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Monday, May 23, 2022

पहली बार न जाने किसने मुझको ऐसा पत्र लिखा...

 पहली बार न जाने किसने, मुझको ऐसा पत्र लिखा,

अपनेपन का संबोधन दे, मुझको अपना मित्र लिखा।


उसने लिखा कि प्रियवर मेरे

 धीरज अपना मत खोना,

मिलते ही एकांत कहीं पर

फूट-फूट कर मत रोन।


जन्म-जन्म के संबंधों का ब्योरा बहुत विचित्र लिखा,

पहली बार न जाने किसने मुझको ऐसा पत्र लिखा। 


फिर यह लिखा कि मन कन्चन मृग

इसके पीछे मत जाना

सुख-दुःख से ही बना हुआ है

दुनिया का ताना-बाना।


अग्निपरीक्षा जैसा ही कुछ, आंसू भरा प्रपत्र लिखा,

पहली बार न जाने किसने मुझको ऐसा पत्र लिखा।


यह भी लिखा दुःखी मत होना

तुम गीतों में जी लेना,

अपनी पीड़ा घुटन छिपा कर

सारे आंसू पी लेना।


फिर फिर कोने में तिथि अंकित की, घर का नाम पवित्र लिखा

पहली बार न जाने किसने मुझको ऐसा पत्र लिखा।


पढ़कर उसकी व्यथा कथा को

हम उस रात बहुत रोए

सदियां बीत गई हैं तब से

उसके बाद नहीं सोए।

 

जो कुछ लिखा, बहुत गहरा था, जैसे राम-चरित्र लिखा

पहली बार न जाने किसने मुझको ऐसा पत्र लिखा।


- राजकुमारी रश्मि


(साभार : सरस्वती सुमन पत्रिका)

Friday, May 20, 2022

खत लिखूं मैं इक गुलाबी

दिल, अभी यह चाहता है

खत लिखूं मैं इक गुलाबी  


संग सखियों के पुराने

दिन सुहाने याद करना।

और छत पर बैठकर

चाँद से संवाद करना।


डाकिया आता नहीं अब,

ना महकते खत जबाबी।

दिल अभी यह चाहता है

खत लिखूँ मै इक गुलाबी।


सुर्ख मुखड़े के खुशी की

चाँदनी जब झिलमिलाई।

गंध गीली याद की, हिय

प्राण, अंतस में समाई।


सुबह, दुपहर, साँझ, साँसें

गीत गाती हैं खिताबी।

दिल अभी यह चाहता है

खत लिखूँ मै इक गुलाबी।


मौसमी नव रंग सारे

प्रकृति में कुछ यूँ समाये

नेह के आँचल तले, हर

एक दीपक मुस्कुराये।


छाँव बरगद की नहीं, माँ

बात लगती हैं किताबी।

दिल अभी यह चाहता है

खत लिखूँ मैं इक गुलाबी।


 - शशि पुरवार


(साभार : सरस्वती सुमन पत्रिका)

Friday, September 2, 2016

चिट्ठी में है मन का प्यार

चिट्ठियाँ संवेदना की संवाहक हैं, भावनाओं की खूबसूरत अभिव्यक्ति हैं और कई बार जब कहने के लिए शब्द कम पड़ते हैं तो चिट्ठियाँ उसकी भरपाई कर देती हैं। यह सही है कि ई-मेल और सोशल मीडिया के इस दौर में चिट्ठियाँ लिखने की ललक कम हुई है, पर अभी भी इनका प्रचलन कम नहीं हुआ है।  हमारे दिलों के एक कोने में चिट्ठियाँ अभी भी सहेज कर रखी हुई हैं। ये वे चिट्ठियाँ हैं, जो हमसे बातें करती हैं, अपनों की यादों को सहेजती हैं और अतीत से नाता जोड़ती हैं। पिछले दिनों एक पत्रिका पर नजर पड़ी तो यह खूबसूरत कविता पढ़ने का मोह न छोड़ सका और इसे आप सबके साथ भी शेयर कर रहा हूँ -


