Sunday, May 8, 2011

रवीद्रनाथ ठाकुर के 150वें जन्मदिन पर डाक टिकट


भारतीय डाक विभाग ने रवीद्रनाथ ठाकुर के 150वें जन्मदिन के अवसर पर 7 मई 2011 को दो डाक टिकटों का एक सेट जारी किया है। इन डाक टिकटों का मूल्य 5 रुपये प्रति है। डाक टिकट के डिजाइन में रचना कर्म में लीन रवीद्रनाथ ठाकुर -पृष्ठभूमि में शांतिनिकेतन का उपासना घर, अपने नाटक वाल्मीकि प्रतिभा में अभिनय करते हुए रवीद्रनाथ ठाकुर तथा उनकी एक पेंटिग को दर्शाया गया है। इन डाक टिकटों के साथ मिनिएचर शीट भी जारी की गई है, जिसका मूल्य 10 रुपये है, जिस पर रविंद्रनाथ ठाकुर का जन्म स्थान, उनकी कुछ कविताओं की पांडुलिपियां और नोबेल पुरस्कार को दिखाया गया है। इसके साथ ही प्रथम दिवस आवरण व विवरणिका भी जारी किए गए हैं, जिसमें उनकी पेंटिंग तथा हस्तलिपि एवं चित्राकंन दर्शाया गया है।

(रबीन्द्रनाथ ठाकुर के व्यक्तित्व-कृतित्व पर कृष्ण कुमार यादव का आलेख 'सृजनगाथा' पर 'कवीन्द्र-रविन्द्र और उनके विमर्श' शीर्षक से पढ़ा जा सकता है)


Tuesday, April 26, 2011

प्यार की चिट्ठी

'प्यार की चिट्ठी' भला किसे न सुहाए. टेक्नालाजी कहाँ की कहाँ पहुँच गई, पर अभी भी उन प्यार भरे चिट्ठियों की बात होते ही मन में सिहरन सी उठने लगती है. ऐसी ही इक प्यार भरी चिट्ठी जनसत्ता के समान्तर स्तम्भ में 21 अप्रैल, 2011 को पढ़ी, तो सोचा की इसे यहाँ भी बांच लूं. इस प्यार भरी चिट्ठी के लेखक हैं सिद्धेश्वर जी. उनकी (प्रेम) पत्र - लेखन और (प्रेम) पत्र - पठन के (वे) दिन पोस्ट यहाँ पर साभार प्रस्तुत है !!


तब रंगीन लगती थीं श्वेत श्याम तस्वीरें
और किताबों के बीच चुपके से रखे गए सूखे फूल
बोसीदा कमरे में भर में भर देते थे सुगन्ध।


रात के दो के आसपास का समय था।वोल्वो तेज रफ्तार से भाग रही थी. बस में थोड़े-थोड़े अंतराल पर एक ही गाना बार-बार बज रहा था-'चिठ्ठी आई है ,वतन से चिठ्ठी आई है'.लग रहा था कि बस के ड्राइवर और स्टाफ को घर की याद आ रही होगी. मैं ऐसा शायद इसलिए भी अनुमान कर रहा क्योंकि स्वयं घर से दूर था - हजारों मील, लेकिन घर की याद बिना किसी टिकट भाड़े नजदीक और नजदीक चली आ रही थी. मुझसे आगे की सीट पर बैठा युवक अपनी साथी को बता रहा था-'नाम फिल्म इसी गाने से पंकज उधास का नाम फेमस हुआ था'.शुक्र है कि युवती ने 'कौन पंकज, कौन उधास?' नहीं पूछा.मुझे याद आया कि एक सहकर्मी ने एक दिन बताया था कि उन दिनों जब यह गाना खूब चला था तब उन्होंने इसी से 'प्रेरणा'लेकर गणित में एम.एस-सी.करने के तत्काल बाद एक विदेशी स्कूल की नौकरी के बदले अपने कस्बेनुमा शहर की मास्टरी को इसलिए तरजीह दी थी कि 'उमर बहुत है छोटी,अपने घर में भी है रोटी'.हालांकि बाद में,थोड़ी तरलता आने पर उन्होंने बेहद मीठे और मुलायम अंदाज में यह भी खुलासा किया था कि इस निर्णय के केन्द्र में 'प्रेम' भी (शायद प्रेम ही!) एक मजबूत कारण या आधार था.और यह भी कि उन दिनों वह रोजाना बिला नागा 'उसे' एक पत्र लिखा करते थे - प्रेम पत्र.

वह कोई दूसरा समय था
इतिहास का एक बनता हुई कालखंड
समय की खराद पर
उसी में ढलना था हम सबका जीवन।

आजकल पत्र कौन लिखता है? सरकारी,व्यव्सायी,नौकरी-चाकरी के आवेदन-बुलावा आदि के अतिरिक्त पारिवारिक-सामाजिक पत्र हमारी जिंदगी के हाशिए से भी सरक गए लगते है.क्या ऐसा संचार के वैकल्पिक संसाधनों-साधनों की सहज - सरल - सस्ती उपलब्धता के कारण हुआ है? या कि समय का अभाव,पारिवारिक-सामाजिक संरचना के तंतुजाल में दरकाव,पेपरलेस कम्युनिकेशन की ओर अग्रगामिता आदि-इत्यादि चीजें इसकी वजहें हैं? बहरहाल, इस गुरु-गंभीर विषय पर विमर्श की विचार-वीथिका में वरिष्ठ-गरिष्ठ विद्वानों को विचरण करने का सुअवसर प्रदान करते हुए मैं तो बस यही कहना चाह रहा हूं कि कहां गए वो दिन? वो पत्र-लेखन और पत्र-पठन के दिन अब तो पत्र-लेखन कला स्कूली पाठ्यक्रमों में सिमट कर रह-सी गई है।

दुनिया बदलती जा रही है पल-प्रतिपल।
तमाम जतन और जुगत के बावजूद
हर ओर सतत जारी है कुरूपताओं का कारोबार
बढ़ता ही जा रहा है कूड़ा कबाड़
फिर भी मन का कोई कोई कोना
खोजता है एकान्त

कुछ लोग कहेंगे कि ई मेल ,एसएमएस,इंस्टैन्ट मैसेजिंग आदि पर मेरी नजर क्यों नहीं जा रही है. हां,ये भी पत्र के विकल्प रूप - प्रारूप हैं और इनके जरिए व्यक्त की जाने वाली संवेदना तथा उसके शिल्प को मैं नकार भी नहीं रहा हूं किन्तु यहां मेरी मुराद कागज पर लिखे जाने वाले उस पत्र से है जिससे तमाम भाषाओं का विपुल साहित्य भरा पड़ा है,जिसको लेकर रचा गया समूचे संसार का शास्त्रीय-उपशास्त्रीय-लोक-फ़ोक संगीत अनंत काल तक दिग्-दिगंत में गूंजता रहेगा,जो कभी मानवीय संबंधों की ऊष्मा का कागजी पैरहन था,जो कभी सूखे हुए फूलों के साथ किताबों के पन्नों में मिला करता था और दिक्काल की सीमाओं को एक झटके में तिरोहित कर जीवन-जगत के तमस में आलोक का आश्चर्य भर देता था.

