें। क्षतिग्रस्त टिकटों को निकाल फेंकने में संकोच नहीं करें। अच्छे डाक-टिकटों को ठण्डे पानी के बर्तन में रखें और कुछ मिनटों के बाद कागज से धीरे-धीरे अलग कर लें। भिगोते समय कुछ डाक-टिकटों पर स्याही फैल सकती है, ऐसे डाक-टिकटों को अलग से भिगोना चाहिये। छुड़ाए गये डाक-टिकटों को चिमटी से उठा लें और उन्हें साफ कागज पर मुँह के बल सूखने के लिये रख दें। जैसे-जैसे वे सूखेंगे, कभी-कभी उनमें संकुचन आता जायेगा। सूखने के बाद उन्हें एक पुस्तक में कुछ घण्टों के लिये रख दें। अपने डाक-टिकटों को छाँट लंे और जैसे आप आरोपण करना चाहते हैं वैसे ही पृष्ठों पर लगा दें। कब्जा का करीब एक तिहाई हिस्सा मोड़ लें और उसकी नोक को भिगों लें व इसे डाक-टिकट की पीठ पर जोड़ दें। डाक-टिकट पर कब्जा जड़ने के बाद कब्जे के दूसरे ओर को हल्का से भिगो दें और डाक-टिकट को पृष्ठ के उचित ‘एलबम’ के पृष्ठ ग्राफ-पेपर, जो समान छोटे-छोटे वर्गों में विभक्त होते हैं पर आप डाक-टिकटों को आसानी से अंतर पर रख सकते हैं। प्रत्येक टिकट पर एक छोटा सा विवरण भी लिखना अच्छा होगा। डाक-टिकटों के संग्रह के लिये विवरण तैयार करना इस शौक का बड़ा ही आनन्ददायी पहलू है। विवरण में डाक टिकट के जारी होने की तारीख, अवसर और कलाकार का नाम इत्यादि लिखा जा सकता है। खाका तैयार करने में यह ध्यान रखें कि पृष्ठ डाक-टिकट से या विवरण से ज्यादा भर न जाएँ । दोनों का संतुलन रहना चाहिये।

Friday, June 12, 2009

Philately:King of hobbies & hobby of Kings


(कानपुर से प्रकाशित लाइफ स्टाइल मैगजीन में फिलेटली पर के.के. यादव का लेख साभार प्रस्तुत)

Thursday, June 11, 2009

नियत डाक टिकटों से अलग हैं स्मारक/विशेष डाक टिकट

सामान्यतः लोग डाक विभाग द्वारा जारी नियत डाक टिकटों के बारे में ही जानते हंै। ये डाक टिकट विशेष रूप से दिन-प्रतिदिन की डाक-आवश्यकताओं के लिए जारी किए जाते हैं और असीमित अवधि के लिए विक्रय हेतु रखे जाते है। पर इसके अलावा डाक विभाग किसी घटना, संस्थान, विषय-वस्तु, वनस्पति व जीव-जन्तु तथा विभूतियों के स्मरण में भी डाक टिकट भी जारी करता है, जिन्हें स्मारक/विशेष डाक टिकट कहा जाता है। सामान्यतया ये सीमित संख्या मे मुद्रित किये जाते हैं और फिलेटलिक ब्यूरो/काउन्टर/प्राधिकृत डाकघरों से सीमित अवधि के लिये ही बेचे जाते हैं। नियत डाक टिकटों के विपरीत ये केवल एक बार मुद्रित किये जाते हैं ताकि पूरे विश्व में चल रही प्रथा के अनुसार संग्रहणीय वस्तु के तौर पर इनका मूल्य सुनिश्चित हो सके। परन्तु ये वर्तमान डाक टिकटों का अतिक्रमण नहीं करते और सामान्यतया इन्हें डाक टिकट संग्राहको द्वारा अपने अपने संग्रह के लिए खरीदा जाता है। इन स्मारक/ विशेष डाक टिकटों के साथ एक ‘सूचना विवरणिका’’ एवं ‘‘प्रथम दिवस आवरण’’ के रूप में एक चित्रात्मक लिफाफा भी जारी किया जाता है। डाक टिकट संग्राहक प्रथम दिवस आवरण पर लगे डाक टिकट को उसी दिन एक विशेष मुहर से विरूपित करवाते हैं। इस मुुहर पर टिकट के जारी होने की तारीख और स्थान अंकित होता है। जहाँ नियत डाक टिकटों का मुद्रण बार-बार होता है, वहीं स्मारक/विशेष डाक टिकट सिर्फ एक बार मुद्रित होते हैं। यही कारण है कि वक्त बीतने के साथ अपनी दुर्लभता के चलते वे काफी मूल्यवान हो जाते हैं।

दुनिया का सबसे मँहगा डाक-टिकट मिला रद्दी में

विश्व का सबसे मँहगा और दुर्लभतम डाक-टिकट ब्रिटिश गुयाना द्वारा सन् 1856 में जारी किया गया एक सेण्ट का डाक-टिकट है। गुलाबी कागज पर काले रंग में छपे, विश्व में एकमात्र उपलब्ध इस डाक-टिकट को ब्रिटिश गुयाना के डेमेरैरा नामक नगर में सन् 1873 में एक अंग्रेज बालक एल.वाघान ने रद्दी में पाया और छः शिलिंग मे नील मिककिनान नामक संग्रहकर्ता को बेच दिया । अन्ततः कई हाथों से गुजरते हुए इस डाक-टिकट को न्यूयार्क की राबर्ट सैगल आक्शन गैलेरीज इन्क द्वारा सन् 1981 मे 9,35,000 अमेरिकी डालर(लगभग चार करोड़ रूपये) में नीलाम कर दिया गया। खरीददार का नाम अभी भी गुप्त रखा गया है, क्योंकि विश्व के इस दुर्लभतम डाक टिकट हेतु उसकी हत्या भी की जा सकती है।

