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Wednesday, November 10, 2021

मोबाइलों के दौर के आशिक़ को क्या पता, रखते थे कैसे ख़त में कलेजा निकाल कर

'डाकखाना' - यह केवल एक शब्द नहीं, एक पूरी संस्कृति है। संचार की सबसे प्रारंभिक अवस्था से मनुष्य का साथ देने वाली चिट्ठी; संस्कृति में इतनी रची-बसी रही कि उस पर गीत लिखे गये। चिट्ठी, खत, पाती, नामा, लिफ़ाफ़ा, मजमून, नामाबर, डाकिया, तार, पोस्टकार्ड, डाकबाबू, लेटर बॉक्स, डाक टिकट और न जाने कितने ही शब्दों से सुसज्जित यह डाक-व्यवस्था शायरी और कविताओं के साथ साथ कहानी और उपन्यासों का भी महत्वपूर्ण अंग रही है।

'पीली चिट्ठी' मांगलिक अवसर का प्रतीक होती थी और कोना फटा हुआ पोस्टकार्ड अशुभ की सूचना लेकर आता था। चिट्ठी में लिखा गया एक-एक शब्द महत्वपूर्ण होता था। व्यक्तिगत चिट्ठियों में हाशिये पर की गई चित्रकारी देखकर पानेवाले को लिखनेवाले की मनोदशा का दर्शन हो जाता था।

चिट्ठी के प्रारम्भ में 'आपका पत्र मिला'; 'अत्रं कुशलं तत्रप्यस्तु'; हम सब यहाँ कुशलतापूर्वक हैं, आशा है आप सब भी कुशल होंगे' जैसे वाक्यांश औपचारिक होने के बावजूद रसपूर्ण लगते थे। इसी प्रकार 'बड़ों को चरण स्पर्श और छोटों को ढेर सारा प्यार' जैसा वाक्य चिट्ठी से पूरे परिवार को जोड़ देता था।

लेटर बॉक्स के नीचे सुरंग की कल्पना और रात में चिट्ठी पहुंचाने वाली परियों की कल्पना करने वाला बचपन भी डाक-संस्कृति के साथ ही कहीं गुम हो गया। डाकिये की प्रतीक्षा करने वाली दोपहरी भी अब समय के चक्र से विदा हो गई है।

साथ ही नदारद हो गये हैं वे गीत, जो डाक संस्कृति के इर्द-गिर्द रचे जाते थे। 'मास्टर जी की आई चिट्ठी'; 'हमने सनम को ख़त लिखा'; 'जाते हो परदेस पिया, जाते ही ख़त लिखना'; 'कबूतर जा-जा'; 'चिट्ठी आई है'; 'चिट्ठी न कोई संदेश'; 'ख़त लिख दे साँवरिया के नाम बाबू'; 'फूल तुम्हें भेजा है ख़त में'; 'डाकिया डाक लाया'; 'डाक बाबू आया'; 'संदेसे आते हैं; 'लिखे जो ख़त तुझे'; 'फूलों के रंग से दिल की क़लम से तुझको लिखी रोज़ पाती'; 'सुन ले बाबू ये पैग़ाम, मेरी चिट्ठी तेरे नाम'; 'तेरे खुशबू में बसे ख़त मैं जलाता कैसे' और 'मैंने ख़त महबूब के नाम लिखा' जैसे दर्जनों गीत हिंदी सिनेमा की तवारीख़ में हीरों की तरह जड़े हुए हैं।

कवि-सम्मेलनों में भी चिट्ठी का ख़ूब चलन रहा। मुझे अच्छी तरह याद है। हापुड़ के एक कवि-सम्मेलन में श्वेतकेशा ज्ञानवती सक्सेना जी ने एक गीत पढ़ा- 'ऐसे में क्या चिट्ठी लिखूँ, जब कोना फटने के दिन हैं!' गीत उनकी वय पर इतना एकरूप प्रतीत हुआ कि उसकी संवेदना ने भीतर तक सिहरन उत्पन्न कर दी थी। किशन सरोज जी का गीत 'कर दिये लो आज गंगा में प्रवाहित सब तुम्हारे पत्र, सारे चित्र तुम निश्चिंत रहना' श्रोताओं के मन और नयन दोनों को तर कर देता था। माया गोविंद जी का 'डाकिये ने द्वार खटखटाया, अनबाँचा पत्र लौटाया' गीत लोकप्रियता के कीर्तिमान खड़े कर गया। आज भी डॉ विष्णु सक्सेना जब अपने मुक्तक की चौथी पंक्ति पढ़ते हुए कहते हैं कि, 'उसने गुस्से में मेरा ख़त चबा लिया होगा' तो चिट्ठियों के सहारे जवान हुई हज़ारों प्रेम कहानियां जीवंत हो उठती हैं।

उर्दू शायरी भी इस विषय से भरी पड़ी है। 'नामाबर तू ही बता तूने तो देखे होंगे/कैसे होते हैं ख़त, जिनका जवाब आता है' सरीख़े सैंकड़ों अशआर लोगों की ज़ुबान पर चढ़े। 

दाग़ देहलवी साहब का मशहूर शेर 'तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किसका था/मैं था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किसका था' किसी उपन्यास का कथानक बन जाने की क्षमता रखता है। 'लिफ़ाफ़ा देख के मजमून भाँप लेते हैं' जैसे मिसरे मुहावरे बनकर मक़बूल हो गये। हाल ही में वाशु पाण्डेय ने भी चिट्ठियों में बन्द मुहब्बत की इबारत को बयान करते हुए कहा कि, 'क़ासिद चिट्ठी तैश में आकर लिखी थी/ ले जाओ, पर देना मत शहज़ादी को'। 

तकनीक बदली तो यह सब कुछ फ़ना हो गया। मोबाइल पर एस.एम.एस या कंप्यूटर पर ईमेल भेजने वाली पीढ़ी को चिट्ठियों की उस जादुई दुनिया का अनुमान तक नहीं है। उदयप्रताप सिंह जी का ये शेर पढ़ते हुए आज भी मन तीन दशक पुरानी यादों में खो जाता है, 'मोबाइलों के दौर के आशिक़ को क्या पता, रखते थे कैसे ख़त में कलेजा निकाल कर'।

ब्याहता बिटिया की चिट्ठी मिलने पर माँ का खिला हुए चेहरा; हॉस्टल में रह रहे बेटे को चिट्ठी लिखती माँ की भीगी हुई पलकें; चिट्ठी में लिखे गये शब्दों के साथ अनलिखा दर्द पढ़ लेने का हुनर; हाशिये पर बनी चित्रकारी से मनोदशा पहचान लेने की कला और राखी के त्यौहार पर बहन की चिट्ठी खोलते भाइयों का कौतूहल अब देखने को नहीं मिलता।

'पिता के पत्र पुत्री के नाम' जैसी किताबें चिट्ठियों की अहमियत का चित्र प्रस्तुत करती हैं।

लेकिन आज 'ख़ून से लिख रहा हूँ स्याही न समझना' सरीख़े मिसरे दूर खड़े होकर धूल खा रहे लेटर बॉक्स देखकर बिलख पड़ते होंगे। निदा साहब की दो पंक्तियाँ रह-रहकर उस क़िरदार की याद दिलाती हैं जिसे हम डाकिया कहते थे - 'सीधा-सादा डाकिया जादू करे महान/एक ही थैले में भरे आँसू और मुस्कान'। 

टीवी और रेडियो पर चिट्ठियां भेजने का रिवाज़ अब इतिहास बन चुका है। संपादक के नाम पत्र और प्रकाशनार्थ रचना भेजने की क़वायद हम भूल चुके हैं। न ही संपादकों को अब 'खेद सहित' रचना लौटाने का स्वाद पता है। 

रमेश शर्मा जी के गीत का मुखड़ा एक पूरी परम्परा को श्रद्धांजलि देता हुआ जान पड़ता है - 'ओ दूरभाष की सुविधाओं, मुझे वो चिट्ठी लौटा दो!'

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(डाकखाना और चिट्ठियों पर लिखा यह भावपूर्ण लेख किसी ने मुझसे शेयर किया...लेखक का नाम नहीं पता। इसके लेखक को साधुवाद के साथ इसे यहाँ साभार शेयर कर रहा हूँ)

Monday, June 5, 2017

डाक सेवाओं का महत्‍व फिर से बढ़ रहा है : प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी

डाक सेवाओं का महत्‍व फिर से बढ़ रहा है। डाक विभाग में मानव संसाधन प्रबंधन, प्रणाली सुधार के महत्‍व और बुनियादी सुविधाओं की मज़बूती पर जोर देने की जरूरत है।  उक्त उद्गार प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने सकारात्‍मक शासन और समयानुसार कार्यान्वयन के उद्देश्‍य से विकसित सूचना संचार प्रौद्योगिकी आधारित बहुविध प्‍लेटफार्म-प्रगति के माध्‍यम से बातचीत के दौरान व्यक्त किये। 24 मई, 2017 को प्रगति के माध्यम से प्रधानमंत्री का यह 19वां संवाद था, जिसमें डाक विभाग के सचिव  श्री ए. एन. नन्दा वीडियो-कांफ्रेंसिंग के माध्यम से प्रधानमंत्री से रूबरू हुए।  

इस अवसर पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने  डाक सेवाओं से संबंधित शिकायतों के संचालन और समाधान की दिशा में प्रगति की समीक्षा की। उन्होंने कहा कि डाक सेवाओं का महत्‍व फिर से बढ़ रहा है। उन्‍होंने यह जानना चाहा कि प्रक्रियाओं में कौन-से बदलाव किए गए हैं और कोताही के लिए जिम्‍मेदार अधिकारियों के विरूद्ध कौन-सी कार्रवाई की गई हैं। उन्होंने डाक विभाग में मानव संसाधन प्रबंधन, प्रणाली सुधार के महत्‍व और बुनियादी सुविधाओं की मज़बूती पर जोर दिया।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उत्‍तराखंड, उत्‍तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, ओडिशा, मध्‍य प्रदेश और महाराष्‍ट्र सहित कई राज्‍यों में रेलवे, सड़क और बिजली क्षेत्रों में महत्‍वपूर्ण बुनियादी परियोजनाओं की प्रगति का हालचाल लिया। प्रधानमंत्री ने ‘अपराध और अपराधी ट्रेकिंग नेटवर्क और प्रणाली’ (सीसीटीएनएस)’ की भी समीक्षा की। उन्‍होंने राज्‍यों से मांग करते हुए कहा है कि वे इस नेटवर्क को उच्‍च प्राथमिकता दें, ताकि कानून-व्‍यवस्‍था के हित में और अपराधियों के विरूद्ध न्‍यायिक प्रक्रिया चलाने में इसका अधिकतम लाभ प्राप्‍त किया जा सके।

Monday, October 17, 2016

To take weather reports to farmers, Meteorological Department turns to Postmen

The India Meteorological Department (IMD) has a new job for postmen. Looking to collect and deliver weather information to remote villages, the IMD’s Agricultural Meteorology Division, or AgriMet, wants them to step in and help.