अब भी मँडराती हैं
ढेर सारी कटी पतंगे
तलाशती हुईं अपनी डोरियाँ
अपनी लटाइयाँ
और अपने-अपने हिस्से का आकाश।

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सिद्धेश्वर

Wednesday, April 20, 2011

ब्रिटेन और आस्ट्रेलिया में विलियम-केट की शाही शादी पर डाक टिकट

ब्रिटेन के राजकुमार प्रिंस विलियम और केट मिडिलटन की शाही शादी से पहले ब्रिटिश डाक विभाग ने उनके सम्मान में डाक टिकट निकालने की तैयारी की है। यह डाक टिकट दो तरह के होंगे जिन पर यह जोड़ी आलिंगनबद्ध दिखाई देगी। इसके लिए फोटोग्राफर मारिया टेस्टिनो द्वारा खींची गई तस्वीर का इस्तेमाल किया जाएगा। ‘डेली एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक 1981 में चार्ल्स और डायना की शादी के समय उनके सम्मान में दो डाक टिकट जारी किए गए थे। विलियम इससे पहले भी दो बार डाक टिकटों पर दिख चुके हैं। पहली बार महारानी के 100वें जन्मदिन के उपलक्ष्य में। दूसरी बार अपने 21वें जन्मदिन के अवसर पर। इन टिकटों की बिक्री 21 अप्रैल से शुरु होगी। उल्लेखनीय है कि विलियम और केट की शादी 29 अप्रैल 2011 को होगी।


गौरतलब है कि 11 अप्रैल को आस्ट्रेलिया ने भी ब्रिटेन के राजकुमार प्रिंस विलियम और केट मिडलटन की शादी की स्मृति में एक विशेष डाक टिकट जारी किया है, जिसमें इस भावी दंपति को सगाई की रस्म के बाद की मुद्रा में दिखाया गया है। विभाग के प्रमुख अहमद फाहूर ने कहा,’हमें विश्वास है कि विशेष डाक टिकट लोगों को इस ऐतिहासिक और खुशी के मौके को अपनी यादों में संजोकर रखने का एक मौका देगा।’

Monday, April 18, 2011

सुब्रत राय 'सहारा' पर डाक टिकट ....??

ब्रिटेन की राष्ट्रीय डाक सेवा रायल मेल भारतीय कार्पोरेट दिग्गज एवं सहारा समूह के अध्यक्ष सुब्रत राय के सम्मान में डाक टिकट जारी करेगी। ब्रिटेन ने उनकी उपलब्धियों को देखते हुए प्रथम श्रेणी का डाक टिकट जारी करने की घोषणा की है। इस सम्मान पर श्री राय ने कहा, ‘मेरे पास रायल मेल का आभार व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं हैं, मुझे नहीं लगता कि मैं इसके लायक हूँ। मैं इस सम्मान की गरिमा बनाए रखने की कोशिश करुँगा।’ ब्रिटेन की संसद के प्रवक्ता जान बर्को ने शिक्षा, खेल और प्रौढ़ शिक्षा के क्षेत्र में समूह की उपलब्धियों का स्वागत करते हुए कहा, ‘हम आपकी उपलब्धियों को सलाम करते हैं।’


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सुब्रत राय पर ब्रिटेन के डाक विभाग द्वारा जारी होने वाले डाक टिकट की खबर तमाम अख़बारों में धड़ल्ले से छपी. कुछ समय पहले भोजपुरी गायक और अभिनेता मनोज तिवारी पर भी एक देश द्वारा डाक टिकट छपने की बातें मीडिया में आई थीं. पर इनका रहस्य ही कुछ और है ? वस्तुत: तमाम देश इस तरह के डाक टिकटों को कमर्शियल आधार पर बढ़ावा देते हैं. हाल ही में भारत में भी पर्सनालाइज्ड डाक टिकट आरंभ किये गए हैं, जिन्हें पिछले दिनों INDIPEX के दौरान बखूबी जारी भी किया गया. Business Standard अख़बार ने इस प्रकरण पर पूरी विस्तृत रिपोर्ट भी प्रकाशित की है. अख़बार लिखता है कि -'' A Royal Mail spokesperson said, “Royal Mail has a range of services which allow individuals or businesses to create a personalised label, which can feature their own image or logo next to a postage stamp.” “Companies and individuals around the world purchase Royal Mail’s customised stamp sheets and we are delighted to have produced these limited edition Business Customised sheets to mark this occasion. Our customised stamp products, Smilers and Business Customised services, are very popular with businesses and individuals, who create and purchase them to celebrate events which range from the birth of a baby to a significant event or achievement within their business.” .....तो क्या इंडियन सेलिब्रेटीज अपने को चर्चित बनाने के लिए इस तरह की ट्रिक का इस्तेमाल कर रहे हैं और मीडिया के माध्यम से उसे भुना भी रहे हैं. ऐसे डाक-टिकटों के पीछे छिपा हुआ यह वाकई रोचक पहलू है.

Tuesday, April 12, 2011

एलिजाबेथ टेलर के साथ दफन हुआ प्रेम पत्र भी

पत्र दिल के कितने करीब होते हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि हाॅलीवुड की प्रख्यात अभिनेत्री एलिजाबेथ टेलर की कब्र में उनके पूर्व पति रिचर्ड बर्टन द्वारा उनके आखिरी दिनों में उन्हें भेजा गया पत्र भी रखा गया। अभिनेत्री एलिजाबेथ टेलर की मौत 23 मार्च 2011 को हुई थी और उन्हें लाॅस एंजिल्स के फारेस्ट लाॅन कब्रगाह में दफना दिया गया। हाॅलीवुड में दोनों का रोमांस यादगार माना जाता है। टेलर ने बर्टन के साथ दो बार शादी की थी। दूसरी बार टेलर से तलाक लेने के बाद बर्टन ने सुसान हंट से शादी की, लेकिन अपनी पहली पत्नी को नहीं भूल पाए। 1984 में उन्होंने टेलर को वापस लौटने के लिए प्यार भरा पत्र लिखा था। उसके बाद बर्टन की 58 साल की उम्र में मौत हो गई थी। टेलर पिछले 27 साल से यह पत्र अपने बिस्तर के पास रखती आ रही थीं।

Friday, March 18, 2011

अब भारत में भी ई-डाकघर अपनाएं


भारतीय डाक विभाग भी अब बदलते वक़्त के साथ रफ़्तार लगाने को तैयार है. केंद्रीय संचार और सूचना प्रौद्योगि‍की मंत्री कपि‍ल सि‍ब्‍बल ने पिछले दिनों भारतीय डाक के ई-कॉमर्स पोर्टल ई-डाकघर का शुभारंभ कि‍या। इस पोर्टल से उपभोक्‍ता कहीं भी कि‍सी भी समय डेबि‍ट कार्ड और क्रेडि‍ट कार्ड का इस्‍तेमाल करके डाक संबंधी कोई भी कार्य कर सकेंगे। इस अवसर पर श्री सि‍ब्‍बल ने कहा कि‍ बदलती दुनि‍या में रहन-सहन का तरीका भी बदल रहा है, ई-पोस्‍ट की शुरूआत इस दि‍शा में एक कदम है, जि‍ससे उपभोक्‍ताओं को वि‍भि‍न्‍न सेवाएं मि‍ल सकेंगी। इस पहल का स्‍वागत करते हुए संचार राज्‍य मंत्री सचि‍न पायलट ने कहा कि‍ ई-दवाएं, ई-वाणि‍ज्‍य, ई-शि‍क्षा के बाद ई-डाक एक वाजि‍ब कदम है। श्री पायलट ने इस बात पर भी जोर दिया कि यह पोर्टल क्षेत्रीय भाषा में भी उपलब्‍ध कराया जाना चाहि‍ए, ताकि‍ आम आदमी भी इससे लाभान्वित हो सके.

गौरतलब है कि प्रोजेक्ट एरो की सफलता के बाद भारतीय डाक विभाग की एक महत्‍वाकांक्षी परि‍योजना के रूप में शुरू कि‍या गया ई-डाकघर, पहले चरण में सात सेवाएं देगा। इनमें इलेक्‍ट्रॉनि‍क मनीआर्डर (ईएमओ), तत्‍काल मनीऑर्डर (आईएमओ), डाक टि‍कटों की बि‍क्री, डाक सूचना, जहाज से भेजे गए एक्‍सप्रेस और अंतरराष्‍ट्रीय सामान पर नजर, पि‍न कोड तलाश करना और जानकारी एवं शि‍कायतों की रजि‍स्‍ट्री शामि‍ल हैं। इस सेवा के शुरू होने के साथ ही डाक वि‍भाग ने डाक सेवा की देश के नागरि‍कों तक पहुंच बढ़ाने का अपना वादा पूरा करने की दि‍शा में एक महत्‍वपूर्ण कदम उठाया है।

Friday, March 4, 2011

जब खूबसूरत अभिनेत्रियाँ उतरीं डाक-टिकटों पर

भारतीय डाक विभाग समय-समय पर तमाम विभूतियों पर स्मारक डाक टिकट जारी करता है. इनमें हाल ही में INDIPEX-2011 के दौरान 13 फरवरी, 2011 को भारतीय सिनेमा की छह महान अभिनेत्रियों पर जारी डाक टिकटों का क्रेज खूब दिख रहा है. इन अभिनेत्रियों में मीना कुमारी, नूतन, कानन देवी, देविका रानी, लीला नायडू और सावित्री देवी शामिल हैं।




इससे पूर्व चर्चित अभिनेत्री मधुबाला पर भी वर्ष 2008 में डाक टिकट जारी हो चुका है.






