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Thursday, July 9, 2009

डाक टिकटों पर कानपुर

कानपुर आरम्भ से ही राजनैतिक-सामाजिक-साहित्यिक-औद्योगिक गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र रहा है और यही कारण है कि कानपुर से जुड़े- गणेश शंकर विद्यार्थी (25 मार्च 1962, 15 पैसे), दीन दयाल उपाध्याय (5 मई 1978, 25 पैसे), तात्या टोपे (10 मई 1984, 50 पैसे)े, नाना साहब (10 मई 1984, 50 पैसे), चन्द्रशेखर आजाद (27 फरवरी 1988, 60 पैसे), बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ (8 दिसम्बर 1989, 60 पैसे), श्याम लाल गुप्त ‘पार्षद’ (4 मार्च 1997, 1 रूपये), नरेन्द्र मोहन (14 अक्टूबर 2003, 5 रूपया), पदमपत सिंहानिया (3 फरवरी 2005, 5 रूपया) जैसी विभूतियों पर अभी तक डाक टिकट जारी हो चुके हैं। 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की 150वीं जयन्ती पर कानपुर व लखनऊ में हुए घमासान युद्वों को दर्शाते हुए 9 अगस्त 2007 को 5 रूपये व 15 रूपये मूल्यवर्ग के डाक टिकट व मिनीएचर शीट जारी किये गये। इसके अलावा बिठूर से जुड़े होने के कारण रानी लक्ष्मीबाई (15 अगस्त 1957, 15 पैसे) व महर्षि बाल्मीकि (14अक्टूबर 1970, 20 पैसे) पर जारी डाक टिकटों को भी इसी क्रम में रखा जाता है। यही नहीं फूलबाग स्थित राजकीय संग्राहलय में भी डाक टिकटों के संकलन का एक अलग सेक्शन है। डाक टिकटों के मामले में एक रोचक तथ्य कानपुर से जुड़ा हुआ है। वर्ष 1957 में बाल दिवस पर पहली बार तीन स्मारक डाक टिकट जारी किये गये, जो पोषण (8 पैसे, केला खाता बालक), शिक्षा (15 पैसे, स्लेट पर लिखती लड़की) व मनोरंजन (90 पैसे, मिट्टी का बना बांकुरा घोड़ा) पर आधारित थे। दस हजार फोटोग्रास में से चयनित शेखर बार्कर व रीता मल्होत्रा को क्रमशः पोषण व शिक्षा पर जारी डाक टिकटों पर अंकित किया गया। स्लेट पर लिखती लड़की रीता मल्होत्रा कानपुर की थी। ठीक पचास वर्ष बाद वर्ष 2007 में बाल दिवस पर डाक टिकट जारी होने के दौरान शेखर बार्कर व रीता मल्होत्रा को भी आमंत्रित किया गया, पर रीता मल्होत्रा को शायद खोजा न जा सका। इस प्रकार कानपुर की विभूतियों पर जारी डाक टिकटों के क्रम में रीता मल्होत्रा का नाम भी शामिल किया जा सकता है।

