Showing posts with label दुनिया का प्रथम प्रेम-पत्र. Show all posts
Showing posts with label दुनिया का प्रथम प्रेम-पत्र. Show all posts

Tuesday, October 9, 2018

विश्व डाक दिवस @ राष्ट्रीय डाक सप्ताह : पत्रों की खूबसूरत दुनिया

पत्रों की अपनी एक खूबसूरत दुनिया है।  सभ्यता के आरंभ से ही मानव किसी न किसी रूप में पत्र लिखता रहा है। कहते हैं कि दुनिया का सबसे पहला खत 2009 ईसा पूर्व बेबीलोन के खंडरों से मिला था, जो एक प्रेमी ने अपनी प्रेमिका के विरह के भाव से ओतप्रोत होकर लिखा था। भावनाओं की बयार इस कद थी कि प्रेमी ने मिट्टी के फर्श को खोदते हुए ‘मैं तुमसे मिलने आया था, पर तुम नहीं मिली’ का संदेश जाने से पहले प्रेमिका के लिए छोड़ा। इस संदेश में कितनी तड़प थी इसका अंदाजा वही लगा सकता है जिसके लिए वह लिखा गया। 

डाक विभाग एक संदेश दूसरे तक पहुंचाने का काम करता है। ईसा पूर्व आरंभ से ही मानव किसी न किसी रूप में संदेश देता रहा है। दीवारों पर चित्रकारी से लेकर मूर्तियों तक। छोटे और तेजी से संदेश पहुंचाने का सबसे पहले वाहक कबूतर बने। इनको सबसे पहले डाकिए के रूप में आज भी जाना जाता है। धीरे-धीरे  तेजी से संदेश भेजने के लिए घोड़ों का इस्तेमाल हुआ। ये रियासतों के बीच दौड़ते थे। रियासतों के बीच संदेश का आदान-प्रदान करने के लिए डाक नेटवर्क 1727 से अस्तित्व में आया। धीरे-धीरे रियासतों में डाकघर बनने लगे और इनमें एकरूपता लाने के लिए इनको जोड़ा गया। 
(Heritage Building Lucknow GPO)


ऐतिहासिक परिदृश्य-

- पहला डाकघर कोलकाता में आरंभ हुआ। इसके बाद तत्कालीन तीन प्रेसिडेंसियों कोलकाता (1774), चेन्नई (1786) और मुम्बई (1793) में जनरल पोस्ट ऑफिस स्थापित हुए। 
- 1837 में भारतीय डाकघर अधिनियम बना। 
- 1854 में अधिक व्यापक  भारतीय डाकघर अधिनियम बना। भारत के ब्रिटिश क्षेत्रों में डाक ढुलाई का एकाधिकार डाकघरों को इसी के बाद मिला। 
- वर्तमान डाक प्रणाली भारतीय डाकघर अधिनियम, 1854 के साथ अस्तित्व में आई। 
- इसी के साथ रेल डाक सेवा तथा भारत से ग्रेट ब्रिटेन और चीन तक एक समुद्री डाक सेवा प्रारंभ हुई। 
- 'एक विश्व-एक डाक प्रणाली' की अवधारणा को साकार करने हेतु 9 अक्टूबर, 1874 को 'यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन' की स्थापना बर्न, स्विटजरलैण्ड में की गई, जिससे विश्व भर में एक समान डाक व्यवस्था लागू हो सके। भारत प्रथम एशियाई राष्ट्र था, जो कि 1 जुलाई 1876 को इसका सदस्य बना। 
- इसके बाद भारतीय डाकघर अधिनियम 1898 पारित हुआ, जिसके बाद डाक सेवाओं को विनियमित किया गया। 
- वर्ष 1969 में टोकियो, जापान में सम्पन्न यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन कांग्रेस में यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन' के स्थापना दिवस को "विश्व डाक दिवस" के रूप में मनाने हेतु घोषित किया गया।  तब से पूरी दुनिया में  इस दिन को प्रतिवर्ष धूमधाम मनाया जाता है। विश्व डाक दिवस के क्रम में ही भारत में पूरे सप्ताह को राष्ट्रीय डाक सप्ताह के रूप में मनाया जाता है। 
-इस प्रकार डाक  विभाग का यह सफर तय हुआ और एक अक्टूबर, 2018 को डाक विभाग ने अपने 164 साल पूरे किए। 
कभी अंग्रेजों का थियेटर हुआ करता था हजरतगंज स्थित लखनऊ जीपीओ 
(साभार : दैनिक हिंदुस्तान, लखनऊ, 9 अक्टूबर 2018)


