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Tuesday, November 4, 2014

प्रधानमंत्री मोदी, चिठ्ठियाँ और मन की बात

चिट्ठियाँ भला किसे नहीं भातीं।  न शब्दों की बंदिश और न एक ही बार लिखने का झंझट।  चिट्ठियों के माध्यम से तो भाव भी अक्षर (जिसका क्षय नहीं होता) हो जाते हैं। उन अक्षरों को पढ़कर चिट्ठी पाने वाला लिखने वाले की मन:स्थिति का भी पता लगा लेता था। कभी राजनेताओं से लेकर फ़िल्मी सितारों की फैन-फॉलोइंग उनको प्राप्त चिट्ठियों से आंकी जाती थी। गांधी जी को  तो इतने ज्यादा पत्र प्राप्त होते थे कि वे दोनों हाथ से पत्रों का जवाब लिखा करते थे। देश के किसे भी कोने में मात्र गांधी लिखी चिट्ठियां उन तक डाक विभाग सकुशल पहुंचा देता था। जेल में रहते हुए नेहरू ने इंदिरा गांधी को जो पत्र लिखे, उन्होंने इंदिरा के व्यक्तित्व को गढ़ने में अहम भूमिका निभाई।  इन पत्रों ने न जाने कितने इतिहास रचे और आज भी लाखों रूपये में नीलम होते हैं।  

चिट्ठियां हमारे परिवेश का अभिन्न अंग रही हैं।  लोकगीतों में चिट्ठियों का बड़ा ही सटीक और मार्मिक वर्णन मिलता है। आधुनिक से लेकर पुरातन साहित्य में भी चिट्ठियों के तमाम वर्णन हैं। चिट्ठियाँ तब से लिखी जा रही हैं, जब से सभ्यता का प्रादुर्भाव हुआ होगा और मानव ने लिखना सीखा होगा। माना  जाता है कि रुक्मिणी द्वारा श्रीकृष्ण को लिखी गई चिट्ठी 'विश्व का पहला 'प्रेम पत्र' थी।  लोक गीतों में भी इसका वर्णन बखूबी मिलता  है।

'अंचरा में फाड़ी रु
रुक्मिणी कगजा बनाओल
नयन काजल मसिहान
चारों कोना लिखले
रुक्मिणी छेम कुशलवा
बीचे बीचे रुक्मिणी बयान।'

ऐसी ही न जाने कितने बातें और विरासत इन चिट्ठियों ने सहेज कर रखा है और इन चिट्ठियों के माध्यम से ही वे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक संचारित होती रहती हैं। याद आती हैं हसरत मोहानी की लिखी पंक्तियाँ -

लिक्खा था अपने हाथों से जो तुमने एक बार।
अब तक हमारे पास है वो यादगार खत ।।

वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तकनीक फ्रेंडली हैं । सोशल मीडिया और ई-मेल के माध्यम से लोगों से जुड़े रहते हैं, पर न तो हर कोई मेल करता है और न हर किसी का सोशल मीडिया पर एकाउंट है।  भारत जैसे देश में जहाँ अभी भी इंटरनेट की पहुँच बमुश्किल 15 फीसदी है, वहाँ तो पत्रों की अहमियत और भी बढ़ जाती है। ऐसे में लोगों से जुड़ने के लिए पत्र से बेहतर जरिया नहीं हो सकता। 

प्रधानमंत्री मोदी कितने ही टेक सेवी हों पर दूसरी तरफ यह भी एक सच्चाई है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके नाम आने वाली चिट्ठियों की आमद ने नए रिकार्ड बना दिए हैं। जुलाई के बाद से हर महीने प्रधानमंत्री मोदी के नाम औसतन डेढ़ लाख चिट्ठियाँ आ रही हैं। लोग अमूमन पाँच हजार पत्र प्रतिदिन मोदी को भेज रहे है। कभी-कभी यह आँकड़ा दस हजार तक पहुँच जाता है। 

राजधानी  दिल्ली के निर्माण भवन स्थित पोस्ट आॅफिस  यूँ तो पहले भी अतिविशिष्ट व्यक्तियों के लिए आने वाली चिट्ठियों  के लिए जाना जाता रहा है। लुटियन जोन स्थित अहम मंत्रालयों और अतिविशिष्ट व्यक्तियों के नाम की चिट्ठी भी इसी डाकखाने से जाती है। लेकिन जुलाई 2014 के बाद से यहाँ प्रधानमंत्री के नाम चिट्ठियों की बाढ़ सी आ गई है। जहाँ पूर्व प्रधानमंत्री  मनमोहन सिंह के कार्यकाल में प्रतिदिन करीब पांँच सौ से एक हजार चिट्ठियाँ आती थीं वहीँ  मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद इसमें कई गुना इजाफा हुआ है।  आमतौर पर सुबह 11 बजे छंटनी कर डाक पीएमओ  भेज दी जाती है। लेकिन कई बार दिन में दो बार भी चिट्ठियां पीएमओ पहुँचानी पड़ती हैं। चिट्ठियों की आवक देखते हुए डाक विभाग ने भी मुकम्मल इंतजाम किए हैं । प्रधानमंत्री के नाम आने वाले पत्रों की छंटाई और कंम्प्यूटर वर्गीकरण समेत अन्य इंतजामो को चुस्त करने के लिए दो सितंबर को पीएमओ और डाक विभाग के अधिकारियों के बीच एक बैठक भी हुई थी। 

