Tuesday, April 14, 2009

जानें डाक मत पत्र के बारे में

डाक मत पत्र का नाम सभी ने सुना होगा। लोकतांत्रिक निर्वाचन व्यवस्था में यह एक ऐसी प्रणाली है जिसके माध्यम से मतदाता मतदान केन्द्र पर व्यक्तिशः उपस्थित न होते हुए भी अपना वोट डाल पाता है। दुनिया के कई देशों ने इसको लागू कर रखा है। इस व्यवस्था में सामान्यतया मतदाता के अनुरोध पर बैलट पेपर को उसके पास डाक द्वारा भेजा जाता है। ठप्पा लगाने के बाद मतदाता द्वारा फिर उसे वापस भेजना होता है। पहचान के लिए कुछ सत्यापन प्रक्रियाएं भी आवश्यक होती है। 

भारत में डाक मत पत्र की व्यवस्था केवल सीमित रूप से ही लागू है। यह सबके लिए नहीं है। चुनाव में नामांकन में नाम वापसी के बाद प्रत्याशियों की तस्वीर साफ होने के 48 घण्टे के भीतर संबंधित लोगों को जिला निर्वाचन अधिकारी द्वारा डाक मत पत्र भेजने का नियम है। मतगणना के दिन सुबह 8 बजे तक डाक से वापस आने वाले डाक मत पत्रों को मतगणना में शामिल किया जाता है। मतगणना के सबसे आखिर में डाक मत पत्र को जोड़ा जाता है। 

 द कंडक्ट आफ इलेक्शन रूल 1961 के सेक्शन 18 ए के अनुसार लोकसभा और विधानसभा के चुनावों में डाक द्वारा मतदान के हकदार लोगों की सूची बनाई गई है। इसमें राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और राज्यपाल जैसे महत्वपूर्ण व्यक्ति शामिल हैं। इसके अलावा सेना, चुनाव ड्यूटी पर तैनात मतदाता एवं ऐहतियात के तहत गिरफ्तार मतदाता भी डाक मत पत्र का इस्तेमाल अपना वोट डालने के लिए कर सकते हैं। 

साल 2003 में हुए जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 के सेक्शन 60 सी में किए गये संशोधन अनुसार अब किसी भी ऐसे वर्ग से संबंधित कोई भी व्यक्ति जिसको चुनाव आयोग ने सरकार की सलाह पर अधिसूचित कर रखा हो, डाक या पोस्टल वोटिंग कर सकता है। भारत (आंशिक रूप से) के अलावा डाक मत पत्र का प्रावधान अमेरिका, ब्रिटेन, स्विटजरलैंड, आस्ट्रेलिया, आयरलैंड, जर्मनी इत्यादि देशों में भी है।

चिट्ठियों का इंतजार

सूचना क्रांति के दौर में
खो चुकी हैं मानवीय संवेदनाएं,
चिट्ठी में दिखती थी कभी
जो मोहक भावनाएं।

याद आते हैं छात्रावास के वे दिन
जब डाकियों के आने की आहट
कर जाती थी अंतर्मन में
एक घनघनाहट,
मां के ममता से भरे वे पत्र
करती अनुनय हर बार।

बेटा, समय से भोजन करियो,
अपनी सेहत का खयाल रखियो
समय से सोइयो,
बुआ तुम्हें याद करत रहिन,
दद्दा हाल पूछत रहेन,
बापू कहिन हैं कि मन लगाय पढ़्यो,
जो काजू-बादाम भेजा है, उन्हीं का नाश्ता करियो।

दो-चार दिन के छुट्टी मा घर चले अइयों,
ढेर भाग-दौड़ जिन करयो
समय से स्कूल आवा-जावा करो,
ढेर पढ़ाई के चक्कर में अपनी सेहत न बरबाद करियो।

गन्ने की फसल अच्छी भई है पर पेराई पड़ी है,
जब तू अइबो तब पेरइबे, नया गुड़ तोहे खियइबे ।

ऐसी चिट्ठियों की लंबी कतार
भावों की विह्वलता से ओतप्रोत,
चली आती थी लगातार,
यद्यपि हर बार वही सीख
मानो मांगती ममता की भीख,
मां को पता नहीं कि बेटा कितना बड़ा हो गया,
मगर मां की नज़र में मैं हमेशा बच्चा ही रह गया।

बापू को रहती थी मेरे आगे बढ़ने की इच्छा,
और बेहतर परिणाम की प्रतीक्षा।
पर मां को सताती थी मेरी सेहत की चिंता।
कितना भी तन्दुरुस्त होकर, मैं गांव जाता,
हमेशा मां का उलाहना ही पाता
लागत है कि तुम खाना-वाना ठीक से नहीं खा रह्यो,
ठीक से ना खइबो तो पढ़ाई छोड़ाय तोहे घर ही मा रखिबो।

फिर भी उन चिट्ठियों का इंतजार
रहता था बार-बार,
क्योकि वह नहीं था सिर्फ कागज़ का एक हिस्सा,
बड़े ही मनोयोग से समेटे पूरे गांव का किस्सा।

गांव से दूर, पर पास रहने का भ्रम
मां के समीप रहने का उपक्रम,
जब कभी मन घबराता, गांव याद आता
पलटकर उन चिट्ठियों को
मन गांव की अमराइयों, खलिहानों
और पगडंडियों में खो जाता,
मां के साथ सारे रिश्तों को मैं बहुत करीब पाता।

पर आज वो मां नहीं
साथ ही नए परिवेश में
वो बात भी नहीं।

औद्योगिक क्रांति का दौर,
सूचना क्रंति का ठौर,
तकनीक के तारों में उलझ
दम तोड़ती भावनाएं,
बिछुड़ गई हैं संवेदनाएं।

कभी उनकी चिट्ठी भी देती थी बहुत राहत
जिसमें प्यार की होती थी तीव्र सनसनाहट
साथ ही बनी रहती थी रिश्ते की गरमाहट।
तन्हाइयों की होती थी वो संगिनी
एक पवित्र रिश्ते की बेशक थी वो बंदिनी।

पर आज जब भी वो दूर होती है,
इन तन्हाइयों को खुशमय बनाने में
वो चिट्ठियां ऊर्जा का काम करती हैं।
संजो कर रखी गई चिट्ठियां देती हैं
बहुत व्यापक शान्ति

बाजारवाद की तीव्र आंधी ने
उड़ाकर रख दी है आत्मीयता,
वायरलेस तकनीक के मध्य
गुम हो गई है सामीप्यता।