Wednesday, June 10, 2009

भारत के पहले डाक टिकट सिंदे डाक की कीमत लाखों में

डाक टिकटों की कीमत सिर्फ लिफाफों पर लगने तक ही नहीं है वरन् वक्त के साथ अपनी दुर्लभता के चलते वे काफी मूल्यवान हो जाते हैं। भारत में प्रथमतः डाक टिकट 1 जुलाई 1852 को सिन्ध के मुख्य आयुक्त सर बर्टलेफ्र्रोरे द्वारा जारी किए गए। आधे आने के इस टिकट को सिर्फ सिंध राज्य हेतु जारी करने के कारण ‘सिंदे डाक’ कहा गया एवं मात्र बम्बई-कराची मार्ग हेतु इसका प्रयोग होता था। सिंदे डाक को एशिया में जारी प्रथम डाक टिकट एवं विश्व स्तर पर जारी प्रथम सर्कुलर डाक टिकट का स्थान प्राप्त है। 1852 में जारी इस प्रथम डाक टिकट (आधे आने का सिंदे डाक) की कीमत आज करीब ढाई लाख रूपये आंकी जाती है। कालान्तर में 1 अक्टूबर 1854 को पूरे भारत हेतु महारानी विक्टोरिया के चित्र वाले डाक टिकट जारी किये गये।

Tuesday, June 9, 2009

छपाई में त्रुटि पर हुए डाक टिकट हुए लाखों-करोड़ों के

कभी-कभी कुछ डाक टिकट डिजाइन में गड़बड़ी पाये जाने पर बाजार से वापस ले किये जाते हैं ,ऐसे में उन दुर्लभ डाक टिकटों को फिलेटलिस्ट मुँहमाँगी रकम पर खरीदने को तैयार होते हैं। भारत द्वारा 1854 में प्रथम डाक टिकट के सेट में जारी चार आने वाले लिथोग्राफ में एक शीट पर महारानी विक्टोरिया का सिर टिकटों में उल्टा छप गया, इस त्रुटि के चलते इसकी कीमत आज पाँच लाख रूपये से भी अधिक है। इस प्रकार के कुल चैदह-पन्द्रह त्रुटिपूर्ण डाक टिकट ही अब उपलब्ध हैं। इसी प्रकार स्वतन्त्रता के बाद सन् 1948 में महात्मा गाँधी पर डेढ़ आना, साढे़ तीन आना, बारह आना और दस रू0 के मूल्यों में जारी डाक टिकटों पर तत्कालीन गर्वनर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने गवर्नमेण्ट हाउस में सरकारी काम में प्रयुक्त करने हेतु ‘सर्विस’ शब्द छपवा दिया। इन आलोचनाओं के बाद कि किसी की स्मृति में जारी डाक टिकटों के ऊपर ‘सर्विस’ नहीं छापा जाता, उन टिकटों को तुरन्त नष्ट कर दिया गया। पर इन दो-तीन दिनों मे जारी सर्विस छपे चार डाक टिकटों के सेट का मूल्य आज तीन लाख रूपये से अधिक है। एक घटनाक्रम में ब्रिटेन के न्यू ब्रेंजविक राज्य के पोस्टमास्टर जनरल ने डाक टिकट पर स्वयं अपना चित्र छपवा दिया। ब्रिटेन में डाक टिकटों पर सिर्फ वहाँ के राजा और रानी के चित्र छपते हैं, ऐसे में तत्कालीन महारानी विक्टोरिया ने यह तथ्य संज्ञान में आते ही डाक टिकटों की छपाई रूकवा दी पर तब तक पचास डाक टिकट जारी होकर बिक चुके थे। फलस्वरूप दुर्लभता के चलते इन डाक टिकटों की कीमत आज लाखों में है। एक रोचक घटनाक्रम में सन् 1965 में एक सोलह वर्षीय किशोर ने गरीबी खत्म करने हेतु अमेरिका के पोस्टमास्टर जनरल को सुझाव भेजा कि कुछ डाक-टिकट जानबूझ कर गलतियों के साथ छापे जायें और उनको गरीबों को पाँच-पाँच सेण्ट में बेच दिया जाय। ये गरीब इन टिकटों को संग्रहकर्ताओं को मुँहमाँगी कीमतों पर बेचकर अपना जीवन सुधार सकेंगे।

Monday, June 8, 2009

श्रृंगार-कक्ष की दीवारों से आरम्भ हुआ डाक टिकट संग्रह का शौक

सामान्यतः डाक टिकट एक छोटा सा कागज का टुकड़ा दिखता है, पर इसका महत्व और कीमत दोनों ही इससे काफी ज्यादा है। डाक टिकट वास्तव में एक नन्हा राजदूत है, जो विभिन्न देशों का भ्रमण करता है एवम् उन्हें अपनी सभ्यता, संस्कृति और विरासत से अवगत कराता है। यह किसी भी राष्ट्र के लोगों, उनकी आस्था व दर्शन, ऐतिहासिकता, संस्कृति, विरासत एवं उनकी आकांक्षाओं व आशाओं का प्रतीक है। यह मन को मोह लेने वाली जीवन शक्ति से भरपूर है।

डाक-टिकटों के संग्रह की भी एक दिलचस्प कहानी है। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में यूरोप में एक अंग्रेज महिला को अपने श्रृंगार-कक्ष की दीवारों को डाक टिकटों से सजाने की सूझी और इस हेतु उसने सोलह हजार डाक-टिकट परिचितों से एकत्र किए और शेष हेतु सन् 1841 में ‘टाइम्स आफ लंदन’ समाचार पत्र में विज्ञापन देकर पाठकों से इस्तेमाल किए जा चुके डाक टिकटों को भेजने की प्रार्थना की- "A young lady, being desirous of covering her dressing room with cancelled Postage stamps, has been so for encouraged in her wish by private friends as to have succeeded in collecting 16,000। These, however being insufficient, she will be greatly obliged if any good natured person who may have these (otherwise useless) little articles at their disposal, would assist her in her whimsical project। Address to E.D. Mr. Butt’s Glover, Leadenhall Street, or Mr. Marshall’s Jewaller Hackeny."