मधुबाला का डाक टिकट तो सोने के डाक टिकट रूप में भी ढाला जा चुका है.


30 दिसंबर, 1993 को पद्मश्री से सम्मानित प्रथम हिंदी अभिनेत्री और अपने ज़माने की मशहूर अभिनेत्री नर्गिस दत्त पर जारी डाक टिकट तो अब ढूंढे हुए भी नहीं मिलते, वाकई बेहतरीन.





फ़िल्मी दुनिया से जुडी तमाम हस्तियों पर डाक टिकट जारी होते रहे हैं और अभी भी उनका क्रेज बरकरार है.

Thursday, February 24, 2011

पोस्टकार्ड की दुनिया...

पोस्टकार्ड की दुनिया भी निराली है। सब कुछ खुला-खुला, कुछ भी छुपा नहीं. दूसरे शब्दों में कहें तो पारदर्शिता का सबसे सुन्दर उदहारण. दाम भी सबकी हैसियत के अन्दर. वैसे यह भी अजीब लगता है कि एक पचीस या पचास पैसे का पोस्टकार्ड इतनी कम लागत पर पूरे भारत की सैर कर लेता है. पोस्टकार्ड भी कई तरह के हो गए- साधारण पोस्टकार्ड, जवाबी पोस्टकार्ड, मेघदूत पोस्टकार्ड, प्रिंटेड पोस्टकार्ड, कम्पटीशन पोस्टकार्ड. हर पोस्टकार्ड की अपनी खूबियाँ हैं. मसलन, मेघदूत पोस्टकार्ड के एक ही हिस्से में लिखा जा सकता है, दूसरी ओर विज्ञापन होता है. तभी तो यह सबसे सस्ता अर्थात मात्र पचीस पैसे का है. कम्पटीशन पोस्टकार्ड किसी भी प्रतियोगिता सम्बन्धी जवाब के लिए प्रयुक्त होता है. अब कोई पहले भी कह ले कि पोस्टकार्ड का उतना चलन नहीं रहा, पर साहित्य की दुनिया तो इसके बिना अधूरी है. किसी पत्र-पत्रिका में कोई कविता, कहानी या लेख पसंद आया तो झट से पोस्टकार्ड पर दो लाइन लिखकर भेज दिया. कवि और लेखक भी खुश कि उनके चाहने वाले हैं और पोस्टकार्ड से ही आभार भी व्यक्त कर दिया. अब तो सुप्रीम कोर्ट भी पोस्टकार्ड द्वारा भेजी गई शिकायतों का संज्ञान लेता है. तमाम राजनैतिक दल और एन. जी. ओ. भी पोस्टकार्ड पर सन्देश लिखकर लोगों को जागरूक बनाये रखते हैं. जब भी कभी किसी मुद्दे पर आवाज़ उठानी हो तो हजारों पोस्टकार्ड पर सन्देश लिखकर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री इत्यादि के पास पोस्ट करवा देते हैं.

आज की व्यस्त भरी दुनिया में पोस्टकार्ड बड़े काम की चीज है. कोई कहेगा कि एस. एम. एस. सस्ता होता है, पर मोबाईल खरीदने का झंझट और फिर हर किसी का मोबाईल नंबर हर किसी के पास हो जरुरी भी नहीं. ई-मेल करने के लिए कम्यूटर और इंटरनेट-कनेक्शन होना चाहिए पर पोस्टकार्ड के लिए ऐसा कुछ भी नहीं. किसी को भी सुन्दर से शब्द लिखिए और टहलते-टहलते नजदीक के लेटर-बाक्स में पोस्ट कर आइये. इसी बहाने थोडा घूमना-फिरना भी हो जायेगा वरना इस ई-मेल और मोबाईल ने तो आदमी को जड़ ही बना दिया है. इंस्टेंट होने के चक्कर में न जाने कितनी बीमारियाँ व्यक्ति को घेरे जा रही हैं. कभी गुरु जी लोग बच्चों की राइटिंग देखकर उसके होनहार गुणों को पहचान लेते थे और ज्योतिषी इसी आधार पर लोगों का व्यक्तित्व भी गढ़ देते थे, पर अब तो सुलेखन बीते दिनों की बात हो गई. तो आइये न एक बार फिर से किसी को सुन्दर सा पोस्टकार्ड लिखते हैं की वह रायटिंग देखकर दूर से ही पहचान ले कि किसने यह सुन्दर सा पोस्टकार्ड भेजा है !!

Friday, February 18, 2011

एयर मेल सर्विस के 100 साल


डाक सेवा का विचार सबसे पहले ब्रिटेन में और हवाई जहाज का विचार सबसे पहले अमेरिका में राइट बंधुओं ने दिया वहीं चिट्ठियों ने विश्व में सबसे पहले भारत में हवाई उड़ान भरी। यह ऐतिहासिक घटना 18 फरवरी 1911 को इलाहाबाद में हुई। संयोग से उस साल कुंभ का मेला भी लगा था। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार उस दिन एक लाख से अधिक लोगों ने इस घटना को देखा था जब एक विशेष विमान ने शाम को साढ़े पांच बजे यमुना नदी के किनारों से उड़ान भरी और वह नदी को पार करता हुआ 15 किलोमीटर का सफर तय कर नैनी जंक्शन के नजदीक उतरा जो इलाहाबाद के बाहरी इलाके में सेंट्रल जेल के नजदीक था। आयोजन स्थल एक कृषि एवं व्यापार मेला था जो नदी के किनारे लगा था और उसका नाम ‘यूपी एक्जीबिशन’ था। इस प्रदर्शनी में दो उड़ान मशीनों का प्रदर्शन किया गया था। विमान का आयात कुछ ब्रिटिश अधिकारियों ने किया था। इसके कलपुर्जे अलग अलग थे जिन्हें आम लोगों की मौजूदगी में प्रदर्शनी स्थल पर जोड़ा गया।

आंकड़ों के अनुसार कर्नल वाई विंधाम ने पहली बार हवाई मार्ग से कुछ मेल बैग भेजने के लिए डाक अधिकारियों से संपर्क किया जिस पर उस समय के डाक प्रमुख ने अपनी सहर्ष स्वीकृति दे दी।
मेल बैग पर ‘पहली हवाई डाक’ और ‘उत्तर प्रदेश प्रदर्शनी, इलाहाबाद’ लिखा था। इस पर एक विमान का भी चित्र प्रकाशित किया गया था। इस पर पारंपरिक काली स्याही की जगह मैजेंटा स्याही का उपयोग किया गया था। आयोजक इसके वजन को लेकर बहुत चिंतित थे, जो आसानी से विमान में ले जाया जा सके। प्रत्येक पत्र के वजन को लेकर भी प्रतिबंध लगाया गया था और सावधानीपूर्वक की गई गणना के बाद सिर्फ 6,500 पत्रों को ले जाने की अनुमति दी गई थी। विमान को अपने गंतव्य तक पहुंचने में 13 मिनट का समय लगा। विमान को फ्रेंच पायलट मोनसियर हेनरी पिक्वेट ने उड़ाया।