मगर इन मोबाइलों में इतनी शक्ति कहां
बेशक समेट ले वो मुठ्ठी में जहां,
पर एक दिन वो रेत बन मुठ्ठी से सरक जाएगी
‘ निर्मेष ’ काम तो अपने पैरों की जमीं ही आएगी।

रमेश कुमार निर्मेश
rameshbhu@hotmail.com
(साभार: http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/msid-3078858,prtpages-1.cms)

Sunday, April 12, 2009

आन्दोलनों का गवाह है लखनऊ जीपीओ पार्क

अक्सर प्रदर्शनकारियों से आबाद रहने वाले लखनऊ जीपीओ पार्क की आजादी से पहले भी यही भूमिका थी। वर्तमान पीढ़ी के शायद बहुत कम लोग आजादी की लड़ाई में जीपीओ पार्क योगदान के बारे में जानते होंगे। आज जहाँं जीपीओ पार्क है आजादी से पहले वहाँ ‘रिंक थियेटर‘ हुआ करता था। लखनऊ में चलने वाले काकोरी षडयंत्र केस का मुकदमा पहले रौशनउद्दौला लाइब्रेरी में शुरू हुआ मगर तुरन्त ही बाद इसकी सुनवाई ‘रिंक थियेटर‘ में होने लगी। यहाँ सन 1925 में दस माह तक यह केस चला। सेशन जज हेमलटन इस केस की सुनवाई करते थे और सरकारी वकील जगत नरायण मुल्ला व आनन्द नरायण मुल्ला बहस करते थे। यहीं रामकृष्ण खत्री व शचीन्द्रनाथ सान्याल की पैरवी के लिए चन्द्रभानु गुप्त, मोहनलाल सक्सेना व कृपाशंकर हजेला कलकत्ता के बैरिस्टर बी0के0 चैधरी के साथ यहाँ आया करते थे। क्रान्तिकारियों को जेल से लाते समय कान्यकुब्ज कालेज से कैसरबाग चैराहे तक छात्रों की भीड़ उमड़ पड़ती थी। जिस दिन ‘रिंक थियेटर‘ में शचीन्द्रनाथ सान्याल को काले पानी व रामकृष्ण खत्री को दस साल के कठोर कारावास की सजा सुनायी गयी थी, उसी दिन ‘रिंक थियेटर‘ को तोड़कर यहाँ पर जीपीओ पार्क की नींव रखी गई। इसलिए लखनऊ जीपीओ पार्क और आन्दोलन का जन्मजात रिश्ता है।

Saturday, April 11, 2009

ब्रिटेन में मोटर गाड़ी में सवार होकर अब पत्र बाँटेंगे डाकिये

अपने देश में डाकियों को आपने डाक बाँटते हुए आज तक साइकिल पर देखा होगा। कुछेक क्षेत्रों मे स्पीड पोस्ट का वितरण मोपेड या आटो रिक्शा द्वारा भी होता है। पर अभी तक कभी यह नहीं सुना गया कि डाकिया मोटर गाड़ी से डाक बाँटेगा। पर अब ऐसा ही होने जा रहा है। यह भारत में नहीं बल्कि सात समुन्दर पार ब्रिटेन में होने जा रहा है।

ब्रिटेन में डाकिये अब मोटरसाइकिलों की बजाय फ्रैंच लुक वाली मोटर गाड़ियों (बग्घी) में सवार होकर पत्र बाँटेंगे। रायल मेल सेवा ने अंडे के आकार के इस वाहन का इस्तेमाल करने की अनुमति दे दी है। वाहन की अधिकतम गति 25 मील प्रति घंटे होगी। इससे ब्रिटेन में डाक सेवा में साइकिलों के युग का अंत हो जाएगा। माट्रा माडल फ्रांस में तैयार किया गया है। ब्रिटिश डाकियों ने इस कदम का गर्मजोशी से स्वागत किया है। बैटरी चालित यह गाड़ी एक बार चार्ज होने पर 30 से 35 मील की यात्रा कर सकती है। अन्य वाहनों की तरह इस गाड़ी में नंबर प्लेट की जरूरत नहीं होगी।.....अब इन्तजार कीजिए कि अपने देश में भी मोटर गाड़ियों में सवार होकर डाकिये पत्र बाँटेंगे।

पत्र-पेटी

बड़े प्रेम से लिखता हूँ कोई चिट्ठी
टांकता हूँ किसी परिचित का पता-ठिकाना
बाहर निकलने के अवसर की ताक में
रखता हूँ जेब में जतन से

जगह-जगह लगे लोहे के
लाल बक्सों में डालते हुए चिट्ठी
ठिठक जाते हैं पांव
कि पहुँच तो गई न सही-सलामत
बक्से के अन्दर

यकीन नहीं होता बक्से पर
खड़खड़ाता हूँ खिड़की
सोचता हूँ क्षण भर
और चल देता हूँ, चिट्ठी में लिखी गई
बातों को जांचता-परखता

धुंधली पड़ जाती है चिट्ठी डालने की तारीख
कि अचानक मेरे पते और ठिकाने को ढूंढ़ती हुई
प्रवेश करती है एक चिट्ठी
मेरे आंगन में चुपचाप

गदगद हो जाता है मन
कुशल और क्षेम के बाद
यह पढ़ते हुए कि आपकी चिट्ठी मिली

याद आ जाती मुझे
लोहे के लाल बक्से की
और आ जाते हैं आँखों में आंसू छल्-छल्।

विजय प्रताप सिंह
112ए/2, शिलाखाना, तेलियरगंज, इलाहाबाद-211004

Wednesday, April 8, 2009

हिन्दुस्तान अख़बार में ब्लॉग की चर्चा

आज ८ अप्रैल, २००९ के दैनिक हिंदुस्तान अख़बार में ब्लॉग वार्ता के अंतर्गत "डाकिया डाक लाया" ब्लॉग की चर्चा की गई है। रवीश कुमार जी ने इसे बेहद रोचक रूप में प्रस्तुत किया है.....आभार !! ( उपरोक्त सामग्री को स्पष्ट देखने के लिए इस पर चटका लगायें)