चिट्ठी में है मन का प्यार, चिट्ठी है घर का अख़बार।
इसमें  सुख-दुख की हैं बातें, प्यार भरी इसमें सौगातें।
कितने दिन, कितनी ही रातें, तय कर आई मीलों पार।
                                            चिट्ठी आई मीलों पार।
यह आई मम्मी की चिट्ठी,  लिखा उन्होंने प्यारी किट्टी!
मेहनत से तुम पढ़ना बेटी, पढ़-लिखकर होगी होशियार।
                                               चिट्ठी आई मीलों पार।
पापा पोस्टकार्ड लिखते हैं, घने-घने अक्षर दिखते हैं।
जब आता हैं बड़ा लिफाफा, समझो चाचा का उपहार।
                                                 चिट्ठी आई मीलों पर।
छोटा-सा कागज बिन पैर, करता दुनिया भर की सैर।
नए-नए संदेश सुनाकर,   जोड़ रहा है दिल के तार।
                                                        चिट्ठी आई मीलों पर।

-गौरी दाधीच, 
माकड़वाली रोड, अजमेर (राजस्थान) 

Tuesday, November 10, 2015

देहरी पर दीप एक जलता रहे


पर्व है पुरुषार्थ का,
दीप के दिव्यार्थ का
देहरी पर दीप एक जलता रहे, 
अंधकार से युद्ध यह चलता रहे
हारेगी हर बार अंधियारे की घोर-कालिमा, 
जीतेगी जगमग उजियारे की स्वर्ण-लालिमा
दीप ही ज्योति का प्रथम तीर्थ है, 
कायम रहे इसका अर्थ, वरना व्यर्थ है
आशीषों की मधुर छांव इसे दे दीजिए, 
प्रार्थना-शुभकामना हमारी ले लीजिए। 
झिलमिल रोशनी में निवेदित अविरल शुभकामना , 
आस्था के आलोक में आदरयुक्त मंगल भावना !!

!! प्रकाश-पर्व दीपावली पर आप सभी को सपरिवार हार्दिक शुभकामनाएँ !!


Monday, October 22, 2012

मुक्तक


मुद्दतों से है भले कंटकों में जिन्दगी
मुझको रूमानी करे रूत गुलाबी आज भी
जोहते ही जोहते इक ज़माना हो गया
डाकिया लाया नहीं खत ज़वाबी आज भी।

यहाँ तक सिर्फ आने में ज़माना बीत जायेगा
उन्हें इक फूल जाने में ज़माना बीत जायेगा
पता करते कि आयी है हमारे प्यार की चिट्ठी
हमें तो डाकख़ाने में ज़माना बीत जायेगा।

किसी ने ख़त मुझे लिक्खा नहीं है
कि चिट्ठी डाकिया देता नहीं है
वो वादा लौटने का कर गये हैं
मगर ऐसा मुझे लगता नहीं है।

कोई मौका नहीं है आशिकी का
गो मौसम आशिकाना लग रहा है
गया है मेरा ख़त, आना है उनका
इसी में इक जमाना लग रहा है।


 -केशव शरण

(केशव शरण का नाम हिंदी-साहित्य में किसी परिचय का मोहताज़ नहीं है. देश की प्राय: अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होने वाले केशव शरण भारतीय डाक विभाग में कार्यरत हैं और सम्प्रति बनारस में पोस्टमास्टर के पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क का पता- एस 2/564 सिकरौल, वाराणसी -221002. मो.बा.- 9415295137)

Thursday, October 18, 2012

चिट्ठी: सच या बहाना

मेरी चिट्ठी
उन्हें नहीं मिली
जाने वे सच कह रहे हैं
या कर रहे हैं बहाना

अगर वे सच कह रहे हैं तो
मुझे खुशी है
मैं शुक्रगुजार हूँ डाकखाने का
हालांकि, मुझे एतबार नहीं है
कि उनके नाम लिखी
मेरी चिट्ठी को
डाकखाना गायब करेगा

अगर वह बहाना बना रहे हैं तो
फिर गंभीर बात है
गंभीर बात है कि
मेरी अगंभीर बातें
उन तक पहुँच गयीं।


- केशव शरण

(केशव शरण का नाम हिंदी-साहित्य में किसी परिचय का मोहताज़ नहीं है. देश की प्राय: अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होने वाले केशव शरण भारतीय डाक विभाग में कार्यरत हैं और सम्प्रति बनारस में पोस्टमास्टर के पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क का पता- एस 2/564 सिकरौल, वाराणसी -221002. मो.बा.- 9415295137)

Friday, October 5, 2012

दो चिट्ठियां...


जीवन की पहली चिट्ठी

मैंने
अपने जीवन की
जो पहली चिट्ठी लिखी
उसे मैं पत्र पेटिका में नहीं डाक सकता था
उसका डाकिया मुझे खुद बनना पड़ा
लेकिन मैं दुनिया का सबसे बे-शऊर डाकिया साबित हुआ
कि उसे हाथ में देने की बजाय
फेंककर पलायित हुआ।


जीवन का आखिरी पत्र

अक्सर
मोबाइल पर
इन्टरनेट पर
सन्देश लिखते हुए
मैं सोचने लगता हूँ कि
मैंने कब लिखा था आखिरी पत्र
अपने जीवन का
और गया था उसे पोस्ट करने
डाकघर.

