Wednesday, July 15, 2009

चिट्ठी का फ्यूचर

भाई लोगों का ऐसा कहना, मेरे अक्ल की स्क्रीन पर कतई डिस्प्ले नहीं होता कि मुए मोबाइल के आने से चिट्ठियां लिखने का चलन चैपट हो गया। डाकिए खाली हाथ चलने लगे और तो और एसएमएस ने संक्षिप्त संदेशों की ऐसी हैबिट डाल रखी है कि अब कोई दिल खोल के अपनी बातें नहीं लिखता। याद कीजिए पहले के जमाने में भी जब लेटर लिखे जाते थे, तब भी तो यह वाला जुमला आखिर में टांक ही दिया जाता था- थोड़े लिखे को ज्यादा समझना। यह सूत्र वाक्य ही एसएमएस का बीजमंत्र है। कुछ भी नया नहीं हुआ बस, लेटर लिखने की स्टाइल चेंज हो गई है।

हम सबको एसएमएस नामक डिवाइस का थैंकफुल होना चाहिए, इस एसएमएस विधि के आ जाने से स्टेशनरी और टाइम दोनों की बचत हो रही है। जो जितना ज्यादा पढ़ा-लिखा है, अंगूठे से उतना ही अधिक लिखने में पारंगत है। वह संपूर्ण मोबाइल टेक्नोलाजी अपने ठेंगे पर रखके चलता है।

हाल-फिलहाल, मैं इस बात से भी इत्तेफाक नहीं रखता कि संचार क्रांति के चलते पत्र-लेखन जैसा आदिकालीन कर्म विलुप्त होने की कगार पर है। गाँवों में आज भी चिट्ठी-पत्री का चलन आम है। जिसके यहाँ कंप्यूटर नहीं है, वह साइबर और इंटरनेट कैफे में सर्फिंग-चैटिंग करने जाता है। एक छोटे से दड़बे, जिसे केबिन कहा जाता है में बैठकर अगले की लाइफ के असंख्य घंटे किस रास्ते से निकल गए, यह स्वयं उस ध्यानस्थ जीवात्मा को भी पता नहीं चल पाता। डेस्कटाप, पामटाप और लैपटाप के इस काल में युवक-युवतियों की गोदें तो जैसे सदा-सवैदा भरी ही मिलती हैं। पता नहीं किससे-किससे और किसको-किसको मेल कर रहे हैं। भाई मेरे, पत्र प्रेषण ही तो है। जितना चाहो और जो चाहो, लिखो फिर पासवर्ड के लिफाफे में बंद करके रवाना कर दो। पाने वाला ही बांचेगा। लेटर राइटिंग के भविष्य को लेकर एक और तरह से भी निश्चिंत हुआ जा सकता है। इंटरनेट प्रयोगकर्ताओं में इधर एक नई आदत तरक्की पर है। वे जो पहले चिट्ठियों के जवाब देने तक से कतराते थे, वे इन दिनों दनादन चिट्ठे लिख रहे हैं। बड़ी ही संक्रामक बीमारी है यह ब्लागेंटाइटिस भी। इस रोग की एक खासियत यह भी है कि यह हते पंद्रह दिनों में ही क्रानिक हो लेता है। तब इसकी चपेट में आने वाले पोथा लिखने लग जाते हैं। मेरी बात का सहज ऐतबार न हो तो आप ऐसे तमाम अनामदासी पोथाकारों की साइट्स पर जाइए।

अब तो हालत यह है कि अखबारों तक ने अपने पाठकों के पन्नों वाली स्पेस को इन ब्लागर्स के नाम आवंटित कर दिया है। दिनोदिन ब्लागियों की फिगर में इजाफा हो रहा है। बिना डाक टिकट, लेटरबाक्स के ही चिट्ठे लिखे जा रहे हैं। जवाब आ रहे हैं। जिनके पास एक अदद कंप्यूटर और नेट की सुविधा उपलब्ध है, वे इस चिट्ठाकारिता में अपना योगदान करने को स्वतंत्र हैं। कर भी रहे हैं। अब अंकल एसएमएस के बिग ब्रदर बाबू ब्लागानंद प्रकट हो चुके हैं। उनकी कृपा से बबुआ लव लेटरलाल, चाचा चिट्ठाचंद और पापा पोथाप्रसाद समेत फैमिली के टोटल मेंबर्स की लाइफ सुरक्षित है। सो चिट्ठी बिटिया की भी।
सूर्य कुमार पांडेय,
साभार- आई नेक्स्ट, 13 जुलाई, 2009

Monday, July 13, 2009

अब डाकिया बाबू लायेंगे काशी विश्वनाथ व उज्जैन के महाकालेश्वर का प्रसाद

सावन के मौसम में भगवान शिव की पूजा होती है। बनारस को भगवान शिव की नगरी कहा जाता है और काशी विश्वनाथ मंदिर यहाँ का प्रमुख धार्मिक स्थल है। डाक विभाग और काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट के बीच वर्ष 2006 में हुए एक एग्रीमेण्ट के तहत काशी विश्वनाथ मंदिर का प्रसाद डाक द्वारा भी लोगों को उपलब्ध कराया जा रहा है। इसके तहत साठ रूपये का मनीआर्डर प्रवर डाक अधीक्षक, बनारस (पूर्वी) के नाम भेजना होता है और बदले में वहाँ से काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट के सौजन्य से मंदिर की भभूति, रूद्राक्ष, भगवान शिव की लेमिनेटेड फोटो और शिव चालीसा प्रेषक के पास प्रसाद रूप में भेज दिया जाता है।

काशी विश्वनाथ मंदिर के अलावा उज्जैन के प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर का प्रसाद भी डाक द्वारा मंगाया जा सकता है। इसके लिए प्रशासक, श्री महाकालेश्वर मंदिर प्रबन्धन कमेटी, उज्जैन को 151 रूपये का मनीआर्डर करना पड़ेगा और इसके बदले में वहाँ से स्पीड पोस्ट द्वारा प्रसाद भेज दिया जाता है। इस प्रसाद में 200 ग्राम ड्राई फ्रूट, 200 ग्राम लड्डू, भभूति और भगवान श्री महाकालेश्वर जी का चित्र शामिल है।

इस प्रसाद को प्रेषक के पास एक वाटर प्रूफ लिफाफे में स्पीड पोस्ट द्वारा भेजा जाता है, ताकि पारगमन में यह सुरक्षित और शुद्ध बना रहे। तो अब आप भी घर बैठे भोले जी का प्रसाद ग्रहण कीजिये और मन ही मन में उनका पुनीत स्मरण कर आशीर्वाद लीजिए !!

Thursday, July 9, 2009

डाक टिकटों पर कानपुर

कानपुर आरम्भ से ही राजनैतिक-सामाजिक-साहित्यिक-औद्योगिक गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र रहा है और यही कारण है कि कानपुर से जुड़े- गणेश शंकर विद्यार्थी (25 मार्च 1962, 15 पैसे), दीन दयाल उपाध्याय (5 मई 1978, 25 पैसे), तात्या टोपे (10 मई 1984, 50 पैसे)े, नाना साहब (10 मई 1984, 50 पैसे), चन्द्रशेखर आजाद (27 फरवरी 1988, 60 पैसे), बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ (8 दिसम्बर 1989, 60 पैसे), श्याम लाल गुप्त ‘पार्षद’ (4 मार्च 1997, 1 रूपये), नरेन्द्र मोहन (14 अक्टूबर 2003, 5 रूपया), पदमपत सिंहानिया (3 फरवरी 2005, 5 रूपया) जैसी विभूतियों पर अभी तक डाक टिकट जारी हो चुके हैं। 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की 150वीं जयन्ती पर कानपुर व लखनऊ में हुए घमासान युद्वों को दर्शाते हुए 9 अगस्त 2007 को 5 रूपये व 15 रूपये मूल्यवर्ग के डाक टिकट व मिनीएचर शीट जारी किये गये। इसके अलावा बिठूर से जुड़े होने के कारण रानी लक्ष्मीबाई (15 अगस्त 1957, 15 पैसे) व महर्षि बाल्मीकि (14अक्टूबर 1970, 20 पैसे) पर जारी डाक टिकटों को भी इसी क्रम में रखा जाता है। यही नहीं फूलबाग स्थित राजकीय संग्राहलय में भी डाक टिकटों के संकलन का एक अलग सेक्शन है। डाक टिकटों के मामले में एक रोचक तथ्य कानपुर से जुड़ा हुआ है। वर्ष 1957 में बाल दिवस पर पहली बार तीन स्मारक डाक टिकट जारी किये गये, जो पोषण (8 पैसे, केला खाता बालक), शिक्षा (15 पैसे, स्लेट पर लिखती लड़की) व मनोरंजन (90 पैसे, मिट्टी का बना बांकुरा घोड़ा) पर आधारित थे। दस हजार फोटोग्रास में से चयनित शेखर बार्कर व रीता मल्होत्रा को क्रमशः पोषण व शिक्षा पर जारी डाक टिकटों पर अंकित किया गया। स्लेट पर लिखती लड़की रीता मल्होत्रा कानपुर की थी। ठीक पचास वर्ष बाद वर्ष 2007 में बाल दिवस पर डाक टिकट जारी होने के दौरान शेखर बार्कर व रीता मल्होत्रा को भी आमंत्रित किया गया, पर रीता मल्होत्रा को शायद खोजा न जा सका। इस प्रकार कानपुर की विभूतियों पर जारी डाक टिकटों के क्रम में रीता मल्होत्रा का नाम भी शामिल किया जा सकता है।

डाक टिकट संग्रह को बढ़ावा देने हेतु कानपुर जी0पी0ओ0 में जुलाई 1973 में फिलेटलिक ब्यूरो की स्थापना की गयी जिसमें तमाम डाक टिकटों और उनसे जुड़ी सामग्रियों का अवलोकन किया जा सकता है। कानपुर में 30 अक्टूबर-1 नवम्बर 1982, 17-18 फरवरी 2001, 22-23 मार्च 2003, 24-25 नवम्बर 2004 और 22-23 दिसम्बर 2006 को डाक टिकटों के प्रति लोगों को आकर्षित करने हेतु और इससे जुड़े विभिन्न पहलुओं से रूबरू कराने हेतु डाक टिकट प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। इन प्रदर्शनियों में 30 अक्टूबर-1 नवम्बर 1982 को ‘फिलकाॅन-82‘ के दौरान क्रमशः प्रथम भारतीय पोस्टमास्टर जनरल राय बहादुर सालिगराम, रानी लक्ष्मीबाई व श्री राधाकृष्ण मन्दिर (जे0के0मन्दिर) पर, तत्पश्चात 24 नवम्बर 2004 को ’कानफिलेक्स-2004‘ के दौरान कानपुर जी0पी0ओ0 भवन पर और 22 व 23 दिसम्बर 2006 को ‘कानपेक्स-2006‘ के दौरान क्रमशः ’कानपुर की स्थापत्य कला’ (कानपुर जी0पी0ओ0, लालइमली, फूलबाग, कानपुर सेण्ट्रल रेलवे स्टेशन, चन्द्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के भवनों के चित्र अंकित) एवं ’बिठूर की धरोहरें’ (नानाराव पेशवा का किला, स्वर्ग नसेनी, ब्रहमावर्त घाट, लवकुश जन्मस्थली के चित्र अंकित) पर विशेष आवरण जारी किये गये। इसी प्रकार 17 जनवरी 2009 को महाराज प्रयाग नारायण मंदिर, शिवाला पर विशेष आवरण जारी किया गया। इन जारी आवरणों द्वारा कानपुर की समृद्ध ऐतिहासिक विरासतों को दर्शाने का प्रयास किया गया है।

Wednesday, July 8, 2009

क्रान्तिकारियों के निशाने पर रहे डाकघर

स्वतन्त्रता आन्दोलन में कानपुर की प्रमुख भूमिका रही है। 1857 के बाद से डाकघर बराबर क्रान्तिकारियों के निशाने पर रहे और आगजनी तथा लूटपाट का दौर कानपुर के डाकघरों ने भी देखा। इस दौर में तमाम क्रान्तिकारी नायकों ने भी बड़ी संख्या में हरकारों की भर्ती कर रखी थी, जो उनके लिए गुप्त खबरें भी लाते थे। कानपुर में नाना साहब के दरबार में एक हरकारे गिरधारी ने ही मेरठ विद्रोह की खबर सर्वप्रथम पहुँचाई थी, जिसे बाद में अंग्रेजों ने मौत के घाट उतार दिया। 1857 की क्रान्ति के दौरान जब क्रान्तिकारियों ने कानपुर में अंग्रेजों की संचार व्यवस्था ध्वस्त कर दी तो सेनापति कोलिन थेंप विल ने पत्र द्वारा गर्वनर जनरल लार्ड केनिंग को यहाँ के बारे में सूचित करते हुए सलाह दी कि जब तक अंग्रेजी सेनायें अवध को काबू में नहीं करेंगी, तब तक क्रान्ति की चिंगारी यँू ही फैलती रहेगी। कालान्तर में भी डाक सेवायें लोगों के निशाने पर रहीं, क्योंकि अंग्रेजों के पास संचार माध्यम का यह सबसे सशक्त साधन था। 1940 के दौरान राजस्थान के देवली नामक स्थान में बनाये गये कैम्प में समग्र भारत से लगभग 400 क्रान्तिकारियों को अंग्रेजी हुकूमत ने बन्द कर दिया था, जिसमें कानपुर के भी तमाम लोग थे। इसके विरोध में 8 नवम्बर 1940 को कानपुर में छात्रों ने देवली दिवस की घोषण कर जुलूस निकाले। डी0ए0वी0 से चले जुलूस को सिरकी मोहाल चैकी के पीछे वाली गली में पहुँचने पर पुलिस ने दोनों ओर से घेर कर लाठीचार्ज किया और कुछ लोगों को गिरतार भी कर लिया। इससे आक्रोशित होकर 16 वर्षीय छात्र सूरजबली नादिरा ने अपने साथी शिवशंकर सिंह और अन्य के साथ बड़ा चैराहा स्थिति डाकघर में धावा बोलकर 1,36,000 रूपये अपने कब्जे में कर लिये और पुलिस द्वारा घिर जाने पर नोट लुटाते भाग गये। यद्यपि बाद में पुलिस ने नादिरा को गिरतार कर लिया। इसी प्रकार भारत छोड़ो आन्दोलन के आवह्यन के अगले दिन 10 अगस्त 1942 को आन्दोलित भीड़ ने मेस्टन रोड डाकघर में हमला बोलकर 50,000 रूपये की नकदी लूट ली व सारा सामान आग के हवाले कर दिया। नयागंज डाकखाने का भी सारा सामान लूट लिया गया और जनरलगंज व नरौना एक्सचेन्ज डाकघरों में आग लगाने के साथ-साथ तमाम लेटरबाक्सों को भी नुकसान पहुँचाया गया।

Tuesday, July 7, 2009

भारत के 8 जी0पी0ओ0 में से एक कानपुर में

डाक विभाग की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार समस्त भारत में 8 जी0पी0ओ0 हैं, जो कि मुम्बई, कोलकाता, अहमदाबाद, बेंगलूर, चेन्नई, दिल्ली, लखनऊ और कानपुर में स्थित हैं। इनमें कानपुर जी0पी0ओ0 चीफ पोस्टमास्टर के अधीन कानपुर नगर के व्यस्ततम बड़ा चैराहा पर अवस्थित है। यह एकमात्र ऐसा जी0पी0ओ0 है जो कि अपनी स्थापना के समय राजधानी में अवस्थित नहीं था। एक डाकघर के रूप में इसने 1901 में कार्य करना आरम्भ किया। उस समय यह एक अंग्रेज अधिकारी के बंगले में अवस्थित था। कालान्तर में वर्तमान स्थान पर जी0पी0ओ0 भवन का शिलान्यास 9 सितम्बर 1962 को भारत सरकार के तत्कालीन परिवहन एवं संचार मंत्री श्री जगजीवन राम ने और उद्घाटन 11 अगस्त 1969 को संचार विभाग के तत्कालीन सचिव श्री लक्ष्मी चंद जैन (आई0सी0एस0) ने किया। पहले यह कानपुर डाक मण्डल के अधीन था। 4 जनवरी 1972 को प्रधान डाकघर के रूप में इसका अपग्रेडेशन हुआ और श्री एच0पी0त्रिवेदी (04 जनवरी 72-15 जुलाई 72) इसके प्रथम चीफ पोस्टमास्टर बने। 124 लेटर बाक्स और 187 डाकियों के माध्यम से डाक सेवा जी0पी0ओ0 के अधीनस्थ क्षेत्रों में कार्य कर रही है। 40 उपडाकघर, 02 अतिरिक्त विभागीय उपडाकघर और 23 शाखा डाकघर इसके लेखा क्षेत्र के अन्र्तगत आते हैं। कानपुर जी0 पी0 ओ0 परिसर का क्षेत्रफल 8750 वर्गमीटर है और 3915 वर्गमीटर में इसका भवन बना है। इस चार मंजिला भवन, जिसमें कि एक भूतल भी है, में चीफ पोस्टमास्टर कानपुर जी0पी0ओ0 के अलावा पोस्टमास्टर जनरल कानपुर रीजन, प्रवर डाक अधीक्षक कानपुर नगर मण्डल, प्रवर अधीक्षक रेल डाक सेवा ‘केपी’ मण्डल कानपुर, डाक अधीक्षक कानपुर (मुफस्सिल), अधीक्षक सर्किल स्टैम्प डिपो और प्रबन्धक मेल मोटर सर्विस के कार्यालय भी अवस्थित हैं। कानपुर नगर मण्डल द्वारा आयोजित डाक टिकट प्रदर्शनी ’कानफिलेक्स’ के दौरान 24 नवम्बर 2004 को कानपुर जी0पी0ओ0 भवन पर एक विशेष आवरण भी जारी किया गया । कानपुर जी0पी0ओ0 की विशिष्टता को देखते हुए ही उत्तर प्रदेश में सर्वप्रथम राष्ट्रीय स्पीड पोस्ट केन्द्र यहीं पर 15 नवम्बर 1986 को खोला गया। 14नवम्बर 2006 को कानपुर जी0पी0ओ0 में सभी वित्तीय सेवाएं एक छत के नीचे उपलब्ध कराने हेतु पोस्टल फाइनेंस मार्ट की स्थापना की गई। बचत सेवाओं से प्राप्त सकल जमा के मामले में उ0प्र0 में कानपुर का द्वितीय स्थान है। इस समय यह एक ‘‘प्रोजेक्ट एरो‘‘ डाकघर है.

Sunday, July 5, 2009

कानपुर में निदेशक डाक सेवाएं पद सर्वप्रथम स्थापित

डाक विभाग ने विकेन्द्रीकरण की नीति अपनाते हुये प्रायोगिक तौर पर देश के तीन प्रमुख क्षेत्रों में जुलाई 1973 के दौरान निदेशक डाक सेवाएं पद स्थापित किया। इनमें से एक कानपुर और दो अन्य कोयम्बटूर व नागपुर थे। भारतीय डाक सेवा के अधिकारी श्री एस0आर0 फारूखी को कानपुर क्षेत्र में प्रथम निदेशक बनाया गया। कालान्तर में इस व्यवस्था को समाप्त करते हुए अखिल भारतीय स्तर पर 2 अप्रैल 1979 को सभी क्षेत्रों में रीजनल स्तर की स्थापना की गयी और निदेशक डाक सेवायें पद को इस स्तर पर स्थापित किया गया। कानपुर रीजन में प्रथम निदेशक के रूप में भारतीय डाक सेवा के अधिकारी श्री आर0एस0 गुप्ता की नियुक्ति हुयी। कानपुर में 27 नवम्बर 1986 को अपग्रेडेशन द्वारा अतिरिक्त पोस्टमास्टर जनरल पद का सृजन किया गया और इस पद को 1 मार्च 1989 से पोस्टमास्टर जनरल के रूप में तब्दील कर दिया गया। अतिरिक्त पोस्टमास्टर जनरल के पद सृजन के समय श्री एल0सी0राम कानपुर रीजन के निदेशक (4 मई 1982 से 1 फरवरी 1986 तक) थे। श्री के0एल0 मल्होत्रा कानपुर रीजन के प्रथम अतिरिक्त पोस्टमास्टर जनरल (27 नवम्बर 1986 से 28 फरवरी 1989 तक) नियुक्त हुए व तत्पश्चात 1 मार्च 1989 से 14 मार्च 1990 तक वे कानपुर रीजन के प्रथम पोस्टमास्टर जनरल भी रहे।

डाक सेवाओं को सुचारु रूप से चलाने के लिए विभिन्न क्रियात्मक गतिविधियों हेतु समय-समय पर डाक विभाग द्वारा तमाम इकाईयाँ स्थापित की गई। डाक को विभिन्न डाकघरों से एकत्र करने और उन्हें आर0एम0एस0 व अन्य गन्तव्य स्थानों तक पहुँचाने हेतु दिसम्बर 1963 में कानपुर में मेल मोटर सेवा आरम्भ की गई। इसी प्रकार डाकघरों में डाक टिकट, डाक स्टेशनरी- पोस्टकार्ड, अन्तर्देशीय पत्र, लिफाफा इत्यादि, केन्द्र्रीय भर्ती शुल्क, इण्डियन पोस्टल आर्डर एवं बचत-पत्रों इत्यादि की आपूर्ति के लिये कानपुर में सर्किल स्टैम्प डिपो की 24 फरवरी 1981 को स्थापना की गई। भारतीय प्रतिभूति मुद्रणालय, नासिक से प्राप्त डाक टिकट, डाक स्टेशनरी, केन्द्र्रीय भर्ती शुल्क, राष्ट्रीय बचत पत्र व किसान विकास पत्र एवं सिक्यूरिटी प्रिन्टिंग प्रेस, हैदराबाद से प्राप्त इण्डियन पोस्टल आर्डर को सर्किल स्टैम्प डिपो, कानपुर उत्तर प्रदेश डाक परिमण्डल के 62 प्रधान डाकघरों को आपूर्ति करता है। लखनऊ रीजन के अलावा उत्तर प्रदेश डाक परिमण्डल के सभी रीजनों की आपूर्ति यहीं से होती है। कानपुर की विशिष्टता को देखते हुए ही उत्तर प्रदेश में सर्वप्रथम राष्ट्रीय स्पीड पोस्ट केन्द्र यहीं पर 15 नवम्बर 1986 को खोला गया। 14नवम्बर 2006 को कानपुर जी0पी0ओ0 में सभी वित्तीय सेवाएं एक छत के नीचे उपलब्ध कराने हेतु पोस्टल फाइनेंस मार्ट की स्थापना की गई। बचत सेवाओं से प्राप्त सकल जमा के मामले में उ0प्र0 में कानपुर का द्वितीय स्थान है।

डाक सेवाओं में महत्वपूर्ण कानपुर

व्यवस्थित तौर पर कानपुर में डाक सेवाओं का इतिहास काफी पुराना है। आरम्भ में कानपुर डाक मण्डल के अन्तर्गत कानपुर, फतेहपुर, उन्नाव, रायबरेली, इटावा, फतेहगढ़ और मैनपुरी जनपद शामिल थे। कालान्तर में फतेहगढ़, मैनपुरी और इटावा को कानपुर डाक मण्डल से पृथक कर 15 फरवरी 1935 को फतेहगढ़ डाक मण्डल की स्थापना की गई। बाद में प्रतापगढ़ डाक मण्डल की स्थापना उपरान्त रायबरेली को कानपुर डाक मण्डल से पृथक कर 1जनवरी 1955 को प्रतापगढ़ डाक मण्डल का भाग बना दिया गया। 4 जनवरी 1972 को कानपुर प्रधान डाकघर का अपग्रेडेशन हुआ और यह कानपुर मण्डल से स्वतन्त्र इकाई के रूप में संचालित होने लगा। पुनः 28 फरवरी 1973 को कानपुर देहात, उन्नाव और फतेहपुर को कानपुर डाक मण्डल से पृथक करते हुये एक अलग कानपुर (मुफस्सिल) डाक मण्डल बनाया गया। उस समय कानपुर देहात कानपुर जनपद का और उन्नाव लखनऊ जनपद के भाग थे, जो कि कालान्तर में पृथक जनपद के रूप में अवस्थित हुये। इसके बाद कानपुर डाक मण्डल में सिर्फ कानपुर नगर राजस्व जनपद का क्षेत्र बचा। बाद में 1 फरवरी 1981 को कानपुर (मुफस्सिल) से पृथक कर फतेहपुर डाक मण्डल की स्थापना की गई।

वर्तमान रूप में कानपुर नगर डाक मण्डल की स्थापना 28 फरवरी 1973 को हुई। कानपुर नगर मण्डल में कुल 174 डाकघर हैं, जिनमें 02 प्रधान डाकघर, 94 उप डाकघर, 02 अतिरिक्त विभागीय उपडाकघर और 76 शाखा डाकघर हैं। इसके अलावा 08 पंचायत संचार सेवा केन्द्र व एक फ्रेन्चाइजी आउटलेट भी चल रहे हैं। 31 वितरण डाकघर, 317 डाकियों और 640 लेटर बाक्सों के माध्यम से डाक सेवा नगर मण्डल में कार्य कर रही है। इसके अलावा तमाम ग्रामीण डाक सेवक भी वितरण कार्य में संलग्न हैं। कानपुर नगर मण्डल के कार्यक्षेत्र में अवस्थित नरोना एक्सचेंज डाकघर में लगे शिलापट के अनुसार इस डाकघर का शुभारम्भ 4 अप्रैल 1911 को मिस्टर सी0आर0क्लार्क (आई0सी0एस0), तत्कालीन पोस्टमास्टर जनरल उत्तर प्रदेश द्वारा किया गया था, जो कि कानपुर में अग्रणी डाक सेवाओं को दर्शाता है। कानपुर जी0पी0ओ0 के अलावा नगर के समस्त डाकघर प्रवर डाक अधीक्षक, कानपुर नगर मण्डल के प्रशासकीय नियन्त्रण के अधीन हैं। इस मण्डल के अधीनस्थ नवाबगंज और कैण्ट डाकघरों को अपग्रेडेशन द्वारा क्रमशः 1 अक्टूबर 1973 व 1 जनवरी 1979 को प्रधान डाकघरों में तब्दील कर दिया गया। वर्तमान में नवाबगंज प्रधान डाकघर के लेखा क्षेत्र में 38 और कैण्ट प्रधान डाकघर के लेखा क्षेत्र में 39 उपडाकघर कार्यरत हैं। कानपुर नगर मण्डल के अधीनस्थ शेष 19 उपडाकघर कानपुर जी0पी0ओ0 के लेखा क्षेत्र में आते हैं।

Friday, July 3, 2009

कानपुर में रेल डाक सेवा

रेलवे सेवा आरम्भ होने के बाद इलाहाबाद और कानपुर के बीच अखिल भारतीय स्तर पर प्रथम बार रेलवे सार्टिंग सेक्शन की स्थापना 1 मई 1864 को की गई, जो कि कालान्तर में रेलवे डाक सेवा में तब्दील हो गया। आरम्भ में कानपुर की रेलवे डाक सेवा इलाहाबाद से संचालित होती थी, पर 30 अगस्त 1972 को पोस्टमास्टर जनरल, उत्तर प्रदेश के एक आदेश द्वारा ‘ए’ मण्डल इलाहाबाद को विभक्त कर ‘के0पी0’ मण्डल कानपुर का गठन किया गया। वर्तमान में इस मण्डल द्वारा कुल 12 जनपदों, यथा- कानपुर नगर, कानपुर देहात, उन्नाव, फतेहपुर, फर्रूखाबाद, इटावा, मैनपुरी, औरैया, फिरोजाबाद, महामाया नगर, बुलन्दशहर, अलीगढ़ की डाक का आदान-प्रदान व पारेषण किया जाता है। वर्तमान में रेलवे डाक सेवा की अवधारणा को और व्यापक बनाते हुए इन्हे ‘मेल बिजनेस सेन्टर‘ में तब्दील किया जा रहा है, जहाँ इसका कार्य डाक-प्रोसेसिंग तक सीमित न होकर डाक के एकत्रीकरण, वितरण और विपणन तक विस्तृत हो जायेगा। ‘के0पी0’ मण्डल कानपुर को यह सौभाग्य प्राप्त है कि उत्तर प्रदेश के प्रथम ‘मेल बिजनेस सेन्टर’ का शुभारम्भ इसके अधीनस्थ अलीगढ़ आर0एम0एस0 में 27 दिसम्बर 2006 को हुआ।
(चित्र में- उत्तर प्रदेश के प्रथम ‘मेल बिजनेस सेन्टर’ के शुभारम्भ के दौरान डाक सेवा बोर्ड सदस्य आई. एम. जी. खान और तत्कालीन एस.एस.आर.एम. के.के.यादव )

डाक व्यवस्था में प्रथम कम्पनी स्थापित किया लाला ठंठीमल ने

सामरिक व औद्योगिक रूप से महत्वपूर्ण होने के कारण ब्रिटिश शासन काल से ही अंग्रेजों ने कानपुर में संचार साधनों की प्रमुखता पर जोर दिया। इनमें डाक सेवायें सर्वप्रमुख थीं। कानपुर में सर्वप्रथम डाकघर की स्थापना कैण्ट स्थित नहरिया पर 1840 में हुई। 6 मई 1840 को ब्रिटेन में विश्व के प्रथम डाक टिकट जारी होने के अगले वर्ष 1841 मंे इलाहाबाद और कानपुर के मध्य घोड़ा गाड़ी द्वारा डाक सेवा आरम्भ की गई। इलाहाबाद के एक धनी व्यापारी लाला ठंठीमल, जिनका व्यवसाय कानपुर तक विस्तृत था को इस घोड़ा गाड़ी डाक सेवा को आरम्भ करने का श्रेय दिया जाता है, जिन पर अंग्रेजों ने भी अपना भरोसा दिखाया। जी0टी रोड बनने के बाद उसके रास्ते भी पालकी और घोड़ा गाड़ी से डाक आती थी, जिसमें एक घोड़ा 7 किलोमीटर का सफर तय करता था। आधा तोला वजन का एक पैसा किराया तुरन्त भुगतान करना होता था। इलाहाबाद से बिठूर तक डाक का आवागमन गंगा नदी के रास्ते से होता था। सन् 1850 में लाला ठंठीमल ने कुछ अंग्रेजों के साथ मिलकर ‘इनलैण्ड ट्रांजिट कम्पनी’ की स्थापना की और कलकत्ता से कानपुर के मध्य घोड़ा गाड़ी डाक व्यवस्थित रूप से आरम्भ किया। अगले वर्षों में इसका विस्तार मेरठ, दिल्ली, आगरा, लखनऊ, बनारस इत्यादि प्रमुख शहरों में भी किया गया। कानपुर की अवस्थिति इन शहरों के मध्य में होने के कारण डाक सेवाओं के विस्तार के लिहाज से इसका महत्वपूर्ण स्थान था। इस प्रकार लाला ठंठीमल को भारत में डाक व्यवस्था में प्रथम कम्पनी स्थापित करने का श्रेय दिया जाता है। 1854 में डाक सेवाओं के एकीकृत विभाग में तब्दील होने पर इनलैण्ड ट्रांजिट कम्पनी’ का विलय भी इसमें कर दिया गया।

Wednesday, July 1, 2009

डाकिया: बदलते हुए रूप

पिछले दिनों आफिस में बैठकर कुछ जरूरी फाइलें निपटा रहा था, तभी एक बुजुर्गवार व्यक्ति ने अन्दर आने की इजाजत मांगी। वे अपने क्षेत्र के डाकिये की शिकायत करने आये थे कि न तो उसे बड़े छोटे की समझ है एवं न ही वह समय से डाक पहुंचाता है। बात करते-करते वे अतीत के दिनों में पहुंच गये और बोले-साहब! हमारे जमाने के डाकिये बहुत समझदार हुआ करते थे। हमारा उनसे अपनापन का नाता था। इससे पहले कि हम अपना पत्र खोलें वे लिखावट देखकर बता दिया करते थे-अच्छा! राकेश बाबू (हमारे सुपुत्र) का पत्र आया है, सब ठीक तो है न। वे सज्जन बताने लगे कि जब हमारे पुत्र का नौकरी हेतु चयन हुआ तो डाकिया बाबू नियुक्ति पत्र लेकर आये और मुझे आवाज लगाई। मेरी अनुपस्थिति में मेरी श्रीमती जी बाहर्र आइं व पत्र को खोलकर देखा तो झूम उठीं। डाकिया बाबू ने पूछा- अरे भाभी, क्या बात है, कुछ हमें भी तो बताओ। श्रीमती जी ने जवाब दिया कि आपका भतीजा साहब बन गया है।

शाम को मैं लौटकर घर आया तो पत्नी ने मुझे भी खुशखबरी सुनाई और पल्लू से पैसे निकालते हुए कहा कि जाइये अभी डाकिया बाबू को एक किलो मोतीचूर लड्डू पहुंँचा आइये। मैंने तुरंत साइकिल उठायी और लड्डू खरीद कर डाकिया बाबू के घर पहुंँचा। उस समय वे रात्रि के खाने की तैयारी कर रहे थे। मुझे देखते ही उन्होंने गले लगकर बेटे के चयन की बधाई दी और जवाब में मैंने लड्डू का पैकेट उनके हाथों में रख दिया। डाकिया बाबू बोले- ‘‘अरे ये क्या कर रहे हैं आप? चिट्ठियाँं बांँटना तो मेरा काम है। किसी को सुख बांटता हूँ तो किसी को दुःख।‘‘ मैंने कहा नहीं साहब, आप तो हमारे घर हमारा सौभाग्य लेकर आये थे, अतः आपको ये मिठाई स्वीकारनी ही पड़ेगी।

ये बताते-बताते उन बुजुर्ग की आंखों से आँसू झलक पड़े। और बोले, साहब! जब मेरे बेटे की शादी हुई तो डाकिया बाबू रोज सुबह मेरे घर पर आते और पूछ जाते कि कोई सामान तो बाजार से नहीं मंगवाना है। इसके बाद वे अपने वर्तमान डाकिया के बारे में बताने लगे, साहब! उसे तो बात करने की भी तमीज नही। डाक सीढ़ियों पर ही फेंककर चला जाता है। पिछले दिनों मेरे नाम एक रजिस्ट्री पत्र आया। घर में मात्र मेरी बहू थी। उसने कहा बाबू जी तो घर पर नहीं हैं, लाइये मुझे ही दे दीजिए। जवाब में उसने तुनक कर कहा जब वह आ जाएं तो बोलना कि डाकखाने से आकर पत्र ले जाएं।

मैं उस बुजुर्ग व्यक्ति की बात ध्यान से सुन रहा था और मेरे दिमाग में भी डाकिया के कई रूप कौंध रहे थे। कभी मुझे एक प्रतिष्ठित साहित्यकार की कहानी का वह अंश याद आता, जिसमें डाकिये ने एक व्यक्ति को उसके रिश्तेदार की मौत की सूचना वाला पत्र इसलिए मात्र नहीं दिया, क्योंकि इस दुःखद समाचार से उस व्यक्ति की बेटी की शादी टल सकती थी, जो कि बड़ी मुश्किलों के बाद तय हुई थी। तो कभी विदेश से लौटकर आये एक व्यक्ति की बात कानों में गूँजती कि- कम से कम भारत में अपने यहाँ डाकिया हरेक दरवाजे पर जाता तो है। तो कभी अपने गांँव का वह डाकिया आता, जिसकी शक्ल सिर्फ वही लोग पहचानते थे जो कभी बाजार गये हों। क्योंकि वह डाकिया पत्र-वितरण हेतु कभी गाँव में आता ही नहीं था। हर बाजार के दिन वह खाट लगाकर एक निश्चित दुकान के सामने बैठ जाता और सभी पत्रों को खाट पर सजा देता। गाँव वाले हाथ बांधे खड़े इन्तजार करते कि कब उनका नाम पुकारा जायेगा। जो लोग बाजार नहीं आते, उनके पत्र पड़ोसियों को सौंप दिये जाते। तो कभी एक महिला डाकिया का चेहरा सामने आता जिसने कई दिन की डाक इकट्ठा हो जाने पर उसे रद्दी वाले को बेच दी। या फिर इलाहाबाद में पुलिस महानिरीक्षक रहे एक आई.पी.एस. अधिकारी की पत्नी को जब डाकिये ने उनके बेटे की नियुक्ति का पत्र दिखाया तो वह इतनी भावविह्नल हो गईं कि उन्होंने नियुक्ति पत्र लेने हेतु अपना आंचल ही फैला दिया, मानो मुट्ठी में वो खुशखबरी नहीं संभल सकती थी।

मैं इस तथ्य का प्रतिपादन नहीं करना चाहता कि हर डाकिया बुरा ही होता है या अच्छा ही होता है। पर यह सच है कि ‘‘डाकिया‘‘ भारतीय सामाजिक जीवन की एक आधारभूत कड़ी है। डाकिया द्वारा डाक लाना, पत्रों का बेसब्री से इंतजार, डाकिया से ही पत्र पढ़वाकर उसका जवाब लिखवाना इत्यादि तमाम महत्वपूर्ण पहलू हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आप डाकिये के रहन-सहन, वेश-भूषा एवं वेतन पर मत जाइये, क्योंकि उसके परिचित सभी तबके के लोग हैं। कभी-कभी जो काम बड़े अधिकारी भी नहीं करा पाते वह डाकिया चंद मिनटों में करा देता है। कारण डाक विभाग का वह सबसे मुखर चेहरा है। जहाँ कई अन्य देशों ने होम-टू-होम डिलीवरी को खत्म करने की तरफ कदम बढ़ाये हैं, या इसे सुविधा-शुल्क से जोड़ दिया है, वहीं भारतीय डाकिया आज भी देश के हर होने में स्थित गाँव में निःशुल्क अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है।

जैसे-जैसे व्यक्तिगत एवं सामाजिक रिश्तों में आत्मीयता व भावनात्मकता कम होती गयी, वैसे-वैसे ही डाकिया का दृष्टिकोण भी भावनात्मक की बजाय व्यवसायिक होता गया। कल तक लोग थके-हारे धूप, सर्दी व बरसात में चले आ रहे डाकिये को कम से कम एक गिलास पानी तो पूछते थे, पर आज की पीढ़ी डाकिये को एक हरकारा मात्र समझकर पत्र लेने के तत्काल बाद दरवाजा धड़ाम से बन्द कर कर लेती है, फिर भावनात्मकता व आत्मीयता कहाँ? कहां गया वह अपनापन जब डाकिया चीजों को ढोने वाला हरकारा मात्र न मानकर एक ही थैले में सुख और दुःख दोनों को बांटने वाला दूत समझा जाता था?

वे बुजुर्ग व्यक्ति मेरे पास लम्बे समय तक बैठकर अपनी व्यथा सुनाते रहे और मैंने उनकी शिकायत के निवारण का भरोसा भी दिलाया, पर तब तक मेरा मनोमस्तिष्क ऊपर व्यक्त की गई भावनाओं में विचरण कर चुका था।

Friday, June 26, 2009

उ0 प्र0 परिमंडल डाक कैरम प्रतियोगिता संपन्न

उ0 प्र0 परिमंडल डाक कैरम प्रतियोगिता का आयोजन कानपुर जी0पी0ओ0 भवन में 24-25 जून 2009 को संपन्न हुआ। इस प्रतियोगिता में उ0 प्र0 के विभिन्न जनपदों के कुल 26 खिलाड़ियों ने भाग लिया। प्रतियोगिता का उद्घाटन कानपुर रीजन के पोस्टमास्टर जनरल श्री सीताराम मीना एवं समापन श्री कृष्ण कुमार यादव, चीफ पोस्टमास्टर कानपुर ने किया। इस अवसर पर विजेताओं को मुख्य अतिथि के रूप में चीफ पोस्टमास्टर श्री कृष्ण कुमार यादव ने पुरस्कृत किया। इसमें प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय पुरस्कार हेतु श्री मोहम्मद ओवेश (नोयडा मुख्य डाकघर), श्री के0एस0 नेगी, श्री वी0जे0 केवट (निदेशक डाक लेखा, लखनऊ) व सांत्वना पुरस्कार श्री शेखर कुमार (निदेशक डाक लेखा, लखनऊ) एवं श्री इमरान खान (नोयडा मुख्य डाकघर) को प्रदान किया गया। 
उ0प्र0 डाक कैरम प्रतियोगिता के विजेता अक्टूबर में भोपाल में आयोजित होने वाली अखिल भारतीय डाक कैरम प्रतियोगिता में भाग लेंगे। गौरतलब है कि पिछले वर्ष अखिल भारतीय डाक कैरम प्रतियोगिता मैसूर में आयोजित हुई थी, जिसमें उत्तर प्रदेश के मो0 ओवेस एवं इमरान खान को डबल्स में गोल्ड मेडल मिला था। इन दोनों खिलाड़ियों ने भी इस प्रतियोगिता में भाग लिया। श्री कृष्ण कुमार यादव ने अपने संबोधन में खिलाड़ियों की हौसला आफजाई करते हुए कहा कि इस तरह के खेलकूद एवं वेलफेयर संबंधी गतिविधियों को डाक विभाग सदैव से प्रोत्साहन देता रहा है जिससे कर्मचारियों के मनोबल में वृद्धि होती है।

Monday, June 22, 2009

गाँधी और नेहरू की ऐतिहासिक चिट्ठियाँ

चिट्ठियाँ-पत्रों का अपना इतिहास है। हर पत्र अपने अन्दर एक कहानी छुपाये हुए है। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान और उसके बाद प्रतिष्ठित राजनेताओं द्वारा लिखे गये पत्र सिर्फ शब्द मात्र नहीं बल्कि इतिहास की धरोहर है। वक्त बीतने के साथ यह धरोहर बहुमूल्य होती गईं और यही कारण है कि आज इनकी नीलामी करोड़ों रूपये में होती है।

लंदन की मशहूर नीलामी संस्था क्रिस्टी 14 जुलाई, 2009 को राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी एवं प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की चिट्ठियाँ, पोस्टकार्ड और कुछ कागजात नीलाम करने जा रही है। इनमें उर्दू में लिखे वो तीन पत्र भी शामिल हैं जिन्हें गाँधी जी ने इस्लाम के विद्वान और तब की मशहूर हस्ती मौलाना अब्दुल बारी को लिखे थे। इन पत्रों में हिंदू-मुस्लिम संबंध, लखनऊ में सांप्रदायिक तनाव और गाँधी व बारी के बीच दोस्ती की चर्चा है। इस नीलामी में महात्मा गाँधी के उर्दू में हस्ताक्षर वाले दो पोस्टकार्ड भी शामिल हंै। ये पोस्टकार्ड उर्दू के कवि हामिदउल्ला अफसर को भेजे गए थे। इसी क्रम में नेहरू जी के हस्ताक्षर वाले 29 पत्रों की एक श्रृंखला भी नीलाम की जाएगी। नेहरू जी के इन पत्रों में कश्मीर मुद्दा, साराभाई के राजनीतिक अभियानों, देश के विभाजन के बाद अपने घर से विस्थापित हुए मुसलमानों का पुनर्वास और दिल्ली में घरविहीन बच्चों के लिए शुरू की गई मानवीय परियोजना की चर्चा है। 3 अगस्त, 1953 को लिखे एक पत्र में नेहरू जी ने बताया है कि वह हर कीमत पर अपने निर्णय के अनुसार काम करेंगे। उन्होंने लिखा है- जो हो रहा है उसका कश्मीर में ही नहीं, पूरे भारत और पाकिस्तान में क्या परिणाम होने वाला है, इसके बारे में मैं शायद आपसे ज्यादा बेहतर ढंग से जानता हूँ। यह पत्र कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला को हटाए जाने से पहले लिखा गया है। निश्चिततः तत्कालीन इतिहास और परिवेश को सहेजे हुए ये पत्र न सिर्फ अमूल्य विरासत हैं बल्कि हमारी धरोहर भी हैं।

Tuesday, June 16, 2009

डाक टिकट संग्रहः एक लाभप्रद शौक

डाक टिकट संग्रह केवल एक शौक ही नहीं बल्कि एक ज्ञानवर्द्धक व लाभप्रद मनोरंजन भी है। सामान्यतः डाक टिकट एक छोटा सा कागज का टुकड़ा दिखता है, पर इसका महत्व और कीमत दोनों ही इससे काफी ज्यादा है। डाक टिकट किसी भी राष्ट्र की सभ्यता, संस्कृति एवं विरासत के प्रतिबिम्ब हैं जिसके माध्यम से वहाँ के इतिहास, कला, विज्ञान, व्यक्तित्व, वनस्पति, जीव-जन्तु, राजनयिक सम्बन्ध एवं जनजीवन से जुडे़ विभिन्न पहलुओं की जानकारी मिलती है। मन को मोह लेने वाली जीवन शक्ति से भरपूर डाक टिकटों का संकलन लोगों के सांस्कृतिक लगाव, विविधता एवं सुरूचिपूर्ण चयन का भी परिचायक है। रंग-बिरंगे डाक टिकटों का संग्रह करने वाले लोग जहाँ इस शौक के माध्यम से परस्पर मित्रता में बँधकर सम्बन्धों को नया आयाम देते हैं वहीं इसके व्यवहारिक पहलुओं का भी बखूबी इस्तेमाल करते हैं। मसलन रंग-बिरंगे टिकटों से जहाँ खूबसूरत ग्रीटिंग कार्ड बनाये जा सकते हैं वहीं इनकी खूबसूरती को फ्रेम में भी कैद किया जा सकता है। बचपन से ही बच्चों को फिलेटली के प्रति उत्साहित कर उनको अपनी संस्कृति, विरासत एवम् जनजीवन से जुड़े अन्य पहलुओं के बारे में मनोरंजक रूप से बताया जा सकता है।

डाक-टिकटों के संकलन का सबसे आसान तरीका ‘फिलेटलिक जमा खाता योजना’ है। जिसके तहत न्यूनतम रूपये 200/- जमा करके खाता खोला जा सकता है और भारतीय डाक विभाग देय मूल्य के बराबर रंगीन डाक टिकट, प्रथम दिवस आवरण और विवरणिका खाताधारक के पते पर हर माह बिना किसी अतिरिक्त मूल्य के पहुँचाता है। अपने किसी खास रिश्तेदार या मित्र को सरप्राइज गिट देने के लिए भी फिलेटलिक जमा खाता एक अनूठी चीज है और घर बैठे-बैठे खूबसूरत डाक-टिकट पाने वाला वह रिश्तेदार/दोस्त भी अचरज में पड़ जायेगा कि उस पर इतनी खूबसूरत मेहरबानी करने वाला शख्स कौन हो सकता है? इसके अलावा डाक विभाग वर्ष भर में जारी सभी टिकटों अथवा किसी थीम विशेष के डाक-टिकटों को समेटकर एक विशेष ‘स्टैम्प कलेक्टर्स पैक’ जारी करता है जो आज की विविधतापूर्ण दुनिया में एक अनूठा उपहार भी हो सकता है। और तो और, डाक-विभाग द्वारा सन् 1999 से प्रति वर्ष आयोजित ‘डाक टिकट डिजाइन प्रतियोगिता’ के विजेता की डिजाइन को अगले बाल-दिवस पर डाक-टिकट के रूप में जारी किया जाता है। इसी प्रकार 1998 से भारतीय डाक द्वारा आयोजित ‘डाक टिकट लोकप्रियता मतदान’ में प्रति वर्ष भाग लेकर सर्वोत्तम डाक-टिकटों का चुनाव किया जा सकता है।

फिलेटली को यूँ ही शौकों का राजा नहीं कहा जाता, वस्तुतः यह चीज ही ऐसी है। एक तरफ फिलेटली के माध्यम से अपनी सभ्यता और संस्कृति के गुजरे वक्त को आईने में देखा जा सकता है, वहीं इस नन्हें राजदूत का हाथ पकड़ कर नित नई-नई बातें भी सीखने को मिलती हैं। निश्चिततः आज के व्यस्ततम जीवन एवम् प्रतिस्पर्धात्मक युग में फिलेटली से बढ़कर कोई भी रोचक और ज्ञानवर्द्धक शौक नहीं हो सकता। व्यक्तित्व परिमार्जन के साथ-साथ यह ज्ञान के भण्डार में भी वृद्धि करता है। संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति फ्रेंकलिन डी0 रूजवेल्ट ने डाक-टिकट संग्रह के सम्बन्ध में कहा था- “The best thing about stamp collecting is that the enthusiasm which it arouses in youth increases as the years pass. It dispels boredom, enlarges our vision, broadens our knowledge and in innumerable ways enriches our life. I recommend stamp collecting because I really believe that it makes one a better citizen.”

Sunday, June 14, 2009

डाक टिकट संग्रह हेतु जरूरी बातें

आज विश्व के तमाम देशों द्वारा विभिन्न विषय वस्तुओं पर डाक टिकट जारी किये जा रहे हैं। सभी डाक टिकटों का संकलन न तो सम्भव है व न ही व्यावहारिक ही। डाक टिकट संग्रह हेतु जरूरी है कि किसी खास विषयवस्तु में या खास देश या क्षेत्र के डाक टिकट संग्रह करने में अपनी रूचि के अनुसार संग्रह किया जाय। डाक टिकट संग्रह का सबसे आसान तरीका प्राप्त पत्रों पर लगे डाक टिकट हैं, जिनकी अपने मित्रों से अदला-बदली भी की जा सकती है। आवरण पर से डाक टिकट को उखाड़ने या छीलने की कोशिश न करें, वरन् लिफाफे से टिकट वाला हिस्सा थोड़ा हाशिया देकर काट लें। डाक टिकटों को सहेज कर रखने हेतु बाजार में एलबम भी मिलते हैं। डाक टिकटों को एलबम में लगाने हेतु कब्जा व चिमटी का प्रयोग करना चाहिए। डाक टिकट के आरोपण में गोंद का प्रयोग न करें क्योंकि गोंद हमेशा के लिये आपके डाक टिकटों को क्षतिग्रस्त कर देगा। कब्जे (कार्नस) छोटे पतले कागज के बने होते हैं जिनके एक ओर गोंद लगा होता है। डाक टिकट को पकड़ने के लिए चिमटी का इस्तेमाल करें, अंगुलियों से डाक टिकट मैला हो जाने की संभावना रहती है।

डाक-टिकटों का आरोपण करने से पहले अपने संग्रह को छाँट लें। क्षतिग्रस्त टिकटों को निकाल फेंकने में संकोच नहीं करें। अच्छे डाक-टिकटों को ठण्डे पानी के बर्तन में रखें और कुछ मिनटों के बाद कागज से धीरे-धीरे अलग कर लें। भिगोते समय कुछ डाक-टिकटों पर स्याही फैल सकती है, ऐसे डाक-टिकटों को अलग से भिगोना चाहिये। छुड़ाए गये डाक-टिकटों को चिमटी से उठा लें और उन्हें साफ कागज पर मुँह के बल सूखने के लिये रख दें। जैसे-जैसे वे सूखेंगे, कभी-कभी उनमें संकुचन आता जायेगा। सूखने के बाद उन्हें एक पुस्तक में कुछ घण्टों के लिये रख दें। अपने डाक-टिकटों को छाँट लंे और जैसे आप आरोपण करना चाहते हैं वैसे ही पृष्ठों पर लगा दें। कब्जा का करीब एक तिहाई हिस्सा मोड़ लें और उसकी नोक को भिगों लें व इसे डाक-टिकट की पीठ पर जोड़ दें। डाक-टिकट पर कब्जा जड़ने के बाद कब्जे के दूसरे ओर को हल्का से भिगो दें और डाक-टिकट को पृष्ठ के उचित ‘एलबम’ के पृष्ठ ग्राफ-पेपर, जो समान छोटे-छोटे वर्गों में विभक्त होते हैं पर आप डाक-टिकटों को आसानी से अंतर पर रख सकते हैं। प्रत्येक टिकट पर एक छोटा सा विवरण भी लिखना अच्छा होगा। डाक-टिकटों के संग्रह के लिये विवरण तैयार करना इस शौक का बड़ा ही आनन्ददायी पहलू है। विवरण में डाक टिकट के जारी होने की तारीख, अवसर और कलाकार का नाम इत्यादि लिखा जा सकता है। खाका तैयार करने में यह ध्यान रखें कि पृष्ठ डाक-टिकट से या विवरण से ज्यादा भर न जाएँ । दोनों का संतुलन रहना चाहिये।

Friday, June 12, 2009

Philately:King of hobbies & hobby of Kings


(कानपुर से प्रकाशित लाइफ स्टाइल मैगजीन में फिलेटली पर के.के. यादव का लेख साभार प्रस्तुत)

Thursday, June 11, 2009

नियत डाक टिकटों से अलग हैं स्मारक/विशेष डाक टिकट

सामान्यतः लोग डाक विभाग द्वारा जारी नियत डाक टिकटों के बारे में ही जानते हंै। ये डाक टिकट विशेष रूप से दिन-प्रतिदिन की डाक-आवश्यकताओं के लिए जारी किए जाते हैं और असीमित अवधि के लिए विक्रय हेतु रखे जाते है। पर इसके अलावा डाक विभाग किसी घटना, संस्थान, विषय-वस्तु, वनस्पति व जीव-जन्तु तथा विभूतियों के स्मरण में भी डाक टिकट भी जारी करता है, जिन्हें स्मारक/विशेष डाक टिकट कहा जाता है। सामान्यतया ये सीमित संख्या मे मुद्रित किये जाते हैं और फिलेटलिक ब्यूरो/काउन्टर/प्राधिकृत डाकघरों से सीमित अवधि के लिये ही बेचे जाते हैं। नियत डाक टिकटों के विपरीत ये केवल एक बार मुद्रित किये जाते हैं ताकि पूरे विश्व में चल रही प्रथा के अनुसार संग्रहणीय वस्तु के तौर पर इनका मूल्य सुनिश्चित हो सके। परन्तु ये वर्तमान डाक टिकटों का अतिक्रमण नहीं करते और सामान्यतया इन्हें डाक टिकट संग्राहको द्वारा अपने अपने संग्रह के लिए खरीदा जाता है। इन स्मारक/ विशेष डाक टिकटों के साथ एक ‘सूचना विवरणिका’’ एवं ‘‘प्रथम दिवस आवरण’’ के रूप में एक चित्रात्मक लिफाफा भी जारी किया जाता है। डाक टिकट संग्राहक प्रथम दिवस आवरण पर लगे डाक टिकट को उसी दिन एक विशेष मुहर से विरूपित करवाते हैं। इस मुुहर पर टिकट के जारी होने की तारीख और स्थान अंकित होता है। जहाँ नियत डाक टिकटों का मुद्रण बार-बार होता है, वहीं स्मारक/विशेष डाक टिकट सिर्फ एक बार मुद्रित होते हैं। यही कारण है कि वक्त बीतने के साथ अपनी दुर्लभता के चलते वे काफी मूल्यवान हो जाते हैं।

दुनिया का सबसे मँहगा डाक-टिकट मिला रद्दी में

विश्व का सबसे मँहगा और दुर्लभतम डाक-टिकट ब्रिटिश गुयाना द्वारा सन् 1856 में जारी किया गया एक सेण्ट का डाक-टिकट है। गुलाबी कागज पर काले रंग में छपे, विश्व में एकमात्र उपलब्ध इस डाक-टिकट को ब्रिटिश गुयाना के डेमेरैरा नामक नगर में सन् 1873 में एक अंग्रेज बालक एल.वाघान ने रद्दी में पाया और छः शिलिंग मे नील मिककिनान नामक संग्रहकर्ता को बेच दिया । अन्ततः कई हाथों से गुजरते हुए इस डाक-टिकट को न्यूयार्क की राबर्ट सैगल आक्शन गैलेरीज इन्क द्वारा सन् 1981 मे 9,35,000 अमेरिकी डालर(लगभग चार करोड़ रूपये) में नीलाम कर दिया गया। खरीददार का नाम अभी भी गुप्त रखा गया है, क्योंकि विश्व के इस दुर्लभतम डाक टिकट हेतु उसकी हत्या भी की जा सकती है।

Wednesday, June 10, 2009

भारत के पहले डाक टिकट सिंदे डाक की कीमत लाखों में

डाक टिकटों की कीमत सिर्फ लिफाफों पर लगने तक ही नहीं है वरन् वक्त के साथ अपनी दुर्लभता के चलते वे काफी मूल्यवान हो जाते हैं। भारत में प्रथमतः डाक टिकट 1 जुलाई 1852 को सिन्ध के मुख्य आयुक्त सर बर्टलेफ्र्रोरे द्वारा जारी किए गए। आधे आने के इस टिकट को सिर्फ सिंध राज्य हेतु जारी करने के कारण ‘सिंदे डाक’ कहा गया एवं मात्र बम्बई-कराची मार्ग हेतु इसका प्रयोग होता था। सिंदे डाक को एशिया में जारी प्रथम डाक टिकट एवं विश्व स्तर पर जारी प्रथम सर्कुलर डाक टिकट का स्थान प्राप्त है। 1852 में जारी इस प्रथम डाक टिकट (आधे आने का सिंदे डाक) की कीमत आज करीब ढाई लाख रूपये आंकी जाती है। कालान्तर में 1 अक्टूबर 1854 को पूरे भारत हेतु महारानी विक्टोरिया के चित्र वाले डाक टिकट जारी किये गये।

Tuesday, June 9, 2009

छपाई में त्रुटि पर हुए डाक टिकट हुए लाखों-करोड़ों के

कभी-कभी कुछ डाक टिकट डिजाइन में गड़बड़ी पाये जाने पर बाजार से वापस ले किये जाते हैं ,ऐसे में उन दुर्लभ डाक टिकटों को फिलेटलिस्ट मुँहमाँगी रकम पर खरीदने को तैयार होते हैं। भारत द्वारा 1854 में प्रथम डाक टिकट के सेट में जारी चार आने वाले लिथोग्राफ में एक शीट पर महारानी विक्टोरिया का सिर टिकटों में उल्टा छप गया, इस त्रुटि के चलते इसकी कीमत आज पाँच लाख रूपये से भी अधिक है। इस प्रकार के कुल चैदह-पन्द्रह त्रुटिपूर्ण डाक टिकट ही अब उपलब्ध हैं। इसी प्रकार स्वतन्त्रता के बाद सन् 1948 में महात्मा गाँधी पर डेढ़ आना, साढे़ तीन आना, बारह आना और दस रू0 के मूल्यों में जारी डाक टिकटों पर तत्कालीन गर्वनर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने गवर्नमेण्ट हाउस में सरकारी काम में प्रयुक्त करने हेतु ‘सर्विस’ शब्द छपवा दिया। इन आलोचनाओं के बाद कि किसी की स्मृति में जारी डाक टिकटों के ऊपर ‘सर्विस’ नहीं छापा जाता, उन टिकटों को तुरन्त नष्ट कर दिया गया। पर इन दो-तीन दिनों मे जारी सर्विस छपे चार डाक टिकटों के सेट का मूल्य आज तीन लाख रूपये से अधिक है। एक घटनाक्रम में ब्रिटेन के न्यू ब्रेंजविक राज्य के पोस्टमास्टर जनरल ने डाक टिकट पर स्वयं अपना चित्र छपवा दिया। ब्रिटेन में डाक टिकटों पर सिर्फ वहाँ के राजा और रानी के चित्र छपते हैं, ऐसे में तत्कालीन महारानी विक्टोरिया ने यह तथ्य संज्ञान में आते ही डाक टिकटों की छपाई रूकवा दी पर तब तक पचास डाक टिकट जारी होकर बिक चुके थे। फलस्वरूप दुर्लभता के चलते इन डाक टिकटों की कीमत आज लाखों में है। एक रोचक घटनाक्रम में सन् 1965 में एक सोलह वर्षीय किशोर ने गरीबी खत्म करने हेतु अमेरिका के पोस्टमास्टर जनरल को सुझाव भेजा कि कुछ डाक-टिकट जानबूझ कर गलतियों के साथ छापे जायें और उनको गरीबों को पाँच-पाँच सेण्ट में बेच दिया जाय। ये गरीब इन टिकटों को संग्रहकर्ताओं को मुँहमाँगी कीमतों पर बेचकर अपना जीवन सुधार सकेंगे।

Monday, June 8, 2009

श्रृंगार-कक्ष की दीवारों से आरम्भ हुआ डाक टिकट संग्रह का शौक

सामान्यतः डाक टिकट एक छोटा सा कागज का टुकड़ा दिखता है, पर इसका महत्व और कीमत दोनों ही इससे काफी ज्यादा है। डाक टिकट वास्तव में एक नन्हा राजदूत है, जो विभिन्न देशों का भ्रमण करता है एवम् उन्हें अपनी सभ्यता, संस्कृति और विरासत से अवगत कराता है। यह किसी भी राष्ट्र के लोगों, उनकी आस्था व दर्शन, ऐतिहासिकता, संस्कृति, विरासत एवं उनकी आकांक्षाओं व आशाओं का प्रतीक है। यह मन को मोह लेने वाली जीवन शक्ति से भरपूर है।

डाक-टिकटों के संग्रह की भी एक दिलचस्प कहानी है। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में यूरोप में एक अंग्रेज महिला को अपने श्रृंगार-कक्ष की दीवारों को डाक टिकटों से सजाने की सूझी और इस हेतु उसने सोलह हजार डाक-टिकट परिचितों से एकत्र किए और शेष हेतु सन् 1841 में ‘टाइम्स आफ लंदन’ समाचार पत्र में विज्ञापन देकर पाठकों से इस्तेमाल किए जा चुके डाक टिकटों को भेजने की प्रार्थना की- "A young lady, being desirous of covering her dressing room with cancelled Postage stamps, has been so for encouraged in her wish by private friends as to have succeeded in collecting 16,000। These, however being insufficient, she will be greatly obliged if any good natured person who may have these (otherwise useless) little articles at their disposal, would assist her in her whimsical project। Address to E.D. Mr. Butt’s Glover, Leadenhall Street, or Mr. Marshall’s Jewaller Hackeny."

इसके बाद धीमे-धीमे पूरे विश्व में डाक-टिकटों का संग्रह एक शौक के रूप में परवान चढ़ता गया। दुनिया में डाक टिकटों का प्रथम एलबम 1862 में फ्रांस में जारी किया गया। आज विश्व में डाक-टिकटों का सबसे बड़ा संग्रह ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के पास है। भारत में भी करीब पचास लाख लोग व्यवस्थित रूप से डाक-टिकटों का संग्रह करते हैं। भारत में डाक टिकट संग्रह को बढ़ावा देने के लिए प्रथम बार सन् 1954 में प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय डाक टिकट प्रदर्शनी का आयोजन किया गया । उसके पश्चात से अनेक राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय और क्षेत्रीय प्रदर्शनियों का आयोजन होता रहा है। वस्तुतः इन प्रदर्शनियों के द्वारा जहाँ अनेकों समृद्ध संस्कृतियों वाले भारत राष्ट्र की गौरवशाली परम्परा को डाक टिकटों के द्वारा चित्रित करके विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक सन्देशों को प्रसारित किया जाता है, वहीं दूसरी तरफ यह विभिन्न राष्ट्रों के मध्य सद्भावना एवम् मित्रता में उत्साहजनक वृद्धि का परिचायक है। इसी परम्परा में भारतीय डाक विभाग द्वारा 1968 में डाक भवन नई दिल्ली में ‘राष्ट्रीय फिलेटली संग्रहालय’ की स्थापना की और 1969 में मुम्बई में प्रथम फिलेटलिक ब्यूरो की स्थापना की गई। डाक टिकटों के अलावा मिनिएचर शीट, सोवीनियर शीट, स्टैम्प शीटलैट, स्टैम्प बुकलैट, कलैक्टर्स पैक व थीमेटिक पैक के माध्यम से भी डाक टिकट संग्रह को रोचक बनाने का प्रयास किया गया है।

Sunday, June 7, 2009

रोलैण्ड हिल बने डाक टिकटों के जनक

जिस समय पत्रों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने का शुल्क तय किया गया और वह गंतव्य पर लिखा जाने लगा तो उन्हीं दिनों इंगलैण्ड के एक स्कूल अध्यापक रोलैण्ड हिल ने देखा कि बहुत से पत्र पाने वालों ने पत्रांे को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया और पत्रों का ढेर लगा हुआ है, जिससे कि सरकारी निधि की क्षति हो रही है। यह सब देख कर उन्होंने सन् 1837 में ‘पोस्ट आफिस रिफार्म’ नामक पत्र के माध्यम से बिना दूरी के हिसाब से डाक/टिकटों की दरों में एकरूपता लाने का सुझाव दिया। उन्होंने चिपकाए जाने वाले ‘लेबिल’ की बिक्री का सुझाव दिया ताकि लोग पत्र भेजने के पहले उसे खरीदे और पत्र पर चिपका कर अपना पत्र भेजें। इस प्रकार रोलैण्ड हिल (1795-1879) को डाक टिकटों का जनक कहा जाता है। इन्हीं के सुझाव पर 6 मई 1840 को विश्व का प्रथम डाक टिकट ‘पेनी ब्लैक’ ब्रिटेन द्वारा जारी किया गया। भारत में प्रथमतः डाक टिकट 1 जुलाई 1852 को सिन्ध के मुख्य आयुक्त सर बर्टलेफ्र्रोरे द्वारा जारी किए गए। आधे आने के इस टिकट को सिर्फ ंिसन्ध राज्य हेतु जारी करने के कारण ‘सिंदे डाक’ कहा गया एवं मात्र बम्बई-कराची मार्ग हेतु इसका प्रयोग होता था। सिंदे डाक को एशिया में जारी प्रथम डाक टिकट एवं विश्व स्तर पर जारी प्रथम सर्कुलर डाक टिकट का स्थान प्राप्त है । 1 अक्टूबर 1854 को पूरे भारत हेतु महारानी विक्टोरिया के चित्र वाले डाक टिकट जारी किये गये।

1904 में भारत में सर्वप्रथम ‘स्टैम्प बुकलेट’ जारी की गयी। 1926 में इण्डिया सिक्यूरिटी प्रेस नासिक में डाक टिकटों की छपाई आरम्भ होने पर 1931 में प्रथम चित्रात्मक डाक टिकट नई दिल्ली के उद्घाटन पर जारी किया गया। 1935 में ब्रिटिश सम्राट जाॅर्ज पंचम की रजत जयन्ती के अवसर पर प्रथम स्मारक डाक टिकट जारी किया गया। स्वतन्त्रता पश्चात 21 नवम्बर 1947 को प्रथम भारतीय डाक टिकट साढे़ तीन आने का ‘‘जयहिन्द’’ जारी किया गया। सन् 1972 से इण्डिया सिक्यूरिटी प्रेस नासिक में डाक टिकटों की बहुरंगी छपाई आरम्भ हो गयी। 21 फरवरी 1911 को विश्व की प्रथम एयरमेल सेवा भारत द्वारा इलाहाबाद से नैनी के बीच आरम्भ की गयी। राष्ट्रमण्डल देशों मे भारत पहला देश है जिसने सन् 1929 में हवाई डाक टिकट का विशेष सेट जारी किया।

Saturday, June 6, 2009

वैज्ञानिक भी मुरीद हुये डाक टिकट संकलन के

सामान्यतः फिलेटली को डाक टिकटों का संकलन कहा जाता है पर बदलते वक्त के साथ फिलेटली डाक टिकटों, प्रथम दिवस आवरण, विशेष आवरण, पोस्ट मार्क, डाक स्टेशनरी एवं डाक सेवाओं से सम्बन्धित साहित्य का व्यवस्थित संग्रह एवं अध्ययन बन गया है। रंग-बिरंगे डाक टिकटों में निहित सौन्दर्य जहाँ इसका कलात्मक पक्ष है, वहीं इसका व्यवस्थित अध्ययन इसके वैज्ञानिक पक्ष को प्रदर्शित करता है।‘‘फिलेटली’’ शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के शब्द ‘फिलोस’ व ‘एटलिया’ से हुई। ‘फिलोस’ माने किसी वस्तु से प्यार और ‘एटलिया’ माने कर से मुक्त। सन् 1864 में 24 वर्षीय फ्रांसीसी व्यक्ति जार्ज हाॅर्पिन ने ‘फिलेटली’ शब्द का इजाद किया। इससे पूर्व इस विधा को ‘टिम्बरोलाॅजी’ नाम से जाना जाता था। फ्रेंच भाषा में टिम्बर का अर्थ टिकट होता है। एडवर्ड लुइन्स पेम्बर्टन को ‘साइन्टिफिक फिलेटली’ का जनक माना जाता है। डाक टिकटों के सौन्दर्य पर मोहित होने वालों की कमी नहीं है पर प्रसिद्ध नोबेल पुरस्कार प्राप्त भौतिक विज्ञानी अर्नेस्ट रदरफोर्ड डाक टिकटों पर इतना मोहित हो गये कि, एक बार उन्होंने कहा कि - ‘सभी विज्ञान या तो भौतिक विज्ञान हैं अथवा डाक टिकट संग्रह।’ (All science is either physics or stamp collecting). रदरफोर्ड का यह कथन दर्शाता है कि डाक टिकट संग्रह सिर्फ एक शौक नहीं है वरन् व्यवस्थित ज्ञान और अध्ययन का भी विषय है।

Friday, June 5, 2009

कभी फिलेटली था राजाओं का शौक

डाक-टिकटों का संग्रह अर्थात फिलेटली मानव के लोकप्रिय शौकों में से एक रहा है। इसे अपनी व्यापकता एवं सुन्दरता के चलते ‘शौकों का राजा’ कहा जाता है। एक जमाना था कि फिलेटली को सिर्फ राजाओं का शौक माना जाता था। इंग्लैण्ड के सम्राट जार्ज पंचम इस शौक के बहुत मुरीद थे। जार्ज पंचम के फिलेटली शौक के बारे में सर हेराल्ड निकोलसन ने लिखा है कि -''For seventeen years he did nothing at all but kill animals and stick in stamps.'' यही नहीं, एक बार सम्राट जार्ज पंचम को किसी डाक टिकट विक्रेता के यहाँ से डाक टिकट खरीदते उनके रिश्तेदार ने देख लिया और इसकी शिकायत उनकी पत्नी महारानी मेरी से की। इसके उत्तर में महारानी मेरी ने कहा- ‘मुझे पता है कि मेरे पति शौक हेतु डाक टिकट खरीदते हैं और यह अच्छा भी है, क्योंकि यह शौक उन्हें अन्य बुरी प्रवृतियों से दूर रखता है।’ महारानी मेरी का यह कथन एक शौक के रूप में डाक टिकट संग्रह की अद्भुत प्रासंगिकता पर भी प्रकाश डालता है। आज भी विश्व में डाक-टिकटों का सबसे बडा संग्रह ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के पास है। इसी प्रकार आस्ट्रिया के राजकुमार चाल्र्स (1882-1922) का जब राज्याभिषेक किया जा रहा था तो उन्होंने मजाक में कहा कि - ‘‘इसकी क्या जरूरत है। बेहतर होगा कि सिंहासन पर मेरी मुखाकृति अंकित एक डाक टिकट रख दी जाये।’’ बदलते वक्त के साथ राजाओं का शौक कही जाने वाली इस विधा ने आज सामान्य जनजीवन में भी उतनी ही लोकप्रियता प्राप्त कर ली है। भारत में करीब पचास लाख लोग व्यवस्थित रूप से डाक-टिकटों का संग्रह करते हैं।

विश्व पर्यावरण दिवस पर लगायें पौधे

!!! आइये धरा की रक्षा का संकल्प लें और पर्यावरण को समृद्ध करें !!!


(विश्व पर्यावरण दिवस पर पौधा लगाते भारतीय डाक सेवा के अधिकारी के.के.यादव)