Thursday, February 24, 2011

पोस्टकार्ड की दुनिया...

पोस्टकार्ड की दुनिया भी निराली है। सब कुछ खुला-खुला, कुछ भी छुपा नहीं. दूसरे शब्दों में कहें तो पारदर्शिता का सबसे सुन्दर उदहारण. दाम भी सबकी हैसियत के अन्दर. वैसे यह भी अजीब लगता है कि एक पचीस या पचास पैसे का पोस्टकार्ड इतनी कम लागत पर पूरे भारत की सैर कर लेता है. पोस्टकार्ड भी कई तरह के हो गए- साधारण पोस्टकार्ड, जवाबी पोस्टकार्ड, मेघदूत पोस्टकार्ड, प्रिंटेड पोस्टकार्ड, कम्पटीशन पोस्टकार्ड. हर पोस्टकार्ड की अपनी खूबियाँ हैं. मसलन, मेघदूत पोस्टकार्ड के एक ही हिस्से में लिखा जा सकता है, दूसरी ओर विज्ञापन होता है. तभी तो यह सबसे सस्ता अर्थात मात्र पचीस पैसे का है. कम्पटीशन पोस्टकार्ड किसी भी प्रतियोगिता सम्बन्धी जवाब के लिए प्रयुक्त होता है. अब कोई पहले भी कह ले कि पोस्टकार्ड का उतना चलन नहीं रहा, पर साहित्य की दुनिया तो इसके बिना अधूरी है. किसी पत्र-पत्रिका में कोई कविता, कहानी या लेख पसंद आया तो झट से पोस्टकार्ड पर दो लाइन लिखकर भेज दिया. कवि और लेखक भी खुश कि उनके चाहने वाले हैं और पोस्टकार्ड से ही आभार भी व्यक्त कर दिया. अब तो सुप्रीम कोर्ट भी पोस्टकार्ड द्वारा भेजी गई शिकायतों का संज्ञान लेता है. तमाम राजनैतिक दल और एन. जी. ओ. भी पोस्टकार्ड पर सन्देश लिखकर लोगों को जागरूक बनाये रखते हैं. जब भी कभी किसी मुद्दे पर आवाज़ उठानी हो तो हजारों पोस्टकार्ड पर सन्देश लिखकर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री इत्यादि के पास पोस्ट करवा देते हैं.

आज की व्यस्त भरी दुनिया में पोस्टकार्ड बड़े काम की चीज है. कोई कहेगा कि एस. एम. एस. सस्ता होता है, पर मोबाईल खरीदने का झंझट और फिर हर किसी का मोबाईल नंबर हर किसी के पास हो जरुरी भी नहीं. ई-मेल करने के लिए कम्यूटर और इंटरनेट-कनेक्शन होना चाहिए पर पोस्टकार्ड के लिए ऐसा कुछ भी नहीं. किसी को भी सुन्दर से शब्द लिखिए और टहलते-टहलते नजदीक के लेटर-बाक्स में पोस्ट कर आइये. इसी बहाने थोडा घूमना-फिरना भी हो जायेगा वरना इस ई-मेल और मोबाईल ने तो आदमी को जड़ ही बना दिया है. इंस्टेंट होने के चक्कर में न जाने कितनी बीमारियाँ व्यक्ति को घेरे जा रही हैं. कभी गुरु जी लोग बच्चों की राइटिंग देखकर उसके होनहार गुणों को पहचान लेते थे और ज्योतिषी इसी आधार पर लोगों का व्यक्तित्व भी गढ़ देते थे, पर अब तो सुलेखन बीते दिनों की बात हो गई. तो आइये न एक बार फिर से किसी को सुन्दर सा पोस्टकार्ड लिखते हैं की वह रायटिंग देखकर दूर से ही पहचान ले कि किसने यह सुन्दर सा पोस्टकार्ड भेजा है !!

Friday, February 18, 2011

एयर मेल सर्विस के 100 साल


डाक सेवा का विचार सबसे पहले ब्रिटेन में और हवाई जहाज का विचार सबसे पहले अमेरिका में राइट बंधुओं ने दिया वहीं चिट्ठियों ने विश्व में सबसे पहले भारत में हवाई उड़ान भरी। यह ऐतिहासिक घटना 18 फरवरी 1911 को इलाहाबाद में हुई। संयोग से उस साल कुंभ का मेला भी लगा था। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार उस दिन एक लाख से अधिक लोगों ने इस घटना को देखा था जब एक विशेष विमान ने शाम को साढ़े पांच बजे यमुना नदी के किनारों से उड़ान भरी और वह नदी को पार करता हुआ 15 किलोमीटर का सफर तय कर नैनी जंक्शन के नजदीक उतरा जो इलाहाबाद के बाहरी इलाके में सेंट्रल जेल के नजदीक था। आयोजन स्थल एक कृषि एवं व्यापार मेला था जो नदी के किनारे लगा था और उसका नाम ‘यूपी एक्जीबिशन’ था। इस प्रदर्शनी में दो उड़ान मशीनों का प्रदर्शन किया गया था। विमान का आयात कुछ ब्रिटिश अधिकारियों ने किया था। इसके कलपुर्जे अलग अलग थे जिन्हें आम लोगों की मौजूदगी में प्रदर्शनी स्थल पर जोड़ा गया।

आंकड़ों के अनुसार कर्नल वाई विंधाम ने पहली बार हवाई मार्ग से कुछ मेल बैग भेजने के लिए डाक अधिकारियों से संपर्क किया जिस पर उस समय के डाक प्रमुख ने अपनी सहर्ष स्वीकृति दे दी।
मेल बैग पर ‘पहली हवाई डाक’ और ‘उत्तर प्रदेश प्रदर्शनी, इलाहाबाद’ लिखा था। इस पर एक विमान का भी चित्र प्रकाशित किया गया था। इस पर पारंपरिक काली स्याही की जगह मैजेंटा स्याही का उपयोग किया गया था। आयोजक इसके वजन को लेकर बहुत चिंतित थे, जो आसानी से विमान में ले जाया जा सके। प्रत्येक पत्र के वजन को लेकर भी प्रतिबंध लगाया गया था और सावधानीपूर्वक की गई गणना के बाद सिर्फ 6,500 पत्रों को ले जाने की अनुमति दी गई थी। विमान को अपने गंतव्य तक पहुंचने में 13 मिनट का समय लगा। विमान को फ्रेंच पायलट मोनसियर हेनरी पिक्वेट ने उड़ाया।

(चित्र में : प्रथम एयर मेल की स्वर्ण जयंती पर जारी प्रथम दिवस आवरण और डाक टिकट का विरूपण, कर्नल वाई विंधाम , भारतीय डाक द्वारा वर्तमान में प्रयुक्त फ्रेटर)

Monday, February 14, 2011

खादी का डाक टिकट प्रदर्शनी का आकर्षण

राजधानी दिल्ली के प्रगति मैदान में शनिवार से शुरू हुई डाक टिकटों की विश्वस्तरीय प्रदर्शनी में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पसंदीदा व स्वदेशी की पहचान ‘खादी’ पर छपा डाक टिकट मुख्य आकर्षण बना हुआ है।

राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील ने प्रगति मैदान में सप्ताह भर चलने वाले ‘इंडीपेक्स-2011’ का उद्घाटन करते हुए कहा कि महात्मा गांधी पर पहली बार एक विशेष खादी का डाक टिकट जारी किया जा रहा है और इसे जारी कर मैं खुद सम्मानित हुई हूं।

प्रदर्शनी के आयोजक, भारतीय डाक ने कहा कि कुल 71 देशों से कोई 595 टिकट संग्राहक इस प्रदर्शनी में हिस्सा ले रहे हैं। इसके अलावा टिकट संग्रह से जुड़े दुनिया भर के 28 व्यापारी और 31 डाक प्रशासन भी हिस्सा ले रहे हैं। इसके पहले भारत ने 1954 और 1997 के बीच इस तरह की पांच प्रदर्शनियों का आयोजन किया था।

खादी डाक टिकट वास्तव में घरेलू स्तर पर तैयार किए गए खादी के कपड़े पर छपा है, जिस पर मोहनदास करमचंद गांधी यानी महात्मा गांधी का चित्र है।

यह टिकट एक सीमित संस्करण है, जो एक विशेष संग्राहक के पास उपलब्ध है। इस टिकट की कीमत 250 रुपये है और इंडीपेक्स की वेबसाइट पर इसे ऑनलाइन बुक किया जा सकता है। कोई भी व्यक्ति अधिकतम 10 टिकटों का आर्डर दे सकता है। इस टिकट की पहली खेप यहां चंद मिनटों में ही बिक गई।

भारतीय डाक ने कहा कि कई देशों ने डाक टिकट छापने के लिए सिल्क जैसी वैकल्पिक सामग्रियों के साथ प्रयोग किया है। भारतीय डाक ने हालांकि सिर्फ कागज पर टिकट छापें हैं। इसमें तीन सेट सुगंधित टिकट भी शामिल हैं। लेकिन पहली बार खादी पर छपा एक विशेष डाक टिकट जारी हुआ है।

भारतीय डाक ने कहा है कि प्रदर्शनी का दूसरा आकर्षण ‘मेरे डाक टिकट’ है। इस टिकट पर कोई व्यक्ति अपने चित्र छपा हुआ पा सकता है और इसका इस्तेमाल सगाई व बेटे के जन्म दिन का उत्सव मनाने या किसी को शुभकामना संदेश भेजने में किया जा सकता है।

इसके अलावा सूर्य, विमान, रेल इंजन, वन्य जीव, ताज महल और भारतीय लोक कथा, पंचतंत्र से लिए गए चित्रों वाले टिकट शीट भी उपलब्ध हैं। एक टिकट शीट की कीमत 150 रुपये है।

प्रदर्शनी का अन्य आकर्षण होगा भारतीय सिनेमा की छह महान अभिनेत्रियों पर जारी होने वाले डाक टिकटों का सेट। इन अभिनेत्रियों में मीना कुमारी, नूतन, कानन देवी, देविका रानी, लीला नायडू और सावित्री देवी शामिल हैं। ये टिकट रविवार को जारी होंगे।