लाल डिब्बे जो गुमनाम गलियों से घर तक पहुंचाते थे-
डाक विभाग के लाल डिब्बे (लेटर बाक्स) बेतरतीब हमें मोहल्लों के भीतर गुमनाम गलियों से घरों तक ले जाते थे। एक समय था जब लोग कहते थे कि फलां जगह पहुंचकर तीन कदम चलकर लाल डिब्बे से दायें मुड़ते ही 10 कदम पर मेरा मकान दिखेगा। पहले डाकिए भी लोगों का पता मुंहजुबानी याद रखते थे। लेकिन, 15 अगस्त 1972 से पिन कोड सिस्टम लागू होने के बाद यह थोड़ा मुश्किल हो गया। वहीं, दादा-दादी, नाना-नानी का हाथ पकड़कर लाल डिब्बे तक जाना भी धीरे-धीरे गुम हो गया। वर्तमान में अब चिटि्ठयां ऑनलाइन जा रही है। सोशल मीडिया का प्रभाव बढ़ने से लाल डिब्बे लुप्त होते गए। 

कई महान विभूतियाँ रही हैं डाकघर में -

साइकिल से गली-गली घूमकर घंटियां बजाकर चिटि्ठयां पहुंचाने वाले इन डाक बाबू को कम मत आंकिए। कई महान हस्तियां भी डाक विभाग से जुड़ी है। जिन्होंने चिटि्ठयां बांटने से लेकर बाबू तक का काम किया। अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन पोस्टमैन थे तो ब्रिटिश  भारत के वायसराय लार्ड रीडिंग भी डाक विभाग से जुड़े थे। फिल्म निर्माता राजेंद्र सिंह बेदी से लेकर देवानंद भी डाक विभाग में काम कर चुके हैं। मुंशी प्रेमचंद के पिता डाक विभाग में क्लर्क थे। पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के पिता भी डाक-तार विभाग में  कर्मचारी थे । 

मात्र 25 से 50 पैसे में मिलने वाले पोस्टकार्ड की कितनी अहमियत है इससे ही पता चलता है कि अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह में एक डाक  को बांटने के लिए डाकिया आज भी एक आईलैंड से दूसरे आईलैंड का सफर तय करता है। डाक से भेजे जाने वाला एक-एक सन्देश बहुत अहम होता है। डाक विभाग निरंतर बदलते परिवेश के साथ अपने को ढालने का काम कर रहा है। 
कृष्ण कुमार  यादव, निदेशक डाक सेवाएं, लखनऊ (मुख्यालय) परिक्षेत्र।


विश्व डाक दिवस पर विशेष : लफ्जों में छिपे जज्बात बयां करते थे ख़त 
(साभार : दैनिक जागरण, लखनऊ, 9 अक्टूबर 2018)

Friday, September 23, 2016

संचार के सबसे पुराने माध्यम 'लेटर बॉक्स' का नवीनतम माध्यम 'स्मार्ट फोन' से हुआ मिलन

लेटर बॉक्स किसी परिचय का मोहताज नहीं है। सड़क के किनारे, लाल रंग का एक बॉक्स, जो बिना किसी मौसम की परवाह किये हम-सभी के सुख-दुःख को आगे बढ़ाता है। पत्र, खत या चिट्ठी जो भी कहें,  कभी संचार का पर्याय माना जाता था यह लाल बॉक्स।  पर जैसे-जैसे टेक्नॉलाजी बदलती गई, लोग इसे भी भूलते गए।  पर लेटर बॉक्स अभी भी वहीं पर है।  हो सकता है, इसमें पड़ने वाली चिट्ठियों की संख्या कम हो गई हो, पर यह अभी भी लोगों की सेवा करने के लिए तत्पर है।  तभी तो लोग यह शिकायत लेकर आते हैं कि हमारे इलाके का लेटर बॉक्स कई दिनों से नहीं खुल रहा है या हमारे क्षेत्र में भी एक लेटर बॉक्स लगवा दीजिये। 