डाक टिकट संग्रह को बढ़ावा देने हेतु कानपुर जी0पी0ओ0 में जुलाई 1973 में फिलेटलिक ब्यूरो की स्थापना की गयी जिसमें तमाम डाक टिकटों और उनसे जुड़ी सामग्रियों का अवलोकन किया जा सकता है। कानपुर में 30 अक्टूबर-1 नवम्बर 1982, 17-18 फरवरी 2001, 22-23 मार्च 2003, 24-25 नवम्बर 2004 और 22-23 दिसम्बर 2006 को डाक टिकटों के प्रति लोगों को आकर्षित करने हेतु और इससे जुड़े विभिन्न पहलुओं से रूबरू कराने हेतु डाक टिकट प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। इन प्रदर्शनियों में 30 अक्टूबर-1 नवम्बर 1982 को ‘फिलकाॅन-82‘ के दौरान क्रमशः प्रथम भारतीय पोस्टमास्टर जनरल राय बहादुर सालिगराम, रानी लक्ष्मीबाई व श्री राधाकृष्ण मन्दिर (जे0के0मन्दिर) पर, तत्पश्चात 24 नवम्बर 2004 को ’कानफिलेक्स-2004‘ के दौरान कानपुर जी0पी0ओ0 भवन पर और 22 व 23 दिसम्बर 2006 को ‘कानपेक्स-2006‘ के दौरान क्रमशः ’कानपुर की स्थापत्य कला’ (कानपुर जी0पी0ओ0, लालइमली, फूलबाग, कानपुर सेण्ट्रल रेलवे स्टेशन, चन्द्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के भवनों के चित्र अंकित) एवं ’बिठूर की धरोहरें’ (नानाराव पेशवा का किला, स्वर्ग नसेनी, ब्रहमावर्त घाट, लवकुश जन्मस्थली के चित्र अंकित) पर विशेष आवरण जारी किये गये। इसी प्रकार 17 जनवरी 2009 को महाराज प्रयाग नारायण मंदिर, शिवाला पर विशेष आवरण जारी किया गया। इन जारी आवरणों द्वारा कानपुर की समृद्ध ऐतिहासिक विरासतों को दर्शाने का प्रयास किया गया है।

Wednesday, July 8, 2009

क्रान्तिकारियों के निशाने पर रहे डाकघर

स्वतन्त्रता आन्दोलन में कानपुर की प्रमुख भूमिका रही है। 1857 के बाद से डाकघर बराबर क्रान्तिकारियों के निशाने पर रहे और आगजनी तथा लूटपाट का दौर कानपुर के डाकघरों ने भी देखा। इस दौर में तमाम क्रान्तिकारी नायकों ने भी बड़ी संख्या में हरकारों की भर्ती कर रखी थी, जो उनके लिए गुप्त खबरें भी लाते थे। कानपुर में नाना साहब के दरबार में एक हरकारे गिरधारी ने ही मेरठ विद्रोह की खबर सर्वप्रथम पहुँचाई थी, जिसे बाद में अंग्रेजों ने मौत के घाट उतार दिया। 1857 की क्रान्ति के दौरान जब क्रान्तिकारियों ने कानपुर में अंग्रेजों की संचार व्यवस्था ध्वस्त कर दी तो सेनापति कोलिन थेंप विल ने पत्र द्वारा गर्वनर जनरल लार्ड केनिंग को यहाँ के बारे में सूचित करते हुए सलाह दी कि जब तक अंग्रेजी सेनायें अवध को काबू में नहीं करेंगी, तब तक क्रान्ति की चिंगारी यँू ही फैलती रहेगी। कालान्तर में भी डाक सेवायें लोगों के निशाने पर रहीं, क्योंकि अंग्रेजों के पास संचार माध्यम का यह सबसे सशक्त साधन था। 1940 के दौरान राजस्थान के देवली नामक स्थान में बनाये गये कैम्प में समग्र भारत से लगभग 400 क्रान्तिकारियों को अंग्रेजी हुकूमत ने बन्द कर दिया था, जिसमें कानपुर के भी तमाम लोग थे। इसके विरोध में 8 नवम्बर 1940 को कानपुर में छात्रों ने देवली दिवस की घोषण कर जुलूस निकाले। डी0ए0वी0 से चले जुलूस को सिरकी मोहाल चैकी के पीछे वाली गली में पहुँचने पर पुलिस ने दोनों ओर से घेर कर लाठीचार्ज किया और कुछ लोगों को गिरतार भी कर लिया। इससे आक्रोशित होकर 16 वर्षीय छात्र सूरजबली नादिरा ने अपने साथी शिवशंकर सिंह और अन्य के साथ बड़ा चैराहा स्थिति डाकघर में धावा बोलकर 1,36,000 रूपये अपने कब्जे में कर लिये और पुलिस द्वारा घिर जाने पर नोट लुटाते भाग गये। यद्यपि बाद में पुलिस ने नादिरा को गिरतार कर लिया। इसी प्रकार भारत छोड़ो आन्दोलन के आवह्यन के अगले दिन 10 अगस्त 1942 को आन्दोलित भीड़ ने मेस्टन रोड डाकघर में हमला बोलकर 50,000 रूपये की नकदी लूट ली व सारा सामान आग के हवाले कर दिया। नयागंज डाकखाने का भी सारा सामान लूट लिया गया और जनरलगंज व नरौना एक्सचेन्ज डाकघरों में आग लगाने के साथ-साथ तमाम लेटरबाक्सों को भी नुकसान पहुँचाया गया।