Sunday, April 5, 2009

दुनिया का प्रथम प्रेम-पत्र

हममें से हर किसी ने अपने जीवन में किसी न किसी रूप में प्रेम-पत्र लिखा होगा। प्रेम-पत्रों का अपना एक भरा-पूरा संसार है। प्रेम जैसी अनुपम भावना को व्यक्त करने के लिए शब्द सचमुच नाकाफी होते हैं। दुनिया की तमाम मशहूर शख्सियतों ने प्रेम-पत्र लिखे हैं- फिर चाहे वह नेपोलियन हों, अब्राहम लिंकन, क्रामवेल, बिस्मार्क या बर्नाड शा हों। आज ये पत्र एक धरोहर बन चुके हैं। ऐसे में यह जानना अचरज भरा लगेगा कि दुनिया का सबसे पुराना प्रेम पत्र बेबीलोन के खंडहरों से मिला था। बेबीलोन की किसी युवती का प्रेमी अपनी भावनाओं को समेटकर उससे जब अपने दिल की बात कहने बेबीलोन तक पहुँचा तो वह युवती तब तक वहां से जा चुकी थी। वह प्रेमी युवक अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाया और उसने वहीं मिट्टी के फर्श पर खोदते हुए लिखा- ''मैं तुमसे मिलने आया था, तुम नहीं मिली।'' यह छोटा सा संदेश विरह की जिस भावना से लिखा गया था, उसमें कितनी तड़प शामिल थी। इसका अंदाजा सिर्फ वह युवती ही लगा सकती थी जिसके लिये इसे लिखा गया। भावनाओं से ओत-प्रोत यह पत्र ईसा से बहुत पहले का है और इसे ही दुनिया का प्रथम प्रेम पत्र माना जाता है।

Saturday, April 4, 2009

डाक सेवाओं के कालानुक्रम विस्तार को दर्शाती पुस्तक

भारतीय डाक सेवा के अधिकारी कृष्ण कुमार यादव द्वारा लिखित पुस्तक ''India Post : 150 Glorious Year'' भारत में डाक सेवाओं के कालानुक्रम विस्तार को दर्शाती है। इस पुस्तक में उल्लिखित ऐतिहासिक तथ्य इसकी पठनीयता में और वृद्धि करते हैं। इससे पूर्व डाक सेवाओं पर तमाम पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं पर सभी तथ्यों और उनसे जुड़े विवरणों को एक जगह एकत्र कर इस प्रकार सारगर्भित रूप में प्रस्तुत करने का यह प्रथम प्रयास है। पुस्तक में तमाम नई सेवाओं के आरम्भ, विभिन्न समयों पर डाक सेवाओं में हुए महत्वपूर्ण परिवर्तन, व्यक्ति विशेष की विशिष्टता से जुड़े तथ्यों, डाक टिकटों और उनके संग्रह से जुड़ी तमाम रोचक बातों का समावेश इसे न सिर्फ डाक विभाग से जुड़े लोगों हेतु आवश्यक बनाता है बल्कि शोधार्थियों, फिलेटलिस्ट एवं जन सामान्य हेतु भी महत्वपूर्ण बनाता है। पुस्तक में 2300 ई0 पूर्व से लेकर वर्ष 2006 तक की जानकारियाँ एवं तथ्य उपलब्ध कराये गये हैं। नागरिक उत्तर प्रदेश, लखनऊ, द्वारा वर्ष 2006 में प्रकाशित इस पुस्तक का मूल्य रू0 250/- मात्र है।

Friday, April 3, 2009

विविध आयामों को समेटे "डाक पत्रिका"


डाक विभाग ‘‘डाक पत्रिका‘‘ नाम से एक त्रैमासिक हाउस जर्नल का प्रकाशन करता है। ग्लेज्ड पेपर पर खूबसूरत कवर पृष्ठ के साथ इस पत्रिका में जहाँ डाक सेवाओं के विविध आयामों पर रचनाएं प्रकाशित होती हैं, वहीं साहित्य एवं स्वास्थ्य जैसी विधाओं में भी अक्सर रचनाएं देखने को मिलती हैं। डाक विभाग वैसे भी साहित्यिक रूप से समृद्व है, अतएव डाक पत्रिका में ऐसे तमाम रचनाकार प्रायः पढ़ने को मिलते हैं जिन्हें हम-आप विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ते रहते हैं। पत्रिका में अंग्रेजी एवं हिन्दी दोनों ही भाषाओं में लेख, कविताएं, पुस्तक समीक्षा कहानियाँ इत्यादि प्रकाशित होती हैं। अतीत के पन्नों से एवं अखबार कहते हैं जैसे स्तम्भ पत्रिका को रोचक बनाते हैं। डाक रस के बहाने गुदगुदाती रचनाएं भी इसमें शामिल हैं। देश के विभिन्न अंचलों से प्राप्त पाठकों के पत्र पत्रिका के बहुआयामी रूप को प्रतिबिम्बित करते हैं। समय-समय पर जारी डाक टिकटों एवं विभिन्न प्रदर्शनियों व कार्यक्रमों की तस्वीरें पत्रिका को जीवंत बनाती हैं। बस जरूरत है इस त्रैमासिक पत्रिका के नियमित एवं सतत् प्रकाशन की। (चित्र में प्रकाशित आवरण पृष्ठ डाक पत्रिका के जनवरी-मार्च 2005 अंक का है)

Thursday, April 2, 2009

एस. एम. एस.



अब नहीं लिखते वो ख़त 
करने लगे हैं एस. एम.एस. 
तोड़-मरोड़ कर लिखे शब्दों के साथ 
करते हैं खुशी का इजहार 
मिटा देता है हर नया एस.एम. एस. 
पिछले एस.एम. एस. का वजूद 
एस.एम. एस. के साथ ही 
शब्द छोटे होते गए 
भावनाएं सिमटती गई 
खो गई सहेज कर रखने की परम्परा 
लघु होता गया सब कुछ 
रिश्तों की क़द्र का अहसास भी !! 

(युवा रचनाकार आकांक्षा जी की यह कविता ''दैनिक जागरण'' के साहित्यिक 'पुनर्नवा' पृष्ठ पर 29 सितम्बर 2006 को प्रकाशित हुयी थी. एस.एम.एस. के बहाने दरकती भावनाओं पर यह कविता बखूबी प्रकाश डालती है. इसे हम यहाँ पर साभार प्रकाशित कर रहे हैं। आकांक्षा जी की अन्य रचनाएँ आप उनके ब्लॉग "शब्द-शिखर" http://shabdshikhar.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं.)

Saturday, March 21, 2009

जब चिट्ठी का मजमून ही बदल गया...

