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Thursday, February 13, 2025

केंद्रीय संचार और पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्री ज्योतिरादित्य एम. सिंधिया ने महाकुंभ 2025 पर प्रयागराज में जारी किये डाक टिकट

डाक विभाग को महाकुंभ 2025 पर तीन टिकटों के साथ एक स्मारक स्मारिका पत्रक जारी करने पर गर्व है। डाक टिकटों का अनावरण माननीय केंद्रीय संचार और पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्री श्री ज्योतिरादित्य एम. सिंधिया ने प्रयागराज के अरैल घाट डाकघर में 13 फरवरी, 2025 को किया।

महाकुंभ 2025 की समृद्ध परंपराओं का सम्मान करते हुए, अन्य डाक टिकट संग्रह सामग्री भी जारी की गई, जिसमें पवित्र स्नान दिवसों पर विशेष कवर और विरूपीकरण, ‘दिव्य, भव्य और डिजिटल महाकुंभ’ और ‘प्रख्यात प्रयागराज’ का उत्सव मनाते हुए एक चित्र पोस्टकार्ड भी शामिल हैं। ये डाक टिकट महाकुंभ के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हैं।


कुंभ मेले की उत्पत्ति हिंदू पौराणिक कथाओं में निहित है। प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथों में समुद्र मंथन की कहानी के अनुसार, देवताओं और राक्षसों के बीच अमृत (अमरता का अमृत) के लिए लड़ाई हुई थी। इस दिव्य युद्ध के दौरान, अमृत की बूंदें चार स्थानों पर गिरी थीं - प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक - जहां अब कुंभ मेला आयोजित किया जाता है, तथा प्रयागराज में हर 144 साल में एक बार महाकुंभ का आयोजन होता है। इसका धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व बहुत अधिक है।

स्मारिका पत्रक में जारी तीन टिकटें इस कविता से प्रेरित हैं:

त्रिवेणीं माधवं सोमं भारद्वाजं च वासुकिम्।

वन्दे अक्षयवटं शेष प्रयागं तीर्थनायकम्।

श्री शंख सामंत द्वारा डिजाइन किए गए स्मारक डाक टिकटों में त्रिवेणी तीर्थ के तीन प्रमुख पहलुओं - महर्षि भारद्वाज आश्रम, स्नान और अक्षयवट को खूबसूरती से दर्शाया गया है।

महर्षि भारद्वाज आश्रम, ऋषि भारद्वाज के समय में एक प्रसिद्ध शैक्षणिक केंद्र था। इसका उल्लेख रामायण में भी मिलता है, जब श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण अपने वनवास काल के दौरान आश्रम में आए थे। दूसरे टिकट स्नान में त्रिवेणी संगम में पवित्र स्नान करने के महत्व को दर्शाया गया है। लाखों तीर्थयात्री त्रिवेणी में डुबकी लगाते हैं, यह विश्वास करते हुए कि उनके पाप धुल जाएंगे और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होगी। तीसरा टिकट, अक्षयवट, अमर बरगद का पेड़ है जिसके नीचे श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण ने अपने वनवास के दौरान विश्राम किया था। प्राचीन शास्त्रों के अनुसार, प्रलय के दौरान भी अक्षयवट स्थिर रहता है।

इस ऐतिहासिक घटना की याद में सीमित संस्करण में टिकटों, प्रथम दिवस कवर और ब्रोशरों का संग्रहणीय स्मारिका खरीदें! अब https://www.epostoffice.gov.in/ पर उपलब्ध है। संग्रहणीय वस्तुएं सुरक्षित करें और महाकुंभ 2025 की महिमा का जश्न मनाएं।


Thursday, February 18, 2021

First Airmail Service : फरवरी 1911 में प्रयागराज में आरम्भ हुई थी दुनिया की पहली हवाई डाक सेवा, एयरमेल सेवा ने पूरा किया 110 सालों का सफरनामा

डाक सेवाओं ने पूरी दुनिया में एक लम्बा सफर तय किया है। डाक सेवाओं के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश का स्थान प्रमुख है। उ.प्र. के प्रयागराज शहर को यह सौभाग्य प्राप्त है कि दुनिया की पहली हवाई डाक सेवा यहीं से आरम्भ हुई। वाराणसी परिक्षेत्र के पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि यह ऐतिहासिक घटना 110 वर्ष पूर्व 18 फरवरी 1911 को प्रयागराज में हुई थी। संयोग से उस साल कुंभ का मेला भी लगा था। उस दिन दिन  फ्रेंच पायलट मोनसियर हेनरी पिक्वेट ने एक नया इतिहास रचा था। वे अपने विमान में प्रयागराज से नैनी के लिए 6500 पत्रों को अपने साथ लेकर उड़े। विमान था हैवीलैंड एयरक्राफ्ट और इसने दुनिया की पहली सरकारी डाक ढोने का एक नया दौर शुरू किया। 

पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव के अनुसार प्रयागराज में उस दिन डाक की उड़ान देखने के लिए लगभग एक लाख लोग इकट्ठे हुए थे जब एक विशेष विमान ने शाम को साढ़े पांच बजे यमुना नदी के किनारों से उड़ान भरी और वह नदी को पार करता हुआ 15 किलोमीटर का सफर तय कर नैनी जंक्शन के नजदीक उतरा जो प्रयागराज के बाहरी इलाके में सेंट्रल जेल के नजदीक था। आयोजन स्थल एक कृषि एवं व्यापार मेला था जो नदी के किनारे लगा था और उसका नाम ‘यूपी एक्जीबिशन’ था। इस प्रदर्शनी में दो उड़ान मशीनों का प्रदर्शन किया गया था। विमान का आयात कुछ ब्रिटिश अधिकारियों ने किया था। इसके कलपुर्जे अलग अलग थे जिन्हें आम लोगों की मौजूदगी में प्रदर्शनी स्थल पर जोड़ा गया।  प्रयागराज से नैनी जंक्शन तक का हवाई सफ़र आज से 110  साल पहले मात्र  13 मिनट में पूरा हुआ था।

पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि हालांकि यह उडान महज छह मील की थी, पर इस घटना को लेकर प्रयागराज में ऐतिहासिक उत्सव सा वातावरण था। ब्रिटिश एवं कालोनियल एयरोप्लेन कंपनी ने जनवरी 1911 में प्रदर्शन के लिए अपना एक विमान भारत भेजा थाए जो संयोग से तब प्रयागराज आया जब कुम्भ का मेला भी चल रहा था। वह ऐसा दौर था जब जहाज देखना तो दूर लोगों ने उसके बारे में ठीक से सुना भी बहुत कम था। ऐसे में इस ऐतिहासिक मौके पर अपार भीड़ होना स्वाभाविक ही था। इस यात्रा में हेनरी ने इतिहास तो रचा ही पहली बार आसमान से दुनिया के सबसे बडे प्रयाग कुंभ का दर्शन भी किया। 

 पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव के अनुसार कर्नल वाई विंधाम ने पहली बार हवाई मार्ग से कुछ मेल बैग भेजने के लिए डाक अधिकारियों से संपर्क किया जिस पर उस समय के डाक प्रमुख ने अपनी सहर्ष स्वीकृति दे दी। मेल बैग पर ‘पहली हवाई डाक’ और ‘उत्तर प्रदेश प्रदर्शनी, इलाहाबाद’ लिखा था। इस पर एक विमान का भी चित्र प्रकाशित किया गया था। इस पर पारंपरिक काली स्याही की जगह मैजेंटा स्याही का उपयोग किया गया था। आयोजक इसके वजन को लेकर बहुत चिंतित थे, जो आसानी से विमान में ले जाया जा सके। प्रत्येक पत्र के वजन को लेकर भी प्रतिबंध लगाया गया था और सावधानीपूर्वक की गई गणना के बाद सिर्फ 6,500 पत्रों को ले जाने की अनुमति दी गई थी। विमान को अपने गंतव्य तक पहुंचने में 13 मिनट का समय लगा।

 भारत में डाक सेवाओं पर तमाम लेख और एक पुस्तक 'इंडिया पोस्ट : 150 ग्लोरियस ईयर्ज़' लिख चुके श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया  कि इस पहली हवाई डाक सेवा का विशेष शुल्क छह आना रखा गया था और इससे होने वाली आय को आक्सफोर्ड एंड कैंब्रिज हॉस्टल, इलाहाबाद को दान में दिया गया। इस सेवा के लिए पहले से पत्रों के लिए खास व्यवस्था बनाई गई थी। 18 फरवरी को दोपहर तक इसके लिए पत्रों की बुकिंग की गई। पत्रों की बुकिंग के लिए आक्सफोर्ड कैंब्रिज हॉस्टल में ऐसी भीड लगी थी कि उसकी हालत मिनी जी.पी.ओ सरीखी हो गई थी। डाक विभाग ने यहाँ तीन-चार कर्मचारी भी तैनात किए थे। चंद रोज में हॉस्टल में हवाई सेवा के लिए 3000 पत्र पहुँच गए। एक पत्र में तो 25 रूपये का डाक टिकट लगा था। पत्र भेजने वालों में प्रयागराज की कई नामी गिरामी हस्तियाँ तो थी हीं, राजा महाराजे और राजकुमार भी थे।