साभार : हिंदुस्तान

डाक टिकट में देखें अपनी तस्वीर


देश में पहली बार लांच हुई ‘माई स्टाम्प’ तकनीक लोगों के लिए खासा रोमांचक और आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। इस स्कीम के तहत अपनी पसंद के थीम टिकटों पर अपनी तस्वीर लगवा सकते हैं। INDIPEX-2011 में 17 थीम बनाई गई हैं।

महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू जैसी महान हस्तियों की फोटो वाली डाक टिकटें तो सभी ने देखी होगी, लेकिन इन टिकटों पर गांधी जी और पंडित नेहरू की जगह खुद की तस्वीर अंकित हो जाए तो यह आपके लिए अनूठा अनुभव होगा। इन दिनों कुछ ऐसा ही प्रगति मैदान के हॉल संख्या 9 में हो रहा है। दिल्लीवाले अपनी इस ख्वाहिश को पूरा करने के लिए भारी संख्या में यहां पहुंच रहे हैं। शुक्रवार से प्रगति मैदान में शुरू हुए विश्व फिलाटेलिक प्रदर्शनी INDIPEX-2011 में यह नजारा देखने को मिल रहा है।

यहां देश में पहली बार लांच हुई ‘माई स्टाम्प’ तकनीक लोगों के लिए खासा रोमांचक और आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। लोग अपनी पसंद के थीम टिकटों पर अपनी तस्वीर लगवा रहे हैं। बच्चे जहां पंचतंत्र और हवाई जहाज जैसी थीम को पसंद कर रहे हैं तो वहीं कई लोग राशिफल और ताजमहल वाली थीम को चुन रहे हैं। यहां ऐसी 17 थीम बनाई गई हैं।

राजौरी गार्डन से आए रोशन ने बताया कि उन्हें टिकट कलेक्शन का शौक है। डाक तकनीक ‘माई स्टाम्प’ मेरे कलेक्शन में नई जान डाल देगी। पर्सनलाइज्ड स्टाम्प के नाम से मशहूर इस रोमांचक तकनीक से लोग अपने यादगार लम्हों को भी टिकट के रूप में छपवा रहे हैं।

66 वर्षीय अरुण ने बताया कि यह तकनीक लम्हों को सम्हालने और यादगार बनाने के लिए एक बढ़िया माध्यम है। इसलिए वह अपने बचपन की फैमिली फोटो छपवाना चाहते हैं। इसके अलावा यहां हॉल संख्या 8-11 में 70 देशों के प्रतिनिधि अपने देश के डाक टिकटों को लाए हुए हैं। इसके अलावा यहां पूरे विश्व के दुर्लभ डाक टिकट, लिफाफे और सिक्कों की विस्तृत प्रदर्शनी भी दिल्ली वालों के लिए खासा आकर्षण का केंद्र है। इंडीपेक्स-2011 के प्रबंधकों ने बताया कि डाक टिकट किसी भी देश के इतिहास, संस्कृति, कला, व्यक्तित्वों और संसाधनों के बारे में जानने का रोमांचक तरीका है। यहां दिल्लीवासियों को अलग-अलग देशों की टिकटों से यह सब जानने को मिलेगा। इसके अलावा डाक टिकट कलेक्शन के रोमांचक शौक को युवाओं और बच्चों में लोकप्रिय बनाना भी है।

पिछले साल आयोजित दिसम्बर में सेव द टाइगर थीम पर आधारित पत्र लेखन प्रतियोगिता और डाक टिकट डिजाइनिंग प्रतियोगिता के विजेताओं के नाम भी घोषित किए गए और लोगों को देखने के लिए उनकी इन कृतियों को यहां विशेष रूप से प्रदर्शित भी किया गया है।

बता दें कि भारत में यह प्रदर्शनी इससे पहले आजादी की पचासवीं वर्षगांठ के अवसर पर 1997 में यहां लगाई गई थी। इस प्रदर्शनी का मजा यहां 18 फरवरी तक लिया जा सकेगा।

साभार : दैनिक भास्कर

Friday, February 11, 2011

कई मायनों में यादगार होगा INDIPEX-2011

दिल्ली के प्रगति मैदान में कल 12 से 18 फरवरी तक होने वाली अंतरराष्ट्रीय डाक टिकट प्रदर्शनी-इंडिपेक्स 2011 'INDIPEX-2011'कई मायनों में यादगार होगी. इस दौरान डाक विभाग तमाम नए आयाम स्थापित करने की कोशिश करेगा, वहीँ डाक टिकटों के प्रति लोगों में क्रेज पैदा करने और देखने का भी यह सुनहरा अवसर है. गौरतलब है कि भारत में पहली अन्तराष्ट्रीय डाक टिकट (फिलेटलिक) प्रदर्शनी का आयोजन 1954 में डाक टिकटों की शताब्दी वर्ष में हुआ था.

इंडिपेक्स 2011 'INDIPEX-2011' का उद्घाटन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल करेंगी। इस प्रदर्शनी में 70 देशों से 595 प्रतिनिधि शामिल हो रहे हैं। इस प्रदर्शनी में स्वीडन के दुर्लभ डाक टिकट ट्रेस्किलिंग एलो को भी रखा जाएगा जिसका बाजार में अनुमानित मूल्य 16 लाख पौंड है। भारतीय डाक टिकटों में सबसे कीमती 1854 में जारी चार आना टिकट है।

इंडिपेक्स 2011 'INDIPEX-2011' डाक टिकट प्रदर्शनी का महत्त्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि भारत ने ही दुनिया में सर्वप्रथम इलाहबाद से नैनी के मध्य प्रतीकात्मक रूप में एयर-मेल सेवा आरंभ की. यह ऐतिहासिक घटना 18 फरवरी 1911 को इलाहाबाद में हुई। अर्थात जिस दिन 'INDIPEX-2011' के आयोजन का अंतिम दिन होगा, उसी दिन इस ऐतिहासिक घटना के 100 साल भी पूरे हो जायेंगें. इस दौरान छोटे सोमर हवाई जहाज से इलाहाबाद से नैनी तक 6,500 चिठ्ठियां ले जाने वाली दुनिया की पहली आधिकारिक एयरमेल सेवा पर भी तीन विशेष डाक टिकट जारी किए जाएंगे। इस छोटे हवाई जहाज को 18 फरवरी 1911 को फ्रांस के पायलट हेनरी पेक्वेट ने उड़ाया था। इस विमान के माध्यम से भेजी गई चिठ्ठियों में पंडित जवाहरलाल नेहरू के अलावा कई गणमान्य लोगों के पत्र शामिल थे। भारतीय वायुसेना की ओर से इस अवसर पर 12 फरवरी को इलाहाबाद से नैनी तक विशेष विमान उड़ान भरेगा।

प्रदर्शनी के दौरान ग्राहकों की पसंद का डाक टिकट तैयार करने की शुरूआत भी हो रही है। माई स्टाम्प नामक इस योजना का मकसद डाक टिकटों के माध्यम से डाक विभाग की आय बढ़ाना है। ऐसे प्रत्येक स्टाम्प की कीमत 150 रूपए होगी। इस तरह की सेवा ब्रिटेन की रायल मेल, फ्रांस की ला पोस्ट, जर्मनी की डोएचे पोस्ट, अमेरिकी पोस्टल सर्विस में पहले से उपलब्ध है।

दुनिया के कई देशों ने कागज के अलावा वस्त्रों सहित अन्य वस्तुओं पर भी डाक टिकट जारी किए हैं लेकिन भारत में अब तक कागज पर डाक टिकट जारी करने का चलन है। लेकिन पहली बार कागज के अतिरिक्त खादी के वस्त्र पर डाक टिकट जारी किए जा रहे हैं। इस तरह के पहले टिकट खादी के कपड़े पर जारी किए जा रहे हैं जो महात्मा गांधी को समर्पित होंगे। इसकी कीमत 250 रूपए रखी गई है।

भारतीय डाक विभाग द्वारा समय-समय पर भारतीय अभिनेताओं पर तमाम डाक टिकट जारी किए गए हैं, मगर अभिनेत्रियों में अभी तक मात्र यह सौभाग्य नर्गिस और मधुबाला को मिला है. दिल्ली के प्रगति मैदान में कल 12 से 18 फरवरी तक होने वाली अंतरराष्ट्रीय डाक टिकट प्रदर्शनी-इंडिपेक्स 2011 में छह अभिनेत्रियों पर भी डाक टिकट जारी किये जायेंगें. रूपहले पर्दे पर अपने सशक्त अभिनय और अप्रतिम सौन्दर्य से मंत्रमुग्ध करने वाली गुजरे जमाने की अदाकारा सावित्री, लीला नायडू, देविका रानी, कानन देवी, नूतन और मीना कुमारी के सम्मान में ये डाक टिकट जारी होंगे।

प्रदर्शनी में भारतीय सिनेमा एक प्रमुख आकर्षण होगा जहां सावित्री, लीला नायडू, देविका रानी, कानन देवी, नूतन और मीना कुमारी पर जारी डाक टिकट भी रखे जाएंगे। पूर्व में मधुबाला, राजकपूर, गुरूदत्त, के एल सहगल, मुकेश, किशोर कुमार, मोहम्मद रफी, हेमंत कुमार और बेगम अख्तर पर जारी डाक टिकट भी यहां प्रदर्शित होंगे।