Tuesday, July 7, 2009

भारत के 8 जी0पी0ओ0 में से एक कानपुर में

डाक विभाग की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार समस्त भारत में 8 जी0पी0ओ0 हैं, जो कि मुम्बई, कोलकाता, अहमदाबाद, बेंगलूर, चेन्नई, दिल्ली, लखनऊ और कानपुर में स्थित हैं। इनमें कानपुर जी0पी0ओ0 चीफ पोस्टमास्टर के अधीन कानपुर नगर के व्यस्ततम बड़ा चैराहा पर अवस्थित है। यह एकमात्र ऐसा जी0पी0ओ0 है जो कि अपनी स्थापना के समय राजधानी में अवस्थित नहीं था। एक डाकघर के रूप में इसने 1901 में कार्य करना आरम्भ किया। उस समय यह एक अंग्रेज अधिकारी के बंगले में अवस्थित था। कालान्तर में वर्तमान स्थान पर जी0पी0ओ0 भवन का शिलान्यास 9 सितम्बर 1962 को भारत सरकार के तत्कालीन परिवहन एवं संचार मंत्री श्री जगजीवन राम ने और उद्घाटन 11 अगस्त 1969 को संचार विभाग के तत्कालीन सचिव श्री लक्ष्मी चंद जैन (आई0सी0एस0) ने किया। पहले यह कानपुर डाक मण्डल के अधीन था। 4 जनवरी 1972 को प्रधान डाकघर के रूप में इसका अपग्रेडेशन हुआ और श्री एच0पी0त्रिवेदी (04 जनवरी 72-15 जुलाई 72) इसके प्रथम चीफ पोस्टमास्टर बने। 124 लेटर बाक्स और 187 डाकियों के माध्यम से डाक सेवा जी0पी0ओ0 के अधीनस्थ क्षेत्रों में कार्य कर रही है। 40 उपडाकघर, 02 अतिरिक्त विभागीय उपडाकघर और 23 शाखा डाकघर इसके लेखा क्षेत्र के अन्र्तगत आते हैं। कानपुर जी0 पी0 ओ0 परिसर का क्षेत्रफल 8750 वर्गमीटर है और 3915 वर्गमीटर में इसका भवन बना है। इस चार मंजिला भवन, जिसमें कि एक भूतल भी है, में चीफ पोस्टमास्टर कानपुर जी0पी0ओ0 के अलावा पोस्टमास्टर जनरल कानपुर रीजन, प्रवर डाक अधीक्षक कानपुर नगर मण्डल, प्रवर अधीक्षक रेल डाक सेवा ‘केपी’ मण्डल कानपुर, डाक अधीक्षक कानपुर (मुफस्सिल), अधीक्षक सर्किल स्टैम्प डिपो और प्रबन्धक मेल मोटर सर्विस के कार्यालय भी अवस्थित हैं। कानपुर नगर मण्डल द्वारा आयोजित डाक टिकट प्रदर्शनी ’कानफिलेक्स’ के दौरान 24 नवम्बर 2004 को कानपुर जी0पी0ओ0 भवन पर एक विशेष आवरण भी जारी किया गया । कानपुर जी0पी0ओ0 की विशिष्टता को देखते हुए ही उत्तर प्रदेश में सर्वप्रथम राष्ट्रीय स्पीड पोस्ट केन्द्र यहीं पर 15 नवम्बर 1986 को खोला गया। 14नवम्बर 2006 को कानपुर जी0पी0ओ0 में सभी वित्तीय सेवाएं एक छत के नीचे उपलब्ध कराने हेतु पोस्टल फाइनेंस मार्ट की स्थापना की गई। बचत सेवाओं से प्राप्त सकल जमा के मामले में उ0प्र0 में कानपुर का द्वितीय स्थान है। इस समय यह एक ‘‘प्रोजेक्ट एरो‘‘ डाकघर है.