दरअसल प्रधानमंत्री मोदी जनता से सीधे संवाद पर खासा जोर देते हैं। उन्होंने तीन अक्टूबर को ’मन की बात’ कार्यक्रम के जरिए जनता से रेडियो संवाद की परंपरा शुरू की थी। साथ ही लोगों को सरकार के साथ अपने अनुभव, शिकायतें ई-मेल व पत्रों  के जरिए भेजने को प्रोत्साहित भी किया था। प्रधानमंत्री ने जनता से मिले पत्रों और उनकी बातें पंसद आने पर अपने रेडियो संवाद में शामिल करने का भी वादा किया था। ऐसे में लोगों  ने भी अपने मन की बात देश के मुखिया  को चिट्ठियों के माध्यम से भेजनी आरम्भ कर दी। प्रधानमंत्री के नाम आने वाले पत्रों में जहाँ बड़ी संख्या सामाजिक संगठनों की है, वहीं दूर-दराज के गाँवों से आ रहे पत्रों की तादाद भी कम नहीं है। इंटरनेट के इस दौर में डाक से आ रही चिट्ठियों की संख्या डाक विभाग के लिए भी उत्साहजनक है, वहीं एक ख़त्म होती विधा 'पत्र लेखन' को जीवंत करने का प्रयास भी।

- कृष्ण कुमार यादव
निदेशक डाक सेवाएँ, 
इलाहाबाद परिक्षेत्र, इलाहाबाद -211001 

Sunday, October 9, 2011

विश्व डाक दिवस : संवेदना के संवाहक पत्र

पत्रों की दुनिया बेहद निराली है। दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक यदि पत्र अबाध रूप से आ-जा रहे हंै तो इसके पीछे ‘यूनिवर्सल पोस्टल‘ यूनियन का बहुत बड़ा योगदान है, जिसकी स्थापना 9 अक्टूबर 1874 को स्विटजरलैंड में हुई थी। यह 9 अक्टूबर पूरी दुनिया में ‘विश्व डाक दिवस‘ के रूप में मनाया जाता है। तब से लेकर आज तक डाक-सेवाओं में वैश्विक स्तर पर तमाम क्रांतिकारी परिवर्तन आए हैं और भारत भी इन परिवर्तनों से अछूता नहीं हैं। डाक सेवाओं का इतिहास बहुत पुराना है, पर भारत में एक विभाग के रूप में इसकी स्थापना 1 अक्तूबर 1854 को लार्ड डलहौजी के काल में हुई। डाकघरों में बुनियादी डाक सेवाओं के अतिरिक्त बैंकिंग, वित्तीय व बीमा सेवाएं भी उपलब्ध हैं। एक तरफ जहाँ डाक-विभाग सार्वभौमिक सेवा दायित्व के तहत सब्सिडी आधारित विभिन्न डाक सेवाएं दे रहा है, वहीं पहाड़ी, जनजातीय व दूरस्थ अंडमान व निकोबार द्वीप समूह जैसे क्षेत्रों में भी उसी दर पर डाक सेवाएं उपलब्ध करा रहा है।

सभ्यता के आरम्भ से ही मानव किसी न किसी रूप में पत्र लिखता रहा है। दुनिया का सबसे पुराना ज्ञात पत्र 2009 ईसा पूर्व का बेबीलोन के खण्डहरों से मिला था, जो कि वास्तव में एक प्रेम पत्र था और मिट्टी की पटरी पर लिखा गया था। कहा जाता है कि बेबीलोन की किसी युवती का प्रेमी अपनी भावनाओं को समेटकर उससे जब अपने दिल की बात कहने बेबीलोन तक पहुँचा तो वह युवती तब तक वहाँ से जा चुकी थी। वह प्रेमी युवक अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाया और उसने वहीं मिट्टी के फर्श पर खोदते हुए लिखा-‘‘मैं तुमसे मिलने आया था, तुम नहीं मिली।‘‘ यह छोटा सा संदेश विरह की जिस भावना से लिखा गया था, उसमें कितनी तड़प शामिल थी। इसका अंदाजा सिर्फ वह युवती ही लगा सकती थी जिसके लिये इसे लिख गया। भावनाओं से ओत-प्रोत यह पत्र 2009 ईसा पूर्व का है और इसी के साथ पत्रों की दुनिया ने अपना एक ऐतिहासिक सफर पूरा कर लिया है।