मीना कुमारी, नूतन, देविका रानी.. अब डाक टिकटों पर

भारतीय डाक विभाग द्वारा समय-समय पर भारतीय अभिनेताओं पर तमाम डाक टिकट जारी किए गए हैं, मगर अभिनेत्रियों में अभी तक मात्र यह सौभाग्य नर्गिस और मधुबाला को मिला है. दिल्ली के प्रगति मैदान में कल 12 से 18 फरवरी तक होने वाली अंतरराष्ट्रीय डाक टिकट प्रदर्शनी-इंडिपेक्स 2011 में छह अभिनेत्रियों पर भी डाक टिकट जारी किये जायेंगें. रूपहले पर्दे पर अपने सशक्त अभिनय और अप्रतिम सौन्दर्य से मंत्रमुग्ध करने वाली गुजरे जमाने की अदाकारा सावित्री, लीला नायडू, देविका रानी, कानन देवी, नूतन और मीना कुमारी के सम्मान में ये डाक टिकट जारी होंगे।

पहली बार खादी पर डाक टिकट

दिल्ली के प्रगति मैदान में कल 12 से 18 फरवरी तक होने वाली अंतरराष्ट्रीय डाक टिकट प्रदर्शनी-इंडिपेक्स 2011 में पहली बार डाक विभाग खादी के कपड़े पर गांधी जी की फोटो छपा विशेष डाक टिकट जारी करने वाला है। खादी पर स्याही फैलने के कारण छपाई अधिकारियों के सामने यह काम एक चुनौती था। इसके लिए देश के भिन्न भागों में पैदा होने वाले कपास के तैयार खादी पर छपाई करके देखी गई। अधिकारियों के खुशी का ठिकाना न रहा जब उन्होंने पाया कि पश्चिम बंगाल के कपास से बुनी गई खादी पर स्याही नहीं फैली। भारतीय डाक विभाग ने खादी पर गांधी जी की फोटो वाले एक लाख टिकट छापे हैं। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल इस अदभुत डाक टिकट का प्रदर्शनी के दौरान अनावरण करेंगी।

अब खुद का फोटो डाक टिकट पर

डाक टिकट पर छपा महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, जगदीशचंद्र बोस या ऐसी अन्य हस्तियों का फोटो क्या कहता है। अब इन प्रतिष्ठित शख्सियतों में एक और नाम जुड़ने वाला है- आपका। जी हां, आप भी इस प्रतिष्ठा के हकदार बन पाएंगे और अपनी तस्वीर वाली डाक टिकट छपवाने की आपकी हसरत पूरी हो पाएगी। जी हाँ , अब कोई भी व्यक्ति जब चाहे डाक टिकट पर अपनी फोटो छपवा सकता है, वह भी मात्र 10 मिनट में। भारतीय डाक विभाग 'माई पोस्ट' नाम की यह योजना शुरू कर रहा है।

दिल्ली के प्रगति मैदान में कल 12 से 18 फरवरी तक होने वाली अंतरराष्ट्रीय डाक टिकट प्रदर्शनी-इंडिपेक्स 2011 में यह योजना शुरू होगी।इस योजना का उद्घाटन होने के बाद डाकघर जाने के बाद अपनी फोटो वाली डाक टिकट पाने के इच्छुक व्यक्ति 10 मिनट में यह टिकट अपने हाथ में पाएगा। अपना यह शौक पूरा करने लिए आपको मात्र 150 रुपये देने होंगे। गौरतलब है कि यह योजना दुनिया भर में लोकप्रिय है मगर सुरक्षा कारणों से अब इसे भारत में शुरू नहीं किया गया था। तो देर किस बात कि, आप भी पहुँचिये डाक टिकटों पर अपनी फोटो देखने के लिए...!!

विश्व डाक टिकट प्रदर्शनी INDIPEX-2011 12 से 18 फरवरी तक

'INDIPEX-2011' का आयोजन 12-18 फरवरी, 2011 के मध्य प्रगति मैदान, दिल्ली में किया जा रहा है. भारत में पहली अन्तराष्ट्रीय डाक टिकट (फिलेटलिक) प्रदर्शनी का आयोजन 1954 में डाक टिकटों की शताब्दी वर्ष में हुआ था. इस डाक टिकट प्रदर्शनी का महत्त्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि भारत ने ही दुनिया में सर्वप्रथम इलाहबाद से नैनी के मध्य प्रतीकात्मक रूप में एयर-मेल सेवा आरंभ की. यह ऐतिहासिक घटना 18 फरवरी 1911 को इलाहाबाद में हुई। अर्थात जिस दिन 'INDIPEX-2011' के आयोजन का अंतिम दिन होगा, उसी दिन इस ऐतिहासिक घटना के 100 साल भी पूरे हो जायेंगें. 'INDIPEX-2011' के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए इन लिंकों पर जाएँ-
'INDIPEX-2011'
'INDIPEX-2011'

भारत के चार राजघराने वाले राज्यों पर डाक टिकटों का सैट

डाक विभाग ने इंडिपेक्स 2011 विश्व डाक टिकट संग्रह प्रदर्शनी के कर्टन रेजर के रूप में भारत के राजघरानों के बारे में चार डाक टिकटों का सैट जारी किया। यह प्रदर्शनी 12 फरवरी से 18 फरवरी, 2011 तक प्रगति मैदान, नई दिल्ली में आयोजित की जाएगी। इन टिकटों को दिल्ली क्षेत्र की मुख्य पोस्टमास्टर जनरल सुश्री रामेश्वरी हांडा ने पहले संसद मार्ग मुख्य डाकघर में जारी किया था। चार स्मारक डाक टिकटों के इस सैट में सिरमौर, इंदौर, बामरा तथा कोचीन द्वारा जारी डाक टिकटों को दर्शाया गया है। ये डाक टिकटें दुनिया भर की दुर्लभ और बहुमूल्य डाक टिकटों की श्रेणी में आती हैं।

स्वतंत्रता से पूर्व भारत में 568 राज्य थे जिनका स्वतंत्रता के बाद अस्तित्व समाप्त हो गया। यहां यह उल्लेखनीय है कि पांच सौ से अधिक राज्यों में से केवल चालीस राज्यों ने अपनी सार्वभौमिकता की निशानी के रूप में डाक टिकटें जारी की थीं। इन राज्यों द्वारा जारी डाक टिकटों में राजाओं और राज कुमारों तथा राजसी प्रतीकों को चित्रित किया गया है। इन पर अनेक पध्दतियों तथा रंगों का प्रयोग करके छपाई की गई। कहा जा सकता है कि राज घराने वाले कुछ राज्यों ने एक पैतृक संपत्ति छोड़ी है जो डाक टिकट संग्रहण क्षेत्र के लिए बहुमूल्य है।

यह इस क्रम में दूसरा सैट है जैसा कि दिल्ली, शिमला, उदगमंडलम, कूच बिहार, नागपुर तथा लखनऊ मुख्य डाकघरों सहित प्राचीन डाक भवनों के छ: टिकटों का पहला सैट 12 मई 2010 को जारी किया गया था। इसका उद्देश्य विश्व के समक्ष भारतीय डाक की गौरवपूर्ण विरासत को प्रदर्शित करना था।

Tuesday, February 1, 2011

पोस्टमैन

(कविवर सोहन लाल द्विवेदी ने भी डाकिया को अपने शब्दों में ढाला है। मार्च 1957 में प्रकाशित उनकी कविता ‘पोस्टमैन‘ वाकई एक बेहतरीन कविता है। )

किस समय किसे दोगे क्या तुम
यह नहीं किसी को कभी ज्ञान
उत्सुकता में, उत्कंठा में
देखा करता जग महान
आ गई लाटरी निर्धन की
कैसी उसकी तकदीर फिरी
हो गया खड़ा वह उच्च भवन
तोरण, झंडी सुख की फहरी
यह भाग्य और दुर्भाग्य
सभी का फल लेकर तुम जाते
कोई रोता कोई हँसता
तुम पत्र बाँटते ही जाते
इस जग का सारा रहस्य
तुम थैले में प्रतिदिन किए बंद
आते रहते हो तुम पथ में
विधि के रचते से नए छंद।

Wednesday, January 26, 2011

गणतंत्र दिवस...जय हिंद !!

*** गणतंत्र दिवस पर ढेरों शुभकामनायें ***

Friday, January 7, 2011

अंडमान-निकोबार में पर्यटन को बढ़ावा देते पोस्टकार्ड


(सेलुलर जेल)


(बैरन द्वीप और बैरन ज्वालामुखी)


(राॅस और स्मिथ द्वीप)
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भारतीय डाक विभाग ने अंडमान में पर्यटन को बढ़ावा देने वाले मेघदूत पोस्टकार्ड जारी किए हैं. गौरतलब है कि जहाँ सामान्य पोस्टकार्ड 50 पैसे में उपलब्ध होते हैं वहीँ मेघदूत पोस्टकार्ड मात्र 25 पैसे में उपलब्ध होते हैं। मेघदूत पोस्टकार्ड के पते वाले साइड में कुछ लिखा नहीं जा सकता वहाँ पर विभिन्न प्रकार के विज्ञापन या प्रचार सामग्री मुद्रित की जाती है। उक्त मेघदूत पोस्टकार्ड बिक्री हेतु भारत के विभिन्न हिस्सों में उपलब्ध है।


इस विज्ञापन में कभी काला पानी के लिए मशहूर पर अब ऐतिहासिक राष्ट्रीय स्मारक सेलुलर जेल, बैरन द्वीप और यहाँ स्थित भारत के एकमात्र सक्रिय बैरन ज्वालामुखी एवं राॅस और स्मिथ द्वीपों इत्यादि के चित्रों को प्रदशित किया गया है. राॅस और स्मिथ द्वीपों की यह विशेषता है कि ज्वार आने पर यह दोनों द्वीप आपस में मिल जाते हैं और भाटा के समय अलग हो जाते हैं. इसी कारण इन्हें सिस्टर-आइलैंड भी कहा जाता है. गौरतलब है कि इन मेघदूत पोस्टकार्डों को सूचना-प्रसार एवं पर्यटन निदेशालय, अंडमान व निकोबार प्रशासन द्वारा विज्ञापित किया गया है।