Sunday, July 5, 2009

कानपुर में निदेशक डाक सेवाएं पद सर्वप्रथम स्थापित

डाक विभाग ने विकेन्द्रीकरण की नीति अपनाते हुये प्रायोगिक तौर पर देश के तीन प्रमुख क्षेत्रों में जुलाई 1973 के दौरान निदेशक डाक सेवाएं पद स्थापित किया। इनमें से एक कानपुर और दो अन्य कोयम्बटूर व नागपुर थे। भारतीय डाक सेवा के अधिकारी श्री एस0आर0 फारूखी को कानपुर क्षेत्र में प्रथम निदेशक बनाया गया। कालान्तर में इस व्यवस्था को समाप्त करते हुए अखिल भारतीय स्तर पर 2 अप्रैल 1979 को सभी क्षेत्रों में रीजनल स्तर की स्थापना की गयी और निदेशक डाक सेवायें पद को इस स्तर पर स्थापित किया गया। कानपुर रीजन में प्रथम निदेशक के रूप में भारतीय डाक सेवा के अधिकारी श्री आर0एस0 गुप्ता की नियुक्ति हुयी। कानपुर में 27 नवम्बर 1986 को अपग्रेडेशन द्वारा अतिरिक्त पोस्टमास्टर जनरल पद का सृजन किया गया और इस पद को 1 मार्च 1989 से पोस्टमास्टर जनरल के रूप में तब्दील कर दिया गया। अतिरिक्त पोस्टमास्टर जनरल के पद सृजन के समय श्री एल0सी0राम कानपुर रीजन के निदेशक (4 मई 1982 से 1 फरवरी 1986 तक) थे। श्री के0एल0 मल्होत्रा कानपुर रीजन के प्रथम अतिरिक्त पोस्टमास्टर जनरल (27 नवम्बर 1986 से 28 फरवरी 1989 तक) नियुक्त हुए व तत्पश्चात 1 मार्च 1989 से 14 मार्च 1990 तक वे कानपुर रीजन के प्रथम पोस्टमास्टर जनरल भी रहे।

डाक सेवाओं को सुचारु रूप से चलाने के लिए विभिन्न क्रियात्मक गतिविधियों हेतु समय-समय पर डाक विभाग द्वारा तमाम इकाईयाँ स्थापित की गई। डाक को विभिन्न डाकघरों से एकत्र करने और उन्हें आर0एम0एस0 व अन्य गन्तव्य स्थानों तक पहुँचाने हेतु दिसम्बर 1963 में कानपुर में मेल मोटर सेवा आरम्भ की गई। इसी प्रकार डाकघरों में डाक टिकट, डाक स्टेशनरी- पोस्टकार्ड, अन्तर्देशीय पत्र, लिफाफा इत्यादि, केन्द्र्रीय भर्ती शुल्क, इण्डियन पोस्टल आर्डर एवं बचत-पत्रों इत्यादि की आपूर्ति के लिये कानपुर में सर्किल स्टैम्प डिपो की 24 फरवरी 1981 को स्थापना की गई। भारतीय प्रतिभूति मुद्रणालय, नासिक से प्राप्त डाक टिकट, डाक स्टेशनरी, केन्द्र्रीय भर्ती शुल्क, राष्ट्रीय बचत पत्र व किसान विकास पत्र एवं सिक्यूरिटी प्रिन्टिंग प्रेस, हैदराबाद से प्राप्त इण्डियन पोस्टल आर्डर को सर्किल स्टैम्प डिपो, कानपुर उत्तर प्रदेश डाक परिमण्डल के 62 प्रधान डाकघरों को आपूर्ति करता है। लखनऊ रीजन के अलावा उत्तर प्रदेश डाक परिमण्डल के सभी रीजनों की आपूर्ति यहीं से होती है। कानपुर की विशिष्टता को देखते हुए ही उत्तर प्रदेश में सर्वप्रथम राष्ट्रीय स्पीड पोस्ट केन्द्र यहीं पर 15 नवम्बर 1986 को खोला गया। 14नवम्बर 2006 को कानपुर जी0पी0ओ0 में सभी वित्तीय सेवाएं एक छत के नीचे उपलब्ध कराने हेतु पोस्टल फाइनेंस मार्ट की स्थापना की गई। बचत सेवाओं से प्राप्त सकल जमा के मामले में उ0प्र0 में कानपुर का द्वितीय स्थान है।