जब संचार के अन्य साधन न थे, तो पत्र ही संवाद का एकमात्र माध्यम था। पत्रों का काम मात्र सूचना देना ही नहीं बल्कि इनमें एक अजीब रहस्य या गोपनीयता, संग्रहणीयता, लेखन कला एवं अतीत को जानने का भाव भी छुपा होता है। पत्रों की सबसे बडी विशेषता इनका आत्मीय पक्ष है। यदि पत्र किसी खास का हुआ तो उसे छुप-छुप कर पढ़ने में एवम् संजोकर रखने तथा मौका पाते ही पुराने पत्रों के माध्यम से अतीत में लौटकर विचरण करने का आनंद ही कुछ और है। यह सही है कि संचार क्रान्ति ने चिठ्ठियों की संस्कृति को खत्म करने का प्रयास किया है और पूरी दुनिया को बहुत करीब ला दिया है। पर इसका एक पहलू यह भी है कि इसने दिलों की दूरियाँ इतनी बढ़ा दी हैं कि बिल्कुल पास में रहने वाले अपने इष्ट मित्रों और रिश्तेदारों की भी लोग खोज-खबर नहीं रखते। ऐसे में युवा पीढ़ी के अंदर संवेदनाओं को बचा पाना कठिन हो गया है। तभी तो पत्रों की महत्ता को देखते हुए एन0सी0ई0आर0टी0 को पहल कर कक्षा आठ के पाठ्यक्रम में ‘‘चिट्ठियों की अनोखी दुनिया‘‘ नामक अध्याय को शामिल करना पड़ा।

सिर्फ साधारण व्यक्ति ही नहीं बल्कि प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने भी पत्रों के अंदाज को जिया है। माक्र्स-एंजिल्स के मध्य ऐतिहासिक मित्रता का सूत्रपात पत्रों से ही हुआ। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने उस स्कूल के प्राचार्य को पत्र लिखा, जिसमें उनका पुत्र अध्ययनरत था। इस पत्र में उन्होंने प्राचार्य से अनुरोध किया था कि उनके पुत्र को वे सारी शिक्षायें दी जाय, जो कि एक बेहतर नागरिक बनने हेतु जरूरी हैं। इसमें किसी भी रूप में उनका पद आडे़ नहीं आना चाहिये। महात्मा गाँधी तो पत्र लिखने में इतने सिद्धहस्त थे कि दाहिने हाथ के साथ-साथ वे बाएं हाथ से भी पत्र लिखते थे। पं0 जवाहर लाल नेहरू अपनी पुत्री इन्दिरा गाँधी को जेल से भी पत्र लिखते रहे। ये पत्र सिर्फ पिता-पुत्री के रिश्तों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें तात्कालिक राजनैतिक एवं सामाजिक परिवेश का भी सुन्दर चित्रण है। इन्दिरा गाँधी के व्यक्तित्व को गढ़ने में इन पत्रों का बहुत बड़ा हाथ रहा है। आज ये किताब के रूप में प्रकाशित होकर ऐतिहासिक दस्तावेज बन चुके हैं। इन्दिरा गाँधी ने इस परम्परा को जीवित रखा एवं दून में अध्ययनरत अपने बेटे राजीव गाँधी को घर की छोटी-छोटी चीजों और तात्कालिक राजनैतिक-सामाजिक परिस्थितियों के बारे में लिखती रहीं। एक पत्र में तो वे राजीव गाँधी को रीवा के महाराज से मिले सौगातों के बारे में भी बताती हैं। तमाम राजनेताओं-साहित्यकारों के पत्र समय-समय पर पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित होते रहते हैं। इनसे न सिर्फ उस व्यक्ति विशेष के संबंध में जाने-अनजाने पहलुओं का पता चलता है बल्कि तात्कालिक राजनैतिक-सामाजिक-साहित्यिक-सांस्कृतिक परिवेश के संबंध में भी बहुत सारी जानकारियाँ प्राप्त होती हैं। इसी ऐतिहासिक के कारण आज भी पत्रों की नीलामी लाखों रूपयों में होती हैं।

कहते हैं कि पत्रों का संवेदनाओं से गहरा रिश्ता है और यही कारण है कि पत्रों से जुड़े डाक विभाग ने तमाम प्रसिद्ध विभूतियों को पल्लवित-पुष्पित किया है। अमेरिका के राष्ट्रपति रहे अब्राहम लिंकन पोस्टमैन तो भारत में पदस्थ वायसराय लार्ड रीडिंग डाक वाहक रहे। विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक व नोबेल पुरस्कार विजेता सी0वी0 रमन भारतीय डाक विभाग में अधिकारी रहे वहीं प्रसिद्ध साहित्यकार व ‘नील दर्पण‘ पुस्तक के लेखक दीनबन्धु मित्र पोस्टमास्टर थे। ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित लोकप्रिय तमिल उपन्यासकार पी0वी0अखिलंदम, राजनगर उपन्यास के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित अमियभूषण मजूमदार, फिल्म निर्माता व लेखक पद्मश्री राजेन्द्र सिंह बेदी, मशहूर फिल्म अभिनेता देवानन्द डाक कर्मचारी रहे हैं। उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द जी के पिता अजायबलाल डाक विभाग में ही क्लर्क रहे। ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता मशहूर लेखिका महाश्वेता देवी,चर्चित समालोचक एवं प्रेमचन्द-विशेषज्ञ डा. कमल किशोर गोयनका तथा प्रसिद्ध बाल साहित्यकार डा. राष्ट्रबन्धु ने आरम्भ में डाक-तार विभाग में काम किया था। सुविख्यात उर्दू समीक्षक पद्मश्री शम्सुररहमान फारूकी, शायर कृष्ण बिहारी नूर, महाराष्ट्र के प्रसिद्ध किसान नेता शरद जोशी सहित तमाम विभूतियाँ डाक विभाग की गोद में अपनी सृजनात्मक-रचनात्मक काया का विस्तार पाने में सफल रहीं।