उक्त मेघदूत पोस्टकार्डों की डाकघरों में काफी माँग है और वर्तमान में टूरिस्ट सीजन होने के चलते तमाम विदेशी और भारतीय पर्यटक इन पर पत्र लिखकर अपने परिजनों को भेज रहे हैं. यहाँ से भेजे जाने के कारण इन पर अंडमान के डाकघरों की मुहर भी लगी होती है, इस कारण इनकी फिलेटलिक वैल्यू भी बढ़ जाती है. देश-विदेश से लोग अंडमान में पर्यटन के बहाने आते हैं और एक बार उस सेलुलर जेल के दर्शन जरुर करते हैं जहाँ देशभक्तों ने इतनी यातनाएं सहीं. डाक विभाग भी इसके प्रति सचेत है और यहाँ के पोर्टब्लेयर प्रधान डाक घर से बाहर जाने वाले पत्रों पर जो मुहर लगाई जाती है, उस पर सेलुलर जेल का चित्र अंकित है. ऐसे में इन पत्रों को लोग यादगार के रूप में सहेज कर रखते हैं.
यहाँ भी पढ़ें-स्वतंत्र आवाज़. काम , स्वर्गविभा, युगमानस

Wednesday, January 5, 2011

जंगलों के संरक्षण पर बच्चों ने लिखीं चिठ्ठयां : UPU पत्र लेखन प्रतियोगिता

पोर्ट ब्लेयर। अंडमान निकोबार द्वीप समूह के डाक विभाग ने स्कूली बच्चों के लिए पोर्ट ब्लेयर में यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन पत्र लेखन प्रतियोगिता आयोजित की जिसमें बच्चों ने एक दूसरे को इस विषय पर पत्र लिखे कि जंगलों का संरक्षण क्यों जरूरी है। बच्चों की विषय में गहरी दिलचस्पी दिखाई दी। प्रतियोगिता के बाद की उत्साहजनक आपसी बातचीत में बच्चों ने संबंधित विषय पर अपने लेखन की चर्चा की और कहा कि उन्होंने विभिन्न शैलियों में जंगलों को मानव जीवन और पर्यावरण के लिए वरदान और वन्य प्राणियों के लिए उनका घर एवं जीवन जीने का एकमात्र स्रोत लिखा है। प्रतियोगिता में जहां बच्चों की लेखनशैली प्रतिभा सामने आई वहीं उनकी जंगलों वृक्षों और उनके सहारे वन्यजीवन के फलने फूलने की उनकी मार्मिक भावनाओं का अच्छे शब्दों में प्रकटीकरण हुआ।

पोर्ट ब्लेयर के राजकीय मॉडल वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में 40वीं यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन पत्र लेखन प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था। प्रतियोगिता का शुभारंभ अंडमान निकोबार द्वीप समूह के डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव ने किया। बच्चों को पत्र लेखन का महत्व समझाकर खूब लिखने की प्रेरणा देते हुए उन्होंने कहा कि पत्र खुशनुमा अहसास के साथ संवेदनाओं को जीवंत रखते हैं। बच्चों को पत्र लेखन का विषय दिया गया था कि 'वे अपने को जंगल का एक पेड़ मानते हुए अपने मित्र को पत्र लिखें कि जंगलों का संरक्षण क्यों जरूरी है।'

कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि डाक विभाग की पत्र लेखन की यह अनूठी पहल किशोरों को डाक सेवाओं के स्वर्णिम आयामों से परिचय कराती है। उनका कहना था कि अभी भी पत्र लेखन का काफी महत्व है और इसमें भावनाओं का जिस प्रकार प्रकटीकरण होता है वह संचार के अन्य साधनों में नहीं है। पत्र लेखन सिर्फ एक विधा ही नहीं है बल्कि इसमें रिश्तों की मिठास हो़ती है और पत्रों की भाषा में एक खुशनुमा अहसास होता है जिससे संवेदनाएं जीवंत रहती हैं। यादव ने कहा कि पत्र लेखन सोचने की क्षमता और शब्द ज्ञान में भी वृद्धि करते हैं, ऐसे में युवा पीढ़ी और विद्यार्थियों को इसके लिए इन्हें प्रेरित करना और इनके महत्व पर ध्यान आकृष्ट करना और भी जरूरी है।

यह प्रतियोगिता अखिल भारतीय स्तर पर आयोजित की गई थी। डाक निदेशक ने बताया कि पत्र-लेखन प्रतियोगिता में शामिल सभी कापियां पहले सर्किल स्तर पर पोर्टब्लेयर के लिए कोलकात्ता में जांची जाएंगीं फिर उनमें से सर्वोत्तम का चयन कर राष्ट्रीय स्तर के लिए डाक निदेशालय दिल्ली भेजी जाएंगीं। राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम, दितीय और तृतीय स्तर के लिए क्रमशः 2000, 1500 और 1000 रूपये का नकद पुरस्कार और प्रमाण पत्र दिया जायेगा। प्रत्येक डाक परिमंडल के लिए हर सर्वोत्तम पत्र को 250 रूपये का प्रोत्साहन नकद पुरस्कार और प्रमाण पत्र भी दिया जायेगा। राष्ट्रीय स्तर पर चयनित सर्वोत्कृष्ट तीन पत्रों को यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन स्तर पर अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों हेतु भेजा जायेगा जहां अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्तर के लिए क्रमशः स्वर्ण, रजत और ताम्र मेडल एवं साथ में यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन का अधिकारिक डाक टिकटों का एल्बम सम्मान स्वरूप दिया जायेगा।

इस अवसर पर डाक टिकटों का एक काउंटर भी लगाया गया था जहां बच्चों ने रंग-बिरंगे डाक टिकटों का लुत्फ उठाया। बच्चों में डाक टिकटों के प्रति काफी क्रेज दिखा। उन्हें डाक विभाग की फिलेटलिक डिपाजिट खाता स्कीम के बारे में भी बताया गया जिसके अंतर्गत कोई न्यूनतम 200 रूपये में खाता खोलकर हर महीने घर बैठे नई डाक टिकटें और अन्य मदें प्राप्त कर सकता है। फिलेटलिक डिपाजिट खाता खोलने में तमाम बच्चों और उनके अभिवावकों ने रूचि दिखाई और लगभग 50 फिलेटलिक डिपाजिट खाते इस अवसर पर खोले गए। प्रतियोगिता में कुल 28 बच्चों ने भाग लिया। अधिकतर प्रतिभागी कार्मेल वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय पोर्टब्लेयर, राजकीय मॉडल वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, विवेकानंद विद्यालय पोर्टब्लेयर और संत मेरी विद्यालय पोर्टब्लेयर के विद्यार्थी थे।




साभार : स्वतंत्र आवाज़




यहाँ भी देखें- पत्र जीवंत रखते हैं खुशनुमा अहसास और संवेदनाएँ - के.के. यादव (हिंदी मीडिया.इन)




पोर्टब्लेयर में स्कूली बच्चों के लिए 40वीं यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन पत्र लेखन प्रतियोगिता संपन्न (स्वर्ग विभा)




शब्दकारिता

दुनिया की सैर कराएगा डाक टिकट

ब्रिटेन के डाक विभाग ‘रॉयल मेल’ ने अपनी तरह का एक अनूठा डाक टिकट जारी किया है.अत्याधुनिक तकनीक से लैस ये डाक टिकट फ़ोन के ज़रिए आपको इंटरनेट से जोड़ देगा.डाक टिकट को तस्वीर के रुप में फ़ोन में कैद कर तुरंत संबंधित वेबसाइट तक पहुंचा जा सकता है. यानी डाक टिकट इंटरनेट के ज़रिए सूचनाओं का संसार और दुनिया के दरवाज़े खोलेगा.

‘रॉयल मेल’ का कहना है दुनियाभर में ये अपनी तरह पहला ऐसा डाक टिकट है.‘इमेज रेकॉगनिशन’ नामक तकनीक ने इस नए डाक टिकट को 21वीं सदी का अत्याधुनिक डाक टिकट बना दिया है.स्मार्टफ़ोन के ज़रिए यह तकनीक डाक टिकट पर छपी तस्वीर को ‘थ्री-डी’ तस्वीर की तरह दिखाएगी. इंटरनेट पर इस तस्वीर की खोज के बाद हमें उससे संबंधित सभी जानकारियां और वेबसाइट भी उपलब्ध होंगी.

नई तकनीक से लैस बुद्धिमान किस्म के ये डाक टिकट दुनिया के लिए मनोरंजन और जानकारियों का ख़ज़ाना खोल देंगे.
असल ज़िंदगी की तस्वीरों को इंटरनेट की दुनिया से जोड़ने वाली इस तकनीक का इस्तेमाल पहली बार किसी डाक टिकट पर किया जा रहा है.यह अद्भुत डाक टिकट ‘रॉयल मेल’ की एक खास श्रंखला का हिस्सा है.ब्रिटेन का डाक विभाग खास मौकों और ऐतिहासिक तारीख़ों पर अलग किस्म के डाक टिकट जारी करता है. इन टिकट के ज़रिए देश और संस्कृति के बारे में लोगों को जागरुक किया जाता है.

‘रॉयल मेल’ के प्रतिनिधी फ़िलिप पार्कर ने कहा, ''नई तकनीक से लैस बुद्धिमान किस्म के ये डाक टिकट दुनिया के लिए मनोरंजन और जानकारियों का ख़ज़ाना खोल देंगे. अगले कुछ महीनों में डाक टिकट इक्कठा करने के शौकीन चिठ्ठियों के ज़रिए इन टिकटों को पा सकेंगे.''

साभार : BBC हिंदी

Saturday, January 1, 2011

पहले ख़त की ख़ुशबू

खतों के प्रति दीवानगी सदियों से रही है. खतों का चलन भले ही कम हुआ हो, पर दीवानगी में कमी नहीं आई है. हसरत मोहानी ने यूँ ही नहीं लिखा था-लिक्खा था अपने हाथों से जो तुमने एक बार / अब तक हमारे पास है वो यादगार खत ।।....अपर्णा त्रिपाठी की इस कविता में वही भाव है, वही संवेदनाएं हैं, वही जज्बा है, वही दीवानगी है... तो आज नए साल के आगाज पर इस ख़ुशबू को महसूस करते हैं...

