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Saturday, October 1, 2022

Story of Postcard : पोस्टकार्ड ने पूरा किया 153 साल का सफर , 1 अक्टूबर, 1869 को ऑस्ट्रिया में जारी हुआ था पहला पोस्टकार्ड


सोशल मीडिया में खोई युवा पीढ़ी का पाला भले ही पोस्टकार्ड से न पड़ा हो, पर एक दौर में पोस्टकार्ड खत भेजने का प्रमुख जरिया था। शादी-ब्याह, शुभकामनाओं से लेकर मौत की ख़बरों तक तो इन पोस्टकार्डों ने सहेजा है। तमाम राजनेताओं से लेकर साहित्यकार व आंदोलनकारियों ने पोस्टकार्ड का बखूबी प्रयोग किया है। अपना वही पोस्टकार्ड 1 अक्टूबर, 2022 को वैश्विक स्तर पर 153 साल का हो गया। वाराणसी परिक्षेत्र के पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि, दुनिया में पहला पोस्टकार्ड  एक अक्तूबर 1869 को ऑस्ट्रिया में जारी किया गया था।

(The Austrian Postal Administration authorized the world's first government postal card, known as Correspondz Karte on October 1, 1869. Example of a court card, postmarked 1899, showing Robert Burns and his cottage and monument in Ayr.)

(World's first Government Postal card : Picture of a Correspondenz-Karte. (Image: Wikimediacommons)

इसके पीछे की कहानी के बारे में पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव बताते हैं कि, पोस्टकार्ड का विचार सबसे पहले ऑस्ट्रियाई प्रतिनिधि कोल्बेंस्टीनर के दिमाग में आया था, जिन्होंने इसके बारे में वीनर न्योस्टॉ में सैन्य अकादमी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर डॉ. एमैनुएल हर्मेन को बताया।  उन्हें यह विचार काफी आकर्षक लगा और उन्होंने 26 जनवरी 1869 को एक अखबार में इसके बारे में लेख लिखा। ऑस्ट्रिया के डाक मंत्रालय ने इस विचार पर बहुत तेजी से काम किया और पोस्टकार्ड की पहली प्रति एक अक्तूबर 1869 में जारी की गई। यहीं से पोस्टकार्ड के सफर की शुरुआत हुई। दुनिया का यह प्रथम पोस्टकार्ड पीले रंग का था।  इसका आकार 122 मिलीमीटर लंबा और 85 मिलीमीटर चौड़ा था।  इसके एक तरफ पता लिखने के लिए जगह छोड़ी गई थी, जबकि दूसरी तरफ संदेश लिखने के लिए खाली जगह छोड़ी गई। 


 पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि भारत में पहला पोस्टकार्ड 1879 में जारी किया गया।  हल्के भूरे रंग में छपे इस पहले पोस्टकार्ड की कीमत 3 पैसे थी और इस कार्ड पर ‘ईस्ट इण्डिया पोस्टकार्ड’ छपा था।  बीच में ग्रेट ब्रिटेन का राजचिह्न मुद्रित था और ऊपर की तरफ दाएं कोने मे लाल-भूरे रंग में छपी ताज पहने साम्राज्ञी विक्टोरिया की मुखाकृति थी। अंदाज़-ए-बयां का यह  माध्यम लोगों को इतना पसंद आया कि साल की पहली तीन तिमाही में ही लगभग 7.5 लाख रुपए के पोस्टकार्ड बेचे गए थे।


गौरतलब है कि डाकघरों में चार  तरह के पोस्टकार्ड मिलते रहे हैं - मेघदूत पोस्टकार्ड, सामान्य पोस्टकार्ड, प्रिंटेड पोस्टकार्ड और कम्पटीशन पोस्टकार्ड । ये क्रमश : 25 पैसे, 50 पैसे, 6 रूपये और 10 रूपये में उपलब्ध हैं। कम्पटीशन पोस्टकार्ड फिलहाल बंद हो गया है।  इन चारों पोस्टकार्ड की लंबाई 14 सेंटीमीटर और चौड़ाई 9 सेंटीमीटर होती है।

पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि कम लिखे को ज़्यादा समझना की तर्ज पर पोस्टकार्ड न सिर्फ व्यक्तिगत बल्कि तमाम सामाजिक-साहित्यिक- धार्मिक -राजनैतिक आंदोलनों का गवाह रहा है।  पोस्टकार्ड का खुलापन पारदर्शिता का परिचायक है तो इसकी सर्वसुलभता लोकतंत्र को मजबूती देती रही है। आज भी तमाम आंदोलनों का आरम्भ पोस्टकार्ड अभियान से ही होता है।  ईमेल, एसएमएस, फेसबुक, टि्वटर और व्हाट्सएप ने संचार की परिभाषा भले ही बदल दी हो, पर पोस्टकार्ड अभी भी आम आदमी की पहचान है।

पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि पोस्टकार्ड के प्रति अभी भी लोगों का क्रेज बरकरार है। वाराणसी परिक्षेत्र के डाकघरों द्वारा पिछले वित्तीय वर्ष में 3.20 लाख पोस्टकार्डों की बिक्री हुई थी, वहीं इस साल 51 हजार से ज्यादा पोस्टकार्डों की बिक्री की जा चुकी है।








शादी-ब्याह, शुभकामनाओं से लेकर विभिन्न आंदोलनों का गवाह रहा है पोस्टकार्ड

पोस्टकार्ड का क्रेज अभी भी बरकरार, वाराणसी परिक्षेत्र में गत वर्ष डाकघरों से बिके 3.20 लाख पोस्टकार्ड


Friday, August 22, 2014

कहानी पोस्टकार्ड की

डाक का महत्व प्राचीन काल से ही रहा है. उस समय एक राजा दूसरे राज्य के राजा तक अपना संदेश एक विशेष व्यक्ति जिसे दूत कहा जाता था, के माध्यम से भेजते थे. उन दूतों को राज्य की ओर से सुरक्षा तथा सम्मान प्रदान किया जाता था. महाकाव्य रामायण तथा महाभारत में कई प्रसंगों में संदेश भेजे जाने का उल्लेख प्राप्त होता है. राजा जनक ने अपनी पुत्री सीता और राम के विवाह होने का संदेश राम के पिता दशरथ को भिजवाया था. रावण की राजसभा में श्रीराम का सन्देश लेकर अंगद का जाना, इस बात का प्रमाण है.. महाभारत में श्रीकृष्ण का कौरवों के लिए पांच गांव मांगने जाना तथा अनेक राज्यों में पांडवों तथा कौरवॊं के पक्ष में, युद्ध में भाग लेने के लिए संदेश पहुँचाना, जैसी कोई डाक व्यवस्था उस समय काम कर रही होगी.

अन्य प्रसंगों में राजा नल द्वारा दमयन्ती के बीच सन्देशों का आदान-प्रदान हंस द्वारा होने का वर्णण आता है. महाकवि कालीदास के मेघदूत में दक्ष अपनी प्रेमिका के पास मेघों के माध्यम से सन्देश पहुँचाते थे. एक प्रेमी राजकुमार अपनी प्रेमिका को कबूतरों द्वारा पत्र पहुँचाते थे. खुदाई के दौरान कुछ ऐसी महत्वपूर्ण जानकारियां मिली हैं कि मिस्र, यूनान एवं चीन में डाक व्यवस्था थी. सिकन्दर महान ने भारत से यूनान तक संचार व्यवस्था बनाई थी, जिससे उसका संपर्क यूनान तक रहता था. अनेक राजा-महाराजा एक स्थान से दूसरे स्थान तक सन्देश पहुंचाने के लिए द्रुतगति से दौडने वाले घोडॊं का प्रयोग किया करते थे.