“The postman will be given a template form when he goes to a village. It will have basic questions, like cropping pattern of the village, land usage, etc. He has to fill the form and get phone numbers of some farmers,” Dr Nabansu Chattopadhyay, deputy director general at AgriMet, said.

The postal department will feed this information to their servers, and IMD officials will then access it to churn out circle-level, custom-made weather and crop forecast.

Chattopadhyay said the decision to rope in the Postal Department was taken during a brainstorming session last month on how to disseminate AgriMet advisories to farmers.

“Timely and precise weather-based advisories are invaluable for farmers to plan their crop cycle. Through the Kisan portal and other services, we have managed to reach 19 million farmers. But we aim to reach all 90 million farmers in India with custom-made weather and crop advisories,” he said.

Chattopadhyay said that in places where even mobile network does not exist, a postman could make all the difference.
The IMD also plans to mount LED screens at village post offices, where weather and crop information would be shown through the day. “All the screens will be connected to the remote server, and information collected by postmen will be used to churn out the advisories,” Chattopadhyay said.

At the moment, five villages — in Gujarat, Uttar Pradesh, Uttarkhand, Punjab and Andhra Pradesh — have been selected for the trial run of the project, and a budget is being worked out.

According to Chattopadhyay, of the 1,54,239 post offices in India, 1,39,222 are in rural areas.

Referring to an economic impact analysis study by the National Council of Applied Economic Research, Chattopadhyay said that at least 25 per cent of the farmers who relied on AgriMet reported an increase in their net income. “The service has the potential of generating net economic benefit of up to Rs 3.3 lakh crore when such advisories are fully utilised by all 90 million farmers,” he said.

Apart from the postal department, AgriMet plans to use services such as farmer’s cooperatives and agricultural produce market committees to ensure their advisories reach all corners.

Wednesday, April 24, 2013

New services push postal dept revenue


While postal department is pushing for modernisation of its services, its revenue has also increased. Allahabad postal region earned revenue of more than one billion rupees in the last financial year. Other than transmission of letters and selling postage stamps, the department also provides services like banking, insurance and other financial services.


Director, postal services of Allahabad region, Krishna Kumar Yadav said the department has increased its revenue in various sectors and compared to rupees one billion seven crore of financial year 2011-12 Allahabad Region has earned a revenue of rupees one billion eighteen crore thirty two lakh during financial year 2012-13, which is 10% more than the last financial year. Out of this, postal operations account for Rs 41 crore and banking services accounts for Rs 77.92 crore, while in the last financial year their share was Rs 39.54 crore and Rs 68.05 crore respectively. Yadav said after implementation of core banking and other modernisation initiatives, the department will generate more revenue.

Yadav added that Allahabad Region has also performed well in the field of postal life insurance. Total business of life insurance amounts to rupees one billion eighty three crore, out of which Postal Life Insurance accounts for Rs 84 crore and Rural Postal Life Insurance for Rs 89 crore.

He said that other than traditional services, premium services like speed post, express parcel post, business post have also received good response from public. Against the allotted target of Rs 18 crore for these services, Allahabad Region has achieved revenue of Rs 23.54 crore. The online 'Track and Trace' facility of speed post has increased the popularity of this service. Yadav said monitoring of postal services are being ensured at each level for better service delivery. Under 'Mail Network Optimization Project', main emphasis is on timely and fast delivery of postal articles.



Monday, April 1, 2013

चिट्ठी मनोभावों की संवाहिका

वह चिट्ठी थी मेरी बुआ की। मेरी दादी को मालूम था कि उनके द्वारा बेटी के यहां भेजे गए पकवान, चूड़ा, दही और साड़ी-चूड़ी-सिन्दूर को पहुंचाकर लगन महतो बेटी की चिट्ठी लेकर आएगा। घर में मेरे पिताजी, भैया, भाभी और मैं भी तो पढ़ी-लिखी थी। पर दादी बार-बार भाभी को अपने पास बुलातीं। कहतीं-'देख! जब रामलगन वापस आ जाए तो तुम मुझे सुशीला की चिट्ठी पढ़कर सुनाना। किसी काम का बहाना मत करना।'

 भाभी हंसतीं और कहतीं-'हां-हां, मैं सब काम छोड़कर पहले बुआ जी की चिट्ठी पढूंगी। पहले रामलगन को लौटने तो दीजिए।'
दादी द्वारा इंतजार करवाकर ही लगन लौटा था। दरवाजे स्थित कुएं पर बैठी दादी दातून कर रही थीं। नजर सड़क पर ही थी। रामलगन को आते देख वे दातून फेंककर रामलगन के साथ आंगन में आ गईं। भाभी को पुकारा। वे नाश्ता कर रही थीं। नाश्ता छोड़कर ही आ गईं। भला बेटी की चिट्ठी जो आई थी।
उन्हें चिट्ठी थमा कर बोलीं-'चलो! मेरी खटिया पर बैठो। मुझे चिट्ठी सुनाओ। जल्दबाजी मत करना।'
भाभी ने चिट्ठी खोली। उस पर पानी के दो चार बूंदों के दाग थे। दादी ने देखा। बोलीं-'देख! चिट्ठी लिखते समय सुशीला जरूर रोई होगी। उसके आंसू की ही बूंदें हैं।' और इतना कहकर दादी स्वयं आंचल से अपनी आंखें पोंछने लगीं। भाभी ने चिट्ठी पढ़नी प्रारंभ की। प्रारंभ में घर का कुशलक्षेम था। उसके बाद घर के सभी बड़े सदस्यों का नाम (रिश्ता) लेकर प्रणाम और एक-एक बच्चे को नाम से आशीष! एक बड़ी दादी और सबसे छोटे ननका का नाम छूट गया था। दादी बोल पड़ीं-'जल्दबाजी में होगी न। खाना बनाना, परोसना, खेतीबाड़ी का काम देखना, उस पर गोद का बच्चा।'
भाभी ने पूछा-'अब मैं आगे पढूं?'
'हां, हां पढ़ो दुलहिनिया। जुग-जुग जिओ। तुम्हारा सुहाग बना रहे।'
भाभी आशीर्वाद ग्रहण कर पढ़ना प्रारंभ करतीं। गाय, बैल, बगीचे के साथ पड़ोस की घटनाओं की भी चर्चा थी। सुशीला बुआ ने अपने पति की भी शिकायत लिखी थी। उन्होंने गांजा पीना शुरू कर दिया था। फिर क्या था। दादी का रोनाधोना प्रारंभ। एक घंटे में अनेक रुकावटों और दादी की समीक्षा के बाद चिट्ठी का वाचन समाप्त होता। दादी, उस कागज के पन्ने को ऐसे सहेजतीं-संभालतीं मानो अपनी नन्हीं बिटिया की तेल मालिश करके सुला रही हों। उस पन्ने को उलटतीं, पुलटतीं, सहलातीं, मोड़तीं, खोलतीं अपने बेटी के जन्म से लेकर विवाह तक के प्रसंगों के पन्ने पलट लेतीं।
भाभी को मालूम रहता कि उन्हें और कई बार चिट्ठी पढ़नी पड़ेगी। पढ़ने भर से काम नहीं चलता। भाभी को चिट्ठी लिखनी भी पड़ती।
चिट्ठी पत्री के आगमन और प्रस्थान की प्रक्रिया स्मरण करती हूं तो उसके लिखे जाने का अनुष्ठान सामने जीवंत हो उठता है। चिट्ठी लिखने की प्रक्रिया में ही साहित्य के नौ रसों का रसास्वादन हो जाता था। चिट्ठी सबसे पहले तो मन पर लिखी जाती थी। अधिकतर लोग निरक्षर होते थे। घर या मुहल्ले में एक दो व्यक्ति ही पढ़े-लिखे। उन पर ही चिट्ठी लिखने और पढ़ने की जिम्मेदारी होती थी। एक बार कह देने पर कोई चिट्ठी लिखने नहीं बैठ जाता था। चिट्ठी लिखना प्रारंभ करने से पूर्व लिखने वाला जितना साधक की मन:स्थिति में आता था उतना ही लिखवाने वाला या वालियां भी।
दोनों आमने-सामने बैठ जाते। लिखवाने वाला कहता था-'सबसे पहले लिखने वाली बात सब लिख जाओ।' फिर घर से लेकर गांव के सभी लोगों का नाम ले-लेकर आशीष या प्रणाम लिखवाया जाता था। घर के समाचारों में भैंस, गाय के बच्चे देने और उनमें से किसी किसी के मरने से लेकर खेतों की फसलों और बाढ़-सुखाड़ का भी वर्णन। फिर अपने मन का वर्णन। लिखने वाला उन समाचारों और भावों के संक्षेपण में सिद्धस्थ होता था। समाचार के रस के अनुसार लिखवाने वाले भी उन्हीं रसों में डूबे रहते थे। बिलख-बिलख कर रोते हुए लोगों के लम्बे प्रसंगों में से छोटा समाचार छांटना भी सहज काम नहीं होता था। चिट्ठी तैयार करके लिखवाने वाले को सुनाना भी। घंटों की मेहनत से चिट्ठी तैयार होती थी। रसों से लबालब भरी हुई। उसको ले जाने वाला कोई साधारण व्यक्ति तो होगा नहीं। वह असाधारण व्यक्ति होता था डाकिया। उन सभी लोगों की प्रतीक्षा का पात्र, जिनके आत्मीय बाहर रहते थे। अधिकांश वैसे लोगों में चिट्ठियों का आदान-प्रदान होता था जो स्वयं पढ़े-लिखे नहीं होते थे। डाकिए को कहीं-कहीं चिट्ठियां लिखनी भी पड़ती थीं और बांचनी भी। कभी-कभी तो एक बार चिट्ठी सुनाकर डाकिए नहीं जा सकता था। एक ही पत्र को दो तीन बार सुनाना पड़ता था।
डाकिया। वह डाकतार विभाग का सबसे निचले तबके का कर्मचारी नहीं, वह तो घर-घर की समस्याओं से परिचित समाज मन की गहरी समझ रखने वाला पुरुष होता था।
लोग उसके झोले से अपनी चिट्ठी निकलवाने के लिए उसे बाध्य करते थे। उनकी चिट्ठी हो तो डाकिया निकाले। डाकिया गांव का बहुत ही महत्त्वपूर्ण सदस्य होता था और डाक व्यवस्था की पूछिए मत। चिट्ठियों में भरे भावों और समाचारों के वजन का आकलन ही नहीं किया जा सकता।
चिट्ठियों के भी कई प्रकार होते हैं। चिट्ठियां समाचारवाहिका तो होती ही हैं, वे प्रेम की संवाहिका भी होती हैं, जिसे पाते ही हमारी पांचों ज्ञानेन्द्रियां सक्रिय हो जाती हैं। आंखें देखकर तृप्त होती हैं। कान सुनकर। त्वचा स्पर्श कर रोमांचित होती है, वहीं जिह्वा पर भी खट्टा-मीठा स्वाद तिर आता है। चिट्ठियों की सुगंध भी होती है। पांचों ज्ञानेन्द्रियों को सक्रिय करती चिट्ठियां लम्बे समय का संदेश दे जाती हैं।
हमारे लोकगीतों में चिट्ठियों का बड़ा ही सटीक और मार्मिक वर्णन मिलता है। पुरातन साहित्यों में भी चिट्ठियों के वर्णन हैं। आज भले ही चिट्ठियां डाक व्यवस्था के माध्यम से जाती हैं। हर काल में डाक व्यवस्था तो थी, उनके रूप भिन्न थे। कहा जाता है कि रुक्मिणी द्वारा श्रीकृष्ण को लिखी गई चिट्ठी 'विश्व का पहला 'प्रेम पत्र' थी। लोक गीतों में उसका वर्णन भी है।