भारतीय परिपे्रक्ष्य में इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता कि भारत एक कृषि प्रधान एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था वाला देश है, जहाँ 70 फीसदी आबादी गाँवों में बसती है। समग्र टेनी घनत्व भले ही 70 का आंकड़ा छूने लगा हो पर ग्रामीण क्षेत्रों में यह बमुश्किल 20 से 25 फीसदी ही है। यदि हर माह 2 करोड़ नए मोबाइल उपभोक्ता पैदा हो रहे हैं तो उसी के सापेक्ष डाक विभाग प्रतिदिन दो करोड़ से ज्यादा डाक वितरित करता है। 1985 में यदि एस0एम0एस0 पत्रों के लिए चुनौती बनकर आया तो उसके अगले ही वर्ष दुतगामी ‘स्पीड पोस्ट‘ सेवा भी आरम्भ हो गई। यह एक सुखद संकेत है कि डाक-सेवाएं नवीनतम टेक्नाॅलाजी का अपने पक्ष में भरपूर इस्तेमाल कर रही हैं। ‘ई-मेल‘ के मुकाबले ‘ई-पोस्ट‘ के माध्यम से डाक विभाग ने डिजिटल डिवाइड को भी कम करने की मुहिम छेड़ी है। आखिरकार अपने देश में इंटरनेट प्रयोक्ता महज 7 फीसदी हंै। आज डाकिया सिर्फ सिर्फ पत्र नहीं बांटता बलिक घरों से पत्र इकट्ठा करने और डाक-स्टेशनरी बिक्री का भी कार्य करता है। समाज के हर सेक्टर की जरूरतों के मुताबिक डाक-विभाग ने डाक-सेवाओं का भी वर्गीकरण किया है, मसलन बल्क मेलर्स के लिए बिजनेस पोस्ट तो कम डाक दरों के लिए बिल मेल सेवा उपलब्ध है। पत्रों के प्रति क्रेज बरकरार रखने के लिए खुश्बूदार डाक-टिकट तक जारी किए गए हैं। आई0टी0 के इस दौर में चुनौतियों का सामना करने के हेतु डाक विभाग अपनी ब्रांडिंग भी कर रहा है। ‘प्रोजेक्ट एरो‘ के तहत डाकघरों का लुक बदलने से लेकर काउंटर सेवाओं, ग्राहकों के प्रति व्यवहार, सेवाओं को समयानुकूल बनाने जैसे तमाम कदम उठाए गए हैं। इस पंचवर्षीय योजना में डाक घर कोर बैंकिंग साल्यूशन के तहत एनीव्हेयर, एनी टाइम, एनीब्रांच बैंकिंग भी लागू करने जा रहा है। सिम कार्ड से लेकर रेलवे के टिकट और सोने के सिक्के तक डाकघरों के काउंटरों पर खनकने लगे हैं और इसी के साथ डाकिया डायरेक्ट पोस्ट के तहत पम्फ्लेट इत्यादि भी घर-घर जाकर बांटने लगा है। पत्रों की मनमोहक दुनिया अभी खत्म नहीं हुई है। तभी तो अन्तरिक्ष-प्रवास के समय सुनीता विलियम्स अपने साथ भगवद्गीता और गणेशजी की प्रतिमा के साथ-साथ पिताजी के हिन्दी में लिखे पत्र ले जाना नहीं भूलती। हसरत मोहानी ने यूँ ही नहीं लिखा था-

लिक्खा था अपने हाथों से जो तुमने एक बार।
अब तक हमारे पास है वो यादगार खत ।।

(विश्व डाक दिवस, 9 अक्तूबर पर आकाशवाणी, पोर्टब्लेयर से प्रसारित कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएं,अंडमान व निकोबार द्वीप समूह की वार्ता)