(चित्र में : प्रथम एयर मेल की स्वर्ण जयंती पर जारी प्रथम दिवस आवरण और डाक टिकट का विरूपण, कर्नल वाई विंधाम , भारतीय डाक द्वारा वर्तमान में प्रयुक्त फ्रेटर)

Monday, February 14, 2011

खादी का डाक टिकट प्रदर्शनी का आकर्षण

राजधानी दिल्ली के प्रगति मैदान में शनिवार से शुरू हुई डाक टिकटों की विश्वस्तरीय प्रदर्शनी में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पसंदीदा व स्वदेशी की पहचान ‘खादी’ पर छपा डाक टिकट मुख्य आकर्षण बना हुआ है।

राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील ने प्रगति मैदान में सप्ताह भर चलने वाले ‘इंडीपेक्स-2011’ का उद्घाटन करते हुए कहा कि महात्मा गांधी पर पहली बार एक विशेष खादी का डाक टिकट जारी किया जा रहा है और इसे जारी कर मैं खुद सम्मानित हुई हूं।

प्रदर्शनी के आयोजक, भारतीय डाक ने कहा कि कुल 71 देशों से कोई 595 टिकट संग्राहक इस प्रदर्शनी में हिस्सा ले रहे हैं। इसके अलावा टिकट संग्रह से जुड़े दुनिया भर के 28 व्यापारी और 31 डाक प्रशासन भी हिस्सा ले रहे हैं। इसके पहले भारत ने 1954 और 1997 के बीच इस तरह की पांच प्रदर्शनियों का आयोजन किया था।

खादी डाक टिकट वास्तव में घरेलू स्तर पर तैयार किए गए खादी के कपड़े पर छपा है, जिस पर मोहनदास करमचंद गांधी यानी महात्मा गांधी का चित्र है।

यह टिकट एक सीमित संस्करण है, जो एक विशेष संग्राहक के पास उपलब्ध है। इस टिकट की कीमत 250 रुपये है और इंडीपेक्स की वेबसाइट पर इसे ऑनलाइन बुक किया जा सकता है। कोई भी व्यक्ति अधिकतम 10 टिकटों का आर्डर दे सकता है। इस टिकट की पहली खेप यहां चंद मिनटों में ही बिक गई।

भारतीय डाक ने कहा कि कई देशों ने डाक टिकट छापने के लिए सिल्क जैसी वैकल्पिक सामग्रियों के साथ प्रयोग किया है। भारतीय डाक ने हालांकि सिर्फ कागज पर टिकट छापें हैं। इसमें तीन सेट सुगंधित टिकट भी शामिल हैं। लेकिन पहली बार खादी पर छपा एक विशेष डाक टिकट जारी हुआ है।

भारतीय डाक ने कहा है कि प्रदर्शनी का दूसरा आकर्षण ‘मेरे डाक टिकट’ है। इस टिकट पर कोई व्यक्ति अपने चित्र छपा हुआ पा सकता है और इसका इस्तेमाल सगाई व बेटे के जन्म दिन का उत्सव मनाने या किसी को शुभकामना संदेश भेजने में किया जा सकता है।

इसके अलावा सूर्य, विमान, रेल इंजन, वन्य जीव, ताज महल और भारतीय लोक कथा, पंचतंत्र से लिए गए चित्रों वाले टिकट शीट भी उपलब्ध हैं। एक टिकट शीट की कीमत 150 रुपये है।

प्रदर्शनी का अन्य आकर्षण होगा भारतीय सिनेमा की छह महान अभिनेत्रियों पर जारी होने वाले डाक टिकटों का सेट। इन अभिनेत्रियों में मीना कुमारी, नूतन, कानन देवी, देविका रानी, लीला नायडू और सावित्री देवी शामिल हैं। ये टिकट रविवार को जारी होंगे।

साभार : हिंदुस्तान

डाक टिकट में देखें अपनी तस्वीर


देश में पहली बार लांच हुई ‘माई स्टाम्प’ तकनीक लोगों के लिए खासा रोमांचक और आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। इस स्कीम के तहत अपनी पसंद के थीम टिकटों पर अपनी तस्वीर लगवा सकते हैं। INDIPEX-2011 में 17 थीम बनाई गई हैं।

महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू जैसी महान हस्तियों की फोटो वाली डाक टिकटें तो सभी ने देखी होगी, लेकिन इन टिकटों पर गांधी जी और पंडित नेहरू की जगह खुद की तस्वीर अंकित हो जाए तो यह आपके लिए अनूठा अनुभव होगा। इन दिनों कुछ ऐसा ही प्रगति मैदान के हॉल संख्या 9 में हो रहा है। दिल्लीवाले अपनी इस ख्वाहिश को पूरा करने के लिए भारी संख्या में यहां पहुंच रहे हैं। शुक्रवार से प्रगति मैदान में शुरू हुए विश्व फिलाटेलिक प्रदर्शनी INDIPEX-2011 में यह नजारा देखने को मिल रहा है।

यहां देश में पहली बार लांच हुई ‘माई स्टाम्प’ तकनीक लोगों के लिए खासा रोमांचक और आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। लोग अपनी पसंद के थीम टिकटों पर अपनी तस्वीर लगवा रहे हैं। बच्चे जहां पंचतंत्र और हवाई जहाज जैसी थीम को पसंद कर रहे हैं तो वहीं कई लोग राशिफल और ताजमहल वाली थीम को चुन रहे हैं। यहां ऐसी 17 थीम बनाई गई हैं।

राजौरी गार्डन से आए रोशन ने बताया कि उन्हें टिकट कलेक्शन का शौक है। डाक तकनीक ‘माई स्टाम्प’ मेरे कलेक्शन में नई जान डाल देगी। पर्सनलाइज्ड स्टाम्प के नाम से मशहूर इस रोमांचक तकनीक से लोग अपने यादगार लम्हों को भी टिकट के रूप में छपवा रहे हैं।

66 वर्षीय अरुण ने बताया कि यह तकनीक लम्हों को सम्हालने और यादगार बनाने के लिए एक बढ़िया माध्यम है। इसलिए वह अपने बचपन की फैमिली फोटो छपवाना चाहते हैं। इसके अलावा यहां हॉल संख्या 8-11 में 70 देशों के प्रतिनिधि अपने देश के डाक टिकटों को लाए हुए हैं। इसके अलावा यहां पूरे विश्व के दुर्लभ डाक टिकट, लिफाफे और सिक्कों की विस्तृत प्रदर्शनी भी दिल्ली वालों के लिए खासा आकर्षण का केंद्र है। इंडीपेक्स-2011 के प्रबंधकों ने बताया कि डाक टिकट किसी भी देश के इतिहास, संस्कृति, कला, व्यक्तित्वों और संसाधनों के बारे में जानने का रोमांचक तरीका है। यहां दिल्लीवासियों को अलग-अलग देशों की टिकटों से यह सब जानने को मिलेगा। इसके अलावा डाक टिकट कलेक्शन के रोमांचक शौक को युवाओं और बच्चों में लोकप्रिय बनाना भी है।

पिछले साल आयोजित दिसम्बर में सेव द टाइगर थीम पर आधारित पत्र लेखन प्रतियोगिता और डाक टिकट डिजाइनिंग प्रतियोगिता के विजेताओं के नाम भी घोषित किए गए और लोगों को देखने के लिए उनकी इन कृतियों को यहां विशेष रूप से प्रदर्शित भी किया गया है।

बता दें कि भारत में यह प्रदर्शनी इससे पहले आजादी की पचासवीं वर्षगांठ के अवसर पर 1997 में यहां लगाई गई थी। इस प्रदर्शनी का मजा यहां 18 फरवरी तक लिया जा सकेगा।

साभार : दैनिक भास्कर

Friday, February 11, 2011

कई मायनों में यादगार होगा INDIPEX-2011

दिल्ली के प्रगति मैदान में कल 12 से 18 फरवरी तक होने वाली अंतरराष्ट्रीय डाक टिकट प्रदर्शनी-इंडिपेक्स 2011 'INDIPEX-2011'कई मायनों में यादगार होगी. इस दौरान डाक विभाग तमाम नए आयाम स्थापित करने की कोशिश करेगा, वहीँ डाक टिकटों के प्रति लोगों में क्रेज पैदा करने और देखने का भी यह सुनहरा अवसर है. गौरतलब है कि भारत में पहली अन्तराष्ट्रीय डाक टिकट (फिलेटलिक) प्रदर्शनी का आयोजन 1954 में डाक टिकटों की शताब्दी वर्ष में हुआ था.