'अंचरा में फाड़ी रु

रुक्मिणी कगजा बनाओल

नयन काजल मसिहान

चारों कोना लिखले

रुक्मिणी छेम कुशलवा

बीचे बीचे रुक्मिणी बयान।'

और उस चिट्ठी को पढ़कर ही कृष्ण रुक्मिणी का अपहरण करते हैं। वह शिशुपाल से ब्याही जाने से बच जाती हैं। अपने यहां डाक व्यवस्था द्वारा भेजी गई चिट्ठियों को सहेज कर रखने और समय-समय पर निकालकर पढ़ने, पढ़वाने का भी रिवाज रहा है।
डाक व्यवस्था की अहमियत तो आज भी है। कम्प्यूटरीकरण में मोबाइल और ईमेल के कारण चिट्ठी लिखने का अभ्यास छूट रहा है। अपना कोई सात समंदर पार हो या सात मील दूर, मोबाइल ही भावों का संवाहक बन गया है। पर चिट्ठियों के माध्यम से तो भाव भी अक्षर (जिसका क्षय नहीं होता) हो जाते हैं। उन अक्षरों को पढ़कर चिट्ठी पाने वाला लिखने वाले की मन:स्थिति का भी पता लगा लेता था।
ससुराल भेजने के पूर्व बेटियों को कम से कम चिट्ठी लिखना-पढ़ना सिखा दिया जाता था, ताकि वह ससुराल में मिल रहे सुख-दु:ख के भाव चिट्ठियों द्वारा भेज सके। अब तो वे कम्प्यूटर इंजीनियर हो रही हैं। अंतरिक्ष में गईं बेटियों को डाक व्यवस्था से क्या लेना देना। बावजूद इसके उन बेटे और बेटियों की संख्या आज भी कम नहीं जो चिट्ठियां लिखवातीं या लिखती हैं। उन्हें अपनों की चिट्ठियों का इंतजार रहता है। डाक व्यवस्था तो चाहिए ही। संवेदनशील डाकिए भी।

Tuesday, June 26, 2012

Now get more remittances under International Money Transfer Services from Post Offices

ALLAHABAD: The transferring of money from abroad has always been a problem. However, the International Money Transfer Scheme (IMTS) of the department of Posts has made it comparatively quick and easier.

Elaborating on various aspects of the scheme, director postal services, Allahabad region Krishna Kumar Yadav said that with the cooperation of private money transfer firm, the money sent through abroad can be obtained by the recipient in India within few minutes, in selected post offices. Basically this service is available for those NRIs, whose families reside in India. In this service a special code is issued to sender and receiver can obtained payment very easily through this code.

Yadav further intimated that under this scheme the number of remittance has been enhanced from 12 to 30 times for single beneficiary in a calendar year from June 2012. Due to this, there is great scope to transfer money from abroad. In this service there is no facility of remittance to abroad. In 2011; 6,253 transactions were done, while in current year upto May 2012; 2,198 transactions took place in Allahabad. Although about 500 IMTS transactions are being done every month, in Allahabad.

Yadav added that the maximum limit of USD 2,500 can be sent at a time as per RBI regulations, which must however be only for personal use. Due to this the payment under this service is made to the person not to any firm, company, trust or society. Amounts upto INR. 50,000/- may be paid to the beneficiary in cash. Any amount exceeding this limit shall be paid by means of account payee cheque or credited directly to the savings account in the post office in the name of the beneficiary. However, in case of foreign tourists, higher amounts can be payable in cash.

He said in Allahabad region there are 89 post offices including all head post offices, where this service is available. Among these there are 18 post offices in Allahabad division, where the service of IMTS is made available. Allahabad includes services at Allahabad HO, Kutchery HO, Allahabad city, high court, Cavalry Line, GTB Nagar, Bahadurganj, CDA Pension, Athrampur, Bharwari, Handia, Karchhana, Manjhanpur, Phoolpur, Naini, Sirathu and Soraon post offices. The post offices have been directed to treat the payee as "most favoured customers", which ensures courteous and efficient service to them.

Courtesy : Times of India

Tuesday, June 5, 2012

डाकिया का आगमन

अब कम ही दिखाई देता है डाकिया
जो रोज-रोज आता था घंटी बजाता था
ढेरों चिट्ठियां बिखेर जाता था
घर-आंगन में अब कम ही दिखाई
देता है डाकिया

उसका आगमन हमारे अरमानों,
खुशियों का आगमन था
उसका आगमन दोस्त-रिश्तेदारों की
खबरों का आगमन था,
उसका आगमन बिटिया की चिट्ठी
उसके सुख-दुख की खबर होती थी,
उसका आगमन बेटे की चिट्ठी होती थी
जो दूर शहर में पढ़ता था
उसका आगमन मां-बाबा की
खुशियों का आगमन था
जो बेटे-बेटियों की चिट्ठियों से
खुश हो लेते थे
उसका आगमन भाई-बहन का
प्यार होता था
उसका आगमन बेटे की नौकरी
लगने की खबर होती थी
उसका आगमन होती थी
होली, दिवाली, ईद की शुभकामनाएं
पर अब कम ही दिखाई देता है
डाकिया

मेरी उम्र के साथ बुढ़ा गया लगता है
डाकिया
बुढ़ा गई लगती हैं भावनाएं-संवेदनाएं
तभी तो अब कम ही दिखाई देता है
डाकिया
बारिश की फुहार की तरह
आज भी जब कभी कर जाता है
डाकिया

चिट्ठी-पत्री की फुहार घर-आंगन में
तो माटी की सौंधी गंध घुल जाती है
वातावरण में हो जाता है तरोताज़ा तन-मन
अब कम ही दिखाई देता है
डाकिया
जो रोज-रोज आता था घंटी बजाता था
ढेरों चिट्ठियां बिखेर जाता था
घर-आंगन में।

साभार

Saturday, June 2, 2012

एक मूक और बधिर डाकिया की कहानी

उत्तर-पूर्वी चीन के ल्याओ निन्ग प्रांत के पहाड़ क्षेत्र में एक मूक और बधिर डाकिया है, वह नहीं सुन सकता और नहीं कह सकता, हर दिन वह अकेला मोटरसाइकिल चलाकर पहाड़ क्षेत्र के पांच हजार से अधिक परिवारों को पत्र,अखबर और पार्सल भेजता है, प्रति साल में वह 25 हज़ार कि.मी.का रास्ता चलता है।

ह्वांग वेई हर दिन लोन्ग थान कस्बे के लोगों को सेवा देता है। लोन्ग थान कस्बे में 120 से अधिक गांव हैं, ये गांव 300 से अधिक वर्ग किलोमीटर में स्थित हैं, बीते दस से अधिक सालों में ह्वांग वेई इस कस्बे में एकमात्र डाकिया है।

इस मूक और बधिर डाकिया का नाम है ह्वांग वेई, 37 साल की उम्र है। गांव में रहने वाली सुश्री वांग को अखबार चाहिए, इसलिए ह्वांग वेई सुश्री वांग का स्थाई अतिथि बन गया है। सुश्री वांग ने कहा- हर बार वह हमारे पत्रों को ला सकता है, ठीक समय पर।

लोन्ग थान कस्बे के 60 प्रतिशत की गांव पहाड़ों में स्थित हैं, दूसरे 30 से अधिक प्रतिशत की गांव हालांकि मार्ग से बहुत दूर नहीं है, लेकिन इस क्षेत्र में दसियों खान स्टेशन हैं, हर पत्र भेजने के लिए दस से अधिक कि.मी. की दूरी चलने की जरूरत है।

वर्ष 2000 के जरवरी में 26 साल की उम्र वाला ह्वांग वेई डाकिया बन गया है, उसे यह काम बहुत पसंद है, इसलिए वह मेहनत से काम करता है, लोन्ग थान कस्बा पोस्ट ब्यूरो के प्रधान मा श्याओ पो ने कहा:

ह्वांग वेई से पहले डाकिया ने पत्र को हर व्यक्ति को नहीं दिया, डाकिया ने सब पत्रों को गांव समिति के दफ़्तर में रखा, लेकिन ह्वांग वेई खुद पत्र को हर लोग को देता है।

पत्रों को भेजने के अलावा, डाकिया पार्सल भेजता है, पार्सल में ये शामिल हैं कि जीवन उत्पादन और कृषि उत्पादन, इसलिए कुछ समय ह्वांग वेई को भारी पार्सल भेजना है, एक साल के 365 दिनों में ह्वांग वेई काम करता है। इस के प्रति ह्वांग वेई की मां ने कहा

देखो, उस के पास दो बड़ा थैला हैं, जिन में धुलाई चूर्ण,अंगूर मदिरा,बाल द्रव,साबुन और कीटनाशकदवा भी है।

मूक और बधिर लोग के रुप में ह्वांग वेई को काम करते हुए अधिक कठिनाई तोड़ना है, ह्वांग वेई के पास अपना उपाय है, ह्वां वेई की मां ने कहा

वह कह नहीं सकता, नहीं बुला सकता, इसलिए काम करते हए ह्वांग वेई एक बाँसुरी का प्रयोग करता है, बाँसुरी की आवाज सुनकर लोगों को ह्वांग वेई आ रहा है मालूम है।

उपभोगताओं को अधिक सुविधा देने के लिए ह्वांग वेई एक विशेष मानचित्र लेता है, जिस में हर परिवार का पता,नाम और कैसे जाने की खबर रिखा जाता है।

पहाड़ों में रहने वालों के लिए पत्र एक प्रमुख बाहर विश्व के साथ संपर्क रकने वाला साधन है, पहाड़ों ने रहने वालों को पोस्ट स्टेशन के लिए विशेष भावना है। त्यौहारों के दौरान पहाड़ों के बाहर रहने वाले पहाड़ों में रहने वालों को पत्र भेजते हैं, इसलिए त्यौहार के दौरान ह्वांग वेई बहुत व्यस्त है। छ्यान चिन ज़ी गांव के श्यू श्यांग छै ने कहा: हमारी गांव में कई लोगों को समान नाम है, उदाहरण के लिए कई लोगों का नाम वांग श्वी है, और कई लोगों का नाम सून शी श्वै है, इसलिए ह्वांग वेई के काम के लिए बहुत कठिनाई है।

ह्वांग वेई संजीदगी से काम करता है, एक ग्रीष्म में ह्वांग वेई एक कंपनी को पत्र भेजने गया, लेकिन पत्र लेने वाला कंपनी में नहीं था,उस ने पत्र लेने वाले की प्रतीक्षा की। चीज़ भेजने के अलावा ह्वांग वेई किसान दोस्तों के लिए मौखिक पत्र भेजता है। छ्यान चिन ज़ी गांव में रहने वाले चाओ योन्ग बिन ने कहा:

ह्वांग वेई अकसर हमारे को मदद करता है, वह हमारे लिए वे चीज़ भेजता है जो हमें चाहिए।

बीते 12 सालों में ह्वांग वेई पत्र भेजने के लिए 2 लाख 50 हजार कि.मी.का मार्ग चला, और कुल 60 हज़ार पत्रों को भेजा है, पहाड़ों में रहने वाले ह्वांग वेई की प्रशंसा करते हैं।

साभार



Tuesday, May 8, 2012

प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है


(पत्र-लेखन की विधा काफी प्राचीन है. जब दिल की बात होठों पर न आ सके तो फिर पत्र ही सहारा रह जाता है. संचार के क्षेत्र में नित नई तकनीकें आ रही हैं, पर चिठ्ठियों के साथ ही संवाद के कोमल पक्ष भी चले गये हैं। ऐसे में लोगों के मन की थाह भी लगाना मुश्किल हो गया है. ऐसे में कनु जी के ब्लॉग 'परवाज़' पर लिखी पोस्ट 'प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है; बड़ी कोमलत के साथ मन की गहराइयों में पैठ कर जाता है. आप भी इन भावनाओं को महसूस करें-

फ़ोन की लम्बी लम्बी बातें कभी वो सुकून नहीं दे सकती जो चिट्ठी के चंद शब्द देते हैं .तुम्हे कभी लिखने का शौक नहीं था और पढने का भी नहीं तो मेरी न जाने कितनी चिट्ठियां मन की मन में रह गई न उन्हें कागज़ मिले न स्याही .तुम्हारे छोटे छोटे मेसेज भी मैं कितनी बार पढ़ती थी तुमने सोचा भी न होगा ,ये लिखते टाइम तुमने ये सोचा होगा ,ये गाना अपने मन में गुनगुनाया होगा शायद परिचित सी मुस्कराहट तुम्हारे होठों पर होगी जब वो सब यादें आती है तो बड़ा सुकून सा मिलता है ..और एक ही कसक रह जाती है काश तुमने कुछ चिट्ठियां भी लिखी होती मुझे तो ये सूरज जो कभी कभी अकेले डूब जाता है,ये चाँद जो रात में हमें मुस्कुराते न देखकर उदास हो जाता है तुम्हारे पास होने पर भी जब तुम्हारी यादें आ कर मेरे सरहाने बेठ जाती हैं इन सबको आसरा मिल जाता ..ये अकेलापन भी इतना अकेला न महसूस करता ....अब तो सोचती हु तुमने न लिखी तो में कुछ चिट्ठियां लिख लू पर जिस तरह तुम खो रहे हो दुनिया की भीड़ में अब तो तुम्हारे दिल का सही सही पता भी खोने लगा है बड़ा डर सा लगता है की मेरी ये चिट्ठियां तुम तक पहुंचेगी भी या नहीं ? तुम तक पहुँच भी गई गई तो जानती हु तुम पढोगे नहीं .....पर फिर भी मेरी विरासत रहेगी किसी प्यार करने वाले के लिए ..

क्या कहते हो ? लिखू या रहने दू।

तुम्हे चिट्ठियां लिखने की तमन्ना होती है कई बार
पर तुम्हारे दिल की तरह तुम्हारे घर का पता भी
पिछली राहों पर छोड़ दिया कहीं भटकता सा
अब बस कुछ छोटी छोटी यादों की चिड़िया हैं
जो अकेले में कंधे पर आ बैठती है
उनके साथ तुम्हारा नाम आ जाता है होठों पर
और कुछ देर उन चिड़ियों के साथ खेलकर
तुम्हारा नाम भी फुर्र हो जाता है
अगली बार फिर मिलने का वादा करके......
पर सब जानते है कुछ चिट्ठियां कभी लिखी नहीं जाती
कुछ नाम कभी ढले नहीं जाते शब्दों में
कुछ लोग बस याद बनने के लिए ही आते है जिंदगी में
और कुछ वादें अधूरे ही रहे तो अच्छा है.....

आज ये ग़ज़ल सुबह से गुनगुना रही हू....प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है !!

Thursday, February 2, 2012

A messenger of love for soldiers

A 26-year-old man makes it his hobby to collect letters of love from citizens and children and deliver them to the Indian soldiers posted at the borders.

To the uninitiated, this man may look like an ordinary postman. But he does much more than just collecting, sorting and distributing letters.

This 26-year-old man from Kalyan has an unusual passion: of collecting letters from citizens and delivering them to the Indian soldiers posted at the borders.

Avinash Patil had a dream of making it to the Indian Army, but he failed. However, that did not deter him from establishing a link with the military. And today, this man has found a special place in the soldiers' hearts.

"The song from film border, Sandesa Aate Hain made me think that if these soldiers are so moved by one letter from one family, how happy will they be if Indian citizens wrote to them! So I started this hobby three years back," says Avinash.

Every year, Avinash collects letters between January and August and compiles them into a book. So far, he has collected more than 1500 letters, which are now with the National Defence Academys libraray in Khadakvasla.

Avinash visits schools and collects letters from students. HE also spreads the message through word of mouth when he is invited to social functions.

"Indian soldiers are very happy when they receive these letters. They feel their own children are writing to them and some of them even reply to these letters," Avinash tells people whenever he gets a chance.

He says he has got tremendous reponse from students and senior citizens and will continue to do so. However, there is lot more that he needs to do.

"I also want to help raise funds for those families of soldiers, who haven't returned home," he explains.

Avinash is now waiting for the clearance for the final step of his job as a postman: delivering the letters to the forward posts in Kashmir. But before that happens, heres one from our side: "Dear Indian Soldier, We salute you for the sacrifice you make for our nation."