आज भी तेरा पहला खत
मेरी इतिहास की किताब में हैं
उसका रंग गुलाबी से पीला हो गया
मगर खुशबू अब भी पन्नो में है

उसके हर एक शब्द हमारी
प्रेम कहानी बयां करते है
और तनहाई में मुझे
बीते समय में ले चलते हैं

वो खत मेरी जिन्दगी का
हिस्सा नही ,जिन्दगी है
हर दिन पढने की उसे
बढती जाती तृष्णगी है.

अपर्णा त्रिपाठी "पलाश"

Monday, December 27, 2010

वो खत के पुरजे


कितना सुहाना दौर हुआ करता था, जब खत लिखे पढे और भेजे जाते थे । हमने पढे लिखे और भेजे इसलिये कहा क्योकि ये तीनो ही कार्य बहुत दुष्कर लेकिन अनन्त सुख देने वाले होते थे ।

खत लिखना कोई सामान्य कार्य नही होता था, तभी तो कक्षा ६ मे ही यह हमारे हिन्दी के पाठ्यक्रम मे होता था । मगर आज के इस भागते दौर मे तो शायद पत्र की प्रासंगिकता ही खत्म होने को है । मुझे याद है वो समय जब पोस्ट्कार्ड लिखने से पहले यह अच्छी तरह से सोच लेना पडता था कि क्या लिखना है, क्योकि उसमे लिखने की सीमित जगह होती थी, और एक अन्तर्देशीय के तो बँटवारे होते थे, जिसमे सबके लिखने का स्थान निश्चित किया जाता था । तब शायद पर्सनल और प्राइवेट जैसे शब्द हमारे जिन्दगी मे शामिल नही हुये थे । तभी तो पूरा परिवार एक ही खत मे अपनी अपनी बातें लिख देता था । आज तो मोबाइल पर बात करते समय भी हम पर्सलन स्पेस ढूँढते है ।

पत्र लिखने के हफ्ते दस दिन बाद से शुरु होता था इन्तजार – जवाब के आने का ।जब डाकिया बाबू जी को घर की गली में आते देखते ही बस भगवान से मनाना शुरु कर देते कि ये मेरे घर जल्दी से आ जाये । और दो चार दिन बीतने पर तो सब्र का बाँध टूट ही जाता था, और दूर से डाकिये को देखते ही पूँछा जाता – चाचा हमार कोई चिट्ठी है का ? और फिर चिट्ठी आते ही एक प्यारे से झगडे का दौर शुरु होता– कि कौन पहले पढेगा ? कभी कभी तो भाई बहन के बीच झगडा इतना बढ जाता कि खत फटने तक की नौबत आ जाती । तब अम्मा आकर सुलह कराती । अब तो वो सारे झगडे डाइनासोर की तरह विलुप्त होते जा रहे हैं ।

और प्रेम खतों का तो कहना ही क्या उनके लिये तो डाकिये अपनी प्रिय सहेली या भरोसेमंद दोस्त ही होते थे । कितने जतन से चिट्ठियां पहुँचाई जाती थी , मगर उससे ज्यादा मेहनत तो उसको पढ्ने के लिये करनी पडती थी । कभी छत का एकान्त कोना ढूँढना पडता था तो कभी दिन मे ही चादर ओढ कर सोने का बहाना करना पडता था । कभी खत पढते पढते गाल लाल हो जाते थे तो कभी गालो पर आसूँ ढल आते थे । और अगर कभी गलती से भाई या बहन की नजर उस खत पर पढ जाये तो माँ को ना बताने के लिये उनकी हर फरमाइश भी पूरी करनी पडती थी।

खत पढते ही चिन्ता शुरु हो जाती कि इसे छुपाया कहाँ जाय ? कभी तकिये के नीचे , कभी उसके गिलाफ के अंदर , कभी किताब के पन्नो के बीच मे तो कभी किसी तस्वीर के फ्रेम के बीच में । इतने जतन से छुपाने के बाद भी हमेशा एक डर बना रहता कि कही किसी के हाथ ना लग जाय, वरना तो शामत आई समझो ।

अब आज के दौर मे जब हम ई – मेल का प्रयोग करते है, हमे कोई इन्तजार भले ही ना करना पडता हो , लेकिन वो खत वाली आत्मियता महसूस नही हो पाती । अब डाकिये जी मे भगवान नजर नही आते । आज गुलाब इन्तजार करते है किसी खत का , जिनमे वो सहेज कर प्रेम संदेश ले जाये । शायद खत हमारी जिन्दगी मे बहुत ज्यादा अहमियत रखते थे तभी तो ना जाने कितने गाने बन गये थे – चाहे वो – वो खत के पुरजे उडा रहा था हो या ये मेरा प्रेम पत्र पढ कर हो , चाहे चिट्ठी आई है हो या मैने खत महबूब के नाम लिखा हो । आज चाहे ई –मेल हमारी जिन्दगी का हिस्सा जरूर बन गये हो मगर हमारी यादो की किताब मे उनका एक भी अध्याय नही , शायद तभी आज तक एक भी गीत इन ई-मेल्स के हिस्से नही आया ।

आज भी मेरे पास कुछ खत है जिन्हे मैने बहुत सहेज कर रक्खा है , मै ही क्यो आप के पास भी कुछ खत जरूर होंगे (सही कहा ना मैने) और उन खतों को पढने से मन कभी नही भरता जब भी हम अपनी पुरानी चीजों को उलटते है , खत हाथ में आने पर बिना पढे नही रक्खा जाता ।

साभार : अपर्णा त्रिपाठी - पलाश

Thursday, December 16, 2010

जिंदगी का लेटर बाक्स


इंतजार कर रहा हूँ
वर्षों से......
दोस्तों के खतों का
नाते-रिश्तेदारों के हाल-समाचार का
महसूसना चाहता हूँ फिर से
सजीव संबंधों की गर्माहट को

लेटर बाक्स से मिलता है सिर्फ
बिजली का बिल
काॅरपोरेशन का टैक्स
बैंक का स्टेटमेंट
या फिर
विज्ञापन के निर्जीव पर्चे !!

राज्यवर्धन
सचिव प्रलेस (पश्चिम बंगाल), एकता हाईट्स,

ब्लाक-2/11 ई0, 56,राजा एस. सी. मल्लिक रोड, कोलकाता-700032

Sunday, December 12, 2010

सोने के डाक टिकट


(आज 12 दिसंबर, 2010 के जनसत्ता अख़बार के रविवारी पृष्ठ पर 'सोने के डाक टिकट' शीर्षक से मेरा एक लेख प्रकाशित है. आप इस लेख को यहाँ भी पढ़ सकते हैं. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा)

डाक टिकटों के बारे में तो सभी जानते हैं लेकिन सोने के डाक-टिकट की बात सुनकर ताज्जुब होता है। हाल ही में भारतीय डाक विभाग ने 25 स्वर्ण डाक टिकटों का एक संग्रहणीय सेट जारी किया है। इसके लिए राष्ट्रीय फिलेटलिक म्यूजियम (नई दिल्ली) के संकलन से 25 ऐतिहासिक व विशिष्ट डाक टिकट इतिहासकारों व डाक टिकट विशेषज्ञों द्वारा विशेष रूप से भारत की अलौकिक कहानी का वर्णन करने के लिए चुने गए हैं, ताकि भारत की सभ्यता और संस्कृति से जुड़ी धरोहरों की जानकारी दी जा सके और महापुरूषों को सच्ची श्रद्धांजलि।

सोने के इन डाक टिकटों को जारी करने के लिए डाक विभाग ने लंदन के हाॅलमार्क ग्रुप को अधिकृत किया है। हाॅलमार्क ग्रुप द्वारा हर चुनी हुई कृति के अनुरूप विश्व प्रसिद्ध कलाकारों द्वारा समान आकार व रूप के मूल टिकट के अनुरूप ही ठोस चांदी में डाक टिकट ढाले गये हैं और उन पर 24 कैरेट सोने की परत चढ़ायी गयी है। ‘‘प्राइड आफ इण्डिया‘‘ नाम से जारी किये गए ये डाक टिकट डायमण्ड कट वाले छिद्र के साथ 2.2 मि0मी0 मोटा है। 25 डाक टिकटों का यह पूरा सेट 1.5 लाख रूपये का है यानि हर डाक टिकट की कीमत 6,000 रूपये है। इन डाक टिकटों के पीछे भारतीय डाक और हाॅलमार्क का लोगो है।

इन 25 खूबसूरत डाक टिकटों में स्वतंत्र भारत का प्रथम डाक टिकट ‘जयहिन्द‘, थाणे और मुंबई के बीच चली पहली रेलगाड़ी पर जारी डाक टिकट, भारतीय डाक के 150 साल पर जारी डाक टिकट, 1857 के महासंग्राम के 150वें साल पर जारी डाक टिकट, प्रथम एशियाई खेल (1951), क्रिकेट विजय-1971, मयूर प्रतिरूप: 19वीं शताब्दी मीनाकारी, राधा किशनगढ़, कथकली, भारतीय गणराज्य, इण्डिया गेट, लालकिला, ताजमहल, वन्देमातरम्, भगवदगीता, अग्नि-2 मिसाइल पर जारी डाक टिकट शामिल किये गये हैं। इनके अलावा महात्मा बुद्ध, महात्मा गांधी, रवीन्द्र नाथ टैगोर, जे.आर.डी.टाटा, होमी जहांगीर भाभा, मदर टेरेसा, सत्यजित रे, अभिनेत्री मधुबाला और धीरूभाई अम्बानी पर जारी डाक टिकटों की स्वर्ण अनुकृति भी जारी की जा रही है।