इंडिपेक्स 2011 'INDIPEX-2011' का उद्घाटन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल करेंगी। इस प्रदर्शनी में 70 देशों से 595 प्रतिनिधि शामिल हो रहे हैं। इस प्रदर्शनी में स्वीडन के दुर्लभ डाक टिकट ट्रेस्किलिंग एलो को भी रखा जाएगा जिसका बाजार में अनुमानित मूल्य 16 लाख पौंड है। भारतीय डाक टिकटों में सबसे कीमती 1854 में जारी चार आना टिकट है।

इंडिपेक्स 2011 'INDIPEX-2011' डाक टिकट प्रदर्शनी का महत्त्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि भारत ने ही दुनिया में सर्वप्रथम इलाहबाद से नैनी के मध्य प्रतीकात्मक रूप में एयर-मेल सेवा आरंभ की. यह ऐतिहासिक घटना 18 फरवरी 1911 को इलाहाबाद में हुई। अर्थात जिस दिन 'INDIPEX-2011' के आयोजन का अंतिम दिन होगा, उसी दिन इस ऐतिहासिक घटना के 100 साल भी पूरे हो जायेंगें. इस दौरान छोटे सोमर हवाई जहाज से इलाहाबाद से नैनी तक 6,500 चिठ्ठियां ले जाने वाली दुनिया की पहली आधिकारिक एयरमेल सेवा पर भी तीन विशेष डाक टिकट जारी किए जाएंगे। इस छोटे हवाई जहाज को 18 फरवरी 1911 को फ्रांस के पायलट हेनरी पेक्वेट ने उड़ाया था। इस विमान के माध्यम से भेजी गई चिठ्ठियों में पंडित जवाहरलाल नेहरू के अलावा कई गणमान्य लोगों के पत्र शामिल थे। भारतीय वायुसेना की ओर से इस अवसर पर 12 फरवरी को इलाहाबाद से नैनी तक विशेष विमान उड़ान भरेगा।

प्रदर्शनी के दौरान ग्राहकों की पसंद का डाक टिकट तैयार करने की शुरूआत भी हो रही है। माई स्टाम्प नामक इस योजना का मकसद डाक टिकटों के माध्यम से डाक विभाग की आय बढ़ाना है। ऐसे प्रत्येक स्टाम्प की कीमत 150 रूपए होगी। इस तरह की सेवा ब्रिटेन की रायल मेल, फ्रांस की ला पोस्ट, जर्मनी की डोएचे पोस्ट, अमेरिकी पोस्टल सर्विस में पहले से उपलब्ध है।

दुनिया के कई देशों ने कागज के अलावा वस्त्रों सहित अन्य वस्तुओं पर भी डाक टिकट जारी किए हैं लेकिन भारत में अब तक कागज पर डाक टिकट जारी करने का चलन है। लेकिन पहली बार कागज के अतिरिक्त खादी के वस्त्र पर डाक टिकट जारी किए जा रहे हैं। इस तरह के पहले टिकट खादी के कपड़े पर जारी किए जा रहे हैं जो महात्मा गांधी को समर्पित होंगे। इसकी कीमत 250 रूपए रखी गई है।

भारतीय डाक विभाग द्वारा समय-समय पर भारतीय अभिनेताओं पर तमाम डाक टिकट जारी किए गए हैं, मगर अभिनेत्रियों में अभी तक मात्र यह सौभाग्य नर्गिस और मधुबाला को मिला है. दिल्ली के प्रगति मैदान में कल 12 से 18 फरवरी तक होने वाली अंतरराष्ट्रीय डाक टिकट प्रदर्शनी-इंडिपेक्स 2011 में छह अभिनेत्रियों पर भी डाक टिकट जारी किये जायेंगें. रूपहले पर्दे पर अपने सशक्त अभिनय और अप्रतिम सौन्दर्य से मंत्रमुग्ध करने वाली गुजरे जमाने की अदाकारा सावित्री, लीला नायडू, देविका रानी, कानन देवी, नूतन और मीना कुमारी के सम्मान में ये डाक टिकट जारी होंगे।

प्रदर्शनी में भारतीय सिनेमा एक प्रमुख आकर्षण होगा जहां सावित्री, लीला नायडू, देविका रानी, कानन देवी, नूतन और मीना कुमारी पर जारी डाक टिकट भी रखे जाएंगे। पूर्व में मधुबाला, राजकपूर, गुरूदत्त, के एल सहगल, मुकेश, किशोर कुमार, मोहम्मद रफी, हेमंत कुमार और बेगम अख्तर पर जारी डाक टिकट भी यहां प्रदर्शित होंगे।

मीना कुमारी, नूतन, देविका रानी.. अब डाक टिकटों पर

भारतीय डाक विभाग द्वारा समय-समय पर भारतीय अभिनेताओं पर तमाम डाक टिकट जारी किए गए हैं, मगर अभिनेत्रियों में अभी तक मात्र यह सौभाग्य नर्गिस और मधुबाला को मिला है. दिल्ली के प्रगति मैदान में कल 12 से 18 फरवरी तक होने वाली अंतरराष्ट्रीय डाक टिकट प्रदर्शनी-इंडिपेक्स 2011 में छह अभिनेत्रियों पर भी डाक टिकट जारी किये जायेंगें. रूपहले पर्दे पर अपने सशक्त अभिनय और अप्रतिम सौन्दर्य से मंत्रमुग्ध करने वाली गुजरे जमाने की अदाकारा सावित्री, लीला नायडू, देविका रानी, कानन देवी, नूतन और मीना कुमारी के सम्मान में ये डाक टिकट जारी होंगे।

पहली बार खादी पर डाक टिकट

दिल्ली के प्रगति मैदान में कल 12 से 18 फरवरी तक होने वाली अंतरराष्ट्रीय डाक टिकट प्रदर्शनी-इंडिपेक्स 2011 में पहली बार डाक विभाग खादी के कपड़े पर गांधी जी की फोटो छपा विशेष डाक टिकट जारी करने वाला है। खादी पर स्याही फैलने के कारण छपाई अधिकारियों के सामने यह काम एक चुनौती था। इसके लिए देश के भिन्न भागों में पैदा होने वाले कपास के तैयार खादी पर छपाई करके देखी गई। अधिकारियों के खुशी का ठिकाना न रहा जब उन्होंने पाया कि पश्चिम बंगाल के कपास से बुनी गई खादी पर स्याही नहीं फैली। भारतीय डाक विभाग ने खादी पर गांधी जी की फोटो वाले एक लाख टिकट छापे हैं। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल इस अदभुत डाक टिकट का प्रदर्शनी के दौरान अनावरण करेंगी।

अब खुद का फोटो डाक टिकट पर

डाक टिकट पर छपा महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, जगदीशचंद्र बोस या ऐसी अन्य हस्तियों का फोटो क्या कहता है। अब इन प्रतिष्ठित शख्सियतों में एक और नाम जुड़ने वाला है- आपका। जी हां, आप भी इस प्रतिष्ठा के हकदार बन पाएंगे और अपनी तस्वीर वाली डाक टिकट छपवाने की आपकी हसरत पूरी हो पाएगी। जी हाँ , अब कोई भी व्यक्ति जब चाहे डाक टिकट पर अपनी फोटो छपवा सकता है, वह भी मात्र 10 मिनट में। भारतीय डाक विभाग 'माई पोस्ट' नाम की यह योजना शुरू कर रहा है।

दिल्ली के प्रगति मैदान में कल 12 से 18 फरवरी तक होने वाली अंतरराष्ट्रीय डाक टिकट प्रदर्शनी-इंडिपेक्स 2011 में यह योजना शुरू होगी।इस योजना का उद्घाटन होने के बाद डाकघर जाने के बाद अपनी फोटो वाली डाक टिकट पाने के इच्छुक व्यक्ति 10 मिनट में यह टिकट अपने हाथ में पाएगा। अपना यह शौक पूरा करने लिए आपको मात्र 150 रुपये देने होंगे। गौरतलब है कि यह योजना दुनिया भर में लोकप्रिय है मगर सुरक्षा कारणों से अब इसे भारत में शुरू नहीं किया गया था। तो देर किस बात कि, आप भी पहुँचिये डाक टिकटों पर अपनी फोटो देखने के लिए...!!