डाक सेवाओं में महत्वपूर्ण कानपुर

व्यवस्थित तौर पर कानपुर में डाक सेवाओं का इतिहास काफी पुराना है। आरम्भ में कानपुर डाक मण्डल के अन्तर्गत कानपुर, फतेहपुर, उन्नाव, रायबरेली, इटावा, फतेहगढ़ और मैनपुरी जनपद शामिल थे। कालान्तर में फतेहगढ़, मैनपुरी और इटावा को कानपुर डाक मण्डल से पृथक कर 15 फरवरी 1935 को फतेहगढ़ डाक मण्डल की स्थापना की गई। बाद में प्रतापगढ़ डाक मण्डल की स्थापना उपरान्त रायबरेली को कानपुर डाक मण्डल से पृथक कर 1जनवरी 1955 को प्रतापगढ़ डाक मण्डल का भाग बना दिया गया। 4 जनवरी 1972 को कानपुर प्रधान डाकघर का अपग्रेडेशन हुआ और यह कानपुर मण्डल से स्वतन्त्र इकाई के रूप में संचालित होने लगा। पुनः 28 फरवरी 1973 को कानपुर देहात, उन्नाव और फतेहपुर को कानपुर डाक मण्डल से पृथक करते हुये एक अलग कानपुर (मुफस्सिल) डाक मण्डल बनाया गया। उस समय कानपुर देहात कानपुर जनपद का और उन्नाव लखनऊ जनपद के भाग थे, जो कि कालान्तर में पृथक जनपद के रूप में अवस्थित हुये। इसके बाद कानपुर डाक मण्डल में सिर्फ कानपुर नगर राजस्व जनपद का क्षेत्र बचा। बाद में 1 फरवरी 1981 को कानपुर (मुफस्सिल) से पृथक कर फतेहपुर डाक मण्डल की स्थापना की गई।

वर्तमान रूप में कानपुर नगर डाक मण्डल की स्थापना 28 फरवरी 1973 को हुई। कानपुर नगर मण्डल में कुल 174 डाकघर हैं, जिनमें 02 प्रधान डाकघर, 94 उप डाकघर, 02 अतिरिक्त विभागीय उपडाकघर और 76 शाखा डाकघर हैं। इसके अलावा 08 पंचायत संचार सेवा केन्द्र व एक फ्रेन्चाइजी आउटलेट भी चल रहे हैं। 31 वितरण डाकघर, 317 डाकियों और 640 लेटर बाक्सों के माध्यम से डाक सेवा नगर मण्डल में कार्य कर रही है। इसके अलावा तमाम ग्रामीण डाक सेवक भी वितरण कार्य में संलग्न हैं। कानपुर नगर मण्डल के कार्यक्षेत्र में अवस्थित नरोना एक्सचेंज डाकघर में लगे शिलापट के अनुसार इस डाकघर का शुभारम्भ 4 अप्रैल 1911 को मिस्टर सी0आर0क्लार्क (आई0सी0एस0), तत्कालीन पोस्टमास्टर जनरल उत्तर प्रदेश द्वारा किया गया था, जो कि कानपुर में अग्रणी डाक सेवाओं को दर्शाता है। कानपुर जी0पी0ओ0 के अलावा नगर के समस्त डाकघर प्रवर डाक अधीक्षक, कानपुर नगर मण्डल के प्रशासकीय नियन्त्रण के अधीन हैं। इस मण्डल के अधीनस्थ नवाबगंज और कैण्ट डाकघरों को अपग्रेडेशन द्वारा क्रमशः 1 अक्टूबर 1973 व 1 जनवरी 1979 को प्रधान डाकघरों में तब्दील कर दिया गया। वर्तमान में नवाबगंज प्रधान डाकघर के लेखा क्षेत्र में 38 और कैण्ट प्रधान डाकघर के लेखा क्षेत्र में 39 उपडाकघर कार्यरत हैं। कानपुर नगर मण्डल के अधीनस्थ शेष 19 उपडाकघर कानपुर जी0पी0ओ0 के लेखा क्षेत्र में आते हैं।