भूटान ने 1996 में 140 न्यू मूल्य वर्ग का ऐसा विशेष डाक टिकट जारी किया था जिसके मुद्रण में 22 कैरेट सोने के घोल का उपयोग किया गया था। विश्व के पहले डाक टिकट ‘पेनी ब्लैक‘ के सम्मान में जारी किये गये इस टिकट पर ‘22 कैरेट गोल्ड स्टेम्प 1996‘ लिखा है। इस टिकट की स्वर्णिम चमक को देखकर इसकी विश्वसनीयता के बारे में कोई संदेह नहीं रह जाता। यह खूबसूरत डाक टिकट अब दुर्लभ डाक टिकटों की श्रेणी में माना जाता है क्योंकि अब यह आसानी से उपलब्ध नहीं है।

भारतीय डाक विभाग ने हाॅलमार्क ग्रुप के साथ जारी किये जा रहे इन डाक टिकटों के बारे में सबसे रोचक तथ्य यह है कि ये स्वर्ण डाक टिकट डाकघरों में उपलब्ध नहीं हैं और न ही किसी शोरूम में। इन्हें प्राप्त करने के लिए विशेष आर्डर फार्म भर कर हाॅलमार्क को भेजना होता है। इसके साथ संलग्न विवरणिका जो इसकी खूबसूरती की व्याख्या करती है, आपने आप में एक अनूठा उपहार है। साथ ही वैलवेट लगी एक केज, ग्लब्स व स्विस निर्माणकर्ता द्वारा सत्यापित शुद्धता का प्रमाण पत्र इन डाक टिकटों को और भी संग्रहणीय बनाते हैं। इन डाक टिकटों की ऐतिहासिकता बरकरार रखने और इन्हें मूल्यवान बनाने के लिए सिर्फ 7,500 सेट ही जारी किया गया है।

सोने के ये डाक टिकट न सिर्फ डाक टिकट संग्रहकर्ताओं बल्कि अपनी सभ्यता व संस्कृति से जुड़े हर व्यक्ति के लिए एक अमूल्य धरोहर हैं. इसीलिए डाक टिकटों के पहले सेट को नई दिल्ली के राष्ट्रीय फिलेटलिक म्यूजियम में भी प्रदर्शन के लिए सुरक्षित रखने का फैसला किया गया है ।

Thursday, December 9, 2010

गौरैया और कबूतर के साथ उडेंगी चिट्ठियाँ

भारतीय डाक विभाग ने 9 जुलाई सन 2010 को गौरैया व कबूतर पर डाक टिकट जारी किए। गौरैया व कबूतर हमारी संस्कृति और परंपराओं का हिस्सा रहे हैं, लोकजीवन में इनसे जुड़ी कहानियां व गीत आप को लोक साहित्य में मिलेंगें। इधर कुछ वर्षों से पक्षी वैज्ञानिकों एंव सरंक्षणवादियों का ध्यान घट रही गौरैया की तरफ़ गया। नतीजतन इसके अध्ययन व सरंक्षण की बात शुरू हुई, जैसे की पूर्व में गिद्धों व सारस के लिए हुआ। डाक टिकटों में एक नर व मादा गौरैया को एक मिट्टी के घड़े पर बैठे हुए दर्शाया गया है, दूसरे सेट में कबूतरों का एक जोड़ा चित्रित है। एक डाक टिकट की कीमत पाँच रुपये हैं। जो पूरे भारत में आप के पत्र को पहुंचाने में सक्षंम हैं.डाक टिकटों को इकट्ठा करने वाले लोगों के संग्रह में कबूतर और गौरैया की तस्वीर वाले डाक टिकटों की बढ़ोत्तरी हो सकेगी।पक्षी प्रेमियों के लिए भी यह एक सुखद अनुभव होगा जब वह गौरैया या कबूतर वाले डाक टिकट लगे पत्रों को प्राप्त करेंगे या किसी को भेजेंगे।

हांलाकि ई-मेल व मोबाइल ने चिठ्ठियों के चलन को काफ़ी हद तक कम किया हैं, लेकिन हाथ से लिखे खत और उन पर चिपके हुए रंग-बिरंगी तस्वीरों वाले टिकट मानव मन-मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव छोड़ते हैं, साथ ही वह खत व टिकट लिफ़ाफ़े हमारे अतीत की यादों को सुरक्षित रखने में भी मदद करते हैं। क्योंकि जब भी आप इन धूल चढ़े लिफ़ाफ़ों से वह परत हटायेंगे तो बरबस ही वह पुराना वक्त और वह बाते ताजा होंगी जो इस खत में लिखी हुई हैं। खास बात है कि कागज के यह खत जो कहते हैं, उस बात का पालन करने के लिए हम अधिक तत्पर व संवेदनशील होते हैं। वह प्रभाव इलेक्ट्रानिक संपर्क के किसी माध्यम में मौजूद नही हैं।

इसलिए इस बार जब आप किसी को खत लिखे तो गौरैया व कबूतर वाले टिकट लगाना मत भूलिएगा, और यह भी जरूर लिखिएगा कि हमारें घरों व उनके आस-पास रहने वाले इन खूबसूरत परिन्दों के खाने-पीने का खयाल रखते है या नही।

साभार :दुधवा लाइव डेस्क

Saturday, December 4, 2010

डाक टिकट बनीं पत्र मित्रता

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी संग्रह करना बहुत से बच्चों की हॉबी का हिस्सा होता है, कोई अखबार में छपी रेसीपीज तो कोई विभिन्न देशों की मुद्राएं इकटी करने में लगा रहता है। डाक-टिकटों का संग्रह विश्व के सबसे लोकप्रिय शौकों में से एक है। डाक-टिकटों का संग्रह हमें स्वाभाविक रूप से सीखने को प्रेरित करता है, इसलिए इसे प्राकृतिक शिक्षा-उपकरण कहा जाता है। डाक-टिकट किसी भी देश की विरासत की चित्रमय कहानी हैं। डाक टिकटों का एक संग्रह विश्वकोश की तरह है, जिसके द्वारा हम अनेक देशों के इतिहास, भूगोल, संस्कृति, ऎतिहासिक घटनाएं, भाषाएं, मुद्राएं, पशु-पक्षी, वनस्पतियों और लोगों की जीवनशैली एवं देश के महारथियों के बारे में बहुत सारी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

डाक टिकट का इतिहास
डाक-टिकट का इतिहास करीब 169 साल पुराना है। विश्व का पहला डाक टिकट 1 मई 1840 को ग्रेट ब्रिटेन में जारी किया गया था, जिसके ऊपर ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया का चित्र छपा था। एक पेनी मूल्य के इस टिकट के किनारे सीधे थे यानी टिकटों को अलग करने के लिए जो छोटे छोटे छेद बनाए जाते हैं, वे प्राचीन डाक टिकटों में नहीं थे। इस समय तक उनमें लिफाफे पर चिपकाने के लिए गोंद भी नहीं लगा होता था। इसके उपयोग का प्रारंभ 6 मई 1840 से हुआ। टिकट संग्रह करने में रूचि रखने वालों के लिए इस टिकट का बहुत महत्व है, क्योंकि इस टिकट से ही डाक-टिकट संग्रह का इतिहास भी शुरू होता है।

भारत में पहला डाक-टिकट
1 जुलाई 1852 में सिंध प्रांत में जारी किया गया, जो केवल सिंध प्रांत में उपयोग के लिए सीमित था। आधे आने मूल्य के इस टिकट को भूरे कागज पर लाख की लाल सील चिपका कर जारी किया गया था। यह टिकट बहुत सफल नहीं रहा क्योंकि लाख टूटकर झड़ जाने के कारण इसको संभालकर रखना संभव नहीं था। फिर भी ऎसा अनुमान किया जाता है कि इस टिकट की लगभग 100 प्रतियां विभिन्न संग्रहकर्ताओं के पास सुरक्षित हैं। डाक-टिकटों के इतिहास में इस टिकट को सिंध डाक के नाम से जाना जाता है। बाद में सफेद और नीले रंग के इसी प्रकार के दो टिकट वोव कागज पर जारी किए गए लेकिन इनका प्रयोग बहुत कम दिनों तक रहा, क्योंकि 30 सितंबर 1854 को सिंध प्रांत पर ईस्ट इंडिया कंपनी का अधिकार होने के बाद इन्हें बंद कर दिया गया।ये एशिया के पहले डाक-टिकट तो थे ही, विश्व के पहले गोलाकार टिकट भी थे। संग्रहकर्ता इस प्रकार के टिकटों को महत्वपूर्ण समझते हैं और आधे आने मूल्य के इन टिकटों को आज सबसे बहुमूल्य टिकटों में गिनते हैं।

डाकटिकट संग्रह बना मनोरंजन
समय के साथ जैसे-जैसे टिकटों का प्रचलन बढ़ा टिकट संग्रह का शौक भी पनपने लगा। 1860 से 1880 के बीच बच्चों और किशोरों ने टिकटों का संग्रह करना शुरू कर दिया था। दूसरी ओर अनेक वयस्क लोगों में भी यह शौक पनपने लगा और उन्होंने टिकटों को जमा करना शुरू किया, संरक्षित किया, उनके रेकार्ड रखे और उन पर शोध आलेख प्रकाशित किए। जल्दी ही इन संरक्षित टिकटों का मूल्य बढ़ गया क्योंकि इनमें से कुछ तो ऎतिहासिक विरासत बन गए थे और बहुमूल्य बन गए थे। ग्रेट ब्रिटेन के बाद अन्य कई देशों द्वारा डाक-टिकट जारी किये गए।

1920 तक यह टिकट संग्रह का शौक आम जनता तक पहुंचने लगा। उनको अनुपलब्ध तथा बहुमूल्य टिकटों की जानकारी होने लगी और लोग टिकट संभालकर रखने लगे। नया टिकट जारी होता तो उसे खरीदने के लिए डाकघर पर भीड़ लगनी शुरू हो जाती थी। लगभग 50 वर्षो तक इस शौक का नशा जारी रहा। इसी समय टिकट संग्रह के शौक पर आधारित टिकट भी जारी किए गए। जर्मनी के टिकट में टिकटों के शौकीन एक व्यक्ति को टिकट पर अंकित बारीक अक्षर आवर्धक लेंस (मैग्नीफाइंग ग्लास) की सहायता से पढ़ते हुए दिखाया गया है। आवर्धक लेंस टिकट-संग्रहकर्ताओं का एक महत्वपूर्ण उपकरण है। एक रूपये मूल्य का भारतीय टिकट, यू.एस. का टिकट तथा बांग्लादेश के लाल रंग के तिकोने टिकटों का एक जोड़ा टिकट संग्रह के शौक पर आधारित महत्वपूर्ण टिकटों में से हैं।