Courtesy : ibnlive.in.com

Saturday, November 12, 2011

डाक टिकटों और लिफाफों के संग्राहक



बचपन में डाक टिकटें इकट्ठी करने का शौक तो हम में से बहुत लोगों को रहा होगा पर इस शौक को आगे बढ़ाने का रास्ता हममें से बहुत कम लोगों को मिला होगा। आज दुनिया की बहुत सी पुरानी और दुर्लभ डाक टिकटें और लिफाफे पेशेवर संग्रहकों द्वारा बहुत ऊंची कीमत पर खरीदी और बेची जा रही हैं। भारत भी इस विषय में पीछे नहीं है। हाल ही में जीनेवा की एक नीलामी में 1948 में भारत में गांधी जी पर जारी की गई एक डेढ आने की टिकट के साथ भेजा गया एक लिफाफा लगभग साढे पांच हज़ार यूरो में बिका जबकि इसका अनुमान दो हज़ार यूरो लगाया गया था। इस नीलामी में साढे तीन हज़ार यूरो तक बोली लगाई जर्मनी में रह रहे एक भारतीय डाक टिकट संग्रहक, राजेश वर्मा ने। स्टुट्टगार्ट निवासी राजेश वर्मा को हालांकि बचपन से डाक टिकटें इकट्ठी करने का शौक रहा है, पर 1981 में पटना में पढ़ाई खत्म करने के बाद जर्मनी आने के बाद यह शौक दोबारा पालने में उन्हें दो तीन साल लग गए। यहां उन्होंने देखा कि इस क्षेत्र में अनेक संस्थाएं सक्रिय हैं, जिनकी नियमित रूप से बैठकें आयोजित होती हैं, बहुत सारे व्यापार मेले आयोजित होते हैं जिनमें टिकटों, लिफाफों की अदला बदली, ख़रीद बेच और नीलामी होती है। एक मित्र ने उन्हें गांधी जी पर आधारित डाक टिकटें और लिफाफे संग्रहित करने की सलाह दी। आज उनके पास दुनिया भर के देशों द्वारा गांधी जी पर जारी की गई सैंकड़ों डाक टिकटों और उनके साथ भेजे गए लिफाफों का संग्रह है, जैसे बेल्जियम, भूटान, कैमरून, माल्टा, सीरिया, यमन, साइप्रस, ब्राजील, मॉरीशस, उरुग्वे, सोमालिया, पनामा, वेनेजुएला, माली, एंटीगुआ और बारबुडा, त्रिनिदाद और टोबैगो, ग्रेनेडा, आयरलैण्ड, इंग्लैण्ड, यूनान, हंगरी, कज़ाकस्तान, मेसेडोनिया, टोगो, दक्षिण अफ्रीका, सूरीनाम, संयुक्त अरब गणराज्य, जर्मनी, कांगो, सेनेगल, मैक्सिको, चाड, मॉरिटानिया, नाइजीरिया, गैबॉन निकारागुआ, जिब्राल्टर, सैन मैरिनो आदि। इन डाक टिकटों के अलावा वर्मा जी के पास गांधी जी की टिकटों के साथ उपयोग किए गए लिफाफों का भी अद्भुत संग्रह है। कुछ दुर्लभ लिफाफे तो सचमुच आम व्यक्तियों द्वारा दूसरे देशों में डाक द्वारा भेजे जाने पर दुनिया की सैर करने के बाद उनके हाथ में आए हैं। राजेश वर्मा जी का कहना है कि यहां डाक टिकटों के संग्रह के लिए अच्छी एल्बमें और बहुत सारा सामान भी मिलता है। कम नमी के कारण यहां वर्षों तक भी टिकटें नई लगती हैं, जबकि भारत में नमी अधिक होने के कारण कुछ वर्षों बाद टिकटें पीली पड़नी शुरू हो जाती हैं। उन्होंने डाक टिकटों और लिफाफों के अपने संग्रह को कई देशों में प्रदर्शित किया है। वे फरवरी 2011 में भारतीय एयर-मेल की सौ वीं सालगिरह के मौके पर दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित की जा रही विश्व डाक टिकट प्रदर्शनी में हिस्सा लेने भी जा रहे हैं।

15 अगस्त 1948 को पहले स्वतन्त्र दिवस के मौके पर महात्मा गांधी जी के चित्र के साथ डेढ आना, साढे तीन आना, बारह आना और दस रुपए की चार डाक टिकटों के चार सेट जारी किए गए थे। हालांकि इन डाक टिकटों को जारी करने की योजना जनवरी से ही चल रही थी जब गांधी जी जीवित थे। पर इससे पहले कि टिकटें जारी हो पातीं, गांधी जी की हत्या कर दी गई। ये डाक टिकटें स्विट्ज़ेलैण्ड में मुद्रित की गईं थी। यह भाग्य की विडंबना ही है कि गांधी जी, जिन्होंने जीवन भर स्वदेशी के आदर्श तले काम किया, उन पर आधारित पहली डाक टिकट विदेश में मुद्रित की गई। इनमें से दस रुपए वाली टिकट आम व्यक्ति की पहुंच से बाहर थी। ये पहली और आख़िरी डाक टिकटें हैं जिन पर उर्दू में बापू लिखा हुआ है। यह नेहरू जी की सलाह पर किया गया था। उस समय के गवर्नर जनरल के आदेश पर केवल सरकारी उपयोग के लिए इनमें से दस रुपए वाली टिकटों की सौ अतिरिक्त प्रतियां छापी गईं थी जिन पर 'service' लिखा होता है। यह विश्व की बहुत दुर्लभ टिकटें हैं। इनमें से कुछ टिकटें कुछ गणमान्य व्यक्तियों को उपहार के रूप में दे दी गईं, और कुछ दिल्ली के राष्ट्रीय डाक टिकट संग्रहालय को दे दी गईं। इनमें से अधिकतम आठ प्रतियां निजी हाथों हैं, जिनके कारण वे बहुत दुर्लभ और कीमती हो गईं। इनमें से एक टिकट 5 अक्तूबर 2007 को स्विट्ज़रलैण्ड में डेविड फेल्डमैन कंपनी द्वारा की नीलामी में 38,000 यूरो में बिकी।

-साभार : बसेरा (जर्मनी की हिन्दी पत्रिका )

Monday, November 7, 2011

ख़त तुम्हारा


ख़त मिला तुम्हारा,
पते बगैर पहुँचा मुझ तक ,
हवाएं जानती हैं खूब,
तुम्हारे ख़त लाना मुझ तक,

चली दिल से तुम्हारे,
वो मेरे घर के रास्ते,
उन्हें पता है, तुम्हारे ख़त
होते बस मेरे वास्ते,

नाम भी न लिखा अपना,
फिर भी मैं जान गया,
तुम्हारी हिना की खुशबू से,
ये ख़त पहचान गया,

कोई तहरीर नहीं इसमें,
पर मैं सब जानता हूँ,
तुम्हारे अश्कों की लिखावट,
खूब पहचानता हूँ,

मुझे मालूम है न आयेंगे,
कभी ख़त आज के बाद,
तुम्हें मालूम है न लिखोगी,
कोई ख़त आज के बाद,

तुम्हें पता है, मैं मजबूरियां,
तुम्हारी जानता हूँ,
न होना परेशां कभी तुम,
मैं ये मानता हूँ,

कि तुम्हें शिकवा नहीं मुझसे,
मैं तुमसे नाराज़ नहीं
हम वो एहसास हैं जो ,
ख़त के मोहताज नहीं

- योगेश शर्मा

Monday, August 1, 2011

'विश्व पत्र दिवस' के बहाने

संदेश माध्यमों ने सुस्त-रफ़्तार कबूतरों से लेकर तेज -रफ़्तार ई-मेल और एस.एम.एस. तक का सफर तय कर लिया है। इंटरनेट और सेल-फोन जैसी अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी ने भले ही फौरन पैगाम भेजने और पाने की हमारी खवाहिश पूरी कर दी हो... लेकिन रफ़्तार के चक्कर में हम कहीं न कहीं अपनी लेखनी की धार खोते जा रहे हैं।


ज़रा याद कीजिए! आपने किसी को पिछला पत्र कब लिखा था? शायद ही हम में से कोई हो, जिसे ये याद हो। अब तो पूरी एक ऐसी नई नस्ल परवान पा चुकी है जिसे खत-व-किताबत के बारे में कोई ज्ञान ही नहीं है। पत्र-लेखनी के इसी महत्व को याद करने के मकसद से ३१ जुलाई को 'विश्व पत्र दिवस' मनाया जाता है।


आमतौर पर 'डे' या विशेष दिवस मनाने का ये चलन पश्चिम से आया है लेकिन पत्र-लेखनी की शानदार रिवायत को याद करने की ये कोशिश हमारे अपने ही देश से शुरू हुई है। पत्र-दिवस मनाने के लिए 31 जुलाई का चयन करने के पीछे कोई खास वजह तो नहीं है... लेकिन इस मुहिम को छेडने वालों में से एक शरद श्रीवास्तव इसे मशहूर लेखक मुंशी प्रेम चंद को समर्पित करते हैं जिनका जन्मदिन भी 31 जुलाई ही है। वैसे ये भी माना जाता है कि इसी दिन इंग्लैंड में पहला पत्र पोस्ट हुआ था।


वैसे डाक-सेवाएं आज भी कार्यरत हैं... लेकिन अब उनका महत्व सरकारी पत्र-व्यवहार और पार्सल वगैरह भेजने तक ही सीमित रह गया है। सूचना प्रौद्योगिकी के इस दौर में लोगों ने डाकघरों का रुख करना कम कर दिया है। अब न लोगों को डाक बाबुओं का इंतजार रहता है और न ही डाकियों के पास खातों का वो अंबार रहता है। जिसे देखो बस ई-मेल, सोशल नेटवर्किंग साइट्‌स और शार्ट मेसेज सर्विस यानी एस.एम.एस. पर उल्टी-सीधी भाषा लिखने में लगा है। और ऐसा हो भी क्यों ना! आखिर इस भाग-दौड भरी ज़िन्दगी में लोगों के पास अंतर्देशीय, पोस्टकार्ड और लिफाफे डाकघर से लाने, उसपर हाथ से लिखने और पोस्ट करने की फुर्सत ही कहां है।


लेकिन जल्द पैग़ाम भेजने की चाहत में हमसे पत्राचार का वो रिवायती तरीका छूटता गया, जिससे लोग लेखनी का गुर सीखते थे। देश में ही कई मिसालें ऐसी हैं जिनके खत एक साहित्य के तौर पर याद किए जाते हैं। उनमें पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का अक्सर ज़िक्र आता है जो अपनी बेटी इंदिरा जी को जेल ही पत्र लिखकर ज्ञानवर्धक खजाना भेजते रहते थे। दूसरे मशहूर शायर मिर्ज़ा गालिब के खातों की मिसाल दी जाती है जिनके खत से ऐसा लगता है कि वो सामने बैठे किसी शख्श से गुफ्तगू कर रहे हों।