एक गांव में एक स्त्री थी। उसके पति आई टी आई मे कार्यरत थे । वह अपने पति को पत्र लिखना चाहती थी, पर अल्पशिक्षित होने के कारण उसे यह पता नहीं था कि पूर्णविराम कहाँ लगेगा । इसीलिये उसका जहाँ मन करता था वहीं पूर्णविराम लगा देती थी। आखिरकार उसने चिट्टी इस प्रकार लिखी की उसका मजमून ही बदल गया. आप भी गौर करें और आनंद लें-

मेरे प्यारे जीवनसाथी मेरा प्रणाम आपके चरणों में । आप ने अभी तक चिट्टी नहीं लिखी मेरी सहेली कॊ । नौकरी मिल गयी है हमारी गाय को । बछडा दिया है दादाजी ने । शराब की लत लगा ली है मैंने । तुमको बहुत खत लिखे पर तुम नहीं आये कुत्ते के बच्चे । भेड़िया खा गया दो महीने का राशन । छुट्टी पर आते समय ले आना एक खूबसूरत औरत । मेरी सहेली बन गई है । और इस समय टीवी पर गाना गा रही है हमारी बकरी । बेच दी गयी है तुम्हारी माँ । तुमको बहुत याद कर रही है एक पड़ोसन । हमें बहुत तंग करती है तुम्हारी बहन । सिर दर्द मे लेटी है तुम्हरी पत्नी।

Tuesday, March 10, 2009

डाकघरों से सोने के सिक्कों की बिक्री

डाकघरों में सोने की बिक्री। पहली दृष्टि में यह चौंकाने वाली बात लगती है पर है एकदम सही। भारतीय डाक विभाग द्वारा रिलायन्स मनी लि0 के सहयोग से देश के तमाम डाकघरों में 24 कैरेट के सोने के सिक्कों की बिक्री अक्टूबर २००८ से की जा रही है। आरंभ में यह योजना दिल्ली, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और गुजरात के १०० डाकघरों में आरंभ की गई और तत्पश्चात नवम्बर २००८ में इसे पंजाब, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और मध्य प्रदेश तक विस्तृत किया गया। ९ मार्च २००९ को यह आकर्षक योजना उत्तर प्रदेश और हरियाणा में विस्तृत की गई।

सोने के ये सिक्के 0.5, 1, 5, 8 ग्राम की टेम्पर प्रूफ पैकिंग में बिक्री हेतु उपलब्ध कराये जा रहे हैं। इनकी बिक्री बाजार द्वारा निर्धारित मूल्य से ही निर्धारित होगी। सील्ड कवर में पैक किये गये ये सिक्के वल्काम्बी (Valcambi) स्विटजरलैण्ड द्वारा निर्मित हैं एवं 24 कैरेट के साथ इनकी शुद्धता 99.99 प्रतिशत स्विस सर्टिफिकेशन द्वारा प्रमाणित है। इसके साथ ही डाक विभाग की विभिन्न योजनाओं में निवेश करने के साथ-साथ अब लोगों को डाकघरों में जाकर सोने में निवेश करने का मौका भी मिलेगा। फिलहाल डाकघर से सोने की इस खरीद पर ग्राहकों को 8 अप्रैल तक 5 प्रतिशत की छूट दी जा रही है।.......... है न आकर्षक योजना।
(http://pib.nic.in/release/release.asp?relid=46556)

Sunday, March 8, 2009

अमेरिकी राष्ट्रपति को रोज मिलते हैं 40,000 पत्र

कौन कहता है कि लोग अब पत्र नहीं लिखते। दुनिया की मशहूर हस्तियांँ इस बात की गवाह हैं कि लोगों में अभी भी पत्र लिखने का क्रेज कायम है। नवनिर्वाचित अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को प्रतिदिन करीब 40,000 पत्र मिलते हैं। हालांकि वह इनमें से केवल 10 का ही जवाब दे पाते हैं। यह आंकड़ा खुद राष्ट्रपति बराक ओबामा ने सार्वजनिक किया। उन्होंने व्हाइट हाउस में बुलाए गए हेल्थ सेमिनार के समापन समारोह में इस बात का खुलासा किया। राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा कि मुझे हर दिन 40,000 पत्र मिलते हैं। यद्यपि मैं सभी 40,000 पत्र तो नहीं पढ़ पाता लेकिन मेरा स्टाफ हर दिन 10 पत्रों को चुनता है जो कि मैं पढ़ता हूँ और इनमें से अधिकतर का जवाब देने की हरसंभव कोशिश करता हूँ। राष्ट्रपति बराक ओबामा का मानना है कि यह जनता से संपर्क में रहने का एक नायाब तरीका है।

Monday, March 2, 2009

1897 में गठित हुयी फिलेटलिक सोसाइटी ऑफ़ इंडिया

भारत में प्रथम स्टैम्प सोसाइटी, फिलेटलिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल थी। 1894 में स्थापित इस सोसाइटी के प्रथम अध्यक्ष जी0जे0 हिन्स, उपमहानिदेशक डाक विभाग थे। फिलेटलिक सोसाइटी आफ इंडिया का गठन 6 मार्च 1897 में हुआ था और फिलेटलिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल के तत्कालीन अध्यक्ष सी0 इस्टीवर्ट विल्सन ही इसके प्रथम अध्यक्ष बने। आरम्भ में इस सोसाइटी में 6 महिलाओं सहित कुल 60 सदस्य थे और सभी ब्रिटिश थे। 1897 में ही प्रथम भारतीय सी0के0 दत्त इस सोसाइटी के सदस्य बने। 1906 का वर्ष सोसाइटी हेतु महत्वपूर्ण रहा, जब प्रिन्स आफ वेल्स जार्ज पंचम ने कलकत्ता में स्वयं सदस्यों के डाक टिकटों का संग्रह व्यक्तिगत रूप से देखा। इस दौरान एक सदस्य ए0सी0 राइट ने जार्ज पंचम को ‘सिन्दे डाक' भी सौपा। सोसाइटी ने 1977 में अपना एक शताब्दी का सफर पूरा किया और इस दौरान डाक विभाग द्वारा इस पर दो डाक टिकटों का सेट भी जारी किया . इसके वर्तमान अध्यक्ष श्री दिलीप शाह हैं।