Wednesday, February 18, 2015

इलाहाबाद में आरम्भ हुई थी 18 फरवरी 1911 को दुनिया की पहली हवाई डाक सेवा

डाक सेवाओं ने पूरी दुनिया एक लम्बा सफर तय किया है। डाक सेवाओं के क्षेत्र में इलाहाबाद का स्थान प्रमुख है। इलाहाबाद को यह सौभाग्य प्राप्त है कि दुनिया की पहली हवाई डाक सेवा यहीं से आरम्भ हुई। इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवायें कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि यह ऐतिहासिक घटना  104 वर्ष पूर्व 18 फरवरी 1911 को इलाहाबाद में हुई। संयोग से उस साल कुंभ का मेला भी लगा था। उस दिन दिन  फ्रेंच पायलट मोनसियर हेनरी पिक्वेट ने एक नया इतिहास रचा था। वे अपने विमान में इलाहाबाद से नैनी के लिए 6500 पत्रों को अपने साथ लेकर उडे। विमान था हैवीलैंड एयरक्राफ्ट और इसने दुनिया की पहली सरकारी डाक ढोने का एक नया दौर शुरू किया। 

डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव के अनुसार इलाहाबाद में उस दिन डाक की उड़ान देखने के लिए लगभग एक लाख लोग इकट्ठे हुए थे जब एक विशेष विमान ने शाम को साढ़े पांच बजे यमुना नदी के किनारों से उड़ान भरी और वह नदी को पार करता हुआ 15 किलोमीटर का सफर तय कर नैनी जंक्शन के नजदीक उतरा जो इलाहाबाद के बाहरी इलाके में सेंट्रल जेल के नजदीक था। आयोजन स्थल एक कृषि एवं व्यापार मेला था जो नदी के किनारे लगा था और उसका नाम ‘यूपी एक्जीबिशन’ था। इस प्रदर्शनी में दो उड़ान मशीनों का प्रदर्शन किया गया था। विमान का आयात कुछ ब्रिटिश अधिकारियों ने किया था। इसके कलपुर्जे अलग अलग थे जिन्हें आम लोगों की मौजूदगी में प्रदर्शनी स्थल पर जोड़ा गया। इलाहाबाद से नैनी जंक्शन तक का हवाई सफ़र आज से 104  साल पहले मात्र  13 मिनट में पूरा हुआ था।

निदेशक कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि हालांकि यह उडान महज छह मील की थी, पर इस घटना को लेकर इलाहाबाद में ऐतिहासिक उत्सव सा वातावरण था। ब्रिटिश एवं कालोनियल एयरोप्लेन कंपनी ने जनवरी 1911 में प्रदर्शन के लिए अपना एक विमान भारत भेजा थाए जो संयोग से तब इलाहाबाद आया जब कुम्भ का मेला भी चल रहा था। वह ऐसा दौर था जब जहाज देखना तो दूर लोगों ने उसके बारे में ठीक से सुना भी बहुत कम था। ऐसे में इस ऐतिहासिक मौके पर अपार भीड होना स्वाभाविक ही था। इस यात्रा में हेनरी ने इतिहास तो रचा ही पहली बार आसमान से दुनिया के सबसे बडे प्रयाग कुंभ का दर्शन भी किया। 

 निदेशक डाक सेवाएँ कृष्ण कुमार यादव के अनुसार कर्नल वाई विंधाम ने पहली बार हवाई मार्ग से कुछ मेल बैग भेजने के लिए डाक अधिकारियों से संपर्क किया जिस पर उस समय के डाक प्रमुख ने अपनी सहर्ष स्वीकृति दे दी। मेल बैग पर ‘पहली हवाई डाक’ और ‘उत्तर प्रदेश प्रदर्शनी, इलाहाबाद’ लिखा था। इस पर एक विमान का भी चित्र प्रकाशित किया गया था। इस पर पारंपरिक काली स्याही की जगह मैजेंटा स्याही का उपयोग किया गया था। आयोजक इसके वजन को लेकर बहुत चिंतित थे, जो आसानी से विमान में ले जाया जा सके। प्रत्येक पत्र के वजन को लेकर भी प्रतिबंध लगाया गया था और सावधानीपूर्वक की गई गणना के बाद सिर्फ 6,500 पत्रों को ले जाने की अनुमति दी गई थी। विमान को अपने गंतव्य तक पहुंचने में 13 मिनट का समय लगा।