लगता है
काफी समय गुजर गया है
क्योंकि मुझे कुछ याद नहीं है
यह भी नहीं
कि किसे लिखा था।

- केशव शरण


(केशव शरण का नाम हिंदी-साहित्य में किसी परिचय का मोहताज़ नहीं है. देश की प्राय: अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होने वाले केशव शरण भारतीय डाक विभाग में कार्यरत हैं और सम्प्रति बनारस में पोस्टमास्टर के पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क का पता- एस 2/564 सिकरौल, वाराणसी -221002. मो.बा.- 9415295137)

Thursday, September 6, 2012

मुन्शीराम डाकिया


लेकर पीला पीला थैला,
पत्र बाँटने आता,
यह है मुन्शीराम डाकिया,
सब की चिठ्ठी लाता ।।

सर्दी हो चाहे गर्मी,
पानी गिरता झरझर,
चला जाएगा नही रुकेगा,
चिठ्ठी देता घरघर ।।

बड़े डाकखाने से आता,
लाता कभी रुपैया,
कभी किताबें दे जाता है,
मुझ को हँस हँस भैया ।।

गाँव गाँव जाता है,
पर कभी नहीं है थकता
लाता है सब की खुशखबरी,
सब के मन को भाता ।।

(कभी यह कविता पाठ्य-पुस्तक में पढ़ी थी. इसके रचनाकार का नाम नहीं पता, आपको पता हो तो बताइयेगा)

Thursday, July 19, 2012

कहाँ गई वो चिट्ठियाँ



कहाँ गये वो दिन, जब आती थी चिट्ठियाँ
दुख-सुख का पैगाम, लाती थी चिट्ठियाँ।
दिल से लिखी इबारत, दिल में उतर जाती थी,
लिखने वाले की यादें, तरोताजा कर जाती थी चिट्ठियाँ।
पढ़ते-पढ़ते लिखने वाले की, तस्वीर उभर आती थी,
जब हाल-ए-दिल सुनाकर, बतियाती थी चिट्ठियाँ।
आँसू से लिखी चिट्ठियाँ, नयन डबडबाती थी,
भाव-विहवल कर ऑंखें, बरसाती थी चिट्ठियाँ।
चिट्ठी में लिख हर बात, दिल को छू जाती थीं,
दिल के तार हिलाती, कागज भिगों जाती थी चिट्ठियाँ।
गाँॅव का हाल सुनाकर, गाँव की याद कराती थी
अम्मा-बाबुजी की दुआओ, आशीषों से सहलाती थी चिट्ठियाँ।
खैर-खबर सुनाती नाचती-नचाती, हर्षाती थी,
बावला बनाती थी जब, हाथ में आती थी चिट्ठियाँ।
खुशियो की सौगात, प्यार की बरसात बन जाती थी,
भावनाओं के सागर में, गोते लगाती थी चिट्ठियाँ।
सब्र का बाँध तोड़कर बेकरारों सा बेचैन बनाती थी,
डाकिया का इंतजार करवाती, राह तकवाती थी चिट्ठियाँ।
जिन्हें पढ़ते-पढ़ते हम, खो जाते थे सीने से लगा,
सो जाते थे, ख्यालो-ख्वाबों में डूबाती थी चिट्ठियाँ ।
जिन्हें सहेज रखते थे, मीठी यादों की की तरह-दीवानों को तरह,
नायाब खजानों की तरह, जब संदूक में मिल जाती थी चिट्ठियाँ ।
अपनेपन का अहसास कराती हिचकियों का
राज बताती थी, तकिये के नीचे मिल जाती थी चिट्ठियाँ।
संदेशों का पैगाम सुनाती, बहुत सुकून पहुँचाती थी
जब अम्बा माथे से लगा, सीने से लगाती थी चिट्ठियाँ।
कहाँ गई वे अनमोल चिट्ठियाँ, जो जीने का सहारा बन जाती थी,
प्यार-दुलार जताती, हर्षो-उल्लास, उमंग से भर जाती चिट्ठियाँ।