यह सब कालान्तर की बातें तो है ही, साथ ही रोचक भी है. इसका प्रयोग केवल उच्च वर्ग तक ही सीमित था. साधारण जन इससे कोसों दूर था. बाद मे कई प्रयास किए गए और डाक व्यवस्था में निरन्तर सुधार आता गया और आज यह व्यवस्था आम हो गई है.    

१ अक्टूबर सन १८५४ को पहला भारतीय डाक टिकिट जारी किया गया था. उस समय तक पोस्टकार्ड की कल्पना भी नहीं की गई थी. सन १८६९ में आस्ट्रिया के डाक्टर इमानुएल हरमान ने पत्राचार के एक सस्ते साधन के रुप में पोस्टकार्ड की कल्पना की थी. भारत में पहली बार १ जुलाई १८७९ को पोस्टकार्ड जारी किए गये. जिसकी डिजाइन और छपाई का कार्य मेसर्स थामस डी.ला.रयू. एण्ड कंपनी लंदन ने किया था. उसके  दो मूल्य वर्ग थे. एक पैसा( उस समय एक आने में चार पैसे हुआ करते थे) मुल्य का कार्ड अन्तरदेशीय प्रयोग के लिए था और देढ-आना वाला कार्ड ,उन देशों के लिए था जो “अंतरराष्ट्रीय डाक संघ” से संबद्ध थे.

पहले पोस्टकार्ड मध्यम हलके भूरे से रंग में छपे थे. एक पैसे वाले कार्ड पर “ ईस्ट इण्डिया पोस्टकार्ड” छपा था. बीच में ग्रेट ब्रिटेन का राज चिन्ह मुद्रित था और ऊपर की तरफ़ दाएं कोने मे लाल-भूरे रंग में छपी ताज पहने साम्राज्ञी विक्टोरिया” की मुखाकृति थी. विदेशी पोस्टकार्ड में ऊपर अंग्रेजी और फ़्रेंच भाषाओं में” यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन” अंकित था. इसके नीचे दो पंक्तियों में अंग्रेजी में क्रमशः “ब्रिटिश इण्डिया” और” पोस्टकार्ड” और इसका फ़्रेंच रुपान्तर तथा इन दोनों के बीच में ब्रिटेन का राजचिन्ह मुद्रित था एवं ऊपर दाहिने कोने पर टिकिट होता था. टिकिट और लेख नीले रंग में थे. दोनों ही प्रकार के कार्डॊ में अंग्रेजी में” दि एड्रेस ओनली टु बी रिटेन दिस साईड” छपा था.                                                                                                                                                                                        
 पोस्टकार्ड में कई परिवर्तन हुए. १८९९ में “ईस्ट” शब्द हटा दिया गया और उसके स्थान पर “ इण्डिया पोस्ट कार्ड” मुद्रित होने लगा.

दिल्ली के सम्राट जार्ज पंचम के राज्याभिषॆक की स्मृति में सन १९११ में केन्द्रीय और प्रान्तीय सरकारों ने सरकारी प्रयोग के लिए विशेष पोस्टकार्ड जारी किए थे. इन पर “ पोस्टकार्ड” शब्द मुद्रित था,परन्तु टिकिट का कोई चिन्ह अंकित नहीं था. इन पर “ताज” और “ जी.आर.आई” मोनोग्राम सुनहरे रंग में और दिल्ली तथा विभिन्न प्रांतों के बीच के प्रतीक-चिन्ह ,भिन्न-भिन्न रंगों से इम्बासिंग पद्धति से मुद्रित थे.