लोग पत्र लिखते थे तो उससे उसका पूरा व्यक्तित्व झलकता था। हैंड-राइटिंग के विशेषज्ञ तो आज भी लिखावट से व्यक्तित्व का अंदाज़ा लगा लेते हैं। हस्तलिखित पत्रों की सीधी, आडी, तिरछी लाइनों से उसके लिखने वालों की जेहनियत का आभास हो जाता है। खत की हैंडराइटिंग लिफाफे से खत का मजमून भांप लेने का मुहाविरा इसी लिए काफी प्रचलित है। सुदूर बैठे किसी भी व्यक्ति को खत पा जाने भर से ही उसके वतन की मिट्‌टी की खुशबू आने लगती थी। अपने नजदीकियों और करीबियों को खत लिखने और उसका जवाब आने के इंतजार की शिद्दत ही अजीब थी। फिर प्रेम-पत्र लिखने और पढने का तो दौर ही अजीब था। ऐसे खत बरसों तक लोगों की किताबों, संदूक, बक्से की शोभा बने रहते थे और ऐसे सहेज कर रखे जाते थे जैसे कोई बहुत कीमती सरमाया हो। पत्र की अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मुंबईया फिल्मों में भी इसपर अनेक गाने लिखे गए हैं। 'नाम' फिल्म में तो पंकज उधास के एक कन्सर्ट में ''चिट्ठी आई है आई है चिट्ठी आई है'' गाने पर पाकिस्तानी अफताब भाई भी रोने पर मजबूर हो जाते हैं। बहरहाल पत्र-दिवस मनाने का मकसद इस खोते हुए चलन से आज की पीढी को जागरुक करना है।

साभार : अफसर, ghar ki baat

Saturday, July 16, 2011

53 साल बाद पहुँचा प्रेम-पत्र

20 फरवरी 1958 को कॉलेज में पढ़ाई के दौरान एक अमेरिकी युवती को उसके प्रेमी ने डाक से प्रेम पत्र भेजा। महिला को यह खत अब जाकर है। उनकी उम्र अब 74 साल हो चुकी है और वह दादी मां हैं।

बात 1958 की है। अमेरिकी राज्य पेनसिल्वेनिया की यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रही वोनी नाम की युवती को एक युवक ने प्रेम पत्र लिखा। प्रेमी ने खत के बाहर सिर्फ यही लिखा कि, 'लव, फॉरएवर, वोनी।' यूनिवर्सिटी के पोस्ट बॉक्स में डाले गए इस प्रेम पत्र पर 20 फरवरी 1958 को मुहर लगी लेकिन इसके बाद प्यारी भरी चिट्ठी न जाने कहां गुम हो गई।

लेकिन प्रेमी ने हार नहीं मानीं। उन्होंने यूनिवर्सिटी को चेतावनी दी कि अगर खत वोनी तक नहीं पहुंचा तो वह आधिकारिक शिकायत दर्ज कराएंगे। यूनिवर्सिटी लगातार खत को ढूंढती रही। खोजबीन के दौरान इसी हफ्ते अचानक यूनिवर्सिटी के सामने पांच दशक पुराना यह प्रेम पत्र आ गया।

स्थानीय मीडिया में इस बारे में एक रिपोर्ट भी छपी। रिपोर्ट के जरिए वोनी की एक दोस्त ने उनसे संपर्क किया और बताया कि यूनिवर्सिटी तुम्हें 53 साल पुराना खत सौंपना चाहती है। यूनिवर्सिटी की प्रवक्ता क्रिस्टीन किंडल कहती हैं, 'इस पूरी प्रक्रिया में हमारा मकसद था कि 53 साल पुराने खत को गंतव्य तक पहुंचाया जाए।'

74 साल की वोनी को अब जाकर पुराने प्रेमी का यह खत मिला है। वोनी के बाल अब सफेद हो चुके हैं। उनके कई पोते और पोती हैं। उम्र के इस पड़ाव में मिला प्रेम पत्र वोनी को भावुक कर रहा है। खत लिखने वाले के संपर्क में वह नहीं हैं लेकिन प्यार की एक पुरानी डोर जिंदा है।
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California (Pennsylvania), July 15 (AP): Much has happened in the 53 years since Vonnie sent Clark the letter, wondering why he had not called before going back to college.

They married later that year. He graduated. They had four children. They divorced. And he changed his name.

And, at last, the letter is wending its way to Clark ' that is, Muhammad Siddeeq ' who awaits its arrival with mixed emotions. "I'm curious, but I'm not sure I'd put it under the category of 'looking forward to it'," Siddeeq told the Pittsburgh Tribune-Review.

The letter, bearing four one-cent stamps postmarked February 1958 and addressed to Clark C. Moore, arrived in the mailroom at California University of Pennsylvania last week. School officials checked their files but could not figure out who Clark Moore was.

But his friends and family still lived in the area and saw media reports about the letter. They called Siddeeq, now 74 and living in Indianapolis, who had changed his name after converting to Islam.

"I never dreamed of anything like this," Siddeeq told the Washington Observer-Reporter. The letter, its stamps turned upside down as sign of love, arrived at California University of Pennsylvania on July 8, tucked inside some magazines.
Courtesy : www.telegraphindia.com – Sat, Jul 16, 2011

Tuesday, April 26, 2011

प्यार की चिट्ठी

'प्यार की चिट्ठी' भला किसे न सुहाए. टेक्नालाजी कहाँ की कहाँ पहुँच गई, पर अभी भी उन प्यार भरे चिट्ठियों की बात होते ही मन में सिहरन सी उठने लगती है. ऐसी ही इक प्यार भरी चिट्ठी जनसत्ता के समान्तर स्तम्भ में 21 अप्रैल, 2011 को पढ़ी, तो सोचा की इसे यहाँ भी बांच लूं. इस प्यार भरी चिट्ठी के लेखक हैं सिद्धेश्वर जी. उनकी (प्रेम) पत्र - लेखन और (प्रेम) पत्र - पठन के (वे) दिन पोस्ट यहाँ पर साभार प्रस्तुत है !!


तब रंगीन लगती थीं श्वेत श्याम तस्वीरें
और किताबों के बीच चुपके से रखे गए सूखे फूल
बोसीदा कमरे में भर में भर देते थे सुगन्ध।


रात के दो के आसपास का समय था।वोल्वो तेज रफ्तार से भाग रही थी. बस में थोड़े-थोड़े अंतराल पर एक ही गाना बार-बार बज रहा था-'चिठ्ठी आई है ,वतन से चिठ्ठी आई है'.लग रहा था कि बस के ड्राइवर और स्टाफ को घर की याद आ रही होगी. मैं ऐसा शायद इसलिए भी अनुमान कर रहा क्योंकि स्वयं घर से दूर था - हजारों मील, लेकिन घर की याद बिना किसी टिकट भाड़े नजदीक और नजदीक चली आ रही थी. मुझसे आगे की सीट पर बैठा युवक अपनी साथी को बता रहा था-'नाम फिल्म इसी गाने से पंकज उधास का नाम फेमस हुआ था'.शुक्र है कि युवती ने 'कौन पंकज, कौन उधास?' नहीं पूछा.मुझे याद आया कि एक सहकर्मी ने एक दिन बताया था कि उन दिनों जब यह गाना खूब चला था तब उन्होंने इसी से 'प्रेरणा'लेकर गणित में एम.एस-सी.करने के तत्काल बाद एक विदेशी स्कूल की नौकरी के बदले अपने कस्बेनुमा शहर की मास्टरी को इसलिए तरजीह दी थी कि 'उमर बहुत है छोटी,अपने घर में भी है रोटी'.हालांकि बाद में,थोड़ी तरलता आने पर उन्होंने बेहद मीठे और मुलायम अंदाज में यह भी खुलासा किया था कि इस निर्णय के केन्द्र में 'प्रेम' भी (शायद प्रेम ही!) एक मजबूत कारण या आधार था.और यह भी कि उन दिनों वह रोजाना बिला नागा 'उसे' एक पत्र लिखा करते थे - प्रेम पत्र.

वह कोई दूसरा समय था
इतिहास का एक बनता हुई कालखंड
समय की खराद पर
उसी में ढलना था हम सबका जीवन।

आजकल पत्र कौन लिखता है? सरकारी,व्यव्सायी,नौकरी-चाकरी के आवेदन-बुलावा आदि के अतिरिक्त पारिवारिक-सामाजिक पत्र हमारी जिंदगी के हाशिए से भी सरक गए लगते है.क्या ऐसा संचार के वैकल्पिक संसाधनों-साधनों की सहज - सरल - सस्ती उपलब्धता के कारण हुआ है? या कि समय का अभाव,पारिवारिक-सामाजिक संरचना के तंतुजाल में दरकाव,पेपरलेस कम्युनिकेशन की ओर अग्रगामिता आदि-इत्यादि चीजें इसकी वजहें हैं? बहरहाल, इस गुरु-गंभीर विषय पर विमर्श की विचार-वीथिका में वरिष्ठ-गरिष्ठ विद्वानों को विचरण करने का सुअवसर प्रदान करते हुए मैं तो बस यही कहना चाह रहा हूं कि कहां गए वो दिन? वो पत्र-लेखन और पत्र-पठन के दिन अब तो पत्र-लेखन कला स्कूली पाठ्यक्रमों में सिमट कर रह-सी गई है।

दुनिया बदलती जा रही है पल-प्रतिपल।
तमाम जतन और जुगत के बावजूद
हर ओर सतत जारी है कुरूपताओं का कारोबार
बढ़ता ही जा रहा है कूड़ा कबाड़
फिर भी मन का कोई कोई कोना
खोजता है एकान्त

कुछ लोग कहेंगे कि ई मेल ,एसएमएस,इंस्टैन्ट मैसेजिंग आदि पर मेरी नजर क्यों नहीं जा रही है. हां,ये भी पत्र के विकल्प रूप - प्रारूप हैं और इनके जरिए व्यक्त की जाने वाली संवेदना तथा उसके शिल्प को मैं नकार भी नहीं रहा हूं किन्तु यहां मेरी मुराद कागज पर लिखे जाने वाले उस पत्र से है जिससे तमाम भाषाओं का विपुल साहित्य भरा पड़ा है,जिसको लेकर रचा गया समूचे संसार का शास्त्रीय-उपशास्त्रीय-लोक-फ़ोक संगीत अनंत काल तक दिग्-दिगंत में गूंजता रहेगा,जो कभी मानवीय संबंधों की ऊष्मा का कागजी पैरहन था,जो कभी सूखे हुए फूलों के साथ किताबों के पन्नों में मिला करता था और दिक्काल की सीमाओं को एक झटके में तिरोहित कर जीवन-जगत के तमस में आलोक का आश्चर्य भर देता था.