विश्व डाक टिकट प्रदर्शनी INDIPEX-2011 12 से 18 फरवरी तक

'INDIPEX-2011' का आयोजन 12-18 फरवरी, 2011 के मध्य प्रगति मैदान, दिल्ली में किया जा रहा है. भारत में पहली अन्तराष्ट्रीय डाक टिकट (फिलेटलिक) प्रदर्शनी का आयोजन 1954 में डाक टिकटों की शताब्दी वर्ष में हुआ था. इस डाक टिकट प्रदर्शनी का महत्त्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि भारत ने ही दुनिया में सर्वप्रथम इलाहबाद से नैनी के मध्य प्रतीकात्मक रूप में एयर-मेल सेवा आरंभ की. यह ऐतिहासिक घटना 18 फरवरी 1911 को इलाहाबाद में हुई। अर्थात जिस दिन 'INDIPEX-2011' के आयोजन का अंतिम दिन होगा, उसी दिन इस ऐतिहासिक घटना के 100 साल भी पूरे हो जायेंगें. 'INDIPEX-2011' के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए इन लिंकों पर जाएँ-
'INDIPEX-2011'
'INDIPEX-2011'

भारत के चार राजघराने वाले राज्यों पर डाक टिकटों का सैट

डाक विभाग ने इंडिपेक्स 2011 विश्व डाक टिकट संग्रह प्रदर्शनी के कर्टन रेजर के रूप में भारत के राजघरानों के बारे में चार डाक टिकटों का सैट जारी किया। यह प्रदर्शनी 12 फरवरी से 18 फरवरी, 2011 तक प्रगति मैदान, नई दिल्ली में आयोजित की जाएगी। इन टिकटों को दिल्ली क्षेत्र की मुख्य पोस्टमास्टर जनरल सुश्री रामेश्वरी हांडा ने पहले संसद मार्ग मुख्य डाकघर में जारी किया था। चार स्मारक डाक टिकटों के इस सैट में सिरमौर, इंदौर, बामरा तथा कोचीन द्वारा जारी डाक टिकटों को दर्शाया गया है। ये डाक टिकटें दुनिया भर की दुर्लभ और बहुमूल्य डाक टिकटों की श्रेणी में आती हैं।

स्वतंत्रता से पूर्व भारत में 568 राज्य थे जिनका स्वतंत्रता के बाद अस्तित्व समाप्त हो गया। यहां यह उल्लेखनीय है कि पांच सौ से अधिक राज्यों में से केवल चालीस राज्यों ने अपनी सार्वभौमिकता की निशानी के रूप में डाक टिकटें जारी की थीं। इन राज्यों द्वारा जारी डाक टिकटों में राजाओं और राज कुमारों तथा राजसी प्रतीकों को चित्रित किया गया है। इन पर अनेक पध्दतियों तथा रंगों का प्रयोग करके छपाई की गई। कहा जा सकता है कि राज घराने वाले कुछ राज्यों ने एक पैतृक संपत्ति छोड़ी है जो डाक टिकट संग्रहण क्षेत्र के लिए बहुमूल्य है।

यह इस क्रम में दूसरा सैट है जैसा कि दिल्ली, शिमला, उदगमंडलम, कूच बिहार, नागपुर तथा लखनऊ मुख्य डाकघरों सहित प्राचीन डाक भवनों के छ: टिकटों का पहला सैट 12 मई 2010 को जारी किया गया था। इसका उद्देश्य विश्व के समक्ष भारतीय डाक की गौरवपूर्ण विरासत को प्रदर्शित करना था।

Tuesday, February 1, 2011

पोस्टमैन

(कविवर सोहन लाल द्विवेदी ने भी डाकिया को अपने शब्दों में ढाला है। मार्च 1957 में प्रकाशित उनकी कविता ‘पोस्टमैन‘ वाकई एक बेहतरीन कविता है। )

किस समय किसे दोगे क्या तुम
यह नहीं किसी को कभी ज्ञान
उत्सुकता में, उत्कंठा में
देखा करता जग महान
आ गई लाटरी निर्धन की
कैसी उसकी तकदीर फिरी
हो गया खड़ा वह उच्च भवन
तोरण, झंडी सुख की फहरी
यह भाग्य और दुर्भाग्य
सभी का फल लेकर तुम जाते
कोई रोता कोई हँसता
तुम पत्र बाँटते ही जाते
इस जग का सारा रहस्य
तुम थैले में प्रतिदिन किए बंद
आते रहते हो तुम पथ में
विधि के रचते से नए छंद।

Wednesday, January 26, 2011

गणतंत्र दिवस...जय हिंद !!

*** गणतंत्र दिवस पर ढेरों शुभकामनायें ***

Friday, January 7, 2011

अंडमान-निकोबार में पर्यटन को बढ़ावा देते पोस्टकार्ड


(सेलुलर जेल)


(बैरन द्वीप और बैरन ज्वालामुखी)


(राॅस और स्मिथ द्वीप)
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भारतीय डाक विभाग ने अंडमान में पर्यटन को बढ़ावा देने वाले मेघदूत पोस्टकार्ड जारी किए हैं. गौरतलब है कि जहाँ सामान्य पोस्टकार्ड 50 पैसे में उपलब्ध होते हैं वहीँ मेघदूत पोस्टकार्ड मात्र 25 पैसे में उपलब्ध होते हैं। मेघदूत पोस्टकार्ड के पते वाले साइड में कुछ लिखा नहीं जा सकता वहाँ पर विभिन्न प्रकार के विज्ञापन या प्रचार सामग्री मुद्रित की जाती है। उक्त मेघदूत पोस्टकार्ड बिक्री हेतु भारत के विभिन्न हिस्सों में उपलब्ध है।


इस विज्ञापन में कभी काला पानी के लिए मशहूर पर अब ऐतिहासिक राष्ट्रीय स्मारक सेलुलर जेल, बैरन द्वीप और यहाँ स्थित भारत के एकमात्र सक्रिय बैरन ज्वालामुखी एवं राॅस और स्मिथ द्वीपों इत्यादि के चित्रों को प्रदशित किया गया है. राॅस और स्मिथ द्वीपों की यह विशेषता है कि ज्वार आने पर यह दोनों द्वीप आपस में मिल जाते हैं और भाटा के समय अलग हो जाते हैं. इसी कारण इन्हें सिस्टर-आइलैंड भी कहा जाता है. गौरतलब है कि इन मेघदूत पोस्टकार्डों को सूचना-प्रसार एवं पर्यटन निदेशालय, अंडमान व निकोबार प्रशासन द्वारा विज्ञापित किया गया है।


उक्त मेघदूत पोस्टकार्डों की डाकघरों में काफी माँग है और वर्तमान में टूरिस्ट सीजन होने के चलते तमाम विदेशी और भारतीय पर्यटक इन पर पत्र लिखकर अपने परिजनों को भेज रहे हैं. यहाँ से भेजे जाने के कारण इन पर अंडमान के डाकघरों की मुहर भी लगी होती है, इस कारण इनकी फिलेटलिक वैल्यू भी बढ़ जाती है. देश-विदेश से लोग अंडमान में पर्यटन के बहाने आते हैं और एक बार उस सेलुलर जेल के दर्शन जरुर करते हैं जहाँ देशभक्तों ने इतनी यातनाएं सहीं. डाक विभाग भी इसके प्रति सचेत है और यहाँ के पोर्टब्लेयर प्रधान डाक घर से बाहर जाने वाले पत्रों पर जो मुहर लगाई जाती है, उस पर सेलुलर जेल का चित्र अंकित है. ऐसे में इन पत्रों को लोग यादगार के रूप में सहेज कर रखते हैं.
यहाँ भी पढ़ें-स्वतंत्र आवाज़. काम , स्वर्गविभा, युगमानस