स्वतंत्रता के बाद चटकीले हरे रंग में “त्रिमूर्ति” की नयी डिजाइन के टिकिट वाला प्रथम पोस्टकार्ड ७ दिसम्बर १९४९ को जारी किया गया था. सन १९५० में कम डाक दर( ६ पाई) के स्थानीय़ पोस्टकार्ड जारी किए गए, जिन पर कोणार्क के घोडॆ की प्रतिमा पर आधारित टिकिट की डिजाइन चाकलेट रंग में छपी थी.  २ अक्टूबर १९५१ को तीन चित्र पोस्ट्कार्डॊं की एक श्र्रृंखला जारी की गई,जिसमें एक पर बच्चे को लिए हुए गांधीजी, दूसरे पर चर्खा चलाते हुए गांधीजी और तीसरे पर कस्तूरबा गांधी के साथ गांधीजी का चित्र अंकन था. २ अक्टूबर १९६९ को गांधी शताब्दी के उपलक्ष में तीन पोस्टकार्डॊं की दूसरी श्रृंखला निकाली गई, जिसमें गांधीजी और गांधीजी की मुखाकृति अंकित थी.

जबसे पोस्टकार्डॊं का प्रचलन हुआ है, तभी से जनता के पत्र-व्यवहार का माध्यम ये पोस्ट्कार्ड रहे हैं. हमारे देश के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी ये काफ़ी लोकप्रिय है. इस समय प्रतिवर्ष अरबों की संख्या में पोस्टकार्ड देश के एक छोर से दूसरे छोर तक, देशवासियों को भातृत्व के बंधन में बांधने का कार्य करते हैं.


- (लेखक गोवर्धन यादव  डाक विभाग के पोस्ट्मास्टर पद से सेवानिवृत्ति पश्चात स्वतंत्र लेखन और अध्ययन से जुड़े हुए हैं। विभिन्न सम्मानों से अलंकृत श्री यादव फ़िलहाल  छिंदवाड़ा में रहते हुए सृजनरत हैं।  पता - 103, कावेरी नगर, छिंदवाड़ा, मध्यप्रदेश )       



Sunday, August 17, 2014

पोस्टकार्ड पर ही उकेर दिया पूरा सुंदर काण्ड

पोस्टकार्ड का नाम सुनते ही मन में चिट्ठियां तैरने लगती हैं।  इसे काम शब्दों में खुले संवाद के तौर पर देखा जाता है। आखिर,  इस पोस्टकार्ड पर कितनी लाइनें लिखी जा सकती हैं। बमुश्किल 20, 25, या अधिक से अधिक 50। इन्हें पढ़ने में पांच, सात या फिर 10 मिनट से ज्यादा नहीं लगेंगे। पर यहाँ तो इसका एक अलग ही प्रयोग हुआ और एक महिला ने  पोस्टकार्ड पर रामचरित मानस के पूरे सुंदरकांड को ही उकेर दिया । इतना ही नहीं फिर भी जगह बच गई तो हनुमान चालीसा, हनुमानाष्टक भी लिख डाला। यह अद्भुत कारनामा कर दिखाया है ज्ञानपुर (भदोही) स्थित देवनाथपुर की सुप्रिया ने। हालांकि विवाह के बाद गिनीज बुक आफ व‌र्ल्ड रिकार्ड में नाम शामिल कराने की उसकी हसरत अभी अधूरी है।

आजमगढ़ निवासी गुलाब चंद बरनवाल की पुत्री सुप्रिया शुरू से ही होनहार थी। हमेशा कुछ अलग करने की ललक उसे बचपन से ही था। स्नातक की पढ़ाई करते समय ही छोटे-छोटे अक्षरों में लिखने के अभ्यास का जुनून सवार हुआ। वह पढ़ाई के दौरान ही कई धार्मिक किताबों को कम से कम जगह में अधिक शब्दों को लिख रही थी। उसके इस हुनर को देख साथी भी दांतों तले अंगुल दबाते थे। इसी बीच उसकी शादी देवनाथपुर निवासी अंजनी कुमार से हो गई। ससुराल आने के बाद सर्व प्रथम उसने पोस्टकार्ड पर दुर्गा चालीसा लिखने का काम किया। धीरे-धीरे उसका उत्साह लिखने को लेकर बढ़ने लगा। गिनीज बुक आफ व‌र्ल्ड रिकार्ड में नाम शामिल कराने का जज्बा लेकर उसने जुलाई 2004 में एक ही पोस्टकार्ड पर सुंदरकांड सहित हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक लिख दी। हकीकत तो यह है कि इन अक्षरों को बगैर माइक्रोस्कोप नहीं पढ़ा जा सकता है। इसके बाद उसने 10 दिन में मानस के किष्किंधाकाण्ड को भी कलमबद्ध किया है।