अब भी मँडराती हैं
ढेर सारी कटी पतंगे
तलाशती हुईं अपनी डोरियाँ
अपनी लटाइयाँ
और अपने-अपने हिस्से का आकाश।

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सिद्धेश्वर

Wednesday, January 5, 2011

दुनिया की सैर कराएगा डाक टिकट

ब्रिटेन के डाक विभाग ‘रॉयल मेल’ ने अपनी तरह का एक अनूठा डाक टिकट जारी किया है.अत्याधुनिक तकनीक से लैस ये डाक टिकट फ़ोन के ज़रिए आपको इंटरनेट से जोड़ देगा.डाक टिकट को तस्वीर के रुप में फ़ोन में कैद कर तुरंत संबंधित वेबसाइट तक पहुंचा जा सकता है. यानी डाक टिकट इंटरनेट के ज़रिए सूचनाओं का संसार और दुनिया के दरवाज़े खोलेगा.

‘रॉयल मेल’ का कहना है दुनियाभर में ये अपनी तरह पहला ऐसा डाक टिकट है.‘इमेज रेकॉगनिशन’ नामक तकनीक ने इस नए डाक टिकट को 21वीं सदी का अत्याधुनिक डाक टिकट बना दिया है.स्मार्टफ़ोन के ज़रिए यह तकनीक डाक टिकट पर छपी तस्वीर को ‘थ्री-डी’ तस्वीर की तरह दिखाएगी. इंटरनेट पर इस तस्वीर की खोज के बाद हमें उससे संबंधित सभी जानकारियां और वेबसाइट भी उपलब्ध होंगी.

नई तकनीक से लैस बुद्धिमान किस्म के ये डाक टिकट दुनिया के लिए मनोरंजन और जानकारियों का ख़ज़ाना खोल देंगे.
असल ज़िंदगी की तस्वीरों को इंटरनेट की दुनिया से जोड़ने वाली इस तकनीक का इस्तेमाल पहली बार किसी डाक टिकट पर किया जा रहा है.यह अद्भुत डाक टिकट ‘रॉयल मेल’ की एक खास श्रंखला का हिस्सा है.ब्रिटेन का डाक विभाग खास मौकों और ऐतिहासिक तारीख़ों पर अलग किस्म के डाक टिकट जारी करता है. इन टिकट के ज़रिए देश और संस्कृति के बारे में लोगों को जागरुक किया जाता है.

‘रॉयल मेल’ के प्रतिनिधी फ़िलिप पार्कर ने कहा, ''नई तकनीक से लैस बुद्धिमान किस्म के ये डाक टिकट दुनिया के लिए मनोरंजन और जानकारियों का ख़ज़ाना खोल देंगे. अगले कुछ महीनों में डाक टिकट इक्कठा करने के शौकीन चिठ्ठियों के ज़रिए इन टिकटों को पा सकेंगे.''

साभार : BBC हिंदी

Saturday, January 1, 2011

पहले ख़त की ख़ुशबू

खतों के प्रति दीवानगी सदियों से रही है. खतों का चलन भले ही कम हुआ हो, पर दीवानगी में कमी नहीं आई है. हसरत मोहानी ने यूँ ही नहीं लिखा था-लिक्खा था अपने हाथों से जो तुमने एक बार / अब तक हमारे पास है वो यादगार खत ।।....अपर्णा त्रिपाठी की इस कविता में वही भाव है, वही संवेदनाएं हैं, वही जज्बा है, वही दीवानगी है... तो आज नए साल के आगाज पर इस ख़ुशबू को महसूस करते हैं...

आज भी तेरा पहला खत
मेरी इतिहास की किताब में हैं
उसका रंग गुलाबी से पीला हो गया
मगर खुशबू अब भी पन्नो में है

उसके हर एक शब्द हमारी
प्रेम कहानी बयां करते है
और तनहाई में मुझे
बीते समय में ले चलते हैं

वो खत मेरी जिन्दगी का
हिस्सा नही ,जिन्दगी है
हर दिन पढने की उसे
बढती जाती तृष्णगी है.

अपर्णा त्रिपाठी "पलाश"

Monday, December 27, 2010

वो खत के पुरजे


कितना सुहाना दौर हुआ करता था, जब खत लिखे पढे और भेजे जाते थे । हमने पढे लिखे और भेजे इसलिये कहा क्योकि ये तीनो ही कार्य बहुत दुष्कर लेकिन अनन्त सुख देने वाले होते थे ।

खत लिखना कोई सामान्य कार्य नही होता था, तभी तो कक्षा ६ मे ही यह हमारे हिन्दी के पाठ्यक्रम मे होता था । मगर आज के इस भागते दौर मे तो शायद पत्र की प्रासंगिकता ही खत्म होने को है । मुझे याद है वो समय जब पोस्ट्कार्ड लिखने से पहले यह अच्छी तरह से सोच लेना पडता था कि क्या लिखना है, क्योकि उसमे लिखने की सीमित जगह होती थी, और एक अन्तर्देशीय के तो बँटवारे होते थे, जिसमे सबके लिखने का स्थान निश्चित किया जाता था । तब शायद पर्सनल और प्राइवेट जैसे शब्द हमारे जिन्दगी मे शामिल नही हुये थे । तभी तो पूरा परिवार एक ही खत मे अपनी अपनी बातें लिख देता था । आज तो मोबाइल पर बात करते समय भी हम पर्सलन स्पेस ढूँढते है ।

पत्र लिखने के हफ्ते दस दिन बाद से शुरु होता था इन्तजार – जवाब के आने का ।जब डाकिया बाबू जी को घर की गली में आते देखते ही बस भगवान से मनाना शुरु कर देते कि ये मेरे घर जल्दी से आ जाये । और दो चार दिन बीतने पर तो सब्र का बाँध टूट ही जाता था, और दूर से डाकिये को देखते ही पूँछा जाता – चाचा हमार कोई चिट्ठी है का ? और फिर चिट्ठी आते ही एक प्यारे से झगडे का दौर शुरु होता– कि कौन पहले पढेगा ? कभी कभी तो भाई बहन के बीच झगडा इतना बढ जाता कि खत फटने तक की नौबत आ जाती । तब अम्मा आकर सुलह कराती । अब तो वो सारे झगडे डाइनासोर की तरह विलुप्त होते जा रहे हैं ।

और प्रेम खतों का तो कहना ही क्या उनके लिये तो डाकिये अपनी प्रिय सहेली या भरोसेमंद दोस्त ही होते थे । कितने जतन से चिट्ठियां पहुँचाई जाती थी , मगर उससे ज्यादा मेहनत तो उसको पढ्ने के लिये करनी पडती थी । कभी छत का एकान्त कोना ढूँढना पडता था तो कभी दिन मे ही चादर ओढ कर सोने का बहाना करना पडता था । कभी खत पढते पढते गाल लाल हो जाते थे तो कभी गालो पर आसूँ ढल आते थे । और अगर कभी गलती से भाई या बहन की नजर उस खत पर पढ जाये तो माँ को ना बताने के लिये उनकी हर फरमाइश भी पूरी करनी पडती थी।

खत पढते ही चिन्ता शुरु हो जाती कि इसे छुपाया कहाँ जाय ? कभी तकिये के नीचे , कभी उसके गिलाफ के अंदर , कभी किताब के पन्नो के बीच मे तो कभी किसी तस्वीर के फ्रेम के बीच में । इतने जतन से छुपाने के बाद भी हमेशा एक डर बना रहता कि कही किसी के हाथ ना लग जाय, वरना तो शामत आई समझो ।

अब आज के दौर मे जब हम ई – मेल का प्रयोग करते है, हमे कोई इन्तजार भले ही ना करना पडता हो , लेकिन वो खत वाली आत्मियता महसूस नही हो पाती । अब डाकिये जी मे भगवान नजर नही आते । आज गुलाब इन्तजार करते है किसी खत का , जिनमे वो सहेज कर प्रेम संदेश ले जाये । शायद खत हमारी जिन्दगी मे बहुत ज्यादा अहमियत रखते थे तभी तो ना जाने कितने गाने बन गये थे – चाहे वो – वो खत के पुरजे उडा रहा था हो या ये मेरा प्रेम पत्र पढ कर हो , चाहे चिट्ठी आई है हो या मैने खत महबूब के नाम लिखा हो । आज चाहे ई –मेल हमारी जिन्दगी का हिस्सा जरूर बन गये हो मगर हमारी यादो की किताब मे उनका एक भी अध्याय नही , शायद तभी आज तक एक भी गीत इन ई-मेल्स के हिस्से नही आया ।

आज भी मेरे पास कुछ खत है जिन्हे मैने बहुत सहेज कर रक्खा है , मै ही क्यो आप के पास भी कुछ खत जरूर होंगे (सही कहा ना मैने) और उन खतों को पढने से मन कभी नही भरता जब भी हम अपनी पुरानी चीजों को उलटते है , खत हाथ में आने पर बिना पढे नही रक्खा जाता ।

साभार : अपर्णा त्रिपाठी - पलाश

Thursday, December 9, 2010

गौरैया और कबूतर के साथ उडेंगी चिट्ठियाँ

भारतीय डाक विभाग ने 9 जुलाई सन 2010 को गौरैया व कबूतर पर डाक टिकट जारी किए। गौरैया व कबूतर हमारी संस्कृति और परंपराओं का हिस्सा रहे हैं, लोकजीवन में इनसे जुड़ी कहानियां व गीत आप को लोक साहित्य में मिलेंगें। इधर कुछ वर्षों से पक्षी वैज्ञानिकों एंव सरंक्षणवादियों का ध्यान घट रही गौरैया की तरफ़ गया। नतीजतन इसके अध्ययन व सरंक्षण की बात शुरू हुई, जैसे की पूर्व में गिद्धों व सारस के लिए हुआ। डाक टिकटों में एक नर व मादा गौरैया को एक मिट्टी के घड़े पर बैठे हुए दर्शाया गया है, दूसरे सेट में कबूतरों का एक जोड़ा चित्रित है। एक डाक टिकट की कीमत पाँच रुपये हैं। जो पूरे भारत में आप के पत्र को पहुंचाने में सक्षंम हैं.डाक टिकटों को इकट्ठा करने वाले लोगों के संग्रह में कबूतर और गौरैया की तस्वीर वाले डाक टिकटों की बढ़ोत्तरी हो सकेगी।पक्षी प्रेमियों के लिए भी यह एक सुखद अनुभव होगा जब वह गौरैया या कबूतर वाले डाक टिकट लगे पत्रों को प्राप्त करेंगे या किसी को भेजेंगे।