 लेटर बॉक्स लोगों के स्टेट्स का भी प्रतीक है। जिनके घर के सामने लेटर बॉक्स लगे होते हैं, वे लोगों को सगर्व बताते हैं कि लेटर बॉक्स के सामने वाला घर ही तो हमारा है या लेटर बॉक्स वाली गली से मुड़ लीजियेगा। पत्र लेखन की विधा को जिन्दा रखने में लेटर बॉक्स का बड़ा महत्व है।  न जाने कितनी खट्टी-मीठी यादें अपने में सहेजे हुए है लेटर बॉक्स। खुशामदी से लेकर शिकवा-शिकायत तक को अपने में सहेज कर रखता है। 

मुझे एक घटनाक्रम याद आता है, जब हर सुबह डाकिया लेटर बॉक्स से पत्र निकलने जाता तो उसे सिंदूरी रंग से रँगा हुआ और फूलों के हार के साथ पाता। जब यह लंबे समय तक यह होता रहा तो डाकिया ने एक दिन ठान ही लिया कि इसका पता लगाकर रहेगा। भोर में ही वह वहां छुपकर बैठ गया।  कुछ देर बाद देखा कि एक महिला वहां आकर लेटर बॉक्स को सिंदूरी रंग से पोतकर उस पर फूल चढ़ा रही है।  वह दौड़कर उस महिला के पास  गया और इसका कारण पूछा तो उस महिला का मासूम जवाब सुनकर डाकिया भी हतप्रभ रह गया-" यह लेटर बॉक्स तो हमारे लिए हनुमान जी का रूप है। इसमें हम परदेश  में रह रहे अपने पिया को चिट्ठी डालते हैं और यह हनुमान जी की तरह उनके पास पहुँचा आता है। मुझे अपने पिया से यह जोड़ता है।" 

खैर, वक़्त के साथ कदमताल करते हुए डाक विभाग अब लेटर बॉक्स को भी स्मार्ट बना रहा है। अब लेटर बॉक्स से पत्रों की निकासी को साफ्टवेयर आधारित मोबाईल एप 'नन्यथा' (Nanyatha) से जोड़कर  इसे नई टेक्नालॉजी से जोड़ा जा रहा है।  इसी क्रम में पिछले दिनों कई प्रधान डाकघरों में इसके शुभारम्भ के लिए जाना हुआ। फूल-माला से सजे-धजे लेटर बॉक्स अपनी अलग ही रंगत बिखेर रहे थे। स्टाफ के लोगों का कहना था कि डाक विभाग की सबसे बड़ी पहचान लेटर बॉक्स हैं, पर उन्होंने पहली बार इसे फूलों से इतना सजा-धजा और सुवासित देखा। डाकघर आने वाले लोग और रोड से गुजर रहे भी एकबारगी ठिठक कर इस पुष्पहार से सुसज्जित लेटर बॉक्स को जरूर देखते। कोई पूछता कि क्या आज लेटर बॉक्स का जन्मदिन है तो नई पीढ़ी के लोग इसके साथ शान से अपनी सेल्फी लेते। ...... आखिर, संचार के  सबसे पुराने माध्यम 'लेटर बॉक्स' का नवीनतम माध्यम 'स्मार्ट फोन' से मिलन जो हो रहा था। 


रीयल टाइम आधारित और जीपीएस से लैस इस सॉफ्टवेयर के माध्यम से जहाँ लेटर बॉक्स से पत्रों की निकासी की नियमित मॉनिटरिंग हो सकेगी, वहीं आम जन भी http://www.appost.in/nanyatha/ वेबसाइट पर जाकर अपने क्षेत्र के लेटर बॉक्स की अवस्थिति के साथ-साथ यह देख सकेंगे कि उनके क्षेत्र का लेटर बॉक्स प्रतिदिन नियमित रूप से खुलता है या नहीं और इसमें से कितने पत्र निकलते हैं। पारदर्शिता के साथ-साथ इससे डाक विभाग को लेटर बाक्सों के औचित्य स्थापन में भी सुविधा मिलेगी।