Wednesday, January 5, 2011

जंगलों के संरक्षण पर बच्चों ने लिखीं चिठ्ठयां : UPU पत्र लेखन प्रतियोगिता

पोर्ट ब्लेयर। अंडमान निकोबार द्वीप समूह के डाक विभाग ने स्कूली बच्चों के लिए पोर्ट ब्लेयर में यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन पत्र लेखन प्रतियोगिता आयोजित की जिसमें बच्चों ने एक दूसरे को इस विषय पर पत्र लिखे कि जंगलों का संरक्षण क्यों जरूरी है। बच्चों की विषय में गहरी दिलचस्पी दिखाई दी। प्रतियोगिता के बाद की उत्साहजनक आपसी बातचीत में बच्चों ने संबंधित विषय पर अपने लेखन की चर्चा की और कहा कि उन्होंने विभिन्न शैलियों में जंगलों को मानव जीवन और पर्यावरण के लिए वरदान और वन्य प्राणियों के लिए उनका घर एवं जीवन जीने का एकमात्र स्रोत लिखा है। प्रतियोगिता में जहां बच्चों की लेखनशैली प्रतिभा सामने आई वहीं उनकी जंगलों वृक्षों और उनके सहारे वन्यजीवन के फलने फूलने की उनकी मार्मिक भावनाओं का अच्छे शब्दों में प्रकटीकरण हुआ।

पोर्ट ब्लेयर के राजकीय मॉडल वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में 40वीं यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन पत्र लेखन प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था। प्रतियोगिता का शुभारंभ अंडमान निकोबार द्वीप समूह के डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव ने किया। बच्चों को पत्र लेखन का महत्व समझाकर खूब लिखने की प्रेरणा देते हुए उन्होंने कहा कि पत्र खुशनुमा अहसास के साथ संवेदनाओं को जीवंत रखते हैं। बच्चों को पत्र लेखन का विषय दिया गया था कि 'वे अपने को जंगल का एक पेड़ मानते हुए अपने मित्र को पत्र लिखें कि जंगलों का संरक्षण क्यों जरूरी है।'

कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि डाक विभाग की पत्र लेखन की यह अनूठी पहल किशोरों को डाक सेवाओं के स्वर्णिम आयामों से परिचय कराती है। उनका कहना था कि अभी भी पत्र लेखन का काफी महत्व है और इसमें भावनाओं का जिस प्रकार प्रकटीकरण होता है वह संचार के अन्य साधनों में नहीं है। पत्र लेखन सिर्फ एक विधा ही नहीं है बल्कि इसमें रिश्तों की मिठास हो़ती है और पत्रों की भाषा में एक खुशनुमा अहसास होता है जिससे संवेदनाएं जीवंत रहती हैं। यादव ने कहा कि पत्र लेखन सोचने की क्षमता और शब्द ज्ञान में भी वृद्धि करते हैं, ऐसे में युवा पीढ़ी और विद्यार्थियों को इसके लिए इन्हें प्रेरित करना और इनके महत्व पर ध्यान आकृष्ट करना और भी जरूरी है।

यह प्रतियोगिता अखिल भारतीय स्तर पर आयोजित की गई थी। डाक निदेशक ने बताया कि पत्र-लेखन प्रतियोगिता में शामिल सभी कापियां पहले सर्किल स्तर पर पोर्टब्लेयर के लिए कोलकात्ता में जांची जाएंगीं फिर उनमें से सर्वोत्तम का चयन कर राष्ट्रीय स्तर के लिए डाक निदेशालय दिल्ली भेजी जाएंगीं। राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम, दितीय और तृतीय स्तर के लिए क्रमशः 2000, 1500 और 1000 रूपये का नकद पुरस्कार और प्रमाण पत्र दिया जायेगा। प्रत्येक डाक परिमंडल के लिए हर सर्वोत्तम पत्र को 250 रूपये का प्रोत्साहन नकद पुरस्कार और प्रमाण पत्र भी दिया जायेगा। राष्ट्रीय स्तर पर चयनित सर्वोत्कृष्ट तीन पत्रों को यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन स्तर पर अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों हेतु भेजा जायेगा जहां अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्तर के लिए क्रमशः स्वर्ण, रजत और ताम्र मेडल एवं साथ में यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन का अधिकारिक डाक टिकटों का एल्बम सम्मान स्वरूप दिया जायेगा।

इस अवसर पर डाक टिकटों का एक काउंटर भी लगाया गया था जहां बच्चों ने रंग-बिरंगे डाक टिकटों का लुत्फ उठाया। बच्चों में डाक टिकटों के प्रति काफी क्रेज दिखा। उन्हें डाक विभाग की फिलेटलिक डिपाजिट खाता स्कीम के बारे में भी बताया गया जिसके अंतर्गत कोई न्यूनतम 200 रूपये में खाता खोलकर हर महीने घर बैठे नई डाक टिकटें और अन्य मदें प्राप्त कर सकता है। फिलेटलिक डिपाजिट खाता खोलने में तमाम बच्चों और उनके अभिवावकों ने रूचि दिखाई और लगभग 50 फिलेटलिक डिपाजिट खाते इस अवसर पर खोले गए। प्रतियोगिता में कुल 28 बच्चों ने भाग लिया। अधिकतर प्रतिभागी कार्मेल वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय पोर्टब्लेयर, राजकीय मॉडल वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, विवेकानंद विद्यालय पोर्टब्लेयर और संत मेरी विद्यालय पोर्टब्लेयर के विद्यार्थी थे।




साभार : स्वतंत्र आवाज़




यहाँ भी देखें- पत्र जीवंत रखते हैं खुशनुमा अहसास और संवेदनाएँ - के.के. यादव (हिंदी मीडिया.इन)




पोर्टब्लेयर में स्कूली बच्चों के लिए 40वीं यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन पत्र लेखन प्रतियोगिता संपन्न (स्वर्ग विभा)




शब्दकारिता

दुनिया की सैर कराएगा डाक टिकट

ब्रिटेन के डाक विभाग ‘रॉयल मेल’ ने अपनी तरह का एक अनूठा डाक टिकट जारी किया है.अत्याधुनिक तकनीक से लैस ये डाक टिकट फ़ोन के ज़रिए आपको इंटरनेट से जोड़ देगा.डाक टिकट को तस्वीर के रुप में फ़ोन में कैद कर तुरंत संबंधित वेबसाइट तक पहुंचा जा सकता है. यानी डाक टिकट इंटरनेट के ज़रिए सूचनाओं का संसार और दुनिया के दरवाज़े खोलेगा.

‘रॉयल मेल’ का कहना है दुनियाभर में ये अपनी तरह पहला ऐसा डाक टिकट है.‘इमेज रेकॉगनिशन’ नामक तकनीक ने इस नए डाक टिकट को 21वीं सदी का अत्याधुनिक डाक टिकट बना दिया है.स्मार्टफ़ोन के ज़रिए यह तकनीक डाक टिकट पर छपी तस्वीर को ‘थ्री-डी’ तस्वीर की तरह दिखाएगी. इंटरनेट पर इस तस्वीर की खोज के बाद हमें उससे संबंधित सभी जानकारियां और वेबसाइट भी उपलब्ध होंगी.