इसके बाद धीमे-धीमे पूरे विश्व में डाक-टिकटों का संग्रह एक शौक के रूप में परवान चढ़ता गया। दुनिया में डाक टिकटों का प्रथम एलबम 1862 में फ्रांस में जारी किया गया। आज विश्व में डाक-टिकटों का सबसे बड़ा संग्रह ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के पास है। भारत में भी करीब पचास लाख लोग व्यवस्थित रूप से डाक-टिकटों का संग्रह करते हैं। भारत में डाक टिकट संग्रह को बढ़ावा देने के लिए प्रथम बार सन् 1954 में प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय डाक टिकट प्रदर्शनी का आयोजन किया गया । उसके पश्चात से अनेक राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय और क्षेत्रीय प्रदर्शनियों का आयोजन होता रहा है। वस्तुतः इन प्रदर्शनियों के द्वारा जहाँ अनेकों समृद्ध संस्कृतियों वाले भारत राष्ट्र की गौरवशाली परम्परा को डाक टिकटों के द्वारा चित्रित करके विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक सन्देशों को प्रसारित किया जाता है, वहीं दूसरी तरफ यह विभिन्न राष्ट्रों के मध्य सद्भावना एवम् मित्रता में उत्साहजनक वृद्धि का परिचायक है। इसी परम्परा में भारतीय डाक विभाग द्वारा 1968 में डाक भवन नई दिल्ली में ‘राष्ट्रीय फिलेटली संग्रहालय’ की स्थापना की और 1969 में मुम्बई में प्रथम फिलेटलिक ब्यूरो की स्थापना की गई। डाक टिकटों के अलावा मिनिएचर शीट, सोवीनियर शीट, स्टैम्प शीटलैट, स्टैम्प बुकलैट, कलैक्टर्स पैक व थीमेटिक पैक के माध्यम से भी डाक टिकट संग्रह को रोचक बनाने का प्रयास किया गया है।

Sunday, June 7, 2009

रोलैण्ड हिल बने डाक टिकटों के जनक

जिस समय पत्रों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने का शुल्क तय किया गया और वह गंतव्य पर लिखा जाने लगा तो उन्हीं दिनों इंगलैण्ड के एक स्कूल अध्यापक रोलैण्ड हिल ने देखा कि बहुत से पत्र पाने वालों ने पत्रांे को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया और पत्रों का ढेर लगा हुआ है, जिससे कि सरकारी निधि की क्षति हो रही है। यह सब देख कर उन्होंने सन् 1837 में ‘पोस्ट आफिस रिफार्म’ नामक पत्र के माध्यम से बिना दूरी के हिसाब से डाक/टिकटों की दरों में एकरूपता लाने का सुझाव दिया। उन्होंने चिपकाए जाने वाले ‘लेबिल’ की बिक्री का सुझाव दिया ताकि लोग पत्र भेजने के पहले उसे खरीदे और पत्र पर चिपका कर अपना पत्र भेजें। इस प्रकार रोलैण्ड हिल (1795-1879) को डाक टिकटों का जनक कहा जाता है। इन्हीं के सुझाव पर 6 मई 1840 को विश्व का प्रथम डाक टिकट ‘पेनी ब्लैक’ ब्रिटेन द्वारा जारी किया गया। भारत में प्रथमतः डाक टिकट 1 जुलाई 1852 को सिन्ध के मुख्य आयुक्त सर बर्टलेफ्र्रोरे द्वारा जारी किए गए। आधे आने के इस टिकट को सिर्फ ंिसन्ध राज्य हेतु जारी करने के कारण ‘सिंदे डाक’ कहा गया एवं मात्र बम्बई-कराची मार्ग हेतु इसका प्रयोग होता था। सिंदे डाक को एशिया में जारी प्रथम डाक टिकट एवं विश्व स्तर पर जारी प्रथम सर्कुलर डाक टिकट का स्थान प्राप्त है । 1 अक्टूबर 1854 को पूरे भारत हेतु महारानी विक्टोरिया के चित्र वाले डाक टिकट जारी किये गये।

1904 में भारत में सर्वप्रथम ‘स्टैम्प बुकलेट’ जारी की गयी। 1926 में इण्डिया सिक्यूरिटी प्रेस नासिक में डाक टिकटों की छपाई आरम्भ होने पर 1931 में प्रथम चित्रात्मक डाक टिकट नई दिल्ली के उद्घाटन पर जारी किया गया। 1935 में ब्रिटिश सम्राट जाॅर्ज पंचम की रजत जयन्ती के अवसर पर प्रथम स्मारक डाक टिकट जारी किया गया। स्वतन्त्रता पश्चात 21 नवम्बर 1947 को प्रथम भारतीय डाक टिकट साढे़ तीन आने का ‘‘जयहिन्द’’ जारी किया गया। सन् 1972 से इण्डिया सिक्यूरिटी प्रेस नासिक में डाक टिकटों की बहुरंगी छपाई आरम्भ हो गयी। 21 फरवरी 1911 को विश्व की प्रथम एयरमेल सेवा भारत द्वारा इलाहाबाद से नैनी के बीच आरम्भ की गयी। राष्ट्रमण्डल देशों मे भारत पहला देश है जिसने सन् 1929 में हवाई डाक टिकट का विशेष सेट जारी किया।