-महेंद्र कुमार सिरोठिया, 119, मानस भवन,11, आर.एन.टी.मार्ग इंदौर

Saturday, June 16, 2012

तू पूरा जादूगर है डाकिया

रंग-बिरंगे खतों को झोले से
निकाल कर देता है
तू पूरा जादूगर है डाकिया

तू जानता है तेरी
जरा सी लापरवाही
रिश्तों को तोड़ सकती है
मुद्दतों तक किसी का खत
तेरे झोले से नहीं निकलना
तू उसकी मौत
की आहट जान
लेता है डाकिया

मैं जानता हूं जबसे
मोबाइल चल गया है
बहुत से घरों में तेरा
आना-जाना छुट गया है
उस छुटी हुई जगह में
यादों की पुट्टी भरी दुई

डाकिया
तूने प्रेम पत्रों को
परिणय के बंधन तक
पहुँचते देखा है
तू बहुत सी प्रेम गाथाओं
का मौन गवाह है
ईक दूत के रुप में
तेरी भूमिका किसी
महानायक से कम तो नही
माना कि खुशखबरी लाने पर
किसी ने राजाओं की तरह
अपने गले का हार तुझे तोड़
कर नहीं दिया पर वो एहसान मंद हो
ये एहसान भी कम तो नहीं

डाकिया
शहर फैलते जा रहे है
झोले खाली ही रहते है
लोग खत से हाल चाल
नहीं लेते
बदलते वक्त की चाल से
डाकिया हार ना जाये
वो हारा तो कई जिंदगी
भी हार सकती है
तू नहीं बल्कि ईक पूरा
इतिहास हार जायेगा
वो भी उन चंद पूंजीपति
टेलीकाम कंपनियों से
जिनका खुद का कोई
इतिहास नहीं।

इस इतिहास को बचाने के लिए
कुछ खत लिखो
खत तुम्हें भी ऐतिहासिक
बनाते हैं
वो सम्बंधों के मौन गवाह है
खत किसी भी प्रलोभन में
अपने बयान नहीं बदलेगे
वो हवा से उड़के
तुम्हारे पैरो में गिर भी जाये
तो भी गर्व से भरे ही रहेंगे
उन्हें तुमनतमस्तकसमझने की
भूल मत करना !!

--आलोक तिवारी
रत्ना निवास, पाठक वार्ड, कटनी (मध्य प्रदेश)

Tuesday, June 5, 2012

डाकिया का आगमन

अब कम ही दिखाई देता है डाकिया
जो रोज-रोज आता था घंटी बजाता था
ढेरों चिट्ठियां बिखेर जाता था
घर-आंगन में अब कम ही दिखाई
देता है डाकिया

उसका आगमन हमारे अरमानों,
खुशियों का आगमन था
उसका आगमन दोस्त-रिश्तेदारों की
खबरों का आगमन था,
उसका आगमन बिटिया की चिट्ठी
उसके सुख-दुख की खबर होती थी,
उसका आगमन बेटे की चिट्ठी होती थी
जो दूर शहर में पढ़ता था
उसका आगमन मां-बाबा की
खुशियों का आगमन था
जो बेटे-बेटियों की चिट्ठियों से
खुश हो लेते थे
उसका आगमन भाई-बहन का
प्यार होता था
उसका आगमन बेटे की नौकरी
लगने की खबर होती थी
उसका आगमन होती थी
होली, दिवाली, ईद की शुभकामनाएं
पर अब कम ही दिखाई देता है
डाकिया

मेरी उम्र के साथ बुढ़ा गया लगता है
डाकिया
बुढ़ा गई लगती हैं भावनाएं-संवेदनाएं
तभी तो अब कम ही दिखाई देता है
डाकिया
बारिश की फुहार की तरह
आज भी जब कभी कर जाता है
डाकिया

चिट्ठी-पत्री की फुहार घर-आंगन में
तो माटी की सौंधी गंध घुल जाती है
वातावरण में हो जाता है तरोताज़ा तन-मन
अब कम ही दिखाई देता है
डाकिया
जो रोज-रोज आता था घंटी बजाता था
ढेरों चिट्ठियां बिखेर जाता था
घर-आंगन में।

साभार

Friday, April 20, 2012

ये ख़त है




ये ख़त है
जो कभी
तुमने लिखे थे
मुझको.

उसका अक्षर-अक्षर
तेरा अक्श बन
उभर आता है
आज भी
मेरे जेहन में
चाहे-अनचाहे.

क्योंकि
इन खतों में हैं
कुछ हँसते,
खिल-खिलाते पल,
कुछ सिसकते,
सहलाते पल.
बांटा था जिन्हें
हमने
आपस में
मिल-बैठ कर.