Friday, July 3, 2009

कानपुर में रेल डाक सेवा

रेलवे सेवा आरम्भ होने के बाद इलाहाबाद और कानपुर के बीच अखिल भारतीय स्तर पर प्रथम बार रेलवे सार्टिंग सेक्शन की स्थापना 1 मई 1864 को की गई, जो कि कालान्तर में रेलवे डाक सेवा में तब्दील हो गया। आरम्भ में कानपुर की रेलवे डाक सेवा इलाहाबाद से संचालित होती थी, पर 30 अगस्त 1972 को पोस्टमास्टर जनरल, उत्तर प्रदेश के एक आदेश द्वारा ‘ए’ मण्डल इलाहाबाद को विभक्त कर ‘के0पी0’ मण्डल कानपुर का गठन किया गया। वर्तमान में इस मण्डल द्वारा कुल 12 जनपदों, यथा- कानपुर नगर, कानपुर देहात, उन्नाव, फतेहपुर, फर्रूखाबाद, इटावा, मैनपुरी, औरैया, फिरोजाबाद, महामाया नगर, बुलन्दशहर, अलीगढ़ की डाक का आदान-प्रदान व पारेषण किया जाता है। वर्तमान में रेलवे डाक सेवा की अवधारणा को और व्यापक बनाते हुए इन्हे ‘मेल बिजनेस सेन्टर‘ में तब्दील किया जा रहा है, जहाँ इसका कार्य डाक-प्रोसेसिंग तक सीमित न होकर डाक के एकत्रीकरण, वितरण और विपणन तक विस्तृत हो जायेगा। ‘के0पी0’ मण्डल कानपुर को यह सौभाग्य प्राप्त है कि उत्तर प्रदेश के प्रथम ‘मेल बिजनेस सेन्टर’ का शुभारम्भ इसके अधीनस्थ अलीगढ़ आर0एम0एस0 में 27 दिसम्बर 2006 को हुआ।
(चित्र में- उत्तर प्रदेश के प्रथम ‘मेल बिजनेस सेन्टर’ के शुभारम्भ के दौरान डाक सेवा बोर्ड सदस्य आई. एम. जी. खान और तत्कालीन एस.एस.आर.एम. के.के.यादव )

डाक व्यवस्था में प्रथम कम्पनी स्थापित किया लाला ठंठीमल ने

सामरिक व औद्योगिक रूप से महत्वपूर्ण होने के कारण ब्रिटिश शासन काल से ही अंग्रेजों ने कानपुर में संचार साधनों की प्रमुखता पर जोर दिया। इनमें डाक सेवायें सर्वप्रमुख थीं। कानपुर में सर्वप्रथम डाकघर की स्थापना कैण्ट स्थित नहरिया पर 1840 में हुई। 6 मई 1840 को ब्रिटेन में विश्व के प्रथम डाक टिकट जारी होने के अगले वर्ष 1841 मंे इलाहाबाद और कानपुर के मध्य घोड़ा गाड़ी द्वारा डाक सेवा आरम्भ की गई। इलाहाबाद के एक धनी व्यापारी लाला ठंठीमल, जिनका व्यवसाय कानपुर तक विस्तृत था को इस घोड़ा गाड़ी डाक सेवा को आरम्भ करने का श्रेय दिया जाता है, जिन पर अंग्रेजों ने भी अपना भरोसा दिखाया। जी0टी रोड बनने के बाद उसके रास्ते भी पालकी और घोड़ा गाड़ी से डाक आती थी, जिसमें एक घोड़ा 7 किलोमीटर का सफर तय करता था। आधा तोला वजन का एक पैसा किराया तुरन्त भुगतान करना होता था। इलाहाबाद से बिठूर तक डाक का आवागमन गंगा नदी के रास्ते से होता था। सन् 1850 में लाला ठंठीमल ने कुछ अंग्रेजों के साथ मिलकर ‘इनलैण्ड ट्रांजिट कम्पनी’ की स्थापना की और कलकत्ता से कानपुर के मध्य घोड़ा गाड़ी डाक व्यवस्थित रूप से आरम्भ किया। अगले वर्षों में इसका विस्तार मेरठ, दिल्ली, आगरा, लखनऊ, बनारस इत्यादि प्रमुख शहरों में भी किया गया। कानपुर की अवस्थिति इन शहरों के मध्य में होने के कारण डाक सेवाओं के विस्तार के लिहाज से इसका महत्वपूर्ण स्थान था। इस प्रकार लाला ठंठीमल को भारत में डाक व्यवस्था में प्रथम कम्पनी स्थापित करने का श्रेय दिया जाता है। 1854 में डाक सेवाओं के एकीकृत विभाग में तब्दील होने पर इनलैण्ड ट्रांजिट कम्पनी’ का विलय भी इसमें कर दिया गया।