Saturday, June 6, 2009

वैज्ञानिक भी मुरीद हुये डाक टिकट संकलन के

सामान्यतः फिलेटली को डाक टिकटों का संकलन कहा जाता है पर बदलते वक्त के साथ फिलेटली डाक टिकटों, प्रथम दिवस आवरण, विशेष आवरण, पोस्ट मार्क, डाक स्टेशनरी एवं डाक सेवाओं से सम्बन्धित साहित्य का व्यवस्थित संग्रह एवं अध्ययन बन गया है। रंग-बिरंगे डाक टिकटों में निहित सौन्दर्य जहाँ इसका कलात्मक पक्ष है, वहीं इसका व्यवस्थित अध्ययन इसके वैज्ञानिक पक्ष को प्रदर्शित करता है।‘‘फिलेटली’’ शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के शब्द ‘फिलोस’ व ‘एटलिया’ से हुई। ‘फिलोस’ माने किसी वस्तु से प्यार और ‘एटलिया’ माने कर से मुक्त। सन् 1864 में 24 वर्षीय फ्रांसीसी व्यक्ति जार्ज हाॅर्पिन ने ‘फिलेटली’ शब्द का इजाद किया। इससे पूर्व इस विधा को ‘टिम्बरोलाॅजी’ नाम से जाना जाता था। फ्रेंच भाषा में टिम्बर का अर्थ टिकट होता है। एडवर्ड लुइन्स पेम्बर्टन को ‘साइन्टिफिक फिलेटली’ का जनक माना जाता है। डाक टिकटों के सौन्दर्य पर मोहित होने वालों की कमी नहीं है पर प्रसिद्ध नोबेल पुरस्कार प्राप्त भौतिक विज्ञानी अर्नेस्ट रदरफोर्ड डाक टिकटों पर इतना मोहित हो गये कि, एक बार उन्होंने कहा कि - ‘सभी विज्ञान या तो भौतिक विज्ञान हैं अथवा डाक टिकट संग्रह।’ (All science is either physics or stamp collecting). रदरफोर्ड का यह कथन दर्शाता है कि डाक टिकट संग्रह सिर्फ एक शौक नहीं है वरन् व्यवस्थित ज्ञान और अध्ययन का भी विषय है।

Friday, June 5, 2009

कभी फिलेटली था राजाओं का शौक

डाक-टिकटों का संग्रह अर्थात फिलेटली मानव के लोकप्रिय शौकों में से एक रहा है। इसे अपनी व्यापकता एवं सुन्दरता के चलते ‘शौकों का राजा’ कहा जाता है। एक जमाना था कि फिलेटली को सिर्फ राजाओं का शौक माना जाता था। इंग्लैण्ड के सम्राट जार्ज पंचम इस शौक के बहुत मुरीद थे। जार्ज पंचम के फिलेटली शौक के बारे में सर हेराल्ड निकोलसन ने लिखा है कि -''For seventeen years he did nothing at all but kill animals and stick in stamps.'' यही नहीं, एक बार सम्राट जार्ज पंचम को किसी डाक टिकट विक्रेता के यहाँ से डाक टिकट खरीदते उनके रिश्तेदार ने देख लिया और इसकी शिकायत उनकी पत्नी महारानी मेरी से की। इसके उत्तर में महारानी मेरी ने कहा- ‘मुझे पता है कि मेरे पति शौक हेतु डाक टिकट खरीदते हैं और यह अच्छा भी है, क्योंकि यह शौक उन्हें अन्य बुरी प्रवृतियों से दूर रखता है।’ महारानी मेरी का यह कथन एक शौक के रूप में डाक टिकट संग्रह की अद्भुत प्रासंगिकता पर भी प्रकाश डालता है। आज भी विश्व में डाक-टिकटों का सबसे बडा संग्रह ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के पास है। इसी प्रकार आस्ट्रिया के राजकुमार चाल्र्स (1882-1922) का जब राज्याभिषेक किया जा रहा था तो उन्होंने मजाक में कहा कि - ‘‘इसकी क्या जरूरत है। बेहतर होगा कि सिंहासन पर मेरी मुखाकृति अंकित एक डाक टिकट रख दी जाये।’’ बदलते वक्त के साथ राजाओं का शौक कही जाने वाली इस विधा ने आज सामान्य जनजीवन में भी उतनी ही लोकप्रियता प्राप्त कर ली है। भारत में करीब पचास लाख लोग व्यवस्थित रूप से डाक-टिकटों का संग्रह करते हैं।

विश्व पर्यावरण दिवस पर लगायें पौधे

!!! आइये धरा की रक्षा का संकल्प लें और पर्यावरण को समृद्ध करें !!!


(विश्व पर्यावरण दिवस पर पौधा लगाते भारतीय डाक सेवा के अधिकारी के.के.यादव)

Wednesday, May 13, 2009

भारत के गौरव की झांकी पेश करेंगे "स्वर्ण डाक टिकट"


डाक विभाग लोगों को आर्किर्षत करने हेतु तमाम तरह के डाक टिकट समय-समय पर जारी करता है। अभी हाल ही में चन्दन, गुलाब और जूही वाले खुशबूदार डाक टिकट जारी किये गये हैं। जानकर ताज्जुब होगा कि अब डाक विभाग स्वर्ण डाक टिकटों का एक ऐतिहासिक एवं संग्रहणीय सेट जारी कर रहा है, ताकि भारत की सभ्यता और संस्कृति से जुड़ी धरोहरांे को अक्षुण्ण रखा जा सके और महापुरूषों को सच्ची श्रद्धांजलि दी जा सके। इस हेतु राष्ट्रीय फिलेटलिक म्यूजियम, नई दिल्ली के संकलन से 25 ऐतिहासिक व विशिष्ट डाक टिकट इतिहासकारों व डाक टिकट विशेषज्ञो द्वारा विशेष रूप से भारत की अलौकिक कहानी का वर्णन करने के लिए चुने गए है। ‘‘प्राइड आफ इण्डिया‘‘ नाम से जारी किये जा रहे ये डाक टिकट शुद्ध ठोस चांदी में ढाले गये हैं और उन पर 24 कैरेट सोने की परत चढी़ है। प्रत्येक डाक टिकट डायमण्ड कट वाले छिद्र के साथ 2.2 मि0मी0मोटा है।