हांलाकि ई-मेल व मोबाइल ने चिठ्ठियों के चलन को काफ़ी हद तक कम किया हैं, लेकिन हाथ से लिखे खत और उन पर चिपके हुए रंग-बिरंगी तस्वीरों वाले टिकट मानव मन-मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव छोड़ते हैं, साथ ही वह खत व टिकट लिफ़ाफ़े हमारे अतीत की यादों को सुरक्षित रखने में भी मदद करते हैं। क्योंकि जब भी आप इन धूल चढ़े लिफ़ाफ़ों से वह परत हटायेंगे तो बरबस ही वह पुराना वक्त और वह बाते ताजा होंगी जो इस खत में लिखी हुई हैं। खास बात है कि कागज के यह खत जो कहते हैं, उस बात का पालन करने के लिए हम अधिक तत्पर व संवेदनशील होते हैं। वह प्रभाव इलेक्ट्रानिक संपर्क के किसी माध्यम में मौजूद नही हैं।

इसलिए इस बार जब आप किसी को खत लिखे तो गौरैया व कबूतर वाले टिकट लगाना मत भूलिएगा, और यह भी जरूर लिखिएगा कि हमारें घरों व उनके आस-पास रहने वाले इन खूबसूरत परिन्दों के खाने-पीने का खयाल रखते है या नही।

साभार :दुधवा लाइव डेस्क

Saturday, December 4, 2010

डाक टिकट बनीं पत्र मित्रता

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी संग्रह करना बहुत से बच्चों की हॉबी का हिस्सा होता है, कोई अखबार में छपी रेसीपीज तो कोई विभिन्न देशों की मुद्राएं इकटी करने में लगा रहता है। डाक-टिकटों का संग्रह विश्व के सबसे लोकप्रिय शौकों में से एक है। डाक-टिकटों का संग्रह हमें स्वाभाविक रूप से सीखने को प्रेरित करता है, इसलिए इसे प्राकृतिक शिक्षा-उपकरण कहा जाता है। डाक-टिकट किसी भी देश की विरासत की चित्रमय कहानी हैं। डाक टिकटों का एक संग्रह विश्वकोश की तरह है, जिसके द्वारा हम अनेक देशों के इतिहास, भूगोल, संस्कृति, ऎतिहासिक घटनाएं, भाषाएं, मुद्राएं, पशु-पक्षी, वनस्पतियों और लोगों की जीवनशैली एवं देश के महारथियों के बारे में बहुत सारी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

डाक टिकट का इतिहास
डाक-टिकट का इतिहास करीब 169 साल पुराना है। विश्व का पहला डाक टिकट 1 मई 1840 को ग्रेट ब्रिटेन में जारी किया गया था, जिसके ऊपर ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया का चित्र छपा था। एक पेनी मूल्य के इस टिकट के किनारे सीधे थे यानी टिकटों को अलग करने के लिए जो छोटे छोटे छेद बनाए जाते हैं, वे प्राचीन डाक टिकटों में नहीं थे। इस समय तक उनमें लिफाफे पर चिपकाने के लिए गोंद भी नहीं लगा होता था। इसके उपयोग का प्रारंभ 6 मई 1840 से हुआ। टिकट संग्रह करने में रूचि रखने वालों के लिए इस टिकट का बहुत महत्व है, क्योंकि इस टिकट से ही डाक-टिकट संग्रह का इतिहास भी शुरू होता है।

भारत में पहला डाक-टिकट
1 जुलाई 1852 में सिंध प्रांत में जारी किया गया, जो केवल सिंध प्रांत में उपयोग के लिए सीमित था। आधे आने मूल्य के इस टिकट को भूरे कागज पर लाख की लाल सील चिपका कर जारी किया गया था। यह टिकट बहुत सफल नहीं रहा क्योंकि लाख टूटकर झड़ जाने के कारण इसको संभालकर रखना संभव नहीं था। फिर भी ऎसा अनुमान किया जाता है कि इस टिकट की लगभग 100 प्रतियां विभिन्न संग्रहकर्ताओं के पास सुरक्षित हैं। डाक-टिकटों के इतिहास में इस टिकट को सिंध डाक के नाम से जाना जाता है। बाद में सफेद और नीले रंग के इसी प्रकार के दो टिकट वोव कागज पर जारी किए गए लेकिन इनका प्रयोग बहुत कम दिनों तक रहा, क्योंकि 30 सितंबर 1854 को सिंध प्रांत पर ईस्ट इंडिया कंपनी का अधिकार होने के बाद इन्हें बंद कर दिया गया।ये एशिया के पहले डाक-टिकट तो थे ही, विश्व के पहले गोलाकार टिकट भी थे। संग्रहकर्ता इस प्रकार के टिकटों को महत्वपूर्ण समझते हैं और आधे आने मूल्य के इन टिकटों को आज सबसे बहुमूल्य टिकटों में गिनते हैं।

डाकटिकट संग्रह बना मनोरंजन
समय के साथ जैसे-जैसे टिकटों का प्रचलन बढ़ा टिकट संग्रह का शौक भी पनपने लगा। 1860 से 1880 के बीच बच्चों और किशोरों ने टिकटों का संग्रह करना शुरू कर दिया था। दूसरी ओर अनेक वयस्क लोगों में भी यह शौक पनपने लगा और उन्होंने टिकटों को जमा करना शुरू किया, संरक्षित किया, उनके रेकार्ड रखे और उन पर शोध आलेख प्रकाशित किए। जल्दी ही इन संरक्षित टिकटों का मूल्य बढ़ गया क्योंकि इनमें से कुछ तो ऎतिहासिक विरासत बन गए थे और बहुमूल्य बन गए थे। ग्रेट ब्रिटेन के बाद अन्य कई देशों द्वारा डाक-टिकट जारी किये गए।

1920 तक यह टिकट संग्रह का शौक आम जनता तक पहुंचने लगा। उनको अनुपलब्ध तथा बहुमूल्य टिकटों की जानकारी होने लगी और लोग टिकट संभालकर रखने लगे। नया टिकट जारी होता तो उसे खरीदने के लिए डाकघर पर भीड़ लगनी शुरू हो जाती थी। लगभग 50 वर्षो तक इस शौक का नशा जारी रहा। इसी समय टिकट संग्रह के शौक पर आधारित टिकट भी जारी किए गए। जर्मनी के टिकट में टिकटों के शौकीन एक व्यक्ति को टिकट पर अंकित बारीक अक्षर आवर्धक लेंस (मैग्नीफाइंग ग्लास) की सहायता से पढ़ते हुए दिखाया गया है। आवर्धक लेंस टिकट-संग्रहकर्ताओं का एक महत्वपूर्ण उपकरण है। एक रूपये मूल्य का भारतीय टिकट, यू.एस. का टिकट तथा बांग्लादेश के लाल रंग के तिकोने टिकटों का एक जोड़ा टिकट संग्रह के शौक पर आधारित महत्वपूर्ण टिकटों में से हैं।

1940-50 तक डाक-टिकटों के शौक ने देश-विदेश के लोगों को मिलाना शुरू कर दिया था। टिकट इकटा करने के लिए लोग पत्र-मित्र बनाते थे। अपने देश के डाक-टिकटों को दूसरे देश के मित्रों को भेजते थे और दूसरे देश के डाकटिकट मंगवाते थे। पत्र-मित्रता के इस शौक से डाक-टिकटों का आदान प्रदान तो होता ही था लोग विभिन्न देशों के विषय में अनेक ऎसी बातें भी जानते थे, जो किताबों में नहीं लिखी होती हैं। उस समय टीवी और आवागमन के साधन आम न होने के कारण देश विदेश की जानकारी का ये बहुत ही रोचक साधन बने। पत्र-पत्रिकाओं में टिकट से संबंधित स्तंभ होते और इनके विषय में बहुत सी जानकारियों को जन सामान्य तक पहुंचाया जाता। पत्र-मित्रों के पतों की लंबी सूचियां भी उस समय की पत्रिकाओं में प्रकाशित की जाती थीं।

धीरे धीरे डाक टिकटों के संग्रह की विभिन्न शैलियों का भी जन्म हुआ। लोग इसे अपनी जीवन शैली, परिस्थितियों और रूचि के अनुसार अनुकूलित करने लगे। इस परंपरा के अनुसार कुछ लोग एक देश या महाद्वीप के डाक-टिकट संग्रह करने लगे तो कुछ एक विषय से संबंधित डाक-टिकट। आज अनेक लोग इस प्रकार की शैलियों का अनुकरण करते हुए और अपनी-अपनी पसंद के किसी विशेष विषय के डाक टिकटों का संग्रह करके आनंद उठाते है। विषयों से संबंधित डाक टिकटों के संग्रह में अधिकांश लोग पशु, पक्षी, फल, फूल, तितलियां, खेलकूद, महात्मा गांधी, महानुभावों, पुल, इमारतें आदि विषयों और दुनिया भर की घटनाओं के रंगीन और सुंदर चित्रों से सजे डाक टिकटों को एकत्रित करना पसंद करते है।

प्रत्येक देश हर साल भिन्न भिन्न विषयों पर डाक-टिकट जारी करते हैं और जानकारी का बड़ा खजाना विश्व को सौप देते हैं। इस प्रकार किसी विषय में गहरी जानकारी प्राप्त करने के लिए उस विषय के डाक टिकटों का संग्रह करना एक रोचक अनुभव हो सकता है। डाक-टिकट संग्रह का शौक हर उम्र के लोगों को मनोरंजन प्रदान करता है। बचपन में ज्ञान एवं मनोरंजन, वयस्कों में आनंद और तनावमुक्ति तथा बड़ी उम्र में दिमाग को सक्रियता प्रदान करने वाला इससे रोचक कोई शौक नहीं। इस तरह सभी पीढियों के लिए डाक टिकटों का संग्रह एक प्रेरक और लाभप्रद अभिरूचि है।