Sunday, January 18, 2009

महाराज प्रयाग नारायण मंदिर, शिवाला पर डाक विभाग द्वारा विशेष आवरण


भारतीय डाक विभाग ने कानपुर के प्रसिद्ध महाराज प्रयाग नारायण मंदिर, शिवाला पर दिनांक 17 जनवरी, 2009 को एक विशेष आवरण (लिफाफा) एवं इसका विशेष विरूपण जारी किया। कानपुर जी0पी0ओ0 द्वारा जारी किये गये इस विशेष आवरण का विमोचन श्री श्रीप्रकाश जायसवाल, गृहराज्य मंत्री, भारत सरकार द्वारा श्री रवीन्द्र पाटनी, मेयर कानपुर, श्री उदय कृष्ण, पोस्टमास्टर जनरल कानपुर परिक्षेत्र और श्री कृष्ण कुमार यादव, चीफ पोस्टमास्टर, कानपुर जीपीओ के विशिष्ट आतिथ्य में सम्पन्न हुआ। 

महाराज प्रयाग नारायण मंदिर के 148 साल पूरे होने पर जारी (1861-2009) इस विशेष आवरण पर जहाँ मंदिर के गोपुरम का रेखाचित्र बना है, वहीं दुर्गा पूजा पर जारी डाक टिकट लगाकर इसका विरूपण किया गया है। विरूपण में भी मंदिर का चित्र बना हुआ है। गौरतलब है कि दक्षिण के त्रिचरापल्ली के श्री रंगम मंदिर के बाद तथा उत्तरी भारत में वृन्दावन के बाद महाराज प्रयाग नारायण मंदिर, दूसरा मंदिर है, जिसकी ख्याति देश के अलावा विदेशों तक में हैं। नागरी शैली में स्थापित इस मंदिर का ऊँचा गोपुरम व भव्य उज्जवल कलश दूर से ही अपनी अलग छटा बिखेरता है। बहुत कम लोगों को ज्ञात है कि मंदिरों की स्थापत्य के दृष्टिकोण से पॉँच भिन्न-भिन्न शैलियाँं हैं, जो दक्षिण के पॉँच प्रमुख राजवंशों की परिचायक हैं। ये पाँच मुख्य शैलियाँ कालक्रम में इस प्रकार हैं- पल्लव (600-1100 ई0 के लगभग), चोल (1100-1150 ई0 के लगभग), पांड्य (1100-1350 ई0 के लगभग), विजयनगर (1350-1565 ई0 के लगभग) एवं नायक (1600 ई0 के पश्चात)। इसमें प्रयाग नारायण शिवाला मंदिर विजयनगर शैली का है। इस शैली की मुख्य विशेषता है कि इसके प्रांगण में बाजार होता है, जो यहाँ पर भी है।
इस अवसर पर विशेष आवरण का विमोचन करते हुए केंद्रीय गृह राज्यमंत्री श्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने कहा कि इससे राष्ट्रीय स्तर पर न सिर्फ कानपुर को विशिष्ट पहचान मिली है बल्कि कानपुर के धार्मिक एवं पर्यटन स्थलों में महाराज प्रयाग नारायण मंदिर का नाम भी शुमार हो गया है। जिस कानपुर की पहचान या तो औद्योगिक नगर के रूप में रही है, या ब्रह्मावर्त के चलते, वहाँ उत्तर व दक्षिण का सेतुबन्ध कहे जाने वाले शिवाला के श्री रंगनाथ जी मंदिर पर विशेष आवरण जारी कर डाक विभाग ने कानपुर की सांस्कृतिक चेतना में प्राण फूँकने का कार्य किया है। महापौर श्री रवीन्द्र पाटनी ने इसे कानपुर के इतिहास में एक मील का पत्थर बताते हुए आशा की कि आने वाले दिनों में कानपुर के अन्य प्रसिद्ध स्थानों को भी यह गौरव प्राप्त होगा।