Monday, May 24, 2010

वो चिट्ठियों की दुनिया

अभी हाल ही में मेरे एक मित्र की सगाई सम्पन्न हुई। पेशे से इंजीनियर और हाईटेक सुविधाओं से लैस मेरा मित्र अक्सर सेलफोन या चैटिंग के द्वारा अपनी मंगेतर से बातें करता रहता। तभी एक दिन उसे अपनी मंगेतर का पत्र मिला। उसे यह जानकर ताज्जुब हुआ कि पत्र में तमाम ऐसी भावनायें व्यक्त की गई थीं, जो उसे फोन पर या चैटिंग के दौरान भी नहीं पता चली थीं। अब मेरे मित्र भी अपनी खूबसूरत मनोभावनाओं को मंगेतर को पत्र लिखकर प्रकट करने लगे हैं। इसी प्रकार बिहार के एक गाँव से आकर दिल्ली में बसे अधिकारी को अपनी माँ की बीमारी का पता तब चला जब वे एक साल बाद गाँव लौटकर गये। उन्हें जानकर आश्चर्य हुआ कि इतनी लंबी बीमारी उनसे कैसे छुपी रही, जबकि वे हर सप्ताह अपने घर का हाल-चाल फोन द्वारा लेते रहते थे। आखिरकार उन्हें महसूस हुआ कि यदि इस दौरान उन्होंने घर से पत्र-व्यवहार किया होता तो बीमारी की बात जरूर किसी न किसी रूप में पत्र में व्यक्त होती।

वस्तुतः संचार क्रान्ति के साथ ही संवाद की दुनिया में भी नई तकनीकों का पदार्पण हुआ। टेलीफोन, मोबाइल फोन, इण्टरनेट,फैक्स,वीडियो कान्फं्रेसिंग जैसे साधनों ने समग्र विश्व को एक लघु गाँव में परिवर्तित कर दिया। देखते ही देखते फोन नम्बर डायल किया और सामने से इच्छित व्यक्ति की आवाज आने लगी। ई-मेल या एस0एम0एस0 के द्वारा चंद सेकेंडों में अपनी बात दुनिया के किसी भी कोने में पहुँचा दी। वैश्विक स्तर पर पहली बार 1996 में संयुक्त राज्य अमेरिका में ई-मेल की कुल संख्या डाक सेवाओं द्वारा वितरित पत्रों की संख्या को पार कर गई और तभी से यह गिरावट निरन्तर जारी है। ऐसे में पत्रों की प्रासंागिकता पर भी प्रश्न चिन्ह लगने लगे। क्या वाकई पत्र-लेखन अतीत की वस्तु बनकर रह गया है? क्या सुदूर देश में बैठे अपने पति के पत्रों के इन्तजार में पत्नियाँ बार-बार झांककर यह नहीं देखतीं कि कहीं डाकिया बाबू उनका पत्र बाहर ही तो नहीं छोड़ गया? क्या पत्र अब किताबों में और फिर दस्तावेजों में नहीं बदलेगें ?....... पत्रों से दूरी के साथ ही अहसास की संजीदगी और संवेदनाएं भी खत्म होने लगीं।

सभ्यता के आरम्भ से ही मानव किसी न किसी रूप में पत्र लिखता रहा है। दुनिया का सबसे पुराना ज्ञात पत्र 2009 ईसा पूर्व का माना जाता है, जो कि मिट्टी की पटरी पर लिखा गया था। यह बेबीलोन के खंडहरों से मिला था, जो कि मूलतरू एक प्रेम-पत्र था। बेबीलोन की किसी युवती का प्रेमी अपनी भावनाओं को समेटकर उससे जब अपने दिल की बात कहने बेबीलोन तक पहुँचा तो वह युवती तब तक वहां से जा चुकी थी। वह प्रेमी युवक अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाया और उसने वहीं मिट्टी के फर्श पर खोदते हुए लिखा- ष्मैं तुमसे मिलने आया था, तुम नहीं मिली।ष् यह छोटा सा संदेश विरह की जिस भावना से लिखा गया था, उसमें कितनी तड़प शामिल थी। इसका अंदाजा सिर्फ वह युवती ही लगा सकती थी जिसके लिये इसे लिखा गया। भावनाओं से ओत-प्रोत यह पत्र 2009 ईसा पूर्व का है और आज हम वर्ष 2010 में जी रहे हैं।

जब संचार के अन्य साधन न थे, तो पत्र ही संवाद का एकमात्र माध्यम था। पत्रों का काम मात्र सूचना देना ही नहीं बल्कि इनमें एक अजीब रहस्य या गोपनीयता, संग्रहणीयता, लेखन कला एवं अतीत को जानने का भाव भी छुपा होता है। पत्रों की सबसे बडी विशेषता इनका आत्मीय पक्ष है। यदि पत्र किसी खास का हुआ तो उसे छुप-छुप कर पढ़ने में एवम् संजोकर रखने तथा मौका पाते ही पुराने पत्रों के माध्यम से अतीत में लौटकर विचरण करने का आनंद ही कुछ और है। यह सही है कि संचार क्रान्ति में चिठ्ठियों की संस्कृति को खत्म करने का प्रयास किया है और पूरी दुनिया का बहुत करीब ला दिया है। पर इसका एक पक्ष यह भी है कि इसने दिलों की दूरियाँ इतनी बढ़ा दी हैं कि बिल्कुल पास में रहने वाले अपने इष्ट मित्रों और रिश्तेदारों की भी लोग खोज-खबर नहीं रखते। ऐसे में संवेदनाओं को बचा पाना कठिन हो गया है। युवा कवयित्री आकांक्षा यादव की कविता ’एस0एम0एस0’ में इसकी एक बानगी देखी जा सकती है- अब नहीं लिखते वो खत/करने लगे हैं एस0 एम0 एस0/तोड़ मरोड़ कर लिखे शब्दों के साथ/करते हैं खुशी का इजहार/मिटा देता है हर नया एस0 एम0 एस0/पिछले एस0 एम0 एस0 का वजूद/एस0 एम0 एस0 के साथ ही/शब्द छोटे होते गए/भावनाएँ सिमटती गईं/खो गयी सहेज कर रखने की परम्परा/लघु होता गया सब कुछ/रिश्तों की कद्र का अहसास भी।