भारत के गौरव की झांकी पेश करने वाले इन स्वर्णिम डाक टिकटों को जारी करने हेतु भारतीय डाक विभाग ने लंदन स्थिति कम्पनी हाॅलमार्क ग्रुप को अधिकृत किया है। हाॅलमार्क ग्रुप द्वारा प्रत्येक चुनी हुई कृति के अनुरूप विश्व प्रसिद्ध कलाकारों द्वारा समान आकार व रूप के मूल टिकट के अनुरूप ही ठोस चांदी में डाक टिकट ढाले गये हैं और उस पर 24 कैरेट सोने की परत चढ़ायी गयी है, ताकि भारत की समृद्धि की स्थायी धरोहर को शाश्वत बनाया जा सके। 25 डाक टिकटों का यह पूरा सेट 1.5 (डेढ़ लाख रूपये) का है अर्थात् प्रति डाक टिकट की कीमत 6000 रूपये है। इन डाक टिकटों के पीछे भारतीय डाक और हाॅलमार्क का लोगो अंकित किया गया है।

इन 25 खूबसूरत डाक टिकटों में स्वतंत्र भारत का प्रथम डाक टिकट ‘जयहिन्द‘, थाणे और मुंबई के बीच चली प्रथम रेलगाड़ी पर जारी डाक टिकट, भारतीय डाक के 150 वर्ष पर जारी डाक टिकट, 1857 के महासंग्राम के 150वें वर्ष पर जारी डाक टिकट, प्रथम एशियाई खेल (1951), क्रिकेट विजय-1971, मयूर प्रतिरूप: 19वीं शताब्दी मीनाकारी, राधा किशनगढ़ कथकली, भारतीय गणराज्य, इण्डिया गेट, लालकिला, ताजमहल, वन्देमातरम्, भगवद्गीता, अग्नि-2 मिसाइल पर जारी डाक टिकट शामिल किये गये हैं। इसके अलावा महात्मा बुद्ध, महात्मा गांधी, रवीन्द्र नाथ टैगोर, जे.आर.डी.टाटा, होमी जहांगीर भाभा, मदर टेरेसा, सत्यजित रे, अभिनेत्री मधुबाला एवं धीरूभाई अम्बानी पर जारी डाक टिकटों की स्वर्ण अनुकृति भी जारी की जा रही है।

भारतीय डाक विभाग के इतिहास में यह पहला मौका होगा जब स्वर्ण डाक टिकट जारी किए जायेंगे। भारत के पड़ोस में स्थित भूटान ने वर्ष 1996 में 140 न्यू मूल्य वर्ग का ऐसा विशेष डाक टिकट जारी किया था जिसके मुद्रण में 22 कैरेट सोने के घोल का उपयोग किया गया था। विश्व के पहले डाक टिकट ‘पेनी ब्लैक‘ के सम्मान में जारी किये गये इस टिकट पर ‘22 कैरेट गोल्ड स्टेम्प 1996‘ लिखा है। इस टिकट की स्वर्णिम चमक को देखकर इसकी विश्वसनीयता के बारे में कोई संदेह नहीं रह जाता। यह खूबसूरत डाक टिकट अब दुर्लभ डाक टिकटों की श्रेणी में माना जाता है क्योंकि अब यह आसानी से उपलब्ध नहीं है।

भारतीय डाक विभाग द्वारा हाॅलमार्क ग्रुप के साथ जारी किये जा रहे इन डाक टिकटों के बारे में सबसे रोचक तथ्स यह है कि ये स्वर्ण डाक टिकट डाकघरों में उपलब्ध नहीं होंगे और न ही किसी शोरूम में। इन्हें प्राप्त करने के लिए विशेष आर्डर फार्म भर कर हाॅलमार्क को भेजना होगा। इसके साथ संलग्न विवरणिका जो इसकी खूबसूरती की व्याख्या करती है, स्वयं में एक अनूठा उपहार है। साथ ही वैलवेट लगी एक केज, ग्लब्स व स्विस निर्माणकर्ता द्वारा सत्यापित शुद्धता का प्रमाण पत्र इन डाक टिकटों को और भी संग्रहणीय बनाते हैं। इन डाक टिकटों की ऐतिहासिकता बरकरार रखने और इन्हें मूल्यवान बनाने हेतु इनका सेट सीमित संख्या में ही जारी होगा, जो कि मात्र 7500 है।

निश्चिततः भारतीय डाक विभाग का यह अनूठा प्रयोग सराहनीय है। यह न सिर्फ डाक टिकट संग्रहकर्ताओं बल्कि अपनी सभ्यता व संस्कृति से जुड़े हर व्यक्ति के लिए एक अमूल्य धरोहर साबित होगा, जो कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित होकर अपनी यशगाथा चारों तरफ फैलाता रहेगा। सम्भवतः इसीलिए डाक टिकटों के प्रथम सेट को नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय फिलेटलिक म्यूजियम में भी प्रदर्शन हेतु सुरक्षित रखने का फैसला लिया गया है ।

Saturday, May 9, 2009

भारतीय डाक सेवा के अधिकारी के. के. यादव पर जारी पुस्तक ‘‘बढ़ते चरण शिखर की ओर'' का पद्मश्री गिरिराज किशोर ने किया लोकार्पण