इन पलों में
आज भी
सिमटी है
तुमसे मिलने की चाह,
न मिल पाने का गम
दूर रहकर भी
पास होने का भ्रम
जो पलता रहा है,
बढ़ता रहा है
सदा
साथ-साथ

तेज होती
धडकनों के साथ
पलती है
प्यार की तपिश
जो देती है
झुलसने का अहसास.

ये सब सिलवटें हैं
शब्दों के घरौंदे
घरौंदा
जो घर हो गया है
बीती बातों का,
आशाओं का,
अरमानों का,
धड़कनों में छिपी
विवशता का,
बैचैनी का
टूटते-बनते रिश्तों का.

मेरे-तुम्हारे होने का
एक-दूसरे से अलग
एक-दूसरे के साथ
जीवनपर्यंत
एक सिलसिला बनकर.

- राजीव पुष्पराज
rajivpushpraj@gmail.com

Sunday, December 4, 2011

हाइकु-दिवस : कृष्ण कुमार यादव के डाक-हाइकु

डाक-टिकट घूमे सारी दुनिया रंग-बिरंगे। छुपी हुई हैं पत्रों की दुनिया में संवेदनाएं। रिश्तों की उष्मा पत्रों से पिघलती मौन टूटता। हस्तलिखित शब्दों की ये दुनिया गुनगुनाती। ( हाइकु हिंदी-साहित्य में तेजी से अपने पंख फ़ैलाने लगा है. कम शब्दों (5-7-5)में मारक बात. भारत में प्रो० सत्यभूषण वर्मा का नाम हाइकु के अग्रज के रूप में लिया जाता है. यही कारण है कि उनका जन्मदिन हाइकु-दिवस के रूप में मनाया जाता है. आज 4 दिसम्बर को उनका जन्म-दिवस है, अत: आज ही हाइकु दिवस भी है। इस बार हाइकुकार इसे पूरे सप्ताह तक (4 दिसम्बर - 11 दिसम्बर 2011 तक) मना रहे हैं. इस अवसर पर मेरे कुछ डाक सम्बंधित हाइकु !!) *******************************
कृष्ण कुमार यादव : 10 अगस्त, 1977 को तहबरपुर, आजमगढ़ (उ. प्र.) में जन्म. आरंभिक शिक्षा जवाहर नवोदय विद्यालय, जीयनपुर-आजमगढ़ में एवं तत्पश्चात इलाहाबाद विश्वविद्यालय से वर्ष 1999 में राजनीति शास्त्र में परास्नातक. वर्ष 2001 में भारत की प्रतिष्ठित ‘सिविल सेवा’ में चयन। सम्प्रति ‘भारतीय डाक सेवा’ के अधिकारी। सूरत, लखनऊ और कानपुर में नियुक्ति के पश्चात फिलहाल अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में निदेशक पद पर आसीन।
प्रशासन के साथ-साथ साहित्य, लेखन और ब्लाॅगिंग के क्षेत्र में भी प्रवृत्त। कविता, कहानी, लेख, लघुकथा, हाइकू, व्यंग्य एवं बाल कविता इत्यादि विधाओं में लेखन. देश की प्राय: अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं - समकालीन भारतीय साहित्य, नया ज्ञानोदय, कादम्बिनी, सरिता, नवनीत, वर्तमान साहित्य, आजकल, इन्द्रप्रस्थ भारतीय, उत्तर प्रदेश, मधुमती, हरिगंधा, हिमप्रस्थ, गिरिराज, पंजाब सौरभ, अकार, अक्षर पर्व, अक्षर शिल्पी, युग तेवर, शेष, अक्सर, अलाव, इरावती, उन्नयन, भारत-एशियाई साहित्य, दैनिक जागरण, जनसत्ता, अमर उजाला, राष्ट्रीय सहारा, स्वतंत्र भारत, अजीत समाचार, लोकायत, शुक्रवार, इण्डिया न्यूज, द सण्डे इण्डियन, छपते-छपते, प्रगतिशील आकल्प, युगीन काव्या, आधारशिला, साहिती सारिका, परती पलार, वीणा, पांडुलिपि, समय के साखी, नये पाठक, सुखनवर, प्रगति वार्ता, प्रतिश्रुति, झंकृति, तटस्थ, मसिकागद, शुभ तारिका, सनद, चक्रवाक, कथाचक्र, नव निकष, हरसिंगार, अभिनव कदम, सबके दावेदार, शिवम्, लोक गंगा, आकंठ, प्रेरणा, सरस्वती सुमन, संयोग