भारतीय डाक पर एक पुस्तक लिख चुके श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया  कि इस पहली हवाई डाक सेवा का विशेष शुल्क छह आना रखा था और इससे होने वाली आय को आक्सफोर्ड एंड कैंब्रिज हास्टल इलाहाबाद को दान में दिया गया। इस सेवा के लिए पहले से पत्रों के लिए खास व्यवस्था बनाई गई थी। 18 फरवरी को दोपहर तक इसके लिए पत्रों की बुकिंग की गई। पत्रों की बुकिंग के लिए आक्सफोर्ड कैंब्रिज हॉस्टल में ऐसी भीड लगी थी कि उसकी हालत मिनी जीपीओ सरीखी हो गई थी। डाक विभाग ने यहां तीन चार कर्मचारी भी तैनात किए थे। चंद रोज में होस्टल में हवाई सेवा के लिए 3000 पत्र पहुंच गए। एक पत्र में तो 25 रूपये का टिकट लगा था। पत्र भेजने वालों में इलाहाबाद की कई नामी गिरामी हस्तियां तो थी हीं, राजा महाराजे और राजकुमार भी थे।









Please also read here : 
World's 1st Air Mail started during Maha Kumbh in 1911 (Courtesy : Times of India)


Tuesday, March 12, 2013

डाक विभाग ने कुम्भ पर्व के अंतिम स्नान महाशिवरात्रि पर जारी किया विशेष डाक आवरण

डाक विभाग द्वारा कुम्भ पर्व में महाशिवरात्रि के स्नान (10 मार्च) पर विशेष आवरण का विरूपण एवं विमोचन जारी किया गया। इलाहाबाद प्रधान डाकघर में आयोजित कार्यक्रम में राजर्षिटंडन मुक्तविश्वविधालय के कुलपति प्रो. ए॰ के॰ बक्शी ने पोस्टमास्टर जनरल लेफ्टिनेंट कर्नल ए॰ के. गुप्ता  निदेशक डाक सेवाएँ  कृष्ण कुमार यादव के साथ विशेष आवरण का विरूपण एवं विमोचन किया।

      इस अवसर पर अपने उदबोधन में मुख्य अतिथि प्रो॰ ए॰ के॰ बक्शी ने कहा कि भारत में प्राचीन काल से ही धर्म एवं आध्यात्म की एक लम्बी परंपरा रही है और कुम्भ उन सभी को आत्मसात करते हुए एक लघु भारत का एहसास है। उन्होने कुम्भ पर्व के अंतिम स्नान महाशिवरात्रि पर जारी विशेष आवरण की सराहना करते हुए कहा कि इनके माध्यम से प्रयाग एवं कुम्भ की संस्कृति देश ही नहीं विदेशों में भी सुवासित होगी। पोस्टमास्टर जनरल लेफ्टिनेंट कर्नल ए॰ के॰ गुप्ता ने महाशिवरात्रि पर्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि महाशिवरात्रि का पर्व फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन मनाया  जाता है। धर्मग्रंथों के अनुसार, इसी दिन भगवान शंकर और भगवती पार्वती का विवाह हुआ था। यह पर्व हमें कल्याणकारी कार्य करने के लिए प्रेरित करता है।
      इलाहाबाद क्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएँ  कृष्ण कुमार यादव ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि जैसे कुम्भ में भिन्न मत-मतांतर एवं धर्मों के अनुयायियों का समावेश होता है वैसे ही भगवान शंकर की प्रकृति भी समस्त विरोधाभाषों को समावेशित करते हुए एकता का संदेश देती है। श्री यादव ने कहा कि धर्म जीवन का एक मूलभूत तत्व है पर इसे आज सामाजिक सरकारों के साथ जोड़ने की जरूरत है।
      कार्यक्रम का संचालन सहायक निदेशक  आर॰ एन॰ यादव, अतिथियों का स्वागत प्रवर अधीक्षक डाकघर इलाहाबाद  रहमतुल्लाह आभार ज्ञापन  ए॰ के॰ श्रीवास्तव, कुम्भ मेला अधिकारी (डाक) द्वारा किया गया। कार्यक्रम में सहायक निदेशक मधुसुदन प्रसाद मिश्रा, सीनियर पोस्टमास्टर टी. बी. सिंह, अधीक्षक आर॰ एन॰ यादव, निरीक्षक दीपक कुमार, अर्जित सोनी, रजनीश श्रीवास्तव सहित तमाम अधिकारी, कर्मचारी, फिलाटेलिस्ट, साहित्यकार आदि उपस्थित थे।