लेखन के क्षेत्र में दिनों-ब-दिन चुनौतियाँ बढ़ती जा रही हैं और इन चुनौतियों के बीच ही लेखक का व्यक्तित्व उभर कर सामने आता है। प्रशासनिक पद पर रहकर साहित्य साधना निश्चित ही दुरूह कार्य है पर इस दुरूह कार्य को भी सफलता पूर्वक कर दिखाया है भारतीय डाक सेवा के युवा प्रशासनिक अधिकारी कृष्ण कुमार यादव ने। श्री यादव की इस बात के लिए विशेष सराहना की जानी चाहिए कि जहाँ पद्य की तुलना में गद्य लिखना कहीं अधिक मुश्किल कार्य है, वहीं अब तक एक काव्य, दो निबंध-संग्रह और क्रांतियज्ञ जैसी पुस्तकें लिखकर श्री यादव अपनी सशक्त रचनाधिर्मिता का परिचय दे चुके हैं। उनका लेखन पाठकों के मन को छू जाता है और यही एक लेखक की वास्तविक सफलता होती है।

उक्त उदगार सुविख्यात साहित्यकार पद्मश्री अलंकृत गिरिराज किशोर जी ने युवा प्रशासक एवं साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव के व्यक्तित्व-कृतित्व पर उमेश प्रकाशन, इलाहाबाद द्वारा प्रकाशित एवं पं0 दुर्गा चरण मिश्र द्वारा सम्पादित ''बढ़ते चरण शिखर की ओर: कृष्ण कुमार यादव'' नामक पुस्तक के 9 मई 2009 को ब्रह्मानन्द डिग्री कालेज, कानपुर के प्रेक्षागार में आयोजित लोकार्पण समारोह को बतौर मुख्य अतिथि सम्बोधित करते हुए व्यक्त किये। श्री किशोर ने कहा कि अल्पायु में ही श्री कुष्ण कुमार यादव ने उच्च प्रशासनिक पद की तमाम व्यस्तताओं के बीच जिस तरह साहित्य की ऊँचाइयों को भी स्पर्श किया है वह समाज और विशेषकर युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है। ऐसे युवा व्यक्तित्व पर इतनी कम उम्र में पुस्तक का प्रकाशन स्वागत योग्य है।

समारोह की अध्यक्षता अध्यक्षता कर रहे राष्ट्रभाषा प्रचार समिति उ0प्र0 के संयोजक एवं मानस संगम के प्रणेता डा0 बद्री नारायण तिवारी ने अपने सम्बोधन में कृष्ण कुमार यादव की रचनाधर्मिता को सराहा और कहा कि ‘क्लब कल्चर‘ एवं अपसंस्कृति के इस दौर में जब अधिसंख्य प्रशासनिक अधिकारी बिना प्रभावित हुए नहीं रह पाते तो ऐसे में हिन्दी-साहित्य के प्रति अटूट निष्ठा व समर्पण शुभ एवं स्वागत योग्य है। उन्होंने कहा कि यह साहित्य जगत का सौभाग्य है कि उसे श्री यादव के रूप में एक और हीरा मिल गया है। उसे सहेज कर रखना औेर आगे बढ़ाना हमारी सबकी जिम्मेदारी है। डा0 तिवारी ने कहा कि जो लोग अच्छा कार्य कर रहे हैं उन्हें आगे बढ़ाना ही होगा यह चापसूसी नहीं बल्कि हम सबका दायित्व है।

समारोह में उपस्थिति लब्धप्रतिष्ठित विद्धतजनों ने कृष्ण कुमार यादव के कृतित्व के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला। डा0 सूर्य प्रसाद शुक्ल ने कहा कि श्री यादव भाव, विचार और संवेदना के कवि हैं। उनके भाव बोध में विभिन्न तन्तु परस्पर इस प्रकार संगुम्फित हैं कि इन्सानी जज्बातों की, जिन्दगी के सत्यों की पहचान हर पंक्ति-पंक्ति और शब्द-शब्द में अर्थ से भरी हुई अनुभूति की अभिव्यक्ति से अनुप्राणित हो उठी है। वरिष्ठ साहित्यकार डा0 यतीन्द्र तिवारी ने कहा कि आज के संक्रमणशील समाज में जब बाजार हमें नियमित कर रहा हो और वैश्विक बाजार हावी हो रहा हो ऐसे में कृष्ण कुमार जी की कहानियाँ प्रेम, संवेदना, मर्यादा का अहसास करा कर अपनी सांस्कृतिक चेतना के निकट ला देती है। अपने सम्बोधन में डा0 राम कृष्ण शर्मा ने कहा कि श्री यादव की सेवा आत्मज्ञापन के लिए नहीं बल्कि जन-जन के आत्मस्वरूप के सत्यापन के लिए है। इसी क्रम में भारतीय बाल कल्याण संस्थान के अध्यक्ष श्री रामनाथ महेन्द्र ने श्री यादव को बाल साहित्य का चितेरा बताया। प्रसिद्व बाल साहित्यकार डा0 राष्ट्रबन्धु ने इस बात पर प्रसन्नता जाहिर की कि श्री यादव ने साहित्य के आदिस्रोत और प्राथमिक महत्व के बाल साहित्य के प्रति लेखन निष्ठा दिखाई है। उन्होंने कहा कि अब से 20-25 साल पहले पुस्तक पूर्ण कर लेना ही बड़ी बात होती थी तब विमोचन या लोकार्पण जैसे समारोह यदा-कदा ही होते थे, आज श्री यादव की पुस्तक का लोकार्पण समारोह इस बात का प्रतीक है कि टीवी व इण्टरनेट के युग में भी हिन्दी साहित्य को एक बार फिर से सम्मान और समाज की स्वीकार्यता मिल रही है। गाजीपुर से पधारे समाजसेवी श्री राजेन्द्र प्रसाद ने कहा कि कृष्ण कुमार यादव में जो असीम उत्साह, ऊर्जा, सक्रियता और आकर्षक व्यक्तित्व का चुम्बकत्व गुण है उसे देखकर मन उल्लसित हो उठता है। इतनी कम उम्र में उन्होंने जितनी बड़ी उपलब्धियाँ हासिल की हैं वो माँ सरस्वती एवं माँ शारदा की कृपा का ही प्रतिफल हैं। बी0एन0डी0 कालेज के प्राचार्य डा0 विवेक द्विवेदी ने श्री यादव के कृतित्व को अनुकरणीय बताते हुए युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत माना। पूर्व उपसूचना निदेशक शम्भू नाथ टण्डन ने एक युवा प्रशासक और साहित्यकार पर जारी इस पुस्तक में व्यक्त विचारों के प्रसार की बात कही। इस अवसर पर संस्कृत के उद्भट विद्वान पं0 पीयूष ने श्री यादव को उनकी साहित्यिक सफलता पर बधाई व आर्शीवचन देते हुए कहा कि जब किसी कृतिकार की कृति को विद्वानों का आशीर्वाद मिल जाए स्वीकृत मिल जाए तो समझो वो निःसंदेह सफल कृतिकार है। आज श्री यादव उसी कोटि में आ खड़ हुये हैं।