साहित्य, शब्द, योजना, डाक पत्रिका, भारतीय रेल, अभिनव, प्रयास, अभिनव प्रसंगवश, अभिनव प्रत्यक्ष, समर लोक, शोध दिशा, अपरिहार्य, संवदिया, वर्तिका, कौशिकी, अनंतिम, सार्थक, कश्फ, उदंती, लघुकथा अभिव्यक्ति, गोलकोंडा दर्पण, संकल्य, प्रसंगम, पुष्पक, दक्षिण भारत, केरल ज्योति, द्वीप लहरी, युद्धरत आम आदमी, बयान, हाशिये की आवाज, अम्बेडकर इन इण्डिया, दलित साहित्य वार्षिकी, आदिवासी सत्ता, आश्वस्त, नारी अस्मिता, बाल वाटिका, बाल प्रहरी, बाल साहित्य समीक्षा इत्यादि में रचनाओं का प्रकशन।
इंटरनेट पर विभिन्न वेब पत्रिकाओं-अनुभूति, अभिव्यक्ति, सृजनगाथा, साहित्यकुंज, साहित्यशिल्पी, लेखनी, कृत्या, रचनाकार, हिन्दी नेस्ट, हमारी वाणी, लिटरेचर इंडिया, कलायन इत्यादि इत्यादि सहित ब्लॉग पर रचनाओं का निरंतर प्रकाशन. व्यक्तिश: 'शब्द-सृजन की ओर' और 'डाकिया डाक लाया' एवं युगल रूप में सप्तरंगी प्रेम, उत्सव के रंग और बाल-दुनिया ब्लॉग का सञ्चालन. इंटरनेट पर 'कविता कोश' में भी कविताएँ संकलित. 50 से अधिक पुस्तकों/संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित. आकाशवाणी लखनऊ, कानपुर व पोर्टब्लेयर, Red FM कानपुर और दूरदर्शन पर कविताओं, लेख, वार्ता और साक्षात्कार का प्रसारण।
अब तक कुल 5 कृतियाँ प्रकाशित- 'अभिलाषा' (काव्य-संग्रह,2005) 'अभिव्यक्तियों के बहाने' व 'अनुभूतियाँ और विमर्श' (निबंध-संग्रह, 2006 व 2007), 'India Post : 150 Glorious Years' (2006) एवं 'क्रांति-यज्ञ : 1857-1947 की गाथा' . व्यक्तित्व-कृतित्व पर 'बाल साहित्य समीक्षा' (सं. डा. राष्ट्रबंधु, कानपुर, सितम्बर 2007) और 'गुफ्तगू' (सं. मो. इम्तियाज़ गाज़ी, इलाहाबाद, मार्च 2008) पत्रिकाओं द्वारा विशेषांक जारी. व्यक्तित्व-कृतित्व पर एक पुस्तक 'बढ़ते चरण शिखर की ओर : कृष्ण कुमार यादव' (सं0- दुर्गाचरण मिश्र, 2009) प्रकाशित. सिद्धांत: Doctrine (कानपुर) व संचार बुलेटिन (लखनऊ) अंतराष्ट्रीय शोध जर्नल में संरक्षक व परामर्श सहयोग। ‘साहित्य सम्पर्क’ (कानपुर) पत्रिका में सम्पादन सहयोग। ‘सरस्वती सुमन‘ (देहरादून) पत्रिका के लघु-कथा विशेषांक (जुलाई-सितम्बर, 2011) का संपादन। विभिन्न स्मारिकाओं का संपादन।
विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक-सामाजिक संस्थानों द्वारा विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु 50 से ज्यादा सम्मान और मानद उपाधियाँ प्राप्त। अभिरूचियों में रचनात्मक लेखन व अध्ययन, चिंतन, ब्लाॅगिंग, फिलेटली, पर्यटन इत्यादि शामिल।
बकौल पद्मभूषण गोपाल दास 'नीरज' - ‘श्री कृष्ण कुमार यादव यद्यपि एक उच्च पदस्थ सरकारी अधिकारी हैं, किन्तु फिर भी उनके भीतर जो एक सहज कवि है वह उन्हें एक श्रेष्ठ रचनाकार के रूप में प्रस्तुत करने के लिए निरन्तर बेचैन रहता है। उनमें बुद्धि और हृदय का एक अपूर्व सन्तुलन है। वो व्यक्तिनिष्ठ नहीं समाजनिष्ठ कवि हैं जो वर्तमान परिवेश की विद्रूपताओं, विसंगतियों, षडयन्त्रों और पाखण्डों का बड़ी मार्मिकता के साथ उद्घाटन करते हैं।’