1940-50 तक डाक-टिकटों के शौक ने देश-विदेश के लोगों को मिलाना शुरू कर दिया था। टिकट इकटा करने के लिए लोग पत्र-मित्र बनाते थे। अपने देश के डाक-टिकटों को दूसरे देश के मित्रों को भेजते थे और दूसरे देश के डाकटिकट मंगवाते थे। पत्र-मित्रता के इस शौक से डाक-टिकटों का आदान प्रदान तो होता ही था लोग विभिन्न देशों के विषय में अनेक ऎसी बातें भी जानते थे, जो किताबों में नहीं लिखी होती हैं। उस समय टीवी और आवागमन के साधन आम न होने के कारण देश विदेश की जानकारी का ये बहुत ही रोचक साधन बने। पत्र-पत्रिकाओं में टिकट से संबंधित स्तंभ होते और इनके विषय में बहुत सी जानकारियों को जन सामान्य तक पहुंचाया जाता। पत्र-मित्रों के पतों की लंबी सूचियां भी उस समय की पत्रिकाओं में प्रकाशित की जाती थीं।

धीरे धीरे डाक टिकटों के संग्रह की विभिन्न शैलियों का भी जन्म हुआ। लोग इसे अपनी जीवन शैली, परिस्थितियों और रूचि के अनुसार अनुकूलित करने लगे। इस परंपरा के अनुसार कुछ लोग एक देश या महाद्वीप के डाक-टिकट संग्रह करने लगे तो कुछ एक विषय से संबंधित डाक-टिकट। आज अनेक लोग इस प्रकार की शैलियों का अनुकरण करते हुए और अपनी-अपनी पसंद के किसी विशेष विषय के डाक टिकटों का संग्रह करके आनंद उठाते है। विषयों से संबंधित डाक टिकटों के संग्रह में अधिकांश लोग पशु, पक्षी, फल, फूल, तितलियां, खेलकूद, महात्मा गांधी, महानुभावों, पुल, इमारतें आदि विषयों और दुनिया भर की घटनाओं के रंगीन और सुंदर चित्रों से सजे डाक टिकटों को एकत्रित करना पसंद करते है।

प्रत्येक देश हर साल भिन्न भिन्न विषयों पर डाक-टिकट जारी करते हैं और जानकारी का बड़ा खजाना विश्व को सौप देते हैं। इस प्रकार किसी विषय में गहरी जानकारी प्राप्त करने के लिए उस विषय के डाक टिकटों का संग्रह करना एक रोचक अनुभव हो सकता है। डाक-टिकट संग्रह का शौक हर उम्र के लोगों को मनोरंजन प्रदान करता है। बचपन में ज्ञान एवं मनोरंजन, वयस्कों में आनंद और तनावमुक्ति तथा बड़ी उम्र में दिमाग को सक्रियता प्रदान करने वाला इससे रोचक कोई शौक नहीं। इस तरह सभी पीढियों के लिए डाक टिकटों का संग्रह एक प्रेरक और लाभप्रद अभिरूचि है।

Thursday, December 2, 2010

डाक टिकटों में भारत दर्शन

प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की मुखिया श्रीमती सोनिया गांधी को उनकी इलाहाबाद यात्रा के दौरान 25 नवंबर 2010 को वरिष्ठ पत्रकार और रेल मंत्रालय में परामर्शदाता अरविंद कुमार सिंह ने अपनी हाल में प्रकाशित पुस्तक डाक टिकटों में भारत दर्शन की प्रथम प्रति भेंट की। इस अवसर पर उन्होंने श्रीमती सोनिया गांधी को यह भी जानकारी दी कि राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन में शामिल रहे सेनानियों तथा कांग्रेस के 278 नेताओं पर अब तक भारत में डाक टिकट जारी हो चुके हैं। पर इन सभी डाक टिकटों में पंडित जवाहर लाल नेहरू के निधन के बाद जारी डाक टिकट सबसे महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक माना जाता है जो इलाहाबाद में ही उ.प्र. की तत्कालीन मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी ने 12 जून 1964 को जारी किया था। यह डाक टिकट दो करोड़ की संख्या में छपा था और दुनिया के तमाम हिस्सों में लोकप्रिय रहा था। आज तक किसी भी व्यक्तित्व पर इतनी बड़ी संख्या में डाक टिकट नहीं जारी हुए।

श्री सिंह की यह पुस्तक नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया (भारत सरकार) द्वारा प्रकाशित की गयी है और इसमें डाक टिकटों से संबंधित सभी पक्षों पर महत्वपूर्ण जानकारियां देने के साथ देश के सभी प्रमुख फिलैटलिस्ट, फिलैटली संस्थाओं आदि का भी विवरण दिया गया है। इसके अलावा उनकी एक और पुस्तक भारतीय डाक भी नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा हिंदी में प्रकाशित की गयी है जिसका उर्दू, अंग्रेजी तथा असमिया भाषा में प्रकाशन किया जा चुका है और इसका एक खंड एनसीईआरटी द्वारा आठवीं कक्षा के हिंदी पाठ्यक्रम वसंत भाग-3 में भी शामिल किया गया है।

श्री सिंह ने इलाहाबाद में जनसत्ता के संवाददाता के रूप में अपना कैरियर 1983 में शुरू किया था और 1986 के बाद दिल्ली में चौथी दुनिया, अमर उजाला में लंबे समय तक कार्य करने के बाद हरिभूमि के दिल्ली संस्करण के संपादक समेत कई पदों पर कार्य किया। राष्ट्रपति तथा अकादमी पुरस्कार समेत कई पुरस्कारों से सम्मानित श्री सिंह संप्रति रेल मंत्रालय में परामर्शदाता हैं।

साभार : हिन्दीलोक

भारतीय डाक विभाग ट्विटर पर

दो सरकारी महकमों के प्रति बचपन से बहुत ही आकर्षण रहा है – रेल और डाक । आकर्षण अभी भी है। हांलाकि इन दो महान सेवाओं पर कई आक्रमण शुरु हो गये हैं ।

काशी के राजघाट किले स्थित साधना केन्द्र परिसर में मेरा शैशव बीता । इस परिसर की दो तरफ़ गंगा-वरुणा बहती हैं और तीसरी ओर काशी स्टेशन है। गंगा-वरुणा की भांति काशी स्टेशन से भी हमारी वानर-सेना का आकर्षण था। माल-गोदाम और स्टेशन पर मटर-गश्ती खूब होती थी। माल-वाहक डिब्बों को माल गोदाम में छोड़ने और ले जाने के लिए इंजन की शन्टिंग दिन भर होती । आम तौर पर कुकुर-मुँहा कोयले के इंजन यह काम करते । बिलार-मुँहा इंजन आम तौर पर एक्सप्रेस गाड़ियों में लगे होते। इंजन ड्राईवर और गार्ड अत्यन्त श्रद्धा और आकर्षण के पात्र होते। इंजन ड्राइवरों द्वारा रुमाल गँठिया कर टोपी बनाने की दो शैलियों पर गौर किया था लेकिन सीख एक ही पाये थे- रुमाल के चारों कोनों को गँठियाने वाली शैली। माल-गोदाम में शन्टिंग करने वाले इंजनों के ड्राइवर बहुत प्यासी दृष्टि से हम ताकते। कभी वे खुद पूछते,’ क्या बात है?’ -’ऊपर चढ़ कर अन्दर से इंजन देखना है।’ बेलचे से एक सधी हुई लय में कोयला उठाना और उसे धधकती भट्टी में डालना,भांप के दबाव की घड़ी पर ध्यान रखना, बाहर की तरफ़ लटक कर जायजा लेना,गोल हैण्डल घुमाकर इंजन को आगे या पीछे ले जाना ! गार्ड के डिब्बे से भी बहुत आकर्षण था।

दरजा चार से रिश्तेदारों को ख़त लिखने की माँ ने आदत डलवाई थी। यह झेलाऊ इसलिए नहीं लगता था कि उनके जवाब पा कर मानो पर लग जाते थे। हमारे स्कूल में भी सप्ताह में एक दिन हॉ्स्टल में रहने वाले लड़के-लड़कियों को क्लास में पोस्ट कार्ड दिए जाते थे। घर वालों को लिखने के लिए। शुरु में उन पर स्केल से लाईन खींच कर तब लिखा जाता। डाक-पेटी से डाकिए द्वारा पत्र निकालना , निकट के डाकघर में आने जाने वाली चिट्ठियों की छँटाई,बाहर से आई चिट्ठियों का वितरण इस पूरी प्रक्रिया को बहुत गौर से देखा समझा था। दरअसल एक छोटी सी किताब थी जिसमें अत्यन्त रोचक शैली में पूरी प्रक्रिया का सचित्र विवरण था। अपनी चिट्ठी डाक पेटी में डाल देने के बाद जब डाकिया पेटी को अपनी खाकी बोरी में खाली कर रहा होता है तो बच्चा उत्तेजित होकर माँ से कहता है-’देखो माँ, मेरी चिट्ठी भी यह आदमी चुराकर ले जा रहा है’। डाक घर के अन्दर के कमरे में एक गड्ढे में एक तिजोरी हुआ करती थी। बड़े डाक खाने से लाई गई सामग्री और नगद उसमें रखा होता था । इसके साथ उस तिजोरी में एक छुरा देखा था जिसमें दो घुँघरू लगे थे। इसका रहस्य तो कोई सुधी पाठक बतायेगा ।