समारोह के अन्त में अपने कृतित्व पर जारी पुस्तक व लब्ध प्रतिष्ठित महानुभावों के आशीर्वचनों से अभिभूत कृष्ण कुमार यादव ने आज के दिन को अपने जीवन का स्वर्णिम दिन बताया। उन्होंने कहा कि साहित्य साधक की भूमिका इसलिए भी बढ़ जाती है कि संगीत, नृत्य, शिल्प, चित्रकला, स्थापत्य इत्यादि रचनात्मक व्यापारों का संयोजन भी साहित्य में उसे करना होता है। उन्होने कहा कि पद तो जीवन में आते जाते हैं, मनुष्य का व्यक्तित्व ही उसकी विराटता का परिचायक है।

समारोह के दौरान कृष्ण कुमार यादव की साहित्यिक सेवाओं का सम्मान करते हुए विभिन्न संस्थाओं द्वारा उनका अभिनंदन एवं सम्मान किया गया। इन संस्थाओं में भारतीय बाल कल्याण संस्थान, मानस संगम, साहित्य संगम, उत्कर्ष अकादमी, मानस मण्डल, वीरांगना, मेधाश्रम, सेवा स्तम्भ, पं0 प्रताप नारायण मिश्र स्मारक समिति एवं एकेडमिक रिसर्च सोसाइटी प्रमुख हैं।

समारोह का शुभारम्भ मुख्य अतिथिगणों द्वारा माँ सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन से हुआ। तत्पश्चात पुस्तक के सम्पादक श्री दुर्गा चरण मिश्र द्वारा सभी का स्वागत किया गया। इस अवसर पर कृष्ण कुमार यादव की कविता ‘माँ‘ को संगीत में ढालकर प्रवीण सिंह द्वारा अनुपम प्रस्तुति की गई तो 6 सगी अनवरी बहनों द्वारा प्रस्तुत ‘वन्दे मातरम्‘ ने सद्भाव की मिसाल पेश की। कार्यक्रम का संचालन उत्कर्ष अकादमी के निदेशक डा0 प्रदीप दीक्षित द्वारा किया गया। कार्यक्रम के अन्त में दुर्गा चरण मिश्र द्वारा उमेश प्रकाशन, इलाहाबाद की ओर से सभी को स्मृति चिन्ह भेंट किया गया। कार्यक्रम में श्रीमती आकांक्षा यादव, डा0 गीता चैहान, डा0 प्रेम कुमारी, डा0 हरीतिमा कुमार, सत्यकाम पहारिया, कमलेश द्विवेदी, आजाद कानपुरी, डा0 ओमेन्द्र कुमार, सुरेन्द्र प्रताप सिंह, अनिल खेतान, श्री एस0एस0 त्रिपाठी, सहित तमाम साहित्यकार, बुद्विजीवी, पत्रकारगण एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।

आलोक चतुर्वेदी,
संपादक-साहित्य संगम
उमेश प्रकाशन, 100-लूकरगंज, इलाहाबाद

Wednesday, April 29, 2009

'राष्ट्रीय सहारा' अख़बार में 'बिंदास ब्लॉग' में चर्चा


आज 29 अप्रैल 2009 के दैनिक 'राष्ट्रीय सहारा' पत्र के परिशिष्ट 'आधी दुनिया' में 'बिन्दास ब्लाग' के तहत 'डाकिया डाक लाया' ब्लाग की चर्चा की गई है। इसमें 5 अप्रैल 2009 को प्रकाशित 'दुनिया का प्रथम पत्र' पोस्ट को उद्धरित किया गया है। इस पोस्ट को इस लिंक पर पढ़ा जा सकता है-http://dakbabu.blogspot.com/2009/04/blog-post_06.html गौरतलब है कि अभी 8 अप्रैल 2009 को हिंदुस्तान अख़बार में ब्लॉग वार्ता के अंतर्गत 'डाकिया डाक लाया' ब्लॉग की चर्चा की गई थी। आप लोगों का समर्थन और प्यार इसी प्रकार इस ब्लाग को मिलता रहे तो निश्चिततः डाकिया बाबू आपसे नित्य रूबरू होते रहेंगे।

Sunday, April 26, 2009

डाक टिकट संग्रह कैसे करें

डाक टिकट संग्रह करने का शौक मानव के पुराने शौकों में से है। अंग्रेजी में तो इस पर तमाम पुस्तकें उपलब्ध हैं पर हिन्दी में इस पर साहित्य की कमी है। नये डाक टिकट संग्रहकर्ता इसके अभाव में तमाम परेशानियों से जूझते हैं। इसी के मद्देनजर प्रस्तुत पुस्तक प्रकाश में आई। 17 अध्यायों में लिखित यह पुस्तक डाक टिकटों के संग्रह, मुद्रण, इतिहास, दुर्लभ डाक टिकट एवं तमाम रोचक बातों को अपने में समेटे हुए है। सरल भाषा में लिखी एवं सहजता से समझ में आने वाली शब्दावली इस पुस्तक को सारगर्भित बनाती है। विद्यार्थियों एवं युवाओं हेतु यह पुस्तक स्टार्टर का कार्य करती है। पुस्तक की लोकप्रियता का अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसके तमाम संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं एवं वर्ष 2000 में इसका अंग्रेजी संस्करण भी जारी किया गया।