पत्र लिखना एक शौक भी है। आज भी स्कूलों में जब बच्चों को पत्र लेखन की विधा सिखायी जाती है तो अनायास ही वे अपने माता-पिता, रिश्तेदारों या मित्रों को पत्र लिखने का प्रयास करने लगते हैं। फिर शुरू होता है पिता की हिदायतों का दौर और माँ द्वारा जल्द ही बेटे को अपने पास देखने की कामना व्यक्त करना। पत्र सदैव सम्बंधों की उष्मा बनाये रखते हैं। पत्र लिखने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें कोई जल्दबाजी या तात्कालिकता नहीं होती, यही कारण है कि हर छोटी से छोटी बात पत्रों में किसी न किसी रूप में अभिव्यक्त हो जाती है जो कि फोन या ई-मेल द्वारा सम्भव नहीं है। पत्रों की सबसे बड़ी विशेषता इनका स्थायित्व है। कल्पना कीजिये जब अपनी पुरानी किताबों के बीच से कोई पत्र हम अचानक पाते हैं, तो लगता है जिन्दगी मुड़कर फिर वहीं चली गयी हो। जैसे-जैसे हम पत्रोें को पलटते हैं, सम्बन्धों का एक अनंत संसार खुलता जाता है। किसी शायर ने क्या खूब लिखा है-

खुशबू जैसे लोग मिले अफसाने में
एक पुराना खत खोला अनजाने में

सिर्फ साधारण व्यक्ति ही नहीं बल्कि प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने भी पत्रों के अंदाज को जिया है। पत्रों का अपना एक भरा-पूरा संसार है। दुनिया की तमाम मशहूर शख्सियतों ने पत्र लिखे हैं- फिर चाहे वह महात्मा गाँधी हों, नेपोलियन, अब्राहम लिंकन, क्रामवेल, बिस्मार्क या बर्नाड शा हों। माक्र्स-एंजिल्स के मध्य ऐतिहासिक मित्रता का सूत्रपात पत्रों से ही हुआ। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने उस स्कूल के प्राचार्य को पत्र लिखा, जिसमें उनका पुत्र अध्ययनरत था। इस पत्र में उन्होंने प्राचार्य से अनुरोध किया था कि उनके पुत्र को वे सारी शिक्षायें दी जाय, जो कि एक बेहतर नागरिक बनने हेतु जरूरी हैं। इसमें किसी भी रूप में उनका पद आडे़ नहीं आना चाहिये। महात्मा गाँधी तो रोज पत्र लिखा करते थे। महात्मा गाँधी तो पत्र लिखने में इतने सिद्धहस्त थे कि दाहिने हाथ के साथ-साथ वे बाएं हाथ से भी पत्र लिखते थे। पं0 जवाहर लाल नेहरू अपनी पुत्री इन्दिरा गाँधी को जेल से भी पत्र लिखते रहे। ये पत्र सिर्फ पिता-पुत्री के रिश्तों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें तात्कालिक राजनैतिक एवं सामाजिक परिवेश का भी सुन्दर चित्रण है। इन्दिरा गाँधी के व्यक्तित्व को गढ़ने में इन पत्रों का बहुत बड़ा हाथ रहा है। आज ये किताब के रूप में प्रकाशित होकर ऐतिहासिक दस्तावेज बन चुके हैं। इन्दिरा गाँधी ने इस परम्परा को जीवित रखा एवं दून में अध्ययनरत अपने बेटे राजीव गाँधी को घर की छोटी-छोटी चीजों और तात्कालिक राजनैतिक-सामाजिक परिस्थितियों के बारे में लिखती रहीं। एक पत्र में तो वे राजीव को रीवा के महाराज से मिले सौगातों के बारे में भी बताती हैं। तमाम राजनेताओं-साहित्यकारों के पत्र समय-समय पर प्रकाशित होते रहते हैं। इनसे न सिर्फ उस व्यक्ति विशेष के संबंध में जाने-अनजाने पहलुओं का पता चलता है बल्कि तात्कालिक राजनैतिक-सामाजिक-साहित्यिक-सांस्कृतिक परिवेश के संबंध में भी बहुत सारी जानकारियाँ प्राप्त होती हैं।