 बकौल सुप्रिया, शुरू से ही कुछ अलग करने का जज्बा न जाने कहां से मिल गया था। लोगों ने प्रोत्साहित भी किया। सुंदरकांड पोस्टकार्ड पर लिखने का जज्बा लोगों के उत्साह बढ़ाने से ही मिला। अब समय नहीं मिल पाता है लेकिन इन सबके बीच कुछ अलग करने की ललक में कोई कमी नहीं है।

परिवार में व्यस्तता के कारण व‌र्ल्ड रिकार्ड में नाम शामिल कराने की उसकी ख्वाहिश पूरी नहीं हो सकी। सुप्रिया को अब बच्चों की पढ़ाई आदि कार्यो में ही अधिक समय लग जाता है। पोस्टकार्ड पर छोटे-छोटे अक्षरों में लिखने के लिए एकाग्र चित व समय चाहिए। ऐसे में जो माहौल पहले था वह अब नहीं मिल पा रहा है।

Friday, August 8, 2014

50 पैसे का पोस्टकार्ड, लागत 7 रुपये

टेक्नॉलजी बदली पर अभी भी बहुत सी चीजें अपना स्थान बनाई हुई हैं।  इनमें से एक पोस्टकार्ड भी है। सरकार के लिए 50 पैसे के पोस्टकार्ड की वास्तविक लागत 7 रुपये बैठती है। सूचना के अधिकार यानी आरटीआई के जरिये मांगी गई जानकारी में डाक विभाग ने ऐसी सेवाओं की सूचना मुहैया कराई जो उसके लिए नुकसान वाला कारोबार साबित हो रही हैं।

सूचना के अधिकार के तहत मांगी जानकारी में विभाग ने कहा कि 2012-13 में पोस्टकार्ड की बिक्री से प्रति इकाई 50 पैसे प्राप्त हुए, जबकि इस सेवा को बरकरार रखने की लागत 7.18 रुपये रही जो 2010-11 में 7.50 रुपये थी।

इसी तरह 2012-13 में प्रिंटेड पोस्टकार्ड से 6 रुपये प्रति इकाई का राजस्व मिला जबकि लागत 7.19 रुपये प्रति इकाई रही। जांच में पाया गया कि अंतर्देशीय की लागत 7.18 रुपये प्रति इकाई थी जबकि इस पर आय 2.50 रुपये प्रति इकाई थी।

डाक विभाग का रजिस्टर्ड समाचार पत्र भेजने पर प्रति इकाई 10.59 रुपये का खर्च आता है, जबकि समाचारपत्र का एक बंडल भेजने पर 20.79 रुपये का खर्च आता है। वहीं एक समाचारपत्र भेजने पर उसे मात्र 59 पैसे मिलते हैं जबकि बंडल भेजने पर 1.63 रुपये की प्राप्ति होती है।

डाक विभाग ने यह भी कहा कि 2012-13 में बीमा की पेशकश 55.24 रुपये की दर पर की गई जबकि इसकी लागत करीब तीन गुना 141.82 रुपये है। किताबों के पैकेट को भेजने पर विभाग को 9.51 रुपये की लागत आती है जबकि विभाग को हर डिलीवरी पर सिर्फ 2.90 रुपये की आय होती है।

हर पार्सल पर डाक विभाग को 40.69 रुपये की आय होती है जबकि लागत 46.58 रुपये आती है। प्रिंटेड किताब से 2.90 रुपये की आय होती जबकि लागत 12.44 रुपये होती है। आवेदक एस सी अग्रवाल को भेजे जवाब में विभाग ने कहा है, ‘इस संबंध में कोई सालाना मुनाफा-नुकसान खाता तैयार नहीं किया गया है।’