Saturday, February 21, 2009

डाक सेवाओं का बढ़ता सफर

भारतीय डाक एक विभाग के रूप में भले ही 1854 में स्थापित हुआ हो पर इसका सफर इससे भी पुराना है। भारत में व्यवस्थित डाक सेवा का प्रथम उद्धरण चन्द्रगुप्त मौर्य(321-297 ई0पूर्व) के काल का मिलता है। संदेशवाहक कबूतर भी मौर्य काल की ही देन है। डाक सेवाओं पर भारत में प्रथम लिखित विवरण जियाउद्दीन बरनी का मिलता है, जिसमें उल्लेख किया है कि 1226 ई0 में अलाउद्दीन खिलजी ने नियमित अश्व एवं धावकों को इस कार्य हेतु व्यवस्थित किया। इसी प्रकार मैसूर ने चिक्का देवराज वाड्यार के काल में 1672 ई0 में सबसे बढ़िया डाक व्यवस्था आरम्भ की, जिसे कि भारतीय डाक सेवा के इतिहास में प्रथम संस्थागत स्थापना माना जाता है। इस्ट इंडिया कम्पनी ने सर्व प्रथम 1688 में बम्बई और मद्रास के मध्य डाक लाइन स्थापित करने हेतु कदम उठाये। अंग्रेजों ने सर्वप्रथम 1727 में कलकत्ता के कोर्ट हाउस बिल्डिंग में डाकघर स्थापित किया। इसके ठीक 39 वर्ष बाद राबर्ट क्लाइव ने 24 मार्च 1766 को बंगाल में एक नियमित डाक व्यवस्था आरम्भ की और आदेश किया कि सभी पत्र सरकारी भवन से ही डिस्पैच होने चाहिए। इस हेतु एक पोस्टल राइटर (अब के पोस्टमास्टर) और एक सहायक की गवर्नमेन्ट हाउस में नियुक्ति की गई जो प्रत्येक रात को डाक प्राप्त करते, उनकी स्क्रूटनी करते और तत्पश्चात उसे डिस्पैच करते। 1774 में वारेन हेस्टिंग्स ने यह व्यवस्था की कि कम्पनी डाक के द्वारा लोगों के व्यक्तिगत पत्र भी फीस लेकर भेजे जा सकते हैं। इसके बाद डाक सेवाओं का विस्तार निरन्तर होता गया और 1854 में इसे एक विभाग रूप में स्थापित किया गया। 1947 में विभाजन के पश्चात भारत में 23344 डाकघर थे और कुल मेल ट्रैफिक 2204 मिलियन था। आजादी पश्चात डाक विभाग ने तमाम नये कदम उठाये। 21 नवम्बर 1947 को प्रथम डाक टिकट जारी किया और तत्पश्चात फिलैटली को एक शौक रूप में विकसित करने में अपना योगदान दिया। आवश्यकतानुसार डाक विभाग ने कई अन्य कार्य भी किये, जिसमें 1950 में टी0बी0 सील्स की डाकघरों द्वारा बिक्री शामिल थी। वर्ष 2004 में विभाग ने 150 वर्ष पूरे किये हैं और इसी वर्ष तमाम क्रान्तिकारी कदम उठाये। इनमें लाजिस्टिक पोस्ट, ई-पोस्ट, सीनियर सिटीजन सेविंग स्कीम, म्युचुअल फण्डों की डाकघरों से बिक्री, ओरियन्टल इंश्योरेन्स कम्पनी के उत्पादों की बिक्री शामिल है। 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में अगले वर्ष 26 जनवरी 2005 को प्रथम बार भारतीय डाक ने गणतंत्र दिवस परेड में अपनी झांकी प्रस्तुत की। इसी वर्ष राष्ट्रपति डाॅ0 ए0पी0जे0 अब्दुल कलाम ने देश भर से 150 डाकियों को राष्ट्रपति भवन में आमंत्रित किया। वक्त के साथ डाक सेवाओं का काफिला बढ़ता गया और यह दस्तूर अभी भी जारी है।

Tuesday, January 27, 2009

प्रोजेक्ट एरो बदलेगा डाक घरों का चेहरा


भारतीय डाकघर अपनी साधारण छवि के साथ 150 वर्षों से अधिक समय से राष्ट्र को सेवाएं प्रदान कर रहा है। सामुदायिक जीवन में संचार के एक प्रमुख केन्द्र के रूप में इस समय डाकघर को प्रौद्योगिकी के नवीनतम माध्यमों से कड़ी प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है, जिन्होंने ‘कनेक्टिविटी‘ को पुनर्परिभाषित किया है। विश्व के सबसे बड़े नेटवर्क, 1।55 लाख डाकघरों के साथ तमाम कड़ी प्रतिस्पद्र्धा के बावजूद सामाजिक प्रतिबद्धता को पूरा करने की दिशा में डाक विभाग निरन्तर प्रयासरत हैं। सामान्यतया देखा गया है कि इतने बड़े नेटवर्क के बावजूद डाकघरों की कोई ब्राण्डिंग नहीं है एवं न ही एकरूपता है। हर डाकघर की अपनी अलग संरचना है। इसी के मद्देनजर युवा संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी राज्यमंत्री श्री ज्योतिरादित्य सिन्धिया ने आई0टी0 के इस दौर में नई पहल करते हुए डाकघरों को ‘‘प्रोजेक्ट एरो‘‘ अवधारणा से एकरूप करने का बीड़ा उठाया है। इसके तहत चयनित डाकघरों की कार्यप्रणाली को सभी क्षेत्रों में सुधार एवं उच्चीकृत करके पारदर्शी, सुस्पष्ट एवं उल्लेखनीय प्रदर्शन के आधार पर और आधुनिक बनाया जा रहा है। डाक वितरण, डाकघरों के बीच धन प्रेषण, बचत बैंक सेवाओं और ग्राहकों की सुविधा पर जोर के साथ नवीनतम टेक्नोलाजी, मानव संसाधन के समुचित उपयोग एवं आधारभूत अवस्थापना में उन्नयन द्वारा विभाग अपनी ब्राण्डिंग पर भी ध्यान केन्द्रित कर रहा है। भारतीय डाक विभाग प्रोजेक्ट एरो के तहत प्रथम चरण में पूरे देश में 50 एवं द्वितीय चरण में 450 डाकघरों को नवीनीकृत कर चुका है। तृतीय चरण में 4500 डाकघरों को चिन्हित किया गया है।


एरो के मूलतः दो भाग हैं- कार्यों का सम्यक रूप में सम्पादन एवं डाकघरों के लुक एवं फील को आधुनिक बनाना। प्रथम के अन्तर्गत डाक वितरण, पे्रषण, बचत बैंक एवं आफिस सर्विस में सुधार पर जोर है तो लुक एवं फील के अन्तर्गत डाकघरों की ब्राण्ंिडग, आई0टी0 पर जोर, मानव संसाधन का सम्यक विकास एवं आधारभूत संसाधनों में सुधार अपेक्षित है।