मेरे गुरु का कहना था कि जनता की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने की सरकार यदि ठान लेगी तो उससे ही रोजगार का सृजन होगा। इस प्रकार पैदा रोजगार ’गड्ढ़े खोद कर उसे पाटने’ वाले काम जैसे नहीं होते। आज भी भारतीय डाक विभाग में डाकियों की भर्ती की जा सकती है। देश के कई गाँवों में हफ़्ते-पखवारे में एक बार डाक आती है,कई बार गाँव का कोई व्यक्ति हफ़्ते-पन्द्रह दिन में एक बार निकट के डाकखाने से पत्र ले आता है । देश की जनता की कपड़े की जरूरत को पूरा करने का मन यदि सरकार बना ले तो उसे हैण्डलूम को प्राथमिकता देनी होगी। पूरे देश को शिक्षित करने के लिए आज भी शिक्षकों की बहाली की गुंजाइश है। जब सभी सेवायें-सुविधाएं मुट्ठी-भर लोगों को ही मुहैय्या करने की नीति हो तब तमाम जरूरी रोजगार के अवसरों को समाप्त किया जाता है। सुना है बरसों से डाकियों की नियुक्ति बन्द है।

पिछले कुछ समय से डाक विभाग में रंग-रोगन ,ताम झाम में कुछ चमक-दमक बढ़ी है। डाकियों की संख्या नहीं बढ़ानी है।

हिन्दी में दो ब्लॉग डाक-डाकिया-डाक घर से जुड़े हैं – भारतीय डाक सेवा से जुड़े कृष्ण कुमार यादव ’डाकिया डाक लाया’ नामक ब्लॉग चलाते हैं तथा पप्पू ’डाकखाना’ नामक ब्लॉग चलाते हैं । निश्चित तौर पर हिन्दी ब्लॉग जगत को एक व्यापक आधार देने में इन दोनों चिट्ठों की अहम भूमिका मानी जाएगी। युनुस खान द्वारा शुरु किए गए रेडियोनामा नामक समूह चिट्ठे से इन दोनों चिट्ठों की तुलना की जा सकती है ।

भारतीय डाक विभाग ने पोस्ट ऑफ़िस इंडिया नाम से ट्विटर पर खाता खोला है । ट्विटर पर इस महकमे से जुड़कर हम इस पर हिन्दी को बढ़ा सकते हैं। डाक खानों में टंगी- ’शब्दों के लिए अटिकिए नहीं ,हिन्दी लिखते- लिखते आयेगी’ तख्ती को याद करें और डाक विभाग को हिन्दी में ट्विट करें !!

Sunday, October 17, 2010

विजयदशमी की बधाई !!


दशहरे की परम्परा भगवान राम द्वारा त्रेतायुग में रावण के वध से भले ही आरम्भ हुई हो, पर द्वापरयुग में महाभारत का प्रसिद्ध युद्ध भी इसी दिन आरम्भ हुआ था। विजयदशमी सिर्फ इस बात का प्रतीक नहीं है कि अन्याय पर न्याय अथवा बुराई पर अच्छाई की विजय हुई थी बल्कि यह बुराई में भी अच्छाई ढूँढ़ने का दिन होता है।....विजयदशमी की हार्दिक बधाई !!

Wednesday, October 13, 2010

अंडमान में मनाया गया विश्व डाक दिवस

भारतीय डाक विभाग द्वारा विश्व डाक दिवस प्रधान डाकघर पोर्टब्लेयर में मनाया गया और इस दौरान राष्ट्रीय डाक सप्ताह का आयोजन 9 अक्टूबर-15 अक्टूबर के दौरान किया जा रहा है। कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए अंडमान निकोबार द्वीप समूह के डाक निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि 9 अक्टूबर 1874 को ‘‘जनरल पोस्टल यूनियन‘‘ (वर्तमान में यूनीवर्सल पोस्टल यूनियन या विश्व डाक संघ) के गठन हेतु बर्न, स्विटजरलैण्ड में 22 देशों ने एक संधि पर हस्ताक्षर किया था, इसी कारण 9 अक्टूबर को कालान्तर में ‘‘विश्व डाक दिवस‘‘ के रूप में मनाना आरम्भ किया गया। यह संधि 1 जुलाई 1875 को अस्तित्व में आयी, जिसके तहत विभिन्न देशों के मध्य डाक का आदान-प्रदान करने संबंधी रेगुलेसन्स शामिल थे। कालान्तर में 1 अप्रैल 1879 को जनरल पोस्टल यूनियन का नाम परिवर्तित कर यूनीवर्सल पोस्टल यूनियन कर दिया गया। यूनीवर्सल पोस्टल यूनियन का सदस्य बनने वाला भारत प्रथम एशियाई राष्ट्र था, जो कि 1 जुलाई 1876 को इसका सदस्य बना। जनसंख्या और अन्तर्राष्ट्रीय मेल ट्रैफिक के आधार पर उस समय सदस्य राष्ट्रों की 6 श्रेणियां थीं और भारत आरम्भ से ही प्रथम श्रेणी का सदस्य रहा। 1947 में यूनीवर्सल पोस्टल यूनियन, संयुक्त राष्ट्र संघ की एक विशिष्ट एजेंसी बन गई। श्री कृष्ण कुमार यादव ने इस रोचक तथ्य की ओर भी ध्यान आकृष्ट किया कि विश्व डाक संघ के गठन से पूर्व दुनिया में एक मात्र अन्तर्राष्ट्रीय संगठन रेड क्रास सोसाइटी (1870) था।

इस अवसर पर प्रीमियम सेवाओं से संबंधित कारपोरेट कस्टमर मीट/बिजनेस मीट का आयोजन हुआ । विभिन्न प्रीमियम सेवाओं मसलन- स्पीड पोस्ट, एक्सप्रेस पार्सल पोस्ट, बिजनेस पोस्ट, बिल मेल सर्विस, डायरेक्ट पोस्ट, मीडिया पोस्ट, ई-पोस्ट, ई-पेमेण्ट, लाजिस्टिक पोस्ट, फ्री पोस्ट और इलेक्ट्रानिक इंटीमेशन आॅफ डिलीवरी इत्यादि के संबंध में जानकरी दी गई। डाक सेवा निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने संबोधित करते हुए कहा कि व्यवसायिकता के इस दौर में बिना स्वस्थ्य प्रतिस्पर्धा के कोई भी संगठन उन्नति नहीं कर सकता और डाक विभाग भी इस क्षेत्र में तमाम नये कदम उठा रहा है। डाक विभाग जहाँ नित् नई सेवायें लागू कर रहा है, विभाग ने अपनी परम्परागत छवि को प्रतिस्पर्धा के तहत कारपोरेट इमेज में तब्दील किया है।घर-घर जाकर डाकियों द्वारा डाक का एकत्रीकरण, वन इण्डिया-वन रेट के तहत स्पीड पोस्ट सेवा दरों में कमीं, इन्स्टेन्ट मनी आर्डर, सभी बचत सेवाओं हेतु फाइनेन्स मार्ट, विभिन्न कम्पनियों के म्युचुअल फण्ड व बीमा उत्पादों की बिक्री, कम्प्यूटराइजेशन व प्रोजेक्ट एरो के तहत डाकघरों का आधुनिकीकरण व नवीनतम टेक्नोलाजी का प्रयोग जैसे तमाम कदमों ने डाकघरों का चेहरा बदल डाला है। श्री यादव ने कहा कि एक तरफ विभिन्न कारपोरेट एवं सरकारी व अद्र्व सरकारी विभागों की आवश्यकतानुसार तमाम सेवायें आरम्भ की गई हैं, वहीं बुक नाउ-पे लेटर, बल्क मेल पर छूट, फ्री पिकअप जैसी स्कीमों के तहत डाक सेवाओं को और आकर्षक बनाया गया है। श्री यादव ने कहा कि नेटवर्क की दृष्टि से डाकघर बचत बैंक देश का सबसे बड़ा रीटेल बैंक (लगभग 1.5 लाख शाखाओं, खातों और वार्षिक जमा-राशि का संचालन, 31 मार्च 2007 को कुल जमा राशि-3,515,477.2 मिलियन रूपये) है। यह अनुमान लगाया गया था कि वर्ष 2001 में डाकघर में बचत की कुल राशि भारत के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 7 प्रतिशत बनती है। (विश्व बैंक अध्ययन की अंतिम रिपोर्ट, अगस्त, 2002)। 172 मिलियन से अधिक खाताधारकों के ग्राहक आधार और 1,54,000 शाखाओं के नेटवर्क के साथ डाकघर बचत बैंक देश के सभी बैंकों की कुल संख्या के दोगुने के बराबर है।

श्री यादव ने कहा कि डाक विभाग अपने ग्राहकों की सेवा के लिए प्रतिबद्ध है और इसके लिए लोगों से संवाद कायम करना बेहद जरूरी है। इस परिप्रेक्ष्य में प्रोजेक्ट एरो के तहत जहां विभाग ने कोर सेक्टर पर ध्यान दिया है वहीं स्टाफ को ग्राहकों से अच्छे व्यवहार हेतु भी प्रशिक्षित किया जा रहा है। इस अवसर पर उन संस्थानों के प्रतिनिधियों का भी सम्मान किया गया, जो कि डाक विभाग को लाखों में व्यवसाय देते हैं। इनमें एक्सीस बैंक के हेड श्री प्रकाश कुमार, इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के निदेशक श्री एस0 सौनन्द, भारतीय स्टेट बैंक के चीफ मैनेजर श्री देबदास चट्टोपाध्याय और वेतन एवं लेखा कार्यलय के निदेशक श्री एन0एम0 पिल्लै शामिल हैं

इस अवसर पर उपस्थित जनों का स्वागत श्री एम0 गणपति, पोस्टमास्टर, प्रधान डाकघर, पोर्टब्लेयर ने किया तथा श्री रंजीत कुमार आदक, आभार-ज्ञापन सहायक अधीक्षक (मुख्यालय), द्वारा किया गया।

(साभार : द्वीप समाचार, 10 अक्तूबर, 2010)