पुस्तक- डाक टिकट संग्रह कैसे करें
लेखक-ए0एस0 मित्तल, ए-37, जनता कालोनी, जयपुर
पृष्ठ- 84,
प्रथम संस्करण-1970,
मूल्य- 20 रूपये
प्रकाशक-आदर्श प्रकाशन, चैड़ा रास्ता, जयपुर-302003

Saturday, April 25, 2009

डाक टिकटों के दर्पण में वंशवाद के दर्शन

ब्रिटेन को डाक टिकटों का जन्मदाता माना जाता है। वहाँ पर डाक टिकटों पर सिर्फ राजा-रानी एवं उनके परिवार से जुडे़ लोगों का ही चित्र छापा जाता है। इसी प्रकार विभिन्न देशों में इस परम्परा का अनुगमन करते हुए शासकों के चित्र डाक टिकटों पर अंकित किये गये। कहना गलत नहीं होगा कि डाक टिकट तमाम शासकों के उत्थान-पतन का गवाह है जो अपने अन्दर तमाम रोमांच सहेजे रहता है। प्रस्तुत पुस्तक में ब्रिटेन, अमेरिका, सोवियत संघ एवं भारत में जारी उन तमाम डाक टिकटों का विवेचन-विश्लेषण अध्ययन का विषय बनाया गया है, जिन पर शासकों एवं उनके परिवारजनों के चित्र अंकित हैं। निश्चिततः डाक टिकटों के माध्यम से यह एक पूरे इतिहास-खण्ड का भी व्यापक विश्लेषण है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में नेहरू-गाँधी परिवार पर जारी डाक टिकटों के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन से जुड़े महापुरूषों पर जारी डाक टिकटों को भी स्थान दिया गया है। वस्तुतः ये स्मारक डाक टिकट शासकों के प्रति सदभावना प्रदर्शित करने के क्रम में जारी किए गये परन्तु बाद के वर्षो में इनमें से तमाम डाक टिकटों का विश्लेषण अन्य रूपों में भी किया गया। प्रस्तुत पुस्तक को इसी क्रम में देखा जाना चाहिए।
पुस्तक- डाक टिकटों के दर्पण में वंशवाद के दर्शन
लेखक-गोपीचंद श्रीनागर
पृष्ठ- 84, संस्करण-2004, मूल्य- 75 रूपये
प्रकाशक-वर्षा प्रकाशन, 778, मुट्ठीगंज, इलाहाबाद

Friday, April 24, 2009

डाक टिकटों पर विश्व चित्रकला की झांकी


प्रायः साहित्य के बारे में कहा जाता है कि वह समाज का दर्पण होता है। यदि ध्यान से देखा समझा जाये तो दूसरी कलाएं भी अपने-अपने समाज का दर्पण होती हैं बशर्ते इनके रचयिता सजग साहितयकार-कालाकार में वैसी पैनी दृष्टि हो। ठीक उसी प्रकार अनेकानेक-स्मारक-विशेष-नियत डाक टिकट भी निज समाज के दर्पण ही नहीं बल्कि ऐतिहासिक जीवंत दस्तावेज होते हैं। ऐसे ही ऐतिहासिक दस्तावेजों में वे अनेक डाक टिकट हैं जो अपने में विश्व के महान चित्राकरों की अनुपम चित्रकृतियों को संजाये हुए हैं। ये मात्र डाक टिकट ही नहीं हैं बल्कि अच्छी-खासी चित्रकला की सचित्र पुस्तकें हैं। विश्व के महान चित्रकारों की दुनिया के जीवंत दस्तावेज हैं और अनूठी विश्व चित्रकला के इतिहास के साफ-सुथरे दर्पण हंै।

जो डाक टिकट 8 मई, सन् 1840 ई. में इंग्लैण्ड में पहली बार विश्व पटल पर देखने को मिले थे, वे शुरू में कौतुहल के विषय थे। डाक खर्च अदा करने के बाद इनका संग्रह करना एक अभूतपूर्व शौक के रूप में जन्मा था। तब फिलेटली का मतलब ही था- डाक टिकटों का संग्रह करना। धीरे-धीरे यह शौक मनोरंजन के साथ-साथ ज्ञान का पिटारा बनता चला गया। आज की फिलेटली की उन्नत अवधारणा यह है कि इन डाक टिकटों का विधिवत अध्ययन हो, इनकी सार्थक समीक्षा हो एवं इनके विश्लेषण से प्राप्त निष्कर्षों का इनके समसामयिक विश्व के सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनैतिक परिदृश्य में प्रासंगिक व्याख्या हो। प्रस्तुत पुस्तक में इसी दृष्टिकोण से कुछ बहुमूल्य व दुर्लभ चित्रों वाले डाक टिकट शामिल है एवं तद्नुसार चित्रकला के कुछ मन्तवयों को भी उभारा गया है। निश्चिततः यह पुस्तक एक विलक्षण एवं संग्रहणीय दस्तावेज है।

पुस्तक-रंगीन डाक टिकटों पर विश्व चित्रकला की झांकी
लेखक-गोपीचंद श्रीनागर
पृष्ठ- 120, संस्करण-2005-2006, मूल्य- 150 रूपये
प्रकाशक-बुनियादी साहित्य प्रकाशन, राम कृष्ण पार्क, अमीनाबाद, लखनऊ