प्रोजेक्ट एरो के माध्यम से डाक विभाग पुनः अपनी मूल सेवा डाक वितरण पर विशेष रूप से जोर दे रहा है। डाक वितरण के तहत प्राप्ति के दिन ही सभी प्रकार की डाक चाहे वह साधारण, पंजीकृत, स्पीड पोस्ट या मनीआर्डर हो का उसी दिन शतप्रतिशत वितरण व डिस्पैच, लेटर बाक्सों की समुचित निकासी और डाक को उसी दिन की डाक में शामिल करना, डाक बीटों के पुनर्निर्धारण द्वारा वितरण को और प्रभावी बनाना एवं डाक वितरण की प्रतिदिन मानीटरिंग द्वारा इसे और भी प्रभावी बनाया जा रहा है। यही नहीं आवश्यकतानुसार वितरण का समय और भी पहले किया जा रहा है एवं टेªन व बसों पर डाक के पारागमन हेतु निर्भरता की बजाय मेल मोटर द्वारा इसे त्वरित बनाया जा रहा है।

बचत बैंक सेवाओ को पूर्णतया कम्प्यूटराइज्ड कर उनकी शतप्रतिशत डाटा फीडिंग और सिगनेचर स्कैनिंग भी कराई जा रही है, ताकि मैनुअली ढंग से कार्य संपादित करने पर होने वाली देरी से बचा जा सके। खातों के स्थानान्तरण में लगने वाले समय और ब्याज की त्वरित गणना पर भी जोर है। लोगों की सुविधा हेतु अब कम्प्यूटराइज्ड पास बुकंे जारी की जायेंगी। मृतक दावों का त्वरित निस्तारण भी प्रोजेक्ट एरो के तहत प्राथमिकता पर है। बचत बैंक संबंधी कार्यो हेतु लोगों को भटकना न पड़े, इसके लिए सिटीजन चार्टर का क्रियान्वयन, वेब आधारित ग्राहक शिकायत निस्तारण प्रणाली, सभी बचत बैंक फार्मों के भरे हुए प्रारूपों का पब्लिक हाल में डिस्प्ले किया गया है।

प्रोजेक्ट एरो द्वारा डाकघरों का कायाकल्प होने के साथ ही दूर-दराज ग्रामीण अंचलों में इसके लेखान्तर्गत स्थित डाकघरों की कार्यप्रणाली में भी काफी पारदर्शिता आयेगी। जनोपयोगी सूचना को पब्लिक हाल में उपलब्ध कराना, समुचित पेयजल, टायलेट व बैठने की व्यवस्था इत्यादि सहित तमाम महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर इस प्रोजेक्ट में क्रियान्वयन किया है। इसके अलावा कारपोरेट लुक के तहत काउण्टर स्टाफ हेतु यूनीफार्म का निर्धारण एवं काउण्टर्स की ब्रांडिंग भी की गयी है। डाक विभाग की विभिन्न सेवाओं एवं उनकी दरों के लिए लोगों को असुविधा का सामना न करना पड़े, इसके लिए पब्लिक हाल में टच-स्क्रीन की सुविधा उपलब्ध करायी गयी है। टच स्क्रीन सुविधा द्वारा जहाॅ सभी डाक सेवाए एवं उनकी दरें निर्दिष्ट की गयी हैं, वहीं इसमें क्विज की रोचक सुविधा भी मुहैया करायी गयी है। इस टच स्क्रीन में नेट सर्फिंग का भी प्रावधान है।

Monday, January 26, 2009

डाक टिकटों के आईने में स्वतंत्रता संग्राम

*गणतंत्र दिवस की शुभकामनाओं सहित*
(वर्ष २००४ में भारतीय डाक के १५० वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में अगले वर्ष २६ जनवरी २००५ को प्रथम बार भारतीय डाक विभाग ने गणतंत्र दिवस परेड में अपनी झांकी प्रस्तुत की थी.यह एक स्मरणीय तथ्य है )

Wednesday, January 21, 2009

स्विस डाकघरों में लकड़ी के डाक टिकट

विभिन्न देश डाक टिकटों के प्रति लोगों को आकर्षित करने हेतु नित् नये प्रयोग करते रहते हैं। इसी क्रम में 5 अगस्त 2004 को स्विटजरलैण्ड ने चीड़ के पेड़ की लकड़ी का डाक टिकट जारी किया। चीड़ की लकड़ी से बना चैकोर आकार का यह डाक टिकट पांच स्विस फ्रेंक यानी चार अमेरिकी डालर की कीमत में जारी हुआ है। काष्ठ उद्योग को बढ़ावा देने के लिए जारी किये गये इस डाक टिकट की मोटाई एक के्रडिट कार्ड की मोटाई के बराबर है। स्विटजरलैण्ड के लेखा चित्रकार थामस राथगेब ने इस डाक टिकट को डिजाइन किया है, जो 120 साल पुराने चीड़ के पेड़ की लकड़ी से बनाया गया। डाक टिकट के विविध चित्र उसी तरह से अनूठे हैं जिस तरह हर पेड़ अपने में निराला होता है। गौरतलब है कि स्विटजरलैण्ड इससे पहले फीते और चाकलेट की गंध वाले डाक टिकट जारी कर चुका है। 2001 में स्विस डाकघर ने एक चैकोर डाक टिकट जारी किया जिसमें चाकलेट की सुगंध समेटा एक छोटा सा कैप्सूल लगा था। एक साल पहले इसने स्विटजरलैण्ड के फीता बनाने वाले उद्योग को समर्पित एक और अनूठा डाक टिकट जारी किया था।

Monday, January 19, 2009

एक डाक टिकट 22 कैरेट सोने का

डाक टिकट जगत में नित नये अनूठे प्रयोग करने वाले देशों में भूटान का नाम सबसे ऊपर है। पिछले पचास वर्षों में इस छोटे से देश ने विदेशी मुद्रा कमाने के लिए अनूठे डाक टिकट निकाले हैं। उनमें त्रिआयामी, उभरे हुए रिलीफ टिकट, इस्पात की पतली पन्नियाँ, रेशम, प्लास्टिक और सोने की चमकदार पन्नियों वाले डाक टिकट शामिल हैं। साथ ही, सुगंधित और बोलने वाले (छोटे रिकार्ड के रूप में) डाक टिकट निकालकर भी भूटान ने सबको चौंकाया है।