यह अनायास ही नहीं है कि डाक विभाग ने तमाम प्रसिद्ध विभूतियों को पल्लवित-पुष्पित किया है। अमेरिका के राष्ट्रपति रहे अब्राहम लिंकन पोस्टमैन तो भारत में पदस्थ वायसराय लार्ड रीडिंग डाक वाहक रहे। विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक व नोबेल पुरस्कार विजेता सी0वी0 रमन भारतीय डाक विभाग में अधिकारी रहे वहीं प्रसिद्ध साहित्यकार व ‘नील दर्पण‘ पुस्तक के लेखक दीनबन्धु मित्र पोस्टमास्टर थे। ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित लोकप्रिय तमिल उपन्यासकार पी0वी0अखिलंदम, राजनगर उपन्यास के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित अमियभूषण मजूमदार, फिल्म निर्माता व लेखक पद्मश्री राजेन्द्र सिंह बेदी, मशहूर फिल्म अभिनेता देवानन्द डाक कर्मचारी रहे हैं। उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द जी के पिता अजायबलाल डाक विभाग में ही क्लर्क रहे। ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता मशहूर लेखिका महाश्वेता देवी ने आरम्भ में डाक-तार विभाग में काम किया था तो प्रसिद्ध बाल साहित्यकार डाॅ0 राष्ट्रबन्धु भी पोस्टमैन रहे। उर्दू अदब की बेमिसाल शख्सियत पद्मश्री शम्सुररहमान फारूकी, शायर कृष्ण बिहारी नूर, महाराष्ट्र के प्रसिद्ध किसान नेता शरद जोशी सहित तमाम विभूतियाँ डाक विभाग से जुड़ी रहीं। स्वयं उ0प्र0 की मुख्यमंत्री सुश्री मायावती के पिता डाक-तार विभाग में ही थे। साहित्य जगत में अपनी पहचान स्थापित करने वाले तमाम नाम- कवि तेजराम शर्मा, साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव, कहानीकार दीपक कुमार बुदकी, कथाकार ए. एन. नन्द, शायर अब्दाली, गीतकार राम प्रकाश शतदल, गजलकार केशव शरण, कहानीकार व समीक्षक गोवर्धन यादव, बाल साहित्यकार डा0 राष्ट्रबंधु, लघु कथाकार बलराम अग्रवाल, कालीचरण प्रेमी, अनुराग लाक्षाकर, मंचीय कवि जवाहर लाल जलज, शारदानंद दुबे, जितेन्द्र कुमार, शायर आलम खुर्शीद इत्यादि भारतीय डाक विभाग की समृद्ध परंपरा के ही अंग हैं। स्पष्ट है कि डाक विभाग सदैव से एक समृद्ध विभाग रहा है और तमाम मशहूर शख्सियतें इस विशाल विभाग की गोद में अपनी काया का विस्तार पाने में सफल रहीं।

सूचना क्रान्ति की बात करने वाले दिग्गज भले ही बड़ी-बड़ी बातें करें, पर भारतीय संदर्भ में इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि आज भी एक अरब से ज्यादा जनसंख्या वाले क्षेत्र में लगभग 50 करोड़ लोगों के पास ही टेलीफोन सुविधायें हैं अर्थात् समग्र टेलीफोन घनत्व मात्र लगभग 45 फीसदी है, जबकि गाँवों में यह और भी कम है। इण्टरनेट सुविधा का इस्तेमाल तो वर्ष 2008 तक मात्र 4.53 करोड़ लोग ही कर रहे थे। सूचना क्रान्ति के दिग्गज तो आज एफ0एम0 क्रान्ति की बात करते हैं, पर गाँवों में जाकर देखिए कितने लोग एफ0एम0 के बारे में जानते हैं। दूरदर्शन को पिछड़ा करार देकर बहु-चैनलीय संस्कृति की बात की जा रही है, टेलीफोन की बजाय मोबाइल और फिर एस0एम0एस0 की जगह एम0एम0एस0 की बात की जा रही है, पर कितने लोग इन सुविधाओं का लाभ उठा पा रहे हैं। सूचना क्रान्ति के जिन महारथियों ने विभिन्न चैनलों पर पत्रों को घिसा-पिटा करार देकर सीधे एस0एम0एस0 द्वारा जवाब माँगना आरम्भ कर दिया है, वे भारत की कितनी प्रतिशत जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करते हैं? यह सब ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार चुनावों से पहले बड़े-बड़े ‘‘मतदान पूर्व सर्वेक्षणों’’ का दावा किया जाता है, पर चुनाव के बाद अधिकतर सर्वेक्षण फ्लाप नजर आते हैं। कारण ये सर्वेक्षण समाज के मात्र एक तबके के मध्य ही किये गये हैं, ग्रामीण भारत की उनमें पूरी उपेक्षा की गई है। कोई भी सूचना या संचार क्रान्ति ग्रामीण भारत को शामिल किए बिना संभव नहीं।