       (गृह राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल और भारतीय डाक सेवा के अधिकारी कृष्ण कुमार यादव)
कार्यक्रम के आरम्भ में सभी का स्वागत करते हुए भारतीय डाक सेवा के अधिकारी एवं कानपुर जीपीओ के चीफ पोस्टमास्टर श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि कानपुर सदैव से ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक धरोहरों एवं विभूतियों के मामले में अग्रणी रहा है। यही कारण है कि डाक विभाग ने अब तक कानपुर से जुड़े जहाँ 13 डाक टिकट जारी किये हैं, वहीं स्थानीय तौर पर अब तक 6 विशेष आवरण भी जारी किये गये हैं। श्री यादव ने बताया कि महाराज प्रयाग नारायण मंदिर, शिवाला अतीत के उस काल खण्ड का भी साक्षी है जब इसके प्रांगण में रहकर ही पं0 मोती लाल नेहरू ने कानपुर में अपनी वकालत शुरू की थी। इसी मंदिर के प्रांगण में झण्डा गीत के अमर रचयिता पद्मश्री श्याम लाल गुप्त ‘पार्षद‘ नित्य नंगे पैर रामायण का श्रवण करने आते थे। यहीं सन् 1884-85 में पं0 प्रताप नारायण मिश्र ने लावनी की अलख जगाई व नगर में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों दंगल, शास्त्रार्थ आदि में अग्रणी रहे, जिसकी चर्चा पं0 मिश्र ने ‘ब्राह्मण‘ पत्रिका में भी की है। सन् 1965 से शिवाला प्रांगण में सन्त मनीषियों व विद्वानों के व्याख्यान का जो सूत्रपात हुआ था वह अनवरत् रूप से आज भी जारी है। पं0 राम किंकर उपाध्याय ने शिवाला में रामकथा रस की अविरल गंगा बहाई, जो आज भी जारी है। मंदिर के प्रांगण में प्रतिवर्ष सांस्कृतिक-साहित्यिक गतिविधियों के पर्याय ‘मानस संगम‘ संस्था का वार्षिकोत्सव लगता है, जिसमें देश-विदेश के विद्वानों का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।

            (विशेष आवरण का विमोचन करते हुए केंद्रीय गृह राज्यमंत्री श्री श्रीप्रकाश जायसवाल)
पोस्टमास्टर जनरल श्री उदय कृष्ण ने कहा कि सांस्कृतिक धरोहरों को सवंर्धित करने का कार्य आरम्भ से ही डाक विभाग करता रहा है और इसी कड़ी में महाराज प्रयाग नारायण मंदिर पर जारी इस विशेष आवरण को भी देखा जाना चाहिए। कार्यक्रम के अन्त में धन्यवाद ज्ञापन महाराज प्रयाग नारायण मंदिर के संरक्षक श्री बद्री नारायण तिवारी द्वारा एवं संचालन श्री प्रदीप दीक्षित द्वारा किया गया। मंचासीन अतिथियों को श्री मुकुल नारायण तिवारी एवं अभिनव नारायण तिवारी द्वारा स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में डाक विभाग के अधिकारियों के अलावा शहर के तमाम साहित्यकार, समाजसेवी, जन प्रतिनिधिगण एवं पत्रकार उपस्थित थे।


अभिनव नारायण तिवारी, 
प्रबन्धक- महाराजा प्रयाग नारायण मन्दिर,
 शिवाला, कानपुर-208001