भूटान ने वर्ष 1996 में 140 न्यू मूल्य वर्ग का ऐसा विशेष डाक टिकट जारी किया था जिसके मुद्रण में 22 कैरेट सोने के घोल का उपयोग किया गया था। विश्व के पहले डाक टिकट ‘पेनी ब्लैक‘ के सम्मान में जारी किये गये इस टिकट पर ‘22 कैरेट गोल्ड स्टेम्प 1996‘ लिखा है। इस टिकट की स्वर्णिम चमक को देखकर इसकी विश्वनीयता के बारे में कोई संदेह नहीं रह जाता। यह सूबसूरत डाक टिकट अब दुर्लभ डाक टिकटों की श्रेणी में माना जाता है क्योंकि अब यह आसानी से उपलब्ध नहीं है।

Sunday, January 18, 2009

महाराज प्रयाग नारायण मंदिर, शिवाला पर डाक विभाग द्वारा विशेष आवरण


भारतीय डाक विभाग ने कानपुर के प्रसिद्ध महाराज प्रयाग नारायण मंदिर, शिवाला पर दिनांक 17 जनवरी, 2009 को एक विशेष आवरण (लिफाफा) एवं इसका विशेष विरूपण जारी किया। कानपुर जी0पी0ओ0 द्वारा जारी किये गये इस विशेष आवरण का विमोचन श्री श्रीप्रकाश जायसवाल, गृहराज्य मंत्री, भारत सरकार द्वारा श्री रवीन्द्र पाटनी, मेयर कानपुर, श्री उदय कृष्ण, पोस्टमास्टर जनरल कानपुर परिक्षेत्र और श्री कृष्ण कुमार यादव, चीफ पोस्टमास्टर, कानपुर जीपीओ के विशिष्ट आतिथ्य में सम्पन्न हुआ। 

महाराज प्रयाग नारायण मंदिर के 148 साल पूरे होने पर जारी (1861-2009) इस विशेष आवरण पर जहाँ मंदिर के गोपुरम का रेखाचित्र बना है, वहीं दुर्गा पूजा पर जारी डाक टिकट लगाकर इसका विरूपण किया गया है। विरूपण में भी मंदिर का चित्र बना हुआ है। गौरतलब है कि दक्षिण के त्रिचरापल्ली के श्री रंगम मंदिर के बाद तथा उत्तरी भारत में वृन्दावन के बाद महाराज प्रयाग नारायण मंदिर, दूसरा मंदिर है, जिसकी ख्याति देश के अलावा विदेशों तक में हैं। नागरी शैली में स्थापित इस मंदिर का ऊँचा गोपुरम व भव्य उज्जवल कलश दूर से ही अपनी अलग छटा बिखेरता है। बहुत कम लोगों को ज्ञात है कि मंदिरों की स्थापत्य के दृष्टिकोण से पॉँच भिन्न-भिन्न शैलियाँं हैं, जो दक्षिण के पॉँच प्रमुख राजवंशों की परिचायक हैं। ये पाँच मुख्य शैलियाँ कालक्रम में इस प्रकार हैं- पल्लव (600-1100 ई0 के लगभग), चोल (1100-1150 ई0 के लगभग), पांड्य (1100-1350 ई0 के लगभग), विजयनगर (1350-1565 ई0 के लगभग) एवं नायक (1600 ई0 के पश्चात)। इसमें प्रयाग नारायण शिवाला मंदिर विजयनगर शैली का है। इस शैली की मुख्य विशेषता है कि इसके प्रांगण में बाजार होता है, जो यहाँ पर भी है।
इस अवसर पर विशेष आवरण का विमोचन करते हुए केंद्रीय गृह राज्यमंत्री श्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने कहा कि इससे राष्ट्रीय स्तर पर न सिर्फ कानपुर को विशिष्ट पहचान मिली है बल्कि कानपुर के धार्मिक एवं पर्यटन स्थलों में महाराज प्रयाग नारायण मंदिर का नाम भी शुमार हो गया है। जिस कानपुर की पहचान या तो औद्योगिक नगर के रूप में रही है, या ब्रह्मावर्त के चलते, वहाँ उत्तर व दक्षिण का सेतुबन्ध कहे जाने वाले शिवाला के श्री रंगनाथ जी मंदिर पर विशेष आवरण जारी कर डाक विभाग ने कानपुर की सांस्कृतिक चेतना में प्राण फूँकने का कार्य किया है। महापौर श्री रवीन्द्र पाटनी ने इसे कानपुर के इतिहास में एक मील का पत्थर बताते हुए आशा की कि आने वाले दिनों में कानपुर के अन्य प्रसिद्ध स्थानों को भी यह गौरव प्राप्त होगा।


       (गृह राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल और भारतीय डाक सेवा के अधिकारी कृष्ण कुमार यादव)
कार्यक्रम के आरम्भ में सभी का स्वागत करते हुए भारतीय डाक सेवा के अधिकारी एवं कानपुर जीपीओ के चीफ पोस्टमास्टर श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि कानपुर सदैव से ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक धरोहरों एवं विभूतियों के मामले में अग्रणी रहा है। यही कारण है कि डाक विभाग ने अब तक कानपुर से जुड़े जहाँ 13 डाक टिकट जारी किये हैं, वहीं स्थानीय तौर पर अब तक 6 विशेष आवरण भी जारी किये गये हैं। श्री यादव ने बताया कि महाराज प्रयाग नारायण मंदिर, शिवाला अतीत के उस काल खण्ड का भी साक्षी है जब इसके प्रांगण में रहकर ही पं0 मोती लाल नेहरू ने कानपुर में अपनी वकालत शुरू की थी। इसी मंदिर के प्रांगण में झण्डा गीत के अमर रचयिता पद्मश्री श्याम लाल गुप्त ‘पार्षद‘ नित्य नंगे पैर रामायण का श्रवण करने आते थे। यहीं सन् 1884-85 में पं0 प्रताप नारायण मिश्र ने लावनी की अलख जगाई व नगर में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों दंगल, शास्त्रार्थ आदि में अग्रणी रहे, जिसकी चर्चा पं0 मिश्र ने ‘ब्राह्मण‘ पत्रिका में भी की है। सन् 1965 से शिवाला प्रांगण में सन्त मनीषियों व विद्वानों के व्याख्यान का जो सूत्रपात हुआ था वह अनवरत् रूप से आज भी जारी है। पं0 राम किंकर उपाध्याय ने शिवाला में रामकथा रस की अविरल गंगा बहाई, जो आज भी जारी है। मंदिर के प्रांगण में प्रतिवर्ष सांस्कृतिक-साहित्यिक गतिविधियों के पर्याय ‘मानस संगम‘ संस्था का वार्षिकोत्सव लगता है, जिसमें देश-विदेश के विद्वानों का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।