Friday, November 25, 2011

हर खत तेरे नाम लिखूंगा…


सुबह लिखूंगा, शाम लिखूंगा

हर खत तेरे नाम लिखूंगा।

प्‍यारे न्‍यारे गंगनांगन को,

मैं अपना पैगाम लिखूंगा।



हवा चलेगी जब इठला कर,

मैं पंक्षी बन इतराऊंगा,

बादरा जब-जब बरसेंगे मैं,

मेघ मल्‍हारें बन जाऊंगा,

धरती ओढ़े धानी चुनरिया,

जब-जब खुल के लहरायेगी,

उसकी चुनर के पल्‍लू पर,

मैं तेरा सम्‍मान लिखूंगा।

हर खत तेरे नाम लिखूंगा।

सुबह लिखूंगा, शाम लिखूंगा।



जीत लिखूंगा, हार लिखूंगा,

प्‍यारा सा एक गीत लिखूंगा,

अपने इस सूनेपन को मैं,

नित नूतन मधुमास लिखूंगा,

तेरे अधरों की कोमलता,

देगी एक एहसास नया,

तेरे इस आलिंगन को मैं,

खुशियों की शाम लिखूंगा।

हर खत तेरे नाम लिखूंगा।

सुबह लिखूंगा, शाम लिखूंगा।



प्रीत लिखूंगा, मीत लिखूंगा

और ऐसा संगीत लिखूंगा,

जिसकी धुन पर तुम थिरकोगी,

महकोगी तुम चंदन जैसे,

तेर पायल की छनछन पर,

नदी बहेगी बहके-बहके,

तेरी प्रेम कल्‍पना को मैं,

अपना विश्‍वास लिखूंगा।

हर खत तेरे नाम लिखूंगा।

सुबह लिखूंगा, शाम लिखूंगा।



सुबह लिखूंगा, शाम लिखूंगा

हर खत तेरे नाम लिखूंगा।

प्‍यारे न्‍यारे गंगनांगन को,

मैं अपना पैगाम लिखूंगा।

-आदित्य शुक्ल : अपनी बात

Monday, November 7, 2011

ख़त तुम्हारा


ख़त मिला तुम्हारा,
पते बगैर पहुँचा मुझ तक ,
हवाएं जानती हैं खूब,
तुम्हारे ख़त लाना मुझ तक,

चली दिल से तुम्हारे,
वो मेरे घर के रास्ते,
उन्हें पता है, तुम्हारे ख़त
होते बस मेरे वास्ते,

नाम भी न लिखा अपना,
फिर भी मैं जान गया,
तुम्हारी हिना की खुशबू से,
ये ख़त पहचान गया,

कोई तहरीर नहीं इसमें,
पर मैं सब जानता हूँ,
तुम्हारे अश्कों की लिखावट,
खूब पहचानता हूँ,

मुझे मालूम है न आयेंगे,
कभी ख़त आज के बाद,
तुम्हें मालूम है न लिखोगी,
कोई ख़त आज के बाद,

तुम्हें पता है, मैं मजबूरियां,
तुम्हारी जानता हूँ,
न होना परेशां कभी तुम,
मैं ये मानता हूँ,

कि तुम्हें शिकवा नहीं मुझसे,
मैं तुमसे नाराज़ नहीं
हम वो एहसास हैं जो ,
ख़त के मोहताज नहीं

- योगेश शर्मा

Friday, June 24, 2011

ख़त

बहुत दिनों बाद खतों को लेकर संजीदगी से लिखी कोई कविता पढ़ी. मन में उतर सी गई 'दीपिका रानी' की 'आउटलुक' में छपी यह कविता, सो अब आप से भी शेयर कर रहा हूँ-


एक दिन अचानक एक खत मिला
लिफाफे में थी
थोड़ी खुशबू
कुछ ताजी हवा
और पहली बारिश का सौंधापन

माँ के हाथों की बनी
रोटियों की गर्माहट थी उसमें
पिता की थपकियों सा सुकून
और एक शरारती सा बच्चा
झांक रहा था बार-बार

खत में थे दो हाथ
जो उठे थे दुआओं में
दो आँखें जिनमें दर्द था
जो मेरा था.
मुस्कराहट के पीछे
मेरी आँखों की उदासी को
वो आँखें समझती थीं

खत ने वो असर किया
कि मेरा दर्द
मुस्कराहट में बदल दिया
उसमें थी वो संजीवनी
जो मेरी डूबती सांसों में
जिन्दगी भर गई
और मेरे जीने का सामान कर गई

मैने सोचा, लिखूँ जवाबी खत
वही खुशबू वही गर्माहट
वही सुकून ,वही मुस्कराहट
बंद की लिफाफे में
मगर अब तक वो यहीं पड़ा है
क्या फरिश्तों का कोई पता होता है ?