पत्र कल भी लिखे जाते रहे हैं और आज भी लिखे जा रहे हैं। आज भी हर मिनट में संसार में 1,90,000 पत्र आते-जाते हैं। हाल ही में अन्तरिक्ष में उड़ान भरने वाली भारतीय मूल की सुनीता विलियम्स अपने साथ भगवद्गीता और गणेशजी की प्रतिमा के साथ-साथ अपने पिता के हिन्दी में लिखे पत्र भी साथ लेकर गयी हैं। कोई भी अखबार या पत्रिका ‘पाठकों के पत्र’ कालम का मोह नहीं छोड़ पाती है। डाकघरों के साथ-साथ कूरियर सेवाओं का समानान्तर विकास पत्रों की महत्ता को उजागर करता है। संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे सूचना क्रान्ति के अगुआ राष्ट्रों में आज भी प्रति व्यक्ति, हर वर्ष 734 डाक मदें प्राप्त करता है अर्थात एक दिन में दो से भी कुछ अंश ज्यादा। अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा को आज भी रोज 40,000 से ज्यादा पत्र प्राप्त होते हैं। फोन द्वारा न तो हर बात करना सम्भव है और न ही इण्टरनेट हर किसी की हैसियत के अन्तर्गत आते हैं। भारतीय गाँवों में जहाँ पत्नियाँ अभी भी घरों से बाहर ज्यादा नहीं निकलतीं, दूर रह रहे पति को अपनी समस्याओं व भावनाओं से पत्रों के माध्यम से ही अवगत कराती हैं और फिर पति द्वारा भेजी गई चिट्ठियों को सहेज कर बाक्स में सबसे नीचे रखती हैं ताकि अन्य किसी के हाथ न लगें। परदेश कमाने गये बेटे की चिट्ठियाँ अभी भी माँ डाकिये से पढ़वाती है और फिर उसी से जवाब लिखने की भी मनुहार करती हैं। कई बार बातों से जब बात नहीं बनती तो भी लिखने पड़ते हैं पत्र। पत्र हाथ में आते ही चेहरे पर न जाने कितने भाव आते हैं व जाते हैं, कारण पत्र की लिखावट देखकर ही उसका मजमून भांपने की अदा। व्यक्ति चिट्ठियाँ तात्कालिक रूप से भले ही जल्दी-जल्दी पढ़ ले पर फिर शुरू होती है-एकान्त की खोज और फिर पत्र अगर किसी खास के हों तो सम्बन्धों की पवित्र गोपनीयता की रक्षा करते हुए उसे छिप-छिप कर बार-बार पढ़ना व्यक्ति को ऐसे उत्साह व ऊर्जा से भर देता है, जहाँ से उसके कदम जमीं पर नहीं होते। वह जितनी ही बार पत्र पढ़ता है, उतने ही नये अर्थ उसके सामने आते हैं। ऐसा लगता है मानो वे ही साक्षात खड़े हों। ऐसे ही किसी समय में हसरत मोहानी ने लिखा होगा-

लिक्खा था अपने हाथों से जो तुमने एक बार
अब तक हमारे पास है वो यादगार खत!

कृष्ण कुमार यादव

Thursday, October 22, 2009

2009 ईसा पूर्व में लिखा गया दुनिया का पहला पत्र

हममें से हर किसी ने अपने जीवन में किसी न किसी रूप में पत्र लिखा होगा। पत्रों का अपना एक भरा-पूरा संसार है। दुनिया की तमाम मशहूर शख्सियतों ने पत्र लिखे हैं- फिर चाहे वह नेपोलियन हों, अब्राहम लिंकन, क्रामवेल, बिस्मार्क या बर्नाड शा हों। महात्मा गाँधी तो रोज पत्र लिखा करते थे. अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा को आज भी रोज ४०,०० से ज्यादा पत्र प्राप्त होते हैं.आज ये पत्र एक धरोहर बन चुके हैं। ऐसे में यह जानना अचरज भरा लगेगा कि दुनिया का सबसे पुराना पत्र बेबीलोन के खंडहरों से मिला था, जो कि मूलत: एक प्रेम-पत्र था. बेबीलोन की किसी युवती का प्रेमी अपनी भावनाओं को समेटकर उससे जब अपने दिल की बात कहने बेबीलोन तक पहुँचा तो वह युवती तब तक वहां से जा चुकी थी। वह प्रेमी युवक अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाया और उसने वहीं मिट्टी के फर्श पर खोदते हुए लिखा- ''मैं तुमसे मिलने आया था, तुम नहीं मिली।'' यह छोटा सा संदेश विरह की जिस भावना से लिखा गया था, उसमें कितनी तड़प शामिल थी। इसका अंदाजा सिर्फ वह युवती ही लगा सकती थी जिसके लिये इसे लिखा गया। भावनाओं से ओत-प्रोत यह पत्र 2009 ईसा पूर्व का है और आज हम वर्ष 2009 में जी रहे हैं. ...तो आइये पत्रों के इस सफर का स्वागत करते हैं और अपने किसी को एक खूबसूरत पत्र लिखते हैं !!