            (विशेष आवरण का विमोचन करते हुए केंद्रीय गृह राज्यमंत्री श्री श्रीप्रकाश जायसवाल)
पोस्टमास्टर जनरल श्री उदय कृष्ण ने कहा कि सांस्कृतिक धरोहरों को सवंर्धित करने का कार्य आरम्भ से ही डाक विभाग करता रहा है और इसी कड़ी में महाराज प्रयाग नारायण मंदिर पर जारी इस विशेष आवरण को भी देखा जाना चाहिए। कार्यक्रम के अन्त में धन्यवाद ज्ञापन महाराज प्रयाग नारायण मंदिर के संरक्षक श्री बद्री नारायण तिवारी द्वारा एवं संचालन श्री प्रदीप दीक्षित द्वारा किया गया। मंचासीन अतिथियों को श्री मुकुल नारायण तिवारी एवं अभिनव नारायण तिवारी द्वारा स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में डाक विभाग के अधिकारियों के अलावा शहर के तमाम साहित्यकार, समाजसेवी, जन प्रतिनिधिगण एवं पत्रकार उपस्थित थे।


अभिनव नारायण तिवारी, 
प्रबन्धक- महाराजा प्रयाग नारायण मन्दिर,
 शिवाला, कानपुर-208001

Wednesday, January 14, 2009

डाक विभाग की मशहूर हस्तियाँ

दुनिया की तमाम नामी-गिरामी हस्तियों का किसी न किसी रूप में डाक विभाग से जुड़ाव रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति रहे अब्राहम लिंकन पोस्टमैन तो भारत में पदस्थ वायसराय लार्ड रीडिंग डाक वाहक रहे। विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक व नोबेल पुरस्कार विजेता सी0वी0 रमन भारतीय डाक विभाग में अधिकारी रहे वहीं प्रसिद्ध साहित्यकार व ‘नील दर्पण‘ पुस्तक के लेखक दीनबन्धु मित्र पोस्टमास्टर थे। 

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित लोकप्रिय तमिल उपन्यासकार पी0वी0अखिलंदम, राजनगर उपन्यास के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित अमियभूषण मजूमदार, फिल्म निर्माता व लेखक पद्मश्री राजेन्द्र सिंह बेदी, मशहूर फिल्म अभिनेता देवानन्द डाक कर्मचारी रहे हैं। उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द जी के पिता अजायबलाल डाक विभाग में ही क्लर्क रहे। 

ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता मशहूर लेखिका महाश्वेता देवी ने आरम्भ में डाक-तार विभाग में काम किया था तो प्रसिद्ध बाल साहित्यकार डा0 राष्ट्रबन्धु भी पोस्टमैन रहे। सुविख्यात उर्दू समीक्षक पद्मश्री शम्सुररहमान फारूकी, शायर कृष्ण बिहारी नूर, महाराष्ट्र के प्रसिद्ध किसान नेता शरद जोशी सहित तमाम विभूतियाँ डाक विभाग से जुड़ी रहीं। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री सुश्री मायावती भी डाक-तार विभाग के कर्मचारी की ही पुत्री हैं।

 समकालीन साहित्य के तमाम नाम- कवि तेजराम शर्मा, साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव, कहानीकार दीपक कुमार बुदकी, कथाकार ए. एन. नन्द, शायर अब्दाली, गीतकार राम प्रकाश 'शतदल', गज़लकार केशव शरण, बाल साहित्यकार डा0 राष्ट्रबंधु, लघु कथाकार बलराम अग्रवाल, कालीचरण प्रेमी, अनुराग 'लाक्षाकर', मंचीय कवि जवाहर लाल 'जलज', शारदानंद दुबे इत्यादि भारतीय डाक विभाग की समृद्ध परंपरा के ही अंग हैं. स्पष्ट है कि डाक विभाग सदैव से एक समृद्ध विभाग रहा है और तमाम मशहूर शख्सियतें इस विशाल विभाग की गोद में अपनी काया का विस्तार पाने में सफल रहीं।

Saturday, January 3, 2009

टाइटेनिक यात्रियों के पत्र होंगे नीलाम

टाइटैनिक जहाज को डूबे एक लम्बा अरसा बीत गया, पर अभी भी उसकी यादें लोगों के जेहन में हैं। सबसे नई खबर यह है कि दुर्घटनाग्रस्त जहाज टाइटेनिक के यात्रियों के दो पत्रों को 16 जनवरी को न्यूयार्क में नीलाम किया जाएगा। इसमें एक पत्र उस काले दिन की घटना के अंतिम क्षणों का हृदय विदारक विवरण देता है, जब टाइटेनिक डूब रहा था। यह पत्र एडोल्फ साल्फेल्ड ने जल्दबाजी में अपनी पत्नी को लिखा था, जब 1912 में टाइटेनिक पहली समुद्री यात्रा के लिए साउथेंपटन से रवाना हुआ था और उत्तरी अटलांटिक में किसी हिमखंड से टकराकर डूब गया था जिसमें 1,500 यात्री मारे गए थे। नीलाम होने वाला दूसरा पत्र जाॅर्ज ग्राहम ने लिखा था, जो डिपार्टमेंट स्टोर का सेल्समैन था। स्पिंक स्मिथ नीलामघर के विशेषज्ञ राॅबर्ट लितजेनबर्गर ने अनुसार, इस पत्र में आर0एम0एस0 टाइटेनिक की मुहर लगी है और यह दुर्घटना से जुड़ी बहुमूल्य व दुर्लभ वस्तुओं में से एक है। इन पत्रों की नीलामी में प्रत्येक की बिक्री से 10 हजार से 20 हजार डाॅलर की आय होने की संभावना है। इन वस्तुओं को न्यूयार्क में और स्पिंक स्मिथ की वेबसाइट पर आॅनलाइन बिक्री के लिए भी उपलब्ध कराया जाएगा। सो तैयार हो जाइये, आप भी इस नीलामी में भाग ले सकते हैं !!

Thursday, January 1, 2009