इसके तहत हर लेटर बॉक्स के अंदर 12 अंकों  का यूनिक बार कोड लगाया जायेगा, जिसमें प्रारम्भिक 6 अंक पिनकोड को दर्शायेंगे। डाककर्मी किसी भी लेटर बॉक्स से पत्रों की निकासी करेगा तो पहले वह अपने पास स्थित एंड्रायड बेस्ड स्मार्ट मोबाइल फोन में  स्थित 'नन्यथा एप' से उस लेटर बॉक्स के बार कोड को स्कैन करके उसमें निकले  कुल पत्रों की संख्या को उसी स्थान से अपलोड करेगा | इससे लेटर बॉक्स की लोकेशन सहित पत्रों की संख्या व निकासी की तारीख और समय सॉफ्टवेयर के माध्यम से तुरंत अपलोड हो जायेगा।

Tuesday, November 4, 2014

प्रधानमंत्री मोदी, चिठ्ठियाँ और मन की बात

चिट्ठियाँ भला किसे नहीं भातीं।  न शब्दों की बंदिश और न एक ही बार लिखने का झंझट।  चिट्ठियों के माध्यम से तो भाव भी अक्षर (जिसका क्षय नहीं होता) हो जाते हैं। उन अक्षरों को पढ़कर चिट्ठी पाने वाला लिखने वाले की मन:स्थिति का भी पता लगा लेता था। कभी राजनेताओं से लेकर फ़िल्मी सितारों की फैन-फॉलोइंग उनको प्राप्त चिट्ठियों से आंकी जाती थी। गांधी जी को  तो इतने ज्यादा पत्र प्राप्त होते थे कि वे दोनों हाथ से पत्रों का जवाब लिखा करते थे। देश के किसे भी कोने में मात्र गांधी लिखी चिट्ठियां उन तक डाक विभाग सकुशल पहुंचा देता था। जेल में रहते हुए नेहरू ने इंदिरा गांधी को जो पत्र लिखे, उन्होंने इंदिरा के व्यक्तित्व को गढ़ने में अहम भूमिका निभाई।  इन पत्रों ने न जाने कितने इतिहास रचे और आज भी लाखों रूपये में नीलम होते हैं।  

चिट्ठियां हमारे परिवेश का अभिन्न अंग रही हैं।  लोकगीतों में चिट्ठियों का बड़ा ही सटीक और मार्मिक वर्णन मिलता है। आधुनिक से लेकर पुरातन साहित्य में भी चिट्ठियों के तमाम वर्णन हैं। चिट्ठियाँ तब से लिखी जा रही हैं, जब से सभ्यता का प्रादुर्भाव हुआ होगा और मानव ने लिखना सीखा होगा। माना  जाता है कि रुक्मिणी द्वारा श्रीकृष्ण को लिखी गई चिट्ठी 'विश्व का पहला 'प्रेम पत्र' थी।  लोक गीतों में भी इसका वर्णन बखूबी मिलता  है।

'अंचरा में फाड़ी रु
रुक्मिणी कगजा बनाओल
नयन काजल मसिहान
चारों कोना लिखले
रुक्मिणी छेम कुशलवा
बीचे बीचे रुक्मिणी बयान।'

ऐसी ही न जाने कितने बातें और विरासत इन चिट्ठियों ने सहेज कर रखा है और इन चिट्ठियों के माध्यम से ही वे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक संचारित होती रहती हैं। याद आती हैं हसरत मोहानी की लिखी पंक्तियाँ -