नई तकनीक से लैस बुद्धिमान किस्म के ये डाक टिकट दुनिया के लिए मनोरंजन और जानकारियों का ख़ज़ाना खोल देंगे.
असल ज़िंदगी की तस्वीरों को इंटरनेट की दुनिया से जोड़ने वाली इस तकनीक का इस्तेमाल पहली बार किसी डाक टिकट पर किया जा रहा है.यह अद्भुत डाक टिकट ‘रॉयल मेल’ की एक खास श्रंखला का हिस्सा है.ब्रिटेन का डाक विभाग खास मौकों और ऐतिहासिक तारीख़ों पर अलग किस्म के डाक टिकट जारी करता है. इन टिकट के ज़रिए देश और संस्कृति के बारे में लोगों को जागरुक किया जाता है.

‘रॉयल मेल’ के प्रतिनिधी फ़िलिप पार्कर ने कहा, ''नई तकनीक से लैस बुद्धिमान किस्म के ये डाक टिकट दुनिया के लिए मनोरंजन और जानकारियों का ख़ज़ाना खोल देंगे. अगले कुछ महीनों में डाक टिकट इक्कठा करने के शौकीन चिठ्ठियों के ज़रिए इन टिकटों को पा सकेंगे.''

साभार : BBC हिंदी

Saturday, January 1, 2011

पहले ख़त की ख़ुशबू

खतों के प्रति दीवानगी सदियों से रही है. खतों का चलन भले ही कम हुआ हो, पर दीवानगी में कमी नहीं आई है. हसरत मोहानी ने यूँ ही नहीं लिखा था-लिक्खा था अपने हाथों से जो तुमने एक बार / अब तक हमारे पास है वो यादगार खत ।।....अपर्णा त्रिपाठी की इस कविता में वही भाव है, वही संवेदनाएं हैं, वही जज्बा है, वही दीवानगी है... तो आज नए साल के आगाज पर इस ख़ुशबू को महसूस करते हैं...

आज भी तेरा पहला खत
मेरी इतिहास की किताब में हैं
उसका रंग गुलाबी से पीला हो गया
मगर खुशबू अब भी पन्नो में है

उसके हर एक शब्द हमारी
प्रेम कहानी बयां करते है
और तनहाई में मुझे
बीते समय में ले चलते हैं

वो खत मेरी जिन्दगी का
हिस्सा नही ,जिन्दगी है
हर दिन पढने की उसे
बढती जाती तृष्णगी है.

अपर्णा त्रिपाठी "पलाश"

Monday, December 27, 2010

वो खत के पुरजे


कितना सुहाना दौर हुआ करता था, जब खत लिखे पढे और भेजे जाते थे । हमने पढे लिखे और भेजे इसलिये कहा क्योकि ये तीनो ही कार्य बहुत दुष्कर लेकिन अनन्त सुख देने वाले होते थे ।

खत लिखना कोई सामान्य कार्य नही होता था, तभी तो कक्षा ६ मे ही यह हमारे हिन्दी के पाठ्यक्रम मे होता था । मगर आज के इस भागते दौर मे तो शायद पत्र की प्रासंगिकता ही खत्म होने को है । मुझे याद है वो समय जब पोस्ट्कार्ड लिखने से पहले यह अच्छी तरह से सोच लेना पडता था कि क्या लिखना है, क्योकि उसमे लिखने की सीमित जगह होती थी, और एक अन्तर्देशीय के तो बँटवारे होते थे, जिसमे सबके लिखने का स्थान निश्चित किया जाता था । तब शायद पर्सनल और प्राइवेट जैसे शब्द हमारे जिन्दगी मे शामिल नही हुये थे । तभी तो पूरा परिवार एक ही खत मे अपनी अपनी बातें लिख देता था । आज तो मोबाइल पर बात करते समय भी हम पर्सलन स्पेस ढूँढते है ।

पत्र लिखने के हफ्ते दस दिन बाद से शुरु होता था इन्तजार – जवाब के आने का ।जब डाकिया बाबू जी को घर की गली में आते देखते ही बस भगवान से मनाना शुरु कर देते कि ये मेरे घर जल्दी से आ जाये । और दो चार दिन बीतने पर तो सब्र का बाँध टूट ही जाता था, और दूर से डाकिये को देखते ही पूँछा जाता – चाचा हमार कोई चिट्ठी है का ? और फिर चिट्ठी आते ही एक प्यारे से झगडे का दौर शुरु होता– कि कौन पहले पढेगा ? कभी कभी तो भाई बहन के बीच झगडा इतना बढ जाता कि खत फटने तक की नौबत आ जाती । तब अम्मा आकर सुलह कराती । अब तो वो सारे झगडे डाइनासोर की तरह विलुप्त होते जा रहे हैं ।

और प्रेम खतों का तो कहना ही क्या उनके लिये तो डाकिये अपनी प्रिय सहेली या भरोसेमंद दोस्त ही होते थे । कितने जतन से चिट्ठियां पहुँचाई जाती थी , मगर उससे ज्यादा मेहनत तो उसको पढ्ने के लिये करनी पडती थी । कभी छत का एकान्त कोना ढूँढना पडता था तो कभी दिन मे ही चादर ओढ कर सोने का बहाना करना पडता था । कभी खत पढते पढते गाल लाल हो जाते थे तो कभी गालो पर आसूँ ढल आते थे । और अगर कभी गलती से भाई या बहन की नजर उस खत पर पढ जाये तो माँ को ना बताने के लिये उनकी हर फरमाइश भी पूरी करनी पडती थी।

खत पढते ही चिन्ता शुरु हो जाती कि इसे छुपाया कहाँ जाय ? कभी तकिये के नीचे , कभी उसके गिलाफ के अंदर , कभी किताब के पन्नो के बीच मे तो कभी किसी तस्वीर के फ्रेम के बीच में । इतने जतन से छुपाने के बाद भी हमेशा एक डर बना रहता कि कही किसी के हाथ ना लग जाय, वरना तो शामत आई समझो ।

अब आज के दौर मे जब हम ई – मेल का प्रयोग करते है, हमे कोई इन्तजार भले ही ना करना पडता हो , लेकिन वो खत वाली आत्मियता महसूस नही हो पाती । अब डाकिये जी मे भगवान नजर नही आते । आज गुलाब इन्तजार करते है किसी खत का , जिनमे वो सहेज कर प्रेम संदेश ले जाये । शायद खत हमारी जिन्दगी मे बहुत ज्यादा अहमियत रखते थे तभी तो ना जाने कितने गाने बन गये थे – चाहे वो – वो खत के पुरजे उडा रहा था हो या ये मेरा प्रेम पत्र पढ कर हो , चाहे चिट्ठी आई है हो या मैने खत महबूब के नाम लिखा हो । आज चाहे ई –मेल हमारी जिन्दगी का हिस्सा जरूर बन गये हो मगर हमारी यादो की किताब मे उनका एक भी अध्याय नही , शायद तभी आज तक एक भी गीत इन ई-मेल्स के हिस्से नही आया ।

आज भी मेरे पास कुछ खत है जिन्हे मैने बहुत सहेज कर रक्खा है , मै ही क्यो आप के पास भी कुछ खत जरूर होंगे (सही कहा ना मैने) और उन खतों को पढने से मन कभी नही भरता जब भी हम अपनी पुरानी चीजों को उलटते है , खत हाथ में आने पर बिना पढे नही रक्खा जाता ।

साभार : अपर्णा त्रिपाठी - पलाश

Thursday, December 16, 2010

जिंदगी का लेटर बाक्स


इंतजार कर रहा हूँ
वर्षों से......
दोस्तों के खतों का
नाते-रिश्तेदारों के हाल-समाचार का
महसूसना चाहता हूँ फिर से
सजीव संबंधों की गर्माहट को

लेटर बाक्स से मिलता है सिर्फ
बिजली का बिल
काॅरपोरेशन का टैक्स
बैंक का स्टेटमेंट
या फिर
विज्ञापन के निर्जीव पर्चे !!

राज्यवर्धन
सचिव प्रलेस (पश्चिम बंगाल), एकता हाईट्स,

ब्लाक-2/11 ई0, 56,राजा एस. सी. मल्लिक रोड, कोलकाता-700032