-दीपिका रानी
(साभार : आउटलुक, मई 2011)

Tuesday, February 1, 2011

पोस्टमैन

(कविवर सोहन लाल द्विवेदी ने भी डाकिया को अपने शब्दों में ढाला है। मार्च 1957 में प्रकाशित उनकी कविता ‘पोस्टमैन‘ वाकई एक बेहतरीन कविता है। )

किस समय किसे दोगे क्या तुम
यह नहीं किसी को कभी ज्ञान
उत्सुकता में, उत्कंठा में
देखा करता जग महान
आ गई लाटरी निर्धन की
कैसी उसकी तकदीर फिरी
हो गया खड़ा वह उच्च भवन
तोरण, झंडी सुख की फहरी
यह भाग्य और दुर्भाग्य
सभी का फल लेकर तुम जाते
कोई रोता कोई हँसता
तुम पत्र बाँटते ही जाते
इस जग का सारा रहस्य
तुम थैले में प्रतिदिन किए बंद
आते रहते हो तुम पथ में
विधि के रचते से नए छंद।

Saturday, January 1, 2011

पहले ख़त की ख़ुशबू

खतों के प्रति दीवानगी सदियों से रही है. खतों का चलन भले ही कम हुआ हो, पर दीवानगी में कमी नहीं आई है. हसरत मोहानी ने यूँ ही नहीं लिखा था-लिक्खा था अपने हाथों से जो तुमने एक बार / अब तक हमारे पास है वो यादगार खत ।।....अपर्णा त्रिपाठी की इस कविता में वही भाव है, वही संवेदनाएं हैं, वही जज्बा है, वही दीवानगी है... तो आज नए साल के आगाज पर इस ख़ुशबू को महसूस करते हैं...

आज भी तेरा पहला खत
मेरी इतिहास की किताब में हैं
उसका रंग गुलाबी से पीला हो गया
मगर खुशबू अब भी पन्नो में है

उसके हर एक शब्द हमारी
प्रेम कहानी बयां करते है
और तनहाई में मुझे
बीते समय में ले चलते हैं

वो खत मेरी जिन्दगी का
हिस्सा नही ,जिन्दगी है
हर दिन पढने की उसे
बढती जाती तृष्णगी है.

अपर्णा त्रिपाठी "पलाश"

Thursday, December 16, 2010

जिंदगी का लेटर बाक्स


इंतजार कर रहा हूँ
वर्षों से......
दोस्तों के खतों का
नाते-रिश्तेदारों के हाल-समाचार का
महसूसना चाहता हूँ फिर से
सजीव संबंधों की गर्माहट को

लेटर बाक्स से मिलता है सिर्फ
बिजली का बिल
काॅरपोरेशन का टैक्स
बैंक का स्टेटमेंट
या फिर
विज्ञापन के निर्जीव पर्चे !!

राज्यवर्धन
सचिव प्रलेस (पश्चिम बंगाल), एकता हाईट्स,

ब्लाक-2/11 ई0, 56,राजा एस. सी. मल्लिक रोड, कोलकाता-700032

Wednesday, April 21, 2010

युग-युग जियो डाकिया भैया

युग-युग जियो डाकिया भैया, सांझ सबेरे इहै मनाइत है.....
हम गंवई के रहवैया
पाग लपेटे, छतरी ताने, कांधे पर चमरौधा झोला,
लिए हाथ मा कलम दवाती, मेघदूत पर मानस चोला
सावन हरे न सूखे कातिक, एकै धुन से सदा चलैया......

शादी, गमी, मनौती, मेला, बारहमासी रेला पेला
पूत कमासुत की गठरी के बल पर, फैला जाल अकेला
गांव सहर के बीच तुहीं एक डोर, तुंही मरजाद रखवैया
थानेदार, तिलंगा, चैकीदार, सिपाही तहसीलन के
क्रुकअमीन गिरदावर आवत, लोटत नागिन छातिन पै
तुहैं देख कै फूलत छाती, नयन जुड़ात डाकिया भैया
युग-युग जियो डाकिया भैया.......

अनिल मोहन