लिक्खा था अपने हाथों से जो तुमने एक बार।
अब तक हमारे पास है वो यादगार खत ।।

वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तकनीक फ्रेंडली हैं । सोशल मीडिया और ई-मेल के माध्यम से लोगों से जुड़े रहते हैं, पर न तो हर कोई मेल करता है और न हर किसी का सोशल मीडिया पर एकाउंट है।  भारत जैसे देश में जहाँ अभी भी इंटरनेट की पहुँच बमुश्किल 15 फीसदी है, वहाँ तो पत्रों की अहमियत और भी बढ़ जाती है। ऐसे में लोगों से जुड़ने के लिए पत्र से बेहतर जरिया नहीं हो सकता। 

प्रधानमंत्री मोदी कितने ही टेक सेवी हों पर दूसरी तरफ यह भी एक सच्चाई है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके नाम आने वाली चिट्ठियों की आमद ने नए रिकार्ड बना दिए हैं। जुलाई के बाद से हर महीने प्रधानमंत्री मोदी के नाम औसतन डेढ़ लाख चिट्ठियाँ आ रही हैं। लोग अमूमन पाँच हजार पत्र प्रतिदिन मोदी को भेज रहे है। कभी-कभी यह आँकड़ा दस हजार तक पहुँच जाता है। 

राजधानी  दिल्ली के निर्माण भवन स्थित पोस्ट आॅफिस  यूँ तो पहले भी अतिविशिष्ट व्यक्तियों के लिए आने वाली चिट्ठियों  के लिए जाना जाता रहा है। लुटियन जोन स्थित अहम मंत्रालयों और अतिविशिष्ट व्यक्तियों के नाम की चिट्ठी भी इसी डाकखाने से जाती है। लेकिन जुलाई 2014 के बाद से यहाँ प्रधानमंत्री के नाम चिट्ठियों की बाढ़ सी आ गई है। जहाँ पूर्व प्रधानमंत्री  मनमोहन सिंह के कार्यकाल में प्रतिदिन करीब पांँच सौ से एक हजार चिट्ठियाँ आती थीं वहीँ  मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद इसमें कई गुना इजाफा हुआ है।  आमतौर पर सुबह 11 बजे छंटनी कर डाक पीएमओ  भेज दी जाती है। लेकिन कई बार दिन में दो बार भी चिट्ठियां पीएमओ पहुँचानी पड़ती हैं। चिट्ठियों की आवक देखते हुए डाक विभाग ने भी मुकम्मल इंतजाम किए हैं । प्रधानमंत्री के नाम आने वाले पत्रों की छंटाई और कंम्प्यूटर वर्गीकरण समेत अन्य इंतजामो को चुस्त करने के लिए दो सितंबर को पीएमओ और डाक विभाग के अधिकारियों के बीच एक बैठक भी हुई थी। 

दरअसल प्रधानमंत्री मोदी जनता से सीधे संवाद पर खासा जोर देते हैं। उन्होंने तीन अक्टूबर को ’मन की बात’ कार्यक्रम के जरिए जनता से रेडियो संवाद की परंपरा शुरू की थी। साथ ही लोगों को सरकार के साथ अपने अनुभव, शिकायतें ई-मेल व पत्रों  के जरिए भेजने को प्रोत्साहित भी किया था। प्रधानमंत्री ने जनता से मिले पत्रों और उनकी बातें पंसद आने पर अपने रेडियो संवाद में शामिल करने का भी वादा किया था। ऐसे में लोगों  ने भी अपने मन की बात देश के मुखिया  को चिट्ठियों के माध्यम से भेजनी आरम्भ कर दी। प्रधानमंत्री के नाम आने वाले पत्रों में जहाँ बड़ी संख्या सामाजिक संगठनों की है, वहीं दूर-दराज के गाँवों से आ रहे पत्रों की तादाद भी कम नहीं है। इंटरनेट के इस दौर में डाक से आ रही चिट्ठियों की संख्या डाक विभाग के लिए भी उत्साहजनक है, वहीं एक ख़त्म होती विधा 'पत्र लेखन' को जीवंत करने का प्रयास भी।

- कृष्ण कुमार यादव
निदेशक डाक सेवाएँ, 
इलाहाबाद परिक्षेत्र, इलाहाबाद -211001 

Monday, April 1, 2013

चिट्ठी मनोभावों की संवाहिका

वह चिट्ठी थी मेरी बुआ की। मेरी दादी को मालूम था कि उनके द्वारा बेटी के यहां भेजे गए पकवान, चूड़ा, दही और साड़ी-चूड़ी-सिन्दूर को पहुंचाकर लगन महतो बेटी की चिट्ठी लेकर आएगा। घर में मेरे पिताजी, भैया, भाभी और मैं भी तो पढ़ी-लिखी थी। पर दादी बार-बार भाभी को अपने पास बुलातीं। कहतीं-'देख! जब रामलगन वापस आ जाए तो तुम मुझे सुशीला की चिट्ठी पढ़कर सुनाना। किसी काम का बहाना मत करना।'

 भाभी हंसतीं और कहतीं-'हां-हां, मैं सब काम छोड़कर पहले बुआ जी की चिट्ठी पढूंगी। पहले रामलगन को लौटने तो दीजिए।'
दादी द्वारा इंतजार करवाकर ही लगन लौटा था। दरवाजे स्थित कुएं पर बैठी दादी दातून कर रही थीं। नजर सड़क पर ही थी। रामलगन को आते देख वे दातून फेंककर रामलगन के साथ आंगन में आ गईं। भाभी को पुकारा। वे नाश्ता कर रही थीं। नाश्ता छोड़कर ही आ गईं। भला बेटी की चिट्ठी जो आई थी।
उन्हें चिट्ठी थमा कर बोलीं-'चलो! मेरी खटिया पर बैठो। मुझे चिट्ठी सुनाओ। जल्दबाजी मत करना।'
भाभी ने चिट्ठी खोली। उस पर पानी के दो चार बूंदों के दाग थे। दादी ने देखा। बोलीं-'देख! चिट्ठी लिखते समय सुशीला जरूर रोई होगी। उसके आंसू की ही बूंदें हैं।' और इतना कहकर दादी स्वयं आंचल से अपनी आंखें पोंछने लगीं। भाभी ने चिट्ठी पढ़नी प्रारंभ की। प्रारंभ में घर का कुशलक्षेम था। उसके बाद घर के सभी बड़े सदस्यों का नाम (रिश्ता) लेकर प्रणाम और एक-एक बच्चे को नाम से आशीष! एक बड़ी दादी और सबसे छोटे ननका का नाम छूट गया था। दादी बोल पड़ीं-'जल्दबाजी में होगी न। खाना बनाना, परोसना, खेतीबाड़ी का काम देखना, उस पर गोद का बच्चा।'
भाभी ने पूछा-'अब मैं आगे पढूं?'
'हां, हां पढ़ो दुलहिनिया। जुग-जुग जिओ। तुम्हारा सुहाग बना रहे।'
भाभी आशीर्वाद ग्रहण कर पढ़ना प्रारंभ करतीं। गाय, बैल, बगीचे के साथ पड़ोस की घटनाओं की भी चर्चा थी। सुशीला बुआ ने अपने पति की भी शिकायत लिखी थी। उन्होंने गांजा पीना शुरू कर दिया था। फिर क्या था। दादी का रोनाधोना प्रारंभ। एक घंटे में अनेक रुकावटों और दादी की समीक्षा के बाद चिट्ठी का वाचन समाप्त होता। दादी, उस कागज के पन्ने को ऐसे सहेजतीं-संभालतीं मानो अपनी नन्हीं बिटिया की तेल मालिश करके सुला रही हों। उस पन्ने को उलटतीं, पुलटतीं, सहलातीं, मोड़तीं, खोलतीं अपने बेटी के जन्म से लेकर विवाह तक के प्रसंगों के पन्ने पलट लेतीं।
भाभी को मालूम रहता कि उन्हें और कई बार चिट्ठी पढ़नी पड़ेगी। पढ़ने भर से काम नहीं चलता। भाभी को चिट्ठी लिखनी भी पड़ती।
चिट्ठी पत्री के आगमन और प्रस्थान की प्रक्रिया स्मरण करती हूं तो उसके लिखे जाने का अनुष्ठान सामने जीवंत हो उठता है। चिट्ठी लिखने की प्रक्रिया में ही साहित्य के नौ रसों का रसास्वादन हो जाता था। चिट्ठी सबसे पहले तो मन पर लिखी जाती थी। अधिकतर लोग निरक्षर होते थे। घर या मुहल्ले में एक दो व्यक्ति ही पढ़े-लिखे। उन पर ही चिट्ठी लिखने और पढ़ने की जिम्मेदारी होती थी। एक बार कह देने पर कोई चिट्ठी लिखने नहीं बैठ जाता था। चिट्ठी लिखना प्रारंभ करने से पूर्व लिखने वाला जितना साधक की मन:स्थिति में आता था उतना ही लिखवाने वाला या वालियां भी।
दोनों आमने-सामने बैठ जाते। लिखवाने वाला कहता था-'सबसे पहले लिखने वाली बात सब लिख जाओ।' फिर घर से लेकर गांव के सभी लोगों का नाम ले-लेकर आशीष या प्रणाम लिखवाया जाता था। घर के समाचारों में भैंस, गाय के बच्चे देने और उनमें से किसी किसी के मरने से लेकर खेतों की फसलों और बाढ़-सुखाड़ का भी वर्णन। फिर अपने मन का वर्णन। लिखने वाला उन समाचारों और भावों के संक्षेपण में सिद्धस्थ होता था। समाचार के रस के अनुसार लिखवाने वाले भी उन्हीं रसों में डूबे रहते थे। बिलख-बिलख कर रोते हुए लोगों के लम्बे प्रसंगों में से छोटा समाचार छांटना भी सहज काम नहीं होता था। चिट्ठी तैयार करके लिखवाने वाले को सुनाना भी। घंटों की मेहनत से चिट्ठी तैयार होती थी। रसों से लबालब भरी हुई। उसको ले जाने वाला कोई साधारण व्यक्ति तो होगा नहीं। वह असाधारण व्यक्ति होता था डाकिया। उन सभी लोगों की प्रतीक्षा का पात्र, जिनके आत्मीय बाहर रहते थे। अधिकांश वैसे लोगों में चिट्ठियों का आदान-प्रदान होता था जो स्वयं पढ़े-लिखे नहीं होते थे। डाकिए को कहीं-कहीं चिट्ठियां लिखनी भी पड़ती थीं और बांचनी भी। कभी-कभी तो एक बार चिट्ठी सुनाकर डाकिए नहीं जा सकता था। एक ही पत्र को दो तीन बार सुनाना पड़ता था।
डाकिया। वह डाकतार विभाग का सबसे निचले तबके का कर्मचारी नहीं, वह तो घर-घर की समस्याओं से परिचित समाज मन की गहरी समझ रखने वाला पुरुष होता था।
लोग उसके झोले से अपनी चिट्ठी निकलवाने के लिए उसे बाध्य करते थे। उनकी चिट्ठी हो तो डाकिया निकाले। डाकिया गांव का बहुत ही महत्त्वपूर्ण सदस्य होता था और डाक व्यवस्था की पूछिए मत। चिट्ठियों में भरे भावों और समाचारों के वजन का आकलन ही नहीं किया जा सकता।
चिट्ठियों के भी कई प्रकार होते हैं। चिट्ठियां समाचारवाहिका तो होती ही हैं, वे प्रेम की संवाहिका भी होती हैं, जिसे पाते ही हमारी पांचों ज्ञानेन्द्रियां सक्रिय हो जाती हैं। आंखें देखकर तृप्त होती हैं। कान सुनकर। त्वचा स्पर्श कर रोमांचित होती है, वहीं जिह्वा पर भी खट्टा-मीठा स्वाद तिर आता है। चिट्ठियों की सुगंध भी होती है। पांचों ज्ञानेन्द्रियों को सक्रिय करती चिट्ठियां लम्बे समय का संदेश दे जाती हैं।
हमारे लोकगीतों में चिट्ठियों का बड़ा ही सटीक और मार्मिक वर्णन मिलता है। पुरातन साहित्यों में भी चिट्ठियों के वर्णन हैं। आज भले ही चिट्ठियां डाक व्यवस्था के माध्यम से जाती हैं। हर काल में डाक व्यवस्था तो थी, उनके रूप भिन्न थे। कहा जाता है कि रुक्मिणी द्वारा श्रीकृष्ण को लिखी गई चिट्ठी 'विश्व का पहला 'प्रेम पत्र' थी। लोक गीतों में उसका वर्णन भी है।

'अंचरा में फाड़ी रु

रुक्मिणी कगजा बनाओल

नयन काजल मसिहान

चारों कोना लिखले

रुक्मिणी छेम कुशलवा

बीचे बीचे रुक्मिणी बयान।'

और उस चिट्ठी को पढ़कर ही कृष्ण रुक्मिणी का अपहरण करते हैं। वह शिशुपाल से ब्याही जाने से बच जाती हैं। अपने यहां डाक व्यवस्था द्वारा भेजी गई चिट्ठियों को सहेज कर रखने और समय-समय पर निकालकर पढ़ने, पढ़वाने का भी रिवाज रहा है।
डाक व्यवस्था की अहमियत तो आज भी है। कम्प्यूटरीकरण में मोबाइल और ईमेल के कारण चिट्ठी लिखने का अभ्यास छूट रहा है। अपना कोई सात समंदर पार हो या सात मील दूर, मोबाइल ही भावों का संवाहक बन गया है। पर चिट्ठियों के माध्यम से तो भाव भी अक्षर (जिसका क्षय नहीं होता) हो जाते हैं। उन अक्षरों को पढ़कर चिट्ठी पाने वाला लिखने वाले की मन:स्थिति का भी पता लगा लेता था।
ससुराल भेजने के पूर्व बेटियों को कम से कम चिट्ठी लिखना-पढ़ना सिखा दिया जाता था, ताकि वह ससुराल में मिल रहे सुख-दु:ख के भाव चिट्ठियों द्वारा भेज सके। अब तो वे कम्प्यूटर इंजीनियर हो रही हैं। अंतरिक्ष में गईं बेटियों को डाक व्यवस्था से क्या लेना देना। बावजूद इसके उन बेटे और बेटियों की संख्या आज भी कम नहीं जो चिट्ठियां लिखवातीं या लिखती हैं। उन्हें अपनों की चिट्ठियों का इंतजार रहता है। डाक व्यवस्था तो चाहिए ही। संवेदनशील डाकिए भी।

Sunday, April 5, 2009

दुनिया का प्रथम प्रेम-पत्र

हममें से हर किसी ने अपने जीवन में किसी न किसी रूप में प्रेम-पत्र लिखा होगा। प्रेम-पत्रों का अपना एक भरा-पूरा संसार है। प्रेम जैसी अनुपम भावना को व्यक्त करने के लिए शब्द सचमुच नाकाफी होते हैं। दुनिया की तमाम मशहूर शख्सियतों ने प्रेम-पत्र लिखे हैं- फिर चाहे वह नेपोलियन हों, अब्राहम लिंकन, क्रामवेल, बिस्मार्क या बर्नाड शा हों। आज ये पत्र एक धरोहर बन चुके हैं। ऐसे में यह जानना अचरज भरा लगेगा कि दुनिया का सबसे पुराना प्रेम पत्र बेबीलोन के खंडहरों से मिला था। बेबीलोन की किसी युवती का प्रेमी अपनी भावनाओं को समेटकर उससे जब अपने दिल की बात कहने बेबीलोन तक पहुँचा तो वह युवती तब तक वहां से जा चुकी थी। वह प्रेमी युवक अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाया और उसने वहीं मिट्टी के फर्श पर खोदते हुए लिखा- ''मैं तुमसे मिलने आया था, तुम नहीं मिली।'' यह छोटा सा संदेश विरह की जिस भावना से लिखा गया था, उसमें कितनी तड़प शामिल थी। इसका अंदाजा सिर्फ वह युवती ही लगा सकती थी जिसके लिये इसे लिखा गया। भावनाओं से ओत-प्रोत यह पत्र ईसा से बहुत पहले का है और इसे ही दुनिया का प्रथम प्रेम